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करेंट अफेयर्स और संग्रह

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सांविधानिक विधि

अंतरिम आदेश और उच्च न्यायालय की समयसीमा

 21-Jan-2026

गिरिराज एवं अन्य बनाम मो. अमीर एवं अन्य 

"उच्च न्यायालय को संविधान के अनुच्छेद 226(3) का अनुपालन करना होगाजो अंतरिम आदेशों को रद्द करने के लिये आवेदनों का निपटारा दो सप्ताह के भीतर अनिवार्य करता है।" 

न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और प्रसन्ना बी. वराले 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

गिरिराज और अन्य बनाम मोहम्मद अमीर और अन्य (2025)के मामले में न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और प्रसन्ना बी. वराले की पीठने इलाहाबाद उच्च न्यायालय को अंतरिम आदेश को रद्द करने के लिये लंबित आवेदन का निपटारा करने का निदेश दियाजिसमें भारत के संविधान, 1950 (COI) के अनुच्छेद 226(3) के अनुपालन पर बल दिया गया। 

गिरिराज एवं अन्य बनाम मोहम्मद आमिर एवं अन्य (2025) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक रिट याचिका पर यथास्थिति बनाए रखने का अंतरिम आदेश पारित किया था। 
  • याचिकाकर्त्ताओं ने इस अंतरिम आदेश को चुनौती देते हुए उच्चतम न्यायालय में विशेष अनुमति याचिका दायर की। 
  • अंतरिम आदेश को रद्द करने के लिये जनवरी 2025 में उच्च न्यायालय में एक आवेदन दायर किया गया था। 
  • समय बीतने के बावजूद, 16 जनवरी, 2026 तक आवेदन का कोई निपटारा नहीं हुआ था। 
  • इस मामले की सुनवाई 19 जनवरी, 2026 को उच्च न्यायालय में सूचीबद्ध की गई थी। 
  • याचिकाकर्त्ताओं ने अंतरिम आदेश के जारी रहने के विरुद्ध अनुतोष पाने के लिये उच्चतम न्यायालय का रुख किया। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • उच्चतम न्यायालय ने विशेष अनुमति याचिका दाखिल करने में हुए विलंब को क्षमा कर दिया। 
  • न्यायालय ने दोनों पक्षकारों की ओर से उपस्थित विद्वान अधिवक्ताओं की दलीलें सुनीं। 
  • पीठ ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 226(3) पर प्रकाश डालाजिसमें अंतरिम आदेशों को रद्द करने के लिये आवेदनों के निपटान के संबंध में एक विशिष्ट जनादेश सम्मिलित है। 
  • न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 226(3) के अनुसारउच्च न्यायालय को ऐसे आवेदन दाखिल करने की तिथि से दो सप्ताह की अवधि के भीतर निपटाना आवश्यक है। 
  • न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि इस सांविधानिक उपबंध के होते हुए भीयह आवेदन जनवरी 2025 से बिना किसी निपटारे के लंबित है। 
  • इस बात पर ध्यान देते हुए कि मामला पहले ही 19 जनवरी, 2026 को उच्च न्यायालय के समक्ष सूचीबद्ध थाउच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालय से आवेदन पर विचार करने और उसके गुण-दोष के आधार पर उसका निपटारा करने का अनुरोध किया। 
  • न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि उसने पक्षकारों द्वारा प्रस्तुत किये गए प्रतिद्वंद्वी तर्कों की खूबियों पर कोई राय व्यक्त नहीं की है। 
  • उच्च न्यायालय को जारी किये  गए निदेशों के मद्देनजर उच्चतम न्यायालय ने विशेष अनुमति याचिका का निपटारा कर दिया। 
  • उच्चतम न्यायालय के समक्ष लंबित सभी आवेदनों का भी तदनुसार निपटारा कर दिया गया। 

भारत के संविधान का अनुच्छेद 226 क्या है? 

