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आपराधिक कानून

दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के अधीन भरणपोषण एक आवर्ती एवं सतत् (निरंतर) अधिकार है

 26-Feb-2026

चिन्नन कृशोरे कुमार बनाम आंध्र प्रदेश राज्य और अन्य 

"भरण-पोषण का अधिकार कोई 'एकमुश्त लाभनहीं हैअपितु एक परिवर्तनशीलआवर्ती अधिकार हैजो प्रत्येक दायित्त्व के भंग पर नए सिरे से प्रकट होता हैऔर वैवाहिक मामलों की लंबित कार्यवाही से अप्रभावित रहता है।" 

डॉ. न्यायमूर्ति वाई. लक्ष्मण राव 

स्रोत: आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय नेचिन्नन कृशोरे कुमार बनाम आंध्र प्रदेश राज्य और अन्य (2026)के मामले मेंदण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 125 (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 144) के अधीन भरणपोषण की प्रकृति पर महत्त्वपूर्ण टिप्पणियां दीं। 

  • न्यायमूर्ति वाई. लक्ष्मण राव ने निर्णय दिया कि भरणपोषण एक परिवर्तनशीलआवर्ती अधिकार है जो दायित्त्व के प्रत्येक भंग पर नए सिरे से लागू होता है और वैवाहिक मामलों की लंबित कार्यवाही से समाप्त नहीं होता है। न्यायालय ने परिवार न्यायालय के उस आदेश को बरकरार रखा जिसमें पत्नी को ₹7,500 और उनके अवयस्क संतान को ₹5,000 मासिक भरणपोषण देने का आदेश दिया गया था। 

चिन्नन कृशोरे कुमार बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • याचिकाकर्त्ता/पति ने कुटुंब न्यायालय के 2018 के एक आदेश को चुनौती देते हुए एक आपराधिक पुनरीक्षण याचिका दायर की थीजिसमें उसकी पत्नी (प्रत्यर्थी 2) द्वारा धारा 125 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन दायर आवेदन को स्वीकार कर लिया गया था। 
  • कुटुंब न्यायालय ने पत्नी को 7,500 रुपए प्रति माह और उसके अवयस्क पुत्र  (प्रत्यर्थी 3) को 5,000 रुपए प्रति माह का भरणपोषण देने का आदेश दिया था। 
  • याचिकाकर्त्ता ने तर्क दिया कि कुटुंब न्यायालय ने भरणपोषण प्रदान करने में त्रुटी कीक्योंकि उसकी पत्नी कथित तौर पर अपने अभिकथनों का दस्तावेज़ी सबूत पेश करने में असफल रही थी। 
  • उसने कहा कि उसकी पत्नी ने उसे परेशान करने के लिये कई मामले दर्ज किये थे और कुटुंब न्यायालय उन कार्यवाहियों के लंबित होने पर विचार करने में विफल रहा। 
  • उन्होंने आगे तर्क दिया कि दी गई भरणपोषण पंचाट अत्यधिक और मनमाना था 
  • इसके विपरीतपत्नी ने तर्क दिया कि याचिकाकर्त्ता ने उसका और उसके अवयस्क संतान की उपेक्षा की और उनका भरणपोषण करने से इंकार कर दियाऔर यह कि धारा 125 एक सामाजिक कल्याण उपबंध है जो पति पर अपने आश्रितों का भरणपोषण करने का विधिक दायित्त्व अधिरोपित करता है। 
  • उसने तर्क दिया कि याचिकाकर्त्ता द्वारा अन्य कार्यवाही के लंबित होने पर विश्वास करना पूरी तरह से गलत थाक्योंकि भरणपोषण का दावा करने का अधिकार स्वतंत्र और आवर्ती प्रकृति का होता है। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • न्यायालय ने माना कि इस मामले का आधार धारा 125 दण्ड प्रक्रिया संहिता पर टिका हैऔर इसे एक परोपकारी उपबंध बताया जो उन पत्नियोंबच्चों और निर्धन माता-पिता की दुर्दशा को कम करने के लिये बनाया गया है जिन्हें विधिक रूप से उनका भरणपोषण करने के लिये बाध्य लोगों द्वारा त्याग दिया गया है। 
  • भरणपोषण की प्रकृति पर न्यायालय ने टिप्पणी की कि यह विवाह की स्थिति और पारिवारिक बंधन से अविभाज्य रूप से उत्पन्न होने वाला एक सामाजिक-विधिक दायित्त्व है - यह केवल एक संविदात्मक व्यवस्था नहीं हैअपितु स्वयं विधिक संबंध के आधार पर अधिरोपित किया गया एक व्यक्तिगत दायित्त्व है। 
  • न्यायालय ने इस बात की पुष्टि की कि भरणपोषण कोई "एकमुश्त अनुदान" नहीं हैअपितु एकगतिशीलआवर्ती अधिकार हैजो दायित्त्व के प्रत्येक भंग पर नए सिरे से परिभाषित होता है और समानांतर वैवाहिक कार्यवाही के लंबित होने से अप्रभावित रहता है। 
  • न्यायिक निर्वचन ने धारा 125 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन "पत्नी" की परिभाषा का विस्तार करते हुए इसमें उन तलाकशुदा महिलाओं को भी सम्मिलित किया है जिन्होंने पुनर्विवाह नहीं किया हैऔर कुछ संदर्भों मेंदीर्घकालिक लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाओं को भी सम्मिलित किया हैजिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि उपबंध का सुरक्षात्मक उद्देश्य कठोर शाब्दिक व्याख्या से विफल न हो जाए। 
  • भरणपोषण की राशि के संबंध मेंन्यायालय ने कुटुंब न्यायालय द्वारा दी गई राशि को उचितपर्याप्त और पति के आर्थिक संसाधनोंआश्रितों की उचित आवश्यकताओं और प्रचलित जीवन स्तर के अनुरूप मानते हुए बरकरार रखा। 
  • विवादित आदेश में कोई स्पष्ट त्रुटि न पाते हुएन्यायालय नेआपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी। 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 144 क्या है? 

