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सांविधानिक विधि
राजनीतिक संघ बनाने के अधिकार का समावेशन
11-Feb-2026
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विकास पुंधीर बनाम दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी राज्य और अन्य (2026) "भारत के संविधान का अनुच्छेद 21 सभी व्यक्तियों को प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार को प्रत्याभूत करता है, जिसमें व्यक्तिगत विकल्प चुनने की स्वायत्तता/स्वतंत्रता सम्मिलित है, जिसमें किसी भी राजनीतिक दल से जुड़ने और एक नागरिक द्वारा उचित समझे जाने वाले तरीके से राजनीति में सक्रिय रूप से शामिल होने का अधिकार सम्मिलित है ।" न्यायमूर्ति सौरभ बनर्जी |
स्रोत: दिल्ली उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सौरभ बनर्जी ने विकास पुंधीर बनाम दिल्ली राज्य एवं अन्य (2026) के मामले में यह टिप्पणी की कि राजनीतिक दलों से जुड़ने और राजनीति में सक्रिय रूप से सम्मिलित होने का अधिकार भारत के संविधान, 1950 (भारत का संविधान) के अनुच्छेद 21 के अधीन संरक्षित है और दिल्ली पुलिस को अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों से लगातार मिल रही धमकियों का सामना कर रहे एक अधिवक्ता को आवश्यक संरक्षण प्रदान करने का निदेश दिया।
विकास पुंधीर बनाम दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी राज्य और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- यह याचिका एक अधिवक्ता (याचिकाकर्त्ता) द्वारा दायर की गई थी, जिसने अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों से अपने जीवन को लगातार और बार-बार मिल रही धमकियों का आरोप लगाया था।
- याचिकाकर्त्ता को पहली बार 2016 में धमकियाँ दी गईं, जिसके बाद हर्ष विहार पुलिस थाने में मामला दर्ज किया गया।
- अभियुक्तों के आश्वासनों के बाद मामला शुरू में सुलझ गया था, लेकिन अभियुक्तों में से एक के जेल से छोड़े जाने के बाद 2022 में कथित तौर पर धमकियाँ फिर से शुरू हो गईं।
- याचिकाकर्त्ता को व्हाट्सएप पर एक कॉल आया जिसमें उसे जान से मारने की धमकी दी गई थी यदि वह राजनीति से पीछे नहीं हटता।
- प्रतिद्वंद्वी पार्टी के सदस्यों द्वारा सोशल मीडिया पर बंदूकें चलाते हुए तस्वीरें और वीडियो पोस्ट करके उन्हें लगातार धमकाने के बाद आयुध अधिनियम के अधीन प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज की गई।
- याचिकाकर्त्ता ने दिसंबर 2025 में देर रात उनके आवास की निगरानी कर रहे संदिग्ध व्यक्तियों पर भी चिंता जताई।
- अनुतोष प्रदान करते हुए, न्यायालय ने अनुच्छेद 21 के अधीन राजनीतिक भागीदारी के सांविधानिक संरक्षण की पुष्टि की और संबंधित पुलिस अधिकारियों को याचिकाकर्त्ता को सभी आवश्यक सहायता और संरक्षण प्रदान करने का निदेश दिया।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- न्यायालय ने माना कि अनुच्छेद 21 न केवल प्राण और दैहिक स्वतंत्रता की रक्षा करता है, अपितु इसमें व्यक्तिगत विकल्प चुनने की स्वायत्तता भी सम्मिलित है , जैसे कि किसी राजनीतिक दल से जुड़ने और राजनीतिक क्रियाकलापों में भाग लेने का अधिकार।
- न्यायमूर्ति बनर्जी ने टिप्पणी की: "किसी भी व्यक्ति द्वारा या उसके द्वारा इन मामलों में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप और/या किसी के द्वारा प्रपीड़न व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सुरक्षा के मूल सिद्धांतों पर प्रहार करता है।"
- न्यायालय ने पुष्टि की कि याचिकाकर्त्ता "भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के अधीन संरक्षण का पूरी तरह हकदार है।"
- न्यायालय ने हर्ष विहार पुलिस थाने के SHO और बीट कांस्टेबल को निदेश दिया कि वे विधि के अनुसार, जब भी आवश्यकता हो, याचिकाकर्त्ता को सभी आवश्यक सहायता और संरक्षण प्रदान करने के लिये उपलब्ध रहें।
- न्यायालय ने आगे स्पष्ट किया कि यदि याचिकाकर्त्ता किसी अन्य पुलिस थाने की अधिकारिता में अपना निवास स्थान बदलता है, तो उसे संबंधित SHO को सूचित करना होगा, जो तब समान संरक्षण प्रदान करने के लिये बाध्य होगा।
भारत के संविधान का अनुच्छेद 21 क्या है?
