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आपराधिक कानून
परिवीक्षा पर छोड़ देने का समावेश
23-Jan-2026
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अधीक्षण अभियंता बनाम श्रम न्यायालय, मदुरै और अन्य "उच्च न्यायालय ने यह टिप्पणी करके त्रुटी की कि इस मामले में श्रमिक की दोषसिद्धि अयोग्यता नहीं होगी और केवल यह दोषसिद्धि ही श्रमिक को सेवा से हटाने का आधार नहीं है।" न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और एन.वी. अंजारिया |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
अधीक्षण अभियंता बनाम श्रम न्यायालय मदुरै और अन्य (2025) के मामले में न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और एन.वी. अंजारी की पीठ ने मद्रास उच्च न्यायालय के उस निर्णय को अपास्त कर दिया, जिसमें एक कामगार के दण्ड को केवल इसलिये कम कर दिया गया था क्योंकि उसे आपराधिक कार्यवाही में परिवीक्षा का लाभ दिया गया था, यह दोहराते हुए कि परिवीक्षा पर छोड़ देने से दोषसिद्धि के कलंक को नहीं मिटाया जा सकता है।
अधीक्षण अभियंता बनाम श्रम न्यायालय मदुरै और अन्य (2025) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- यह मामला एक ऐसे कामगार से संबंधित था जिसे अपने भाई का रूप धारण करके और कूटरचित शैक्षणिक प्रमाण पत्र का उपयोग करके नियुक्त किया गया था।
- आंतरिक जांच के बाद, उस कर्मचारी को नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया।
- श्रम न्यायालय ने बर्खास्तगी के दण्ड को तीन वर्ष के लिये वेतन में कटौती और वेतन वृद्धि में कमी से परिवर्तित कर दिया।
- बाद में मद्रास उच्च न्यायालय ने दण्ड को संशोधित करके अनिवार्य सेवानिवृत्ति में परिवर्तित कर दिया।
- उच्च न्यायालय ने इस तथ्य पर काफी हद तक विश्वास किया कि उसी अवचार से संबंधित आपराधिक कार्यवाही में कामगार को परिवीक्षा का लाभ दिया गया था।
- अधीक्षण अभियंता ने दण्ड कम करने के उच्च न्यायालय के निर्णय को चुनौती देते हुए उच्चतम न्यायालय में अपील की।
- अपीलकर्त्ता ने यह तर्क देने के लिये यूनियन ऑफ इंडिया बनाम बख्शी राम (1990) के मामले पर विश्वास किया कि परिवीक्षा पर छोड़ देने से दोषसिद्धि के कलंक को मिटाया नहीं जा सकता है।
- अपीलकर्त्ता ने तर्क दिया कि जब तक दोषसिद्धि बरकरार है, प्रत्यर्थी-कर्मचारी को परिवीक्षा पर छोड़ देने को अनिवार्य सेवानिवृत्ति के स्थान पर सेवा से बर्खास्तगी का दण्ड देने का आधार कभी नहीं माना जा सकता है।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- पीठ ने टिप्पणी की कि उच्च न्यायालय ने यह टिप्पणी करके त्रुटी की है कि श्रमिक की दोषसिद्धि अयोग्यता नहीं होगी और केवल यह दोषसिद्धि ही श्रमिक को सेवा से हटाने का आधार नहीं है।
- पीठ ने इस बात पर बल दिया कि परिवीक्षा पर छोड़ देने से दोषसिद्धि का कलंक नहीं मिटता।
- न्यायालय ने स्पष्ट किया कि आपराधिक कार्यवाही में परिवीक्षा का लाभ विभागीय कार्यवाही में दण्ड कम करने के आधार के रूप में प्रयोग नहीं किया जा सकता है।
- इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि प्रत्यर्थी-श्रमिक की मृत्यु हो चुकी है, पीठ ने उच्च न्यायालय द्वारा विवादित निर्णय में दिये गए दण्ड में संशोधन में हस्तक्षेप नहीं किया।
- तदनुसार अपील का निपटारा कर दिया गया।
परिवीक्षा पर छोड़ना क्या होता है?