बारे में: 

  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 144 पत्नीसंतान और माता-पिता के भरणपोषण के आदेश से संबंधित है। 
  • यह उपबंध पहलेदण्ड प्रक्रिया संहिता (1973) की धारा 125 के अंतर्गत आता था। 

भरणपोषण का दावा कौन कर सकता है: 

  • पत्नी अपना भरणपोषण करने में असमर्थ है। 
  • धर्मज/अधर्मज संतान (विवाहित हो या नहीं) जो अपना भरणपोषण करने में असमर्थ हो। 
  • शारीरिक/मानसिक असामान्यता या क्षति के कारण एक गंभीर बच्चा जो अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ है। 
  • माता-पिता में से कोई एक अपना भरणपोषण करने में असमर्थ है। 

मुख्य उपबंध: 

  • प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट उपेक्षा/अस्वीकृति का सबूत मिलने पर मासिक भरणपोषण का आदेश दे सकता है। 
  • कार्यवाही लंबित रहने के दौरान अंतरिम भरणपोषण का आदेश भी दिया जा सकता है। 
  • अंतरिम भरणपोषण आवेदन का निपटारानोटिस मिलने के 60 दिनों के भीतर किया जाना चाहिये 
  • भरणपोषण का संदाय आदेश की तिथि सेया यदि ऐसा निदेश दिया गया हो तो आवेदन की तिथि से देय है। 

अनुपालन न करना: 

  • राशि वसूलने के लिये वारण्ट जारी किया जा सकता है (जैसे जुर्माना)। 
  • प्रत्येक मास के बकाया भत्ते के लिये एक मासतक का कारावास। 
  • वारण्ट के लिये आवेदन नियत तिथि सेएक वर्ष के भीतरकिया जाना चाहिये 

पत्नी का अधिकार निम्नलिखित स्थितियों में रद्द हो जाता है: 

  • वह जारता की दशा में जी रही है। 
  • वह पर्याप्त कारण के बिना अपने पति के साथ रहने से इंकार करती है। 
  • वे आपसी सहमति से पृथक् रह रहे हैं। 