बारे में: 

  • अनुच्छेद 226 संविधान के भाग के अंतर्गत निहित हैजो उच्च न्यायालय को रिट जारी करने की शक्ति प्रदान करता है। 
  • भारत के संविधान के अनुच्छेद 226(1) मेंकहा गया है कि प्रत्येक उच्च न्यायालय को मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन और अन्य प्रयोजन के लिये किसी व्यक्ति या किसी सरकार को बंदी प्रत्यक्षीकरणपरमादेशप्रतिषेधअधिकार-पृच्छा और उत्प्रेषण याचिका सहित आदेश या रिट जारी करने की शक्ति होगी। 
  • अनुच्छेद 226(2)में कहा गया है कि उच्च न्यायालय को किसी भी व्यक्तिसरकार या प्राधिकारी को रिट या आदेश जारी करने का अधिकार है। 
    • इसके अधिकारिता के भीतर स्थित या 
    • यदि वाद-हेतुक उत्पन्न होने वाली परिस्थितियाँ पूर्णतः या भागत: उसके क्षेत्रीय अधिकारिता के भीतर उत्पन्न होती हैंतो वह उसके स्थानीय अधिकारिता से बाहर हो जाती है। 
  • अनुच्छेद 226(3)में कहा गया है कि जब किसी पक्षकार के विरुद्ध उच्च न्यायालय द्वारा व्यादेशस्थगन या अन्य माध्यमों से अंतरिम आदेश पारित किया जाता हैतो वह पक्षकार न्यायालय में ऐसे आदेश को रद्द करने के लिये आवेदन कर सकता है और न्यायालय द्वारा ऐसे आवेदन का निपटारा दो सप्ताह की अवधि के भीतर किया जाना चाहिये 
  • अनुच्छेद 226(4)कहता है कि इस अनुच्छेद द्वारा उच्च न्यायालय को दी गई शक्ति अनुच्छेद 32 के खण्ड (2) द्वारा उच्चतम न्यायालय को दी गई शक्ति को कम नहीं करेगी। 
  • यह अनुच्छेद सरकार सहित किसी भी व्यक्ति या प्राधिकारी के विरुद्ध जारी किया जा सकता है। 
  • यह मात्र एक सांविधानिक अधिकार हैमौलिक अधिकार नहींऔर आपातकाल के दौरान भी इसे निलंबित नहीं किया जा सकता है। 
  • अनुच्छेद 226 मौलिक अधिकारों के मामले में अनिवार्य प्रकृति का है और जब इसे "किसी अन्य प्रयोजन" के लिये जारी किया जाता है तो विवेकाधीन प्रकृति का होता है। 
  • यह न केवल मौलिक अधिकारों को अपितु अन्य विधिक अधिकारों को भी लागू करता है। 

अनुच्छेद 226 के अधीन उपलब्ध रिट याचिकाएँ: 

  • बंदीप्रत्यक्षीकरण याचिका (Writ of Habeas Corpus) : 
    • यह एक लैटिन वाक्यांश है जिसका अर्थ है 'शरीर के साथ प्रस्तुत करना'। 
    • यह सबसे अधिक प्रयोग किये जाने वाली याचिका है। 
    • जब किसी व्यक्ति को सरकार द्वारा सदोषपूर्ण निरुद्ध किया जाता हैतब वह व्यक्ति स्वयं या उसके परिवारजन/मित्र उसके मुक्त किये जाने हेतु बंदी प्रत्यक्षीकरण की रिट दायर कर सकते हैं।  
  • परमादेश याचिका (Writ of Mandamus) : 
    • यह एक लैटिन वाक्यांश है जिसका अनुवाद 'हम आदेश देते हैंहोता है। 
    • परमादेश एक न्यायिक आदेश है जो सभी लोक प्राधिकारियों को उनके लोक कर्त्तव्य के निर्वहन हेतु जारी किया जाता है 
    • इसका उपयोग सांविधानिकसांविधिकअसांविधिकविश्वविद्यालयोंन्यायालयों और अन्य निकायों द्वारा लोक कर्त्तव्यों के निष्पादन के लिये किया जाता है। 
    • इस याचिका का प्रयोग करने की एकमात्र शर्त यह है कि लोक कर्त्तव्य होना चाहिये।  
  • उत्प्रेषण याचिका (Writ of Certiorari) : 
    • यह एक लैटिन वाक्यांश है जिसका अर्थ है 'सूचित किया जाना'। 
    • यह रिट उच्चतर न्यायालय द्वारा निम्नतर न्यायालय या अधिकरण को जारी की जाती है । 
    • जब कोई अधीनस्थ न्यायालय प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन करता हैतब यह रिट जारी की जाती है । 
    • यदि उच्च न्यायालय को अधीनस्थ न्यायालय द्वारा दिये गए आदेश में कोई त्रुटि मिलती हैतो वह उसे निरस्त (quash) कर सकता है। 
  • प्रतिषेध याचिका (Writ of Prohibition) : 
    • इसका सीधा सा अर्थ है 'रोकना'। 
    • यह रिट अधीनस्थ न्यायालयों (अर्थात् अधीनस्थ न्यायालयोंअधिकरणोंअर्ध-न्यायिक निकायों) के विरुद्ध उच्च न्यायालय द्वारा जारी की जाती है। 
  • अधिकार-पृच्छा याचिका (Writ of Quo Warranto) : 
    • अधिकार-पृच्छा शब्द का अर्थ है 'किस अधिकार से'। 
    • यह किसी निजी व्यक्ति के विरुद्ध उस अधिकार के अधीन जारी की जाती है जिसके अधीन वह ऐसे पद पर आसीन है जिस पर उसे कोई अधिकार नहीं है। 
    • इस रिट के माध्यम से न्यायालय लोक अधिकारियों की नियुक्ति को नियंत्रित कर सकता है और किसी नागरिक को उस लोक पद से वंचित होने से बचा सकता है जिसका वह हकदार हो सकता है। 