- परिवीक्षा पर छोड़ना एक न्यायिक तंत्र है जो कुछ अपराधियों को अच्छे व्यवहार की शर्तों के अधीन, दण्ड भोगे बिना रिहा होने की अनुमति देता है।
- परिवीक्षा प्रणाली का उद्देश्य दण्ड देने के बजाय पहली बार या मामूली अपराध करने वालों का सुधार और पुनर्वास करना है।
- भारतीय विधि के अधीन, परिवीक्षा मुख्य रूप से अपराधी परिवीक्षा अधिनियम, 1958 द्वारा शासित होती है।
- जब किसी अपराधी को परिवीक्षा पर रिहा किया जाता है, तो उसे कारावास में नहीं डाला जाता है, किंतु उसे न्यायालय द्वारा निर्धारित कुछ शर्तों का पालन करना होता है।
- तथापि, परिवीक्षा दिये जाने पर भी दोषसिद्धि अभिलेख में बनी रहती है।
अपराधी परिवीक्षा अधिनियम, 1958 क्या है?
अपराधी परिवीक्षा अधिनियम, 1958 का परिचय
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क्र. सं. |
पहलू |
विवरण |
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1. |
शीर्षक |
परिवीक्षा अपराधी अधिनियम, 1958 |
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2. |
अधिनियम संख्या |
अधिनियम संख्या 20, सन् 1958 |
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3. |
अधिनियमित होने की तिथि |
16 मई, 1958 |
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4. |
प्रवर्तन की तिथि |
किसी राज्य में उस तिथि से, जिसे राज्य सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियुक्त करे; अधिनियम के विभिन्न भागों के लिये भिन्न-भिन्न तिथियाँ नियुक्त की जा सकती हैं। |
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5. |
स्थानीय विस्तार |
संपूर्ण भारत में विस्तार (2019 के संशोधन के पश्चात् जम्मू और कश्मीर सहित) |
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6. |
उद्देश |
अपराधियों को परिवीक्षा पर या सम्यक् भर्त्सना के पश्चात् छोड़ दिये जाने के लिये और इससे संबद्ध बातों के लिये उपबंध करने के लिये अधिनियम करना। |
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7. |
संरचना |
कुल धाराएँ: 19 |
अधिनियम के बारे में:
- अपराधियों को परिवीक्षा पर या सम्यक् भर्त्सना के पश्चात् छोड़ देना और उससे संबंधित मामलों के लिये एक अधिनियम ।
- इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य अपराधियों को कठोर अपराधी बनने से रोकने के लिये उन्हें स्वयं को सुधारने का अवसर देना है।
- यह अधिनियम अपराधियों को परिवीक्षा पर या सम्यक् भर्त्सना के पश्चात् छोड़ने का उपबंध करता है।
- यह अधिनियम अपराधियों को अच्छे व्यवहार के आधार पर परिवीक्षा पर छोड़ने की अनुमति देता है, बशर्ते कि उनके द्वारा किये गए कथित अपराध के लिये आजीवन कारावास या मृत्युदण्ड की दण्ड न हो।
- यह अधिनियम दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) (अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) के उपबंधों के अधीन दोषी ठहराए गए लोगों के साथ-साथ उन लोगों को भी सम्यक् भर्त्सना के पश्चात् छोड़ने की अनुमति देता है, जिन्हें 2 वर्ष का दण्ड या जुर्माना या दोनों का दण्डादेश दिया गया है।
सिविल कानून
कृत्रिम बुद्धिमत्ता द्वारा उत्पन्न नकली उद्धरणों का प्रयोग
23-Jan-2026