परिचय:
- अनुच्छेद 21 प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के संरक्षण से संबंधित है । इसमें कहा गया है कि किसी व्यक्ति को, उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा, अन्यथा नहीं।
- जीवन का अधिकार केवल पशुवत अस्तित्व या जीवित रहने तक ही सीमित नहीं है, अपितु इसमें मानवीय गरिमा के साथ जीने का अधिकार और जीवन के वे सभी पहलू सम्मिलित हैं जो मनुष्य के जीवन को सार्थक, पूर्ण और जीने लायक बनाते हैं।
- अनुच्छेद 21 दो अधिकारों की सुरक्षा करता है:
- प्राण का अधिकार
- दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार
- इस अनुच्छेद को प्राण और दैहिक की रक्षा करने वाले प्रक्रियात्मक मैग्ना कार्टा के रूप में वर्णित किया गया है।
- यह मौलिक अधिकार प्रत्येक व्यक्ति, चाहे वह नागरिक हो या विदेशी, को समान रूप से प्राप्त है।
- भारत के उच्चतम न्यायालय ने इस अधिकार को मौलिक अधिकारों का हृदय बताया है ।
- यह अधिकार केवल राज्य के विरुद्ध ही प्रदान किया गया है।
अनुच्छेद 21 के अंतर्गत अधिकार:
- अनुच्छेद 21 के अंतर्गत आने वाले अधिकार निम्नलिखित हैं:
- निजता का अधिकार
- विदेश जाने का अधिकार
- आश्रय का अधिकार
- एकांत कारावास के विरुद्ध अधिकार
- सामाजिक न्याय और आर्थिक सशक्तिकरण का अधिकार
- हथकड़ी लगाने के विरुद्ध अधिकार
- अभिरक्षा में मृत्यु के विरुद्ध अधिकार
- फाँसी में विलंब के विरुद्ध अधिकार
- डॉक्टरों की सहायता 10. सार्वजनिक फाँसी के विरुद्ध अधिकार
- सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण
- प्रदूषण मुक्त जल और वायु का अधिकार
- प्रत्येक बच्चे को पूर्ण विकास का अधिकार है
- स्वास्थ्य और चिकित्सा सहायता का अधिकार
- शिक्षा का अधिकार
- विचाराधीन कैदियों का संरक्षण
निर्णय विधि:
- फ्रांसिस कोराली मुलिन बनाम प्रशासक (1981) के मामले में न्यायमूर्ति पी. भगवती ने कहा था कि भारत के संविधान का अनुच्छेद 21 एक लोकतांत्रिक समाज में सर्वोच्च महत्त्व के सांविधानिक मूल्य को समाहित करता है।
- खरक सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1963) के मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि जीवन शब्द से केवल पशुवत अस्तित्व का ही अर्थ नहीं है। इसके हनन पर रोक उन सभी अंगों और इंद्रियों पर लागू होती है जिनके द्वारा जीवन का आनंद लिया जाता है। यह प्रावधान शरीर को विकृत करने, जैसे कि कवचधारी पैर काटना, आँख निकालना या शरीर के किसी अन्य अंग को नष्ट करना जिसके माध्यम से आत्मा बाह्य जगत से संपर्क स्थापित करती है, पर भी समान रूप से प्रतिबंध लगाता है।
सिविल कानून
प्रपीड़न का आरोप लगाने वाला वाद सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 7 नियम 11 के अधीन अस्वीकार्य नहीं
11-Feb-2026
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मुथुराजन और अन्य बनाम वैकुंदराजन और अन्य "प्रपीड़न, असम्यक् असर और उससे भी महत्त्वपूर्ण, दुर्व्यपदेशन के आधार, जिसके परिणामस्वरूप एक असमान विभाजन होता है, को सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 7, नियम 11 के अधीन आवेदन पर विचार करते समय तुरंत नामंजूर नहीं किया जा सकता है।" न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
न्यायमूर्ति संजय कुमार और के. विनोद चंद्रन की पीठ ने जे. मुथुराजन और अन्य बनाम एस. वैकुंदराजन और अन्य (2026) के मामले में यह निर्णय दिया कि प्रपीड़न, असम्यक् असर, दुर्व्यपदेशन का अभिकथन करने वाले सिविल वाद को सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) के आदेश 7 नियम 11 के अधीन प्रारंभिक चरण में नामंजूर नहीं किया जा सकता है। न्यायालय ने विचारण न्यायालय और मद्रास उच्च न्यायालय के एक साथ दिये गए निष्कर्षों को अपास्त कर दिया, जिन्होंने अपीलकर्त्ता के वाद को विधिक की प्रक्रिया का दुरुपयोग बताते हुए खारिज कर दिया था।