विधिक मामले: 

  • बंधुआ मुक्ति मोर्चा बनाम भारत संघ (1984) केमामले मेंउच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि अनुच्छेद 226 का दायरा अनुच्छेद 32 की तुलना में कहीं अधिक व्यापक है क्योंकि अनुच्छेद 226 को विधिक अधिकारों की रक्षा के लिये भी जारी किया जा सकता है। 
  • कॉमन कॉज बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2018) के मामलेमें, उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि लोक प्राधिकारियों द्वारा लोक दायित्त्वों को लागू करने के लिये अनुच्छेद 226 के अधीन रिट भी जारी की जा सकती है। 

सिविल कानून

राष्ट्रीय हरित अधिकरण भवन योजना के उल्लंघन से संबंधित विवादों का निर्णय नहीं कर सकता

 21-Jan-2026

राज सिंह गेहलोत एवं अन्य बनाम अमिताभ सेन और अन्य  

"खुले एवं हरित क्षेत्रों के संदर्भ में भवन योजनाओं के अनुपालन न किये जाने से संबंधित विवाद मेंपर्यावरण का प्रश्न राष्ट्रीय हरित अधिकरण के समक्ष कोई महत्त्वपूर्ण पर्यावरणीय प्रश्न नहीं थाअतः इस प्रकरण में राष्ट्रीय हरित अधिकरण द्वारा अपने अधिकारिता के आह्वान को औचित्यपूर्ण नहीं ठहराया जा सकता।"  

न्यायमूर्ति जे.बी. परदीवाला और संदीप मेहता

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

राज सिंह गहलोत और अन्य बनाम अमिताभ सेन और अन्य (2025)के मामले में न्यायमूर्ति जे.बी. परदीवाला और संदीप मेहता की पीठ नेनिर्णय दिया कि राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) उन विवादों का निपटारा नहीं कर सकता जो मूल रूप से भूमि उपयोगज़ोनिंग नियमों और नगर नियोजन अनुपालन से संबंधित हैंभले ही ऐसे विवादों को पर्यावरणीय चिंताओं के रूप में प्रस्तुत किया जाए।   