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गुम्मदी उषा रानी बनाम श्योर मल्लिकार्जुन राव "केवल इस कारण से कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) उपकरण के उपयोग के परिणामस्वरूप, समुचित सत्यापन के अभाव में, अस्तित्वहीन उद्धरणों का संदर्भ लिया गया, आदेश दूषित नहीं माना जाएगा, यदि आदेश में प्रतिपादित विधि तथा तथ्यों पर उसका अनुप्रयोग सही हो।" न्यायमूर्ति रवि नाथ तिलहारी |
स्रोत: आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति रवि नाथ तिलहारी ने गुम्माडी उषा रानी बनाम सुरे मल्लिकार्जुन राव (2025) के मामले में यह निर्णय दिया कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) द्वारा उत्पन्न अस्तित्वहीन उद्धरणों का मात्र उल्लेख, किसी आदेश को दूषित नहीं करता, यदि आदेश में विचारित विधि सही हो तथा वाद के तथ्यों पर विधि के अनुप्रयोग में कोई त्रुटि न हो।
गुम्माडी उषा रानी बनाम श्योर मल्लिकार्जुन राव (2025) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- विचारण न्यायालय ने एक वाद में अधिवक्ता आयुक्त की रिपोर्ट को स्वीकार किया था।
- आदेश पारित करते समय, न्यायिक अधिकारी ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) द्वारा उत्पन्न उद्धरणों पर, पश्चातवर्ती सत्यापन किये बिना, विश्वास किया।
- इसके परिणामस्वरूप आदेश में उन अधिकारियों को सम्मिलित कर लिया गया जिनका कोई अस्तित्व ही नहीं था।
- न्यायिक अधिकारी ने फिर भी रिपोर्ट को बरकरार रखते हुए कारण बताए थे।
- विचारण न्यायालय ने कहा कि अधिवक्ता आयुक्त की रिपोर्ट एक महत्त्वपूर्ण साक्ष्य है।
- इस रिपोर्ट की जांच अन्य साक्ष्यों के आलोक में की जा सकती है और विचारण के प्रक्रम पर इस पर विचार किया जाएगा।
- रिपोर्ट को केवल तभी नामंजूर किया जाएगा जब उसमें पूर्वाग्रह या अवचार के लक्षण पाए जाएंगे।
- याचिकाकर्त्ताओं ने विचारण न्यायालय के आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती दी।
- यह चुनौती इस आधार पर दी गई कि विचारण न्यायालय द्वारा जिन उद्धरणों पर विश्वास किया गया, वे अस्तित्व में नहीं थे।
- याचिकाकर्त्ताओं ने तर्क दिया कि यह आदेश अस्तित्वहीन उद्धरणों पर निर्भर होने के कारण अपास्त किये जाने योग्य है।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- न्यायालय ने यह टिप्पणी की कि यद्यपि उद्धरण अस्तित्वहीन हो सकते हैं, किंतु यदि विचारण न्यायालय ने विधि के सही सिद्धांतों पर विचार किया है तथा तथ्यों पर विधि का अनुप्रयोग भी सही है, तो आदेश में गलत या अस्तित्वहीन निर्णयों अथवा उद्धरणों का मात्र उल्लेख आदेश को अपास्त करने का आधार नहीं बन सकता।
- न्यायालय ने माना कि हस्तक्षेप तभी उचित होगा जब लागू किया गया विधि का सिद्धांत देश की विधि न हो या किसी दिये गए मामले में उसका अनुप्रयोग कृत्रिम बुद्धिमत्ता द्वारा उत्पन्न अस्तित्वहीन निर्णयों पर निर्भर होने के कारण त्रुटिपूर्ण हो।
- न्यायालय ने कहा कि न्यायिक अधिकारी ने विधि द्वारा समर्थित तर्कसंगत आदेश दिया था।
- आदेश में अभिलिखित कारण तथा विचारण न्यायालय द्वारा अपनाया गया दृष्टिकोण पूर्णतः औचित्यपूर्ण था और उसे विधि का समर्थन प्राप्त था।