नोट: "पत्नी" में तलाकशुदा महिला भी सम्मिलित है जिसने पुनर्विवाह नहीं किया है। पति द्वारा रखैल रखना या पुनर्विवाह करना पत्नी के लिये उसके साथ रहने से इंकार करने का न्यायसंगत आधार माना जाता है। 


आपराधिक कानून

सार्वजनिक अभिलेखों में दस्तावेज़ का पता न चल पाना ही उसे कूटरचित साबित नहीं करता

 26-Feb-2026

वंदना जैन और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य 

"केवल इसलिये कि कोई दस्तावेज़ जारी होने के कई वर्षों बाद अभिलेखों में नहीं मिल पातायह नहीं कहा जा सकता कि वह दस्तावेज़ कूटरचित है। किसी दस्तावेज़ को कूटरचित तभी माना जाएगा जब अभिकथन यह साबित करने के लिये किये गए हों कि वह भारतीय दण्ड संहिता की धारा 464 के अंतर्गत एक मिथ्या दस्तावेज़ है।" 

न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और मनोज मिश्रा  

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और मनोज मिश्रा की पीठ नेवंदना जैन और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य (2026) के मामलेमें इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस आदेश को अपास्त कर दियाजिसमें एक आपराधिक मामले को रद्द करने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया गया थाजिसमें कूटरचना का आरोप केवल एक सार्वजनिक कार्यालय के अभिलेखों में एक दस्तावेज़ के न मिलने पर आधारित था। 

  • उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया किकिसी दस्तावेज़ का पता न चल पाना स्वतः ही इस निष्कर्ष पर नहीं पहुँचा सकता कि दस्तावेज़ कूटरचित हैऔर धारा 464 भारतीय दण्ड संहिता (भारतीय न्याय संहिता की धारा 335) के तत्त्वों को स्वतंत्र रूप से स्थापित किया जाना चाहिये 

वंदना जैन और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य (2026) के मामलेकी पृष्ठभूमि क्या है ? 

  • यह मामलाकानपुर में एक संपत्ति के विकास के लिये अपीलकर्त्ताओं और मोटर जनरल सेल्स लिमिटेड के बीच 16 अगस्त, 2010 को हुए एकसंयुक्त उद्यम समझौते (JVA) से उत्पन्न हुआ है। 
  • अंततः संयुक्त उद्यम समझौते (JVA) असफल साबित हुआ। 
  • लगभग 11 वर्ष पश्चात्मार्च 2021 मेंपरिवादकर्त्ता ने भारतीय दण्ड संहिता की धारा 406, 420, 467, 468 और 471 के अधीन प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज कराई। 
  • परिवादकर्त्ता ने अन्य बातों के अलावा यह आरोप लगाया कि अपीलकर्त्ताओं ने संपत्ति पर अपना स्वामित्व स्थापित करने के लिये कार्यपालक मजिस्ट्रेट द्वारा जारी किया गया एक कूटरचित पत्र प्रस्तुत किया था।  
  • कूटरचना के आरोप का आधार यह था कि उक्त पत्र उस कार्यपालक मजिस्ट्रेट के कार्यालय में नहीं मिलाजहाँ से इसे जारी किया गया माना जा रहा था। 
  • इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपीलकर्त्ताओं की याचिका खारिज कर दी। 
  • इससे व्यथित होकर अपीलकर्त्ताओं ने भारत के उच्चतम न्यायालय का रुख किया। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा द्वारा लिखित निर्णय में कहा गया है कि जब तक भारतीय दण्ड संहिता की धारा 464 की शर्तें पूरी नहीं होतीं , तब तक मिथ्या दस्तावेज़ रचने का कोई अपराध नहीं बनता। 
  • न्यायालय ने परिवादकर्त्ता के इस तर्क को स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया किआधिकारिक अभिलेखों में किसी दस्तावेज़ का न मिल पानाअपने आप मेंकूटरचना का निष्कर्ष निकालने का आधार नहीं हो सकता।  
  • न्यायालय ने टिप्पणी की: "यह सर्वविदित है कि प्रश्नगत प्रमाण पत्र/पत्र जैसे दस्तावेज़ स्थायी रूप से संरक्षित नहीं रखे जाते हैं। इसलियेयदि 10 या 11 वर्षों के बादकेवल इसलिये कि कार्यालय यह रिपोर्ट करता है कि ऐसा पत्र/प्रमाण पत्र कार्यालय के अभिलेखों में नहीं मिल रहा हैतो यह नहीं कहा जा सकता कि यह कूटरचित है।" 
  • न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि कोई दस्तावेज़ तभी कूटरचित माना जाता है जब आरोप यह साबित करते हैं कि वह भारतीय दण्ड संहिता की धारा 464 के अधीन एक मिथ्या दस्तावेज़ है - जिसके लिये दस्तावेज़ के निर्माणहस्ताक्षर या परिवर्तन के समय बेईमानी या कपटपूर्ण आशय का सबूत आवश्यक है। 
  • उपरोक्त तथ्यों के आलोक मेंन्यायालयने अपील मंजूर कर लीऔर अपीलकर्त्ताओं के विरुद्ध लंबित आपराधिक मामले को रद्द कर दिया। 