राज सिंह गहलोत और अन्य बनाम अमिताभ सेन और अन्य (2025) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • यह मामला गुरुग्राम में स्थित एंबियंस लैगून आइलैंड परियोजना से संबंधित विशेष अनुमति याचिकाओं के एक समूह से संबंधित था।  
  • आरोप लगाए गए थे किआवासीय उपयोग के लिये मूल रूप से लाइसेंस प्राप्त भूमि पर वाणिज्यिक निर्माण किये गए थे।   
  • इस विवाद को पर्यावरणीय प्रभावों से जुड़ा हुआ बताया गया। 
  • इन दावों पर कार्यवाही करते हुएराष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने पर्यावरण संबंधी प्रतिकर का आदेश देते हुए अंतरिम आदेश पारित किये 
  • राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने कथित उल्लंघनों का आकलन करने के लिये विशेषज्ञ समितियों का गठन किया। 
  • एक विशेषज्ञ समिति (संयुक्त विशेषज्ञ समिति) ने भारी शास्ति की सिफारिश कीजिसमें निम्नलिखित सम्मिलित हैं: 
    • 138.83 करोड़ रुपए का जुर्माना। 
    • पर्यावरण संबंधी प्रतिकर के रूप में 10.33 करोड़ रुपए 
    • विकासकर्त्ताओं से उनके लाभ का 25% से 50% तक रोके जाने का निदेश 
    • वाणिज्यिक परिसर में कुछ इमारतों को ध्वस्त किये जाने की संभावना है। 
  • मुख्य विवाद लाइसेंस रद्द करने की वैधता और नगर नियोजन विधियों के अधीन भूमि के वाणिज्यिक उपयोग की अनुमति से संबंधित था।  
  • इन विवाद्यकों से संबंधित कार्यवाही पहले से ही पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के समक्ष लंबित थी। 
  • अपीलकर्त्ता- एम्बिएंस डेवलपर्स ने इस मामले पर सुनवाई करने के लिये राष्ट्रीय हरित अधिकरण की अधिकारिता को चुनौती दी। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • न्यायालय ने पाया कि मूल विवाद पर्यावरणीय क्षरण नहीं अपितु लाइसेंस रद्द करने की वैधता औरनगर नियोजन विधियों के अधीनभूमि के वाणिज्यिक उपयोग की अनुमति से संबंधित था। 
  • पीठ ने टिप्पणी की कि "खुले और हरित क्षेत्रों के संबंध में भवन योजनाओं के अनुपालन न करने से संबंधित विवाद... पर्यावरण का विवाद्यकराष्ट्रीय हरित अधिकरण के समक्ष कोई महत्त्वपूर्ण प्रश्न नहींथाजिससे इस मामले में राष्ट्रीय हरित अधिकरण द्वारा अधिकारिता का प्रयोग उचित ठहराया जा सके। अपितुवर्तमान मामला अपीलकर्त्ता-एम्बेंस डेवलपर्स की भूमि के उपयोग में अनियमितताओं से संबंधित पक्षकारों के विवादित दावों से संबंधित हैजिसका उपयोग आवासीय कॉलोनी के विकास में किया गया था।" 
  • न्यायालय ने इस बात की पुनः पुष्टि की कि जहाँ विवाद मूल रूप से भूमि उपयोगज़ोनिंगभवन योजना अनुमोदन और नगर नियोजन अनुपालन से संबंधित हैवहाँ यहराष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 की धारा 14 के अधीनराष्ट्रीय हरित अधिकरण की अधिकारिता से बाहर आता है । 
  • न्यायालय ने उच्च न्यायालय में लंबित मामले के निपटारे तक राष्ट्रीय हरित अधिकरण  के समक्ष लंबित कार्यवाही को स्थगित रखा। 
  • न्यायालय ने निदेश दिया कि राष्ट्रीय हरित अधिकरण द्वारा पारित संयुक्त विशेषज्ञ समिति के गठन का आदेशजिसमें भारी जुर्माने और शास्ति अधिरोपित करने की सिफारिश की गई थीपर फिलहाल अमल नहीं किया जाएगा।  

राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) क्या है? 

बारे में: 

  • यह राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 (NGT Act) के अधीन स्थापित एक विशेष निकाय हैजिसका उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण और वनों तथा अन्य प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से संबंधित मामलों का प्रभावी और शीघ्र निपटान करना है।    
  • राष्ट्रीय हरित अधिकरण की स्थापना के साथभारत ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के बाद दुनिया का तीसरा देश बन गया जिसने एक विशेष पर्यावरण अधिकरण की स्थापना कीऔर ऐसा करने वाला पहला विकासशील देश बन गया। 
  • राष्ट्रीय हरित अधिकरण को आवेदन या अपील दाखिल होने के मास के भीतर उनका अंतिम निपटारा करने का दायित्त्व सौंपा गया है।  
  • राष्ट्रीय हरित अधिकरण के पाँच बैठक स्थल हैंनई दिल्ली मुख्य बैठक स्थल है और भोपालपुणेकोलकाता और चेन्नई अन्य चार हैं। 

राष्ट्रीय हरित अधिकरण की संरचना: 