- न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि अधिवक्ता आयुक्त की रिपोर्ट साक्ष्य का एक अंग है, जिस पर अंतिम सुनवाई के समय, उठाई गई आपत्तियों एवं अभिलेख पर उपलब्ध साक्ष्यों के अधीन, विचार किया जाना है।
- याचिकाकर्त्ता प्रतिपरीक्षा के माध्यम से रिपोर्ट के विरुद्ध आपत्तियाँ उठा सकते हैं।
- वर्तमान प्रक्रम में उक्त आदेश से याचिकाकर्त्ताओं को को कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं होगा।
- न्यायालय ने विवादित आदेश में कोई अवैधता नहीं पाई।
- न्यायालय ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि केवल इसलिये कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरण के उपयोग के कारण उचित सत्यापन के बिना अस्तित्वहीन उद्धरणों का उल्लेख किया गया था, आदेश को अमान्य नहीं किया जा सकता है, जब आदेश में उल्लिखित विधि और उसका अनुप्रयोग सही है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) उपकरणों के अनियंत्रित प्रयोग के विरुद्ध न्यायालय की चेतावनी:
- न्यायालय ने विधिक अनुसंधान और न्यायिक लेखन में AI उपकरणों के अनियंत्रित प्रयोग के विरुद्ध चेतावनी दी।
- तथापि AI उपकरणों का उद्देश्य दक्षता बढ़ाना है, परंतु न्यायिक शब्दावली में उनके अनियंत्रित उपयोग से गंभीर चिंताएँ उत्पन्न होती हैं।
- न्यायालय ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) उपकरणों पर बिना किसी सार्थक मानवीय निगरानी के अंधाधुंध विश्वास करने की प्रथा की निंदा की, जिससे उनके द्वारा उत्पन्न दावों की सटीकता को सत्यापित किया जा सके।
- इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि AI उपकरण ऐसे प्राधिकारियों को गढ़ सकते हैं या विद्यमान मामलों का हवाला दे सकते हैं जो विचाराधीन विवाद्यकों से विसंगत हैं।
- न्यायमूर्ति तिलहारी ने टिप्पणी की कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता की तुलना में वास्तविक बुद्धिमत्ता के अनुप्रयोग को प्राथमिकता दी जानी चाहिये।
- AI उपकरणों का उपयोग सावधानी और बुद्धिमत्ता के साथ किया जाना चाहिये।
- विचारण न्यायालयों को सलाह दी गई कि वे सतर्क रहें और न्यायिक निर्णय लेने की प्रक्रिया में AI का उपयोग करते समय न्यायिक विवेक का प्रयोग करें।
- इससे यह सुनिश्चित होता है कि निर्णय सही विधिक सिद्धांतों पर आधारित हों।
विधिक क्षेत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) उपकरणों के उपयोग से जुड़ी चिंताएँ क्या हैं?
बारे में:
- विधिक अनुसंधान और न्यायिक लेखन में दक्षता बढ़ाने के लिये एआई AI का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है।
- तथापि, उनका अनियंत्रित प्रयोग शुद्धता एवं विश्वसनीयता के संबंध में गंभीर प्रश्न उत्पन्न करता है।
- AI उपकरणों के पास सुसंगत विधि के संपूर्ण निकाय तक पहुँच की कमी हो सकती है।
- वे प्रस्तुत विधिक प्रश्न को पूर्णतः समझने में असमर्थ हो सकते हैं अथवा महत्त्वपूर्ण प्राधिकारों की उपेक्षा कर सकते हैं।
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रणालियाँ ऐसे उत्तर उत्पन्न कर सकती हैं जो देखने में तो विश्वसनीय प्रतीत होते हैं, लेकिन तथ्यात्मक या विधिक रूप से गलत होते हैं।
- AI उपकरण ऐसे प्राधिकारियों को गढ़ सकते हैं या विद्यमान मामलों का हवाला दे सकते हैं जो विचाराधीन मुद्दे से अप्रासंगिक हों।