भारतीय न्याय संहिता की धारा 335 क्या है? 

बारे में: 

  • भारतीय न्याय संहिता की धारा 335 मिथ्या दस्तावेज़ रचित करने से संबंधित है। 
  • पहले यह धारा भारतीय दण्ड संहिता की धारा 464 के अंतर्गत आती थी। 

अपराध किसके द्वारा किया जाता है? 

कोई व्यक्ति मिथ्या दस्तावेज़ अथवा मिथ्या इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख रचता हैयदि वह बेईमानी या कपटपूर्वक निम्नलिखित में से किसी भी प्रकार से कार्य करता है:    

  • किसी दस्तावेज़ को या दस्तावेज़ के भाग को रचितहस्ताक्षरितमुद्रांकित या निष्पादित करता है।  
  • किसी इलैक्ट्रॉनिक अभिलेख को या किसी इलैक्ट्रॉनिक अभिलेख के भाग को रचित या पारेषित करता है 
  • किसी इलैक्ट्रॉनिक अभिलेख पर कोई इलैक्ट्रॉनिक चिन्हक लगाता है 
  • किसी दस्तावेज़/इलेक्ट्रॉनिक चिन्हक की अधिप्रमाणिकता का द्योतन करने वाला कोई भी चिह्न बनानायह जानते हुए कि वास्तव में उस व्यक्ति द्वारा नहीं किया गया हैजिससे उसका आभास कराया जा रहा है।  
  • किसी भी दस्तावेज़ या इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख के किसी भी महत्त्वपूर्ण भाग में बिना विधिक अधिकार के परिवर्तन करनाचाहे मूल निर्माता जीवित हो या मृत। 
  • किसी अन्य व्यक्ति से उसकी चित्त-विकृतिमत्तता या प्रवंचना के माध्यम से इस प्रकार हस्ताक्षरमुद्रांकननिष्पादन अथवा परिवर्तन कराना कि वह व्यक्ति दस्तावेज़ की विषयवस्तु या किये गए परिवर्तन की प्रकृति से अनभिज्ञ रहे।  

मुख्य स्पष्टीकरण: 

  • यदि कोई व्यक्ति अपने नाम से हस्ताक्षर करता हैतथापि यदि उसका आशय उसी नाम के किसी अन्य व्यक्ति का प्रतिरूपण करना होतो वह भी कूटरचना का अपराध कर सकता है।  
  • किसी काल्पनिक या मृत व्यक्ति के नाम से इस आशय से मिथ्या दस्तावेज़ बनाना कि उसे वास्तविक अथवा उसके जीवनकाल में निर्मित माना जाएकूटरचना की श्रेणी में आएगा। 
  • "इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर अंकित करना" का वही अर्थ है जो सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के अंतर्गत निर्धारित है।