  • गठन: 
    • अधिकरण में अध्यक्षन्यायिक सदस्य और विशेषज्ञ सदस्य सम्मिलित होते हैं। इनका कार्यकाल तीन वर्ष का या पैंसठ वर्ष की आयु तकजो भी पहले होतक रहेगा और ये पुनर्नियुक्ति के पात्र नहीं हैं।  
  • नियुक्ति: 
    • अध्यक्ष की नियुक्ति केंद्रीय सरकार द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) से परामर्श के पश्चात् की जाती है 
    • न्यायिक सदस्यों और विशेषज्ञ सदस्यों की नियुक्ति के लिये केंद्र सरकार द्वारा एक चयन समिति का गठन किया जाएगा। 
  • सदस्य संख्या: 
    • अधिकरण में न्यूनतम 10 तथा अधिकतम 20 पूर्णकालिक न्यायिक एवं विशेषज्ञ सदस्य नियुक्त किये जा सकते हैं । 

शक्ति एवं अधिकारिता: 

  • प्रक्रिया का विनियमन: 
    • राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 की धारा 19 राष्ट्रीय हरित अधिकरण को अपनी प्रक्रिया को विनियमित करने का अधिकार देती है। 
  • सिविल मामलों में अधिकारिता 
    • अधिकरण को उन सभी सिविल मामलों पर अधिकारिता प्राप्त है जिनमें पर्यावरण से संबंधित कोई महत्त्वपूर्ण प्रश्न (जिसमें पर्यावरण से संबंधित किसी विधिक अधिकार का प्रवर्तन भी सम्मिलित है) निहित हो 
      • अक्टूबर 2021 मेंउच्चतम न्यायालय ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण की स्थिति को एक "अद्वितीय" मंच के रूप में घोषित कियाजिसे देश भर में पर्यावरणीय मुद्दों को उठाने के लिये स्वतः संज्ञान (suo motu) लेने की शक्तियां प्राप्त हैं।   
  • अपीलीय अधिकारिता: 
    • न्यायालयों के समान एक सांविधिक न्यायनिर्णायक निकाय होने के कारणराष्ट्रीय हरित अधिकरण को आवेदन प्रस्तुत किये जाने पर मूल अधिकारिता के अतिरिक्त अपीलीय अधिकारिता भी प्राप्त है। । 
  • प्राकृतिक न्याय:  
    • अधिकरण सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 तथा भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 में निहित प्रक्रिया से बाध्य नहीं हैतथापि यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों द्वारा निदेशित होगा 
  • प्रदूषक भुगतान सिद्धांत: 
    • किसी भी आदेश/निर्णय/पंचाट को पारित करते समयइसमें सतत विकास के सिद्धांतएहतियाती सिद्धांत और प्रदूषक भुगतान सिद्धांत को लागू किया जाएगा। 
  • शक्ति: 
    • प्रदूषण और अन्य पर्यावरणीय क्षति (जिसमें किसी भी खतरनाक पदार्थ को संभालते समय होने वाली दुर्घटनाएं शामिल हैं) के पीड़ितों को अनुतोष और प्रतिकर प्रदान करना। 
    • क्षतिग्रस्त संपत्ति की क्षतिपूर्ति के लिये और 
    • अधिकरण द्वारा उचित समझे जाने वाले किसी भी क्षेत्र या क्षेत्रों के पर्यावरण की बहाली के लिये 
    • अधिकरण का कोई आदेश/निर्णय/पंचाट सिविल न्यायालय के निर्णय के समान ही निष्पादन योग्य होता है। 
  • शास्ति 
    • तीन वर्ष तक का कारावास की सजा। 
    • दस करोड़ रुपए तक का जुर्माना और 
    • जुर्माना और कारावास दोनों। 
  • अपील: 
    • राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के आदेश/निर्णय/पंचाट के विरुद्ध अपील सामान्यत: सूचना मिलने की तारीख से नब्बे दिनों के भीतर उच्चतम न्यायालय में की जा सकती है। 
  • प्रमुख विधियाँ: 
    • जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974, 
    • जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) उपकर अधिनियम, 1977, 
    • वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980, 
    • वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1981, 
    • पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986, 
    • लोक दायित्त्व बीमा अधिनियम, 1991 और 
    • जैव विविधता अधिनियम, 2002। 
    • इन विधियों से संबंधित किसी भी उल्लंघन या इन विधियों के अधीन सरकार द्वारा लिये गए किसी भी निर्णय को राष्ट्रीय हरित अधिकरण के समक्ष चुनौती दी जा सकती है।