गोपनीयता संबंधी चिंताएँ:
- न्यायिक निर्णय लेने में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उपकरणों के उपयोग से निजता के उल्लंघन संबंधी चिंताएँ उत्पन्न होती हैं।
- अनियमित उपयोग न्यायिक निर्णय लेने की प्रक्रिया जनविश्वास एवं भरोसे को क्षति पहुँचा सकता है।
मानवीय पर्यवेक्षण की आवश्यकता:
- सार्थक मानवीय निगरानी के बिना AI उपकरणों पर अंधाधुंध विश्वास करना समस्याग्रस्त है।
- जो लोग विधिक शोध के लिये AI का उपयोग करते हैं, उन्हें इसके परिणामों की गहन जांच करनी चाहिये।
- AI उपकरणों द्वारा उद्धृत सभी स्रोतों की सटीकता और प्रासंगिकता की पुष्टि की जानी चाहिये।
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता की तुलना में वास्तविक बुद्धिमत्ता के अनुप्रयोग को प्राथमिकता दी जानी चाहिये।
- AI उपकरणों का उपयोग सावधानी और बुद्धिमत्ता के साथ किया जाना चाहिये।
न्यायिक सतर्कता आवश्यक:
- न्यायिक निर्णय लेने की प्रक्रिया में AI का प्रयोग करते समय विचारण न्यायालयों को सतर्क रहना चाहिये।
- न्यायालयों को न्यायिक विवेक का प्रयोग करते हुए यह सुनिश्चित करना चाहिये कि निर्णय सही विधिक सिद्धांतों पर आधारित हों।
- न्यायिक आदेशों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) द्वारा उत्पन्न उद्धरणों पर विश्वास करने से पहले उनका सत्यापन करना आवश्यक है।
आदेश क्या है?
बारे में:
- सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 2(14) आदेश को परिभाषित करती है।
- “आदेश” से तात्पर्य किसी सिविल न्यायालय के किसी निर्णय की औपचारिक अभिव्यक्ति से है जो कोई डिक्री नहीं है।
- इसलिये, जो निर्णय डिक्री नहीं है, वह आदेश है।
डिक्री और आदेश में अंतर:
- डिक्री और आदेश में अंतर इस प्रकार है:
- डिक्री केवल उस वाद में पारित की जा सकती है, जो वादपत्र की प्रस्तुति से आरंभ होता है। इसके विपरीत, आदेश वाद से भी उत्पन्न हो सकता है अथवा आवेदन/याचिका की प्रस्तुति से प्रारंभ हुई कार्यवाही से भी पारित किया जा सकता है।
- डिक्री प्रारंभिक, अंतिम अथवा आंशिक रूप से प्रारंभिक एवं आंशिक रूप से अंतिम हो सकती है, जबकि आदेश प्रारंभिक नहीं हो सकता।
- सामान्यतः एक वाद में एक ही डिक्री पारित होती है, किंतु उसी वाद अथवा कार्यवाही में अनेक आदेश पारित किए जा सकते हैं।
- डिक्री के विरुद्ध प्रथम अपील सामान्यतः उपलब्ध होती है, जब तक कि विधि द्वारा स्पष्ट रूप से अपील वर्जित न की गई हो (उदाहरणार्थ, धारा 96(3) के अंतर्गत पक्षकारों की सहमति से पारित डिक्री के विरुद्ध अपील नहीं होती)। इसके विपरीत, केवल वही आदेश अपीलयोग्य होते हैं, जिनका उल्लेख संहिता में स्पष्ट रूप से किया गया है (धारा 104 तथा आदेश 43 नियम 1)।
- डिक्री के मामले में कुछ आधारों पर उच्च न्यायालय में द्वितीय अपील का प्रावधान है, जबकि अपीलयोग्य आदेशों के विरुद्ध द्वितीय अपील का कोई प्रावधान नहीं है।
डिक्री, आदेश और निर्णय में अंतर:
- निर्णय सुनाए जाने के पश्चात् आदेश या डिक्री जारी की जाएगी।
- निर्णय के पश्चात् डिक्री जारी की जाती है।
- डिक्री अथवा आदेश में न्यायाधीश द्वारा कारणों का विवरण देना आवश्यक नहीं होता, जबकि निर्णय में कारणों का उल्लेख अनिवार्य होता है।