जे. मुथुराजन और अन्य बनाम एस. वैकुंडराजन और अन्य (2026) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- यह विवाद 308 पृष्ठों के विभाजन विलेख (KBPP) से उत्पन्न हुआ, जिस पर सभी पक्षकारों ने हस्ताक्षर करने की बात स्वीकार की थी।
- प्रत्यर्थी-वैकुंदराजन समूह ने इस विलेख को बाध्यकारी समझौते के रूप में लागू करने की मांग की, जबकि अपीलकर्त्ता-जेगाथीसन समूह ने दावा किया कि यह विलेख प्रपीड़न, असम्यक् असर, दुर्व्यपदेशन के अधीन निष्पादित किया गया था, और यह केवल एक "अस्थायी मसौदा (tentative draft)" था।
- 2 जनवरी, 2019 को जारी एक सुलह पंचाट, जिसे कथित तौर पर माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम, 1996 के अधीन जारी किया गया था, ने मामले को और जटिल बना दिया। इस पंचाट पर एक सौतेले भाई ने मध्यस्थ के रूप में हस्ताक्षर किये थे, जिसमें KBPP को औपचारिक रूप से संपन्न समझौते के रूप में प्रमाणित किया गया था।
- प्रत्यर्थी ने तर्क दिया कि ये दस्तावेज़ मिलकर माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 36 के अधीन एक प्रवर्तनीय सुलह पंचाट का गठन करते हैं।
- अपीलकर्त्ता ने अभिकथित किया कि कोई वास्तविक सुलह नहीं हुई और यह पंचाट एक अनुचित व्यवस्था को वैध बनाने के लिये मनगढ़ंत तरीके से तैयार किया गया था।
- विचारण न्यायालय ने अपीलकर्त्ता की याचिका को सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 7 नियम 11 के अधीन खारिज कर दिया, इसे उत्पीड़नकारी और विधि की प्रक्रिया का दुरुपयोग मानते हुए, केवल इसलिये कि वाद में प्रपीड़न, असम्यक् असर, दुर्व्यपदेशन के आधार सम्मिलित थे।
- मद्रास उच्च न्यायालय ने विचारण न्यायालय के निर्णय को बरकरार रखा, जिसके परिणामस्वरूप उच्चतम न्यायालय के समक्ष यह अपील दायर की गई है।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन द्वारा लिखित एक निर्णय में न्यायालय ने कहा कि विचारण न्यायालय और उच्च न्यायालय ने वाद को अभिवचन के प्रक्रम में ही खारिज करके एक मौलिक त्रुटि की है।
- न्यायालय ने माना कि चूँकि अपीलकर्त्ताओं ने विभाजन विलेख के साथ-साथ सुलह पंचाट की सत्यता के संबंध में विचारणीय विवाद्यक उठाए थे, इसलिये वादपत्र को प्रारंभिक चरण में ही सरसरी तौर पर नामंजूर नहीं किया जा सकता था।
- न्यायालय ने आगे कहा: "अत: हम पाते हैं कि विचारण न्यायालय का वह आदेश, जिसे उच्च न्यायालय ने भी पुष्ट किया है और जिसके परिणामस्वरूप वादपत्र नामंजूर हुआ है, विधिवत रूप से घोर त्रुटिपूर्ण है। हमारा मत है कि वाद में प्रथम दृष्टया वाद-हेतुक प्रकट होता है और इसे न तो उत्पीड़नकारी कहा जा सकता है और न ही विधि की प्रक्रिया का दुरुपयोग।"
- न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि जैसा कि प्रकटन किया गया है, वाद-हेतुक वास्तविक था, न कि भ्रामक या काल्पनिक, और यह कि तथ्यात्मक अभिकथन, विधिक आधार और मांगा गया अनुतोष अर्थहीन नहीं था और न ही उस स्तर पर यह कहा जा सकता था कि वाद असफल होना तय था।
- उच्चतम न्यायालय ने तदनुसार विचारण न्यायालय और मद्रास उच्च न्यायालय दोनों के विवादित निर्णयों को अपास्त कर दिया।
सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 7 नियम 11 – वादपत्र का नामंजूर किया जाना क्या है?
- सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के आदेश 7 नियम 11 में उसके अंतर्गत सूचीबद्ध विशिष्ट परिस्थितियों में वादपत्र को नामंजूर किये जाने का उपबंध है।
- खण्ड (क) के अनुसार, यदि वाद में वाद-हेतुक प्रकट नहीं किया गया है तो वाद को नामंजूर कर दिया जाएगा।
- खण्ड (ख) में जहाँ दावाकृत अनुतोष का मूल्यांकन कम किया गया है और वादी मूल्यांकन को ठीक करने के लिये न्यायालय द्वारा अपेक्षित किये जाने पर उस समय के भीतर जो न्यायालय ने नियत किया है, ऐसा करने में असफल रहता है।
- खण्ड (ग) उन मामलों से संबंधित है जहाँ दावाकृत अनुतोष का मूल्यांकन ठीक है किंतु वादपत्र अपर्याप्त स्टाम्प-पत्र पर लिखा गया है और वादी अपेक्षित स्टाम्प पत्र के देने के लिये न्यायालय द्वारा अपेक्षित किये जाने पर उस समय के भीतर, जो न्यायालय ने नियत किया है, ऐसा करने में असफल रहता है।
- खण्ड (घ) के अनुसार, जहाँ वादपत्र में के कथन से यह प्रतीत होता है कि वाद किसी विधि द्वारा वर्जित है।
- खण्ड (ङ) में यह उपबंध है कि जहाँ यह दो प्रतियों में फाइल नहीं किया जाता है।
- खण्ड (च) में नामंजूरी का उपबंध है जहाँ वादी नियम 9 के उपबंधों का अनुपालन करने में असफल रहता है।
- इस परंतुक में यह कहा गया है कि मूल्यांकन की शुद्धि के लिये या अपेक्षित स्टाम्प-पत्र के देने के लिये न्यायालय द्वारा नियत समय तब तक नहीं बढ़ाया जाएगा जब तक कि न्यायालय का अभिलिखित किये जाने वाले कारणों से यह समाधान नहीं हो जाता है कि वादी किसी असाधारण कारण से, न्यायालय द्वारा नियत समय के भीतर, यथास्थिति, मूल्यांकन की शुद्धि करने या अपेक्षित स्टाम्प-पत्र के देने से रोक दिया गया था और ऐसे समय के बढ़ाने से इंकार किये जाने से वादी के प्रति गंभीर अन्याय होगा।
- आदेश 7 नियम 11 के अधीन वादपत्र को नामंजूर करने की शक्ति एक असाधारण शक्ति है और इसका प्रयोग अत्यंत सावधानी और विवेक के साथ किया जाना चाहिये।
- खण्ड (घ) के अधीन, न्यायालय को स्वयं वादपत्र में दिये गए कथनों से यह निर्धारित करना होगा कि क्या वाद किसी विधि द्वारा, जिसमें परिसीमा विधि भी शामिल है, वर्जित है।
- आदेश 7 नियम 11(घ) के अधीन जांच का दायरा वादपत्र और उससे संलग्न या उसमें संदर्भित दस्तावेज़ों तक सीमित है।
- सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 7 नियम 11 के अधीन आवेदन पर निर्णय लेते समय प्रतिवादी द्वारा प्रस्तुत प्रतिरक्षा पर विचार नहीं किया जा सकता है।
- इस शक्ति का प्रयोग केवल स्पष्ट और प्रत्यक्ष मामलों में ही किया जाना चाहिये जहाँ वादपत्र प्रथम दृष्टया वर्जित हो।
- जहाँ परिसीमा का अवधारण साक्ष्य की परीक्षा या विधि और तथ्य के मिश्रित प्रश्नों पर विचार करने की आवश्यकता होती है, वहाँ खण्ड (घ) के अधीन वादपत्र को नामंजूर नहीं किया जा सकता है।
- आदेश 7 नियम 11 के अधीन नामंजूरी के लिये आवेदन पर विचार करते समय न्यायालय वाद की चारदीवारी से बाहर नहीं जा सकता है।
- जहाँ कई अनुतोषों की मांग की जाती है और यहाँ तक कि एक अनुतोष भी परिसीमा के भीतर है, वहाँ वादपत्र को विधि द्वारा वर्जित होने के आधार पर पूरी तरह से नामंजूर नहीं किया जा सकता है।
- इस उपबंध का उपयोग केवल तकनीकी आधार पर, वास्तविक दावों को गुण-दोष के आधार पूरी तरह से जांच किये बिना खारिज करने के लिये नहीं किया जाना चाहिये।
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