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करेंट अफेयर्स और संग्रह

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सांविधानिक विधि

केवल माता-पिता का वेतन अन्य पिछड़ा वर्ग आरक्षण क्रीमी लेयर की स्थिति निर्धारित करने के लिये पर्याप्त नहीं है

 13-Mar-2026

भारत संघ और अन्य बनाम रोहित नाथन और अन्य 

"1993 के कार्यालय ज्ञापन, में प्रतिपादित पदों की श्रेणियों और स्थिति मापदंडों के संदर्भ के बिनाकेवल आय वर्ग के आधार पर क्रीमी लेयर स्थिति का अवधारण करना विधि की दृष्टि से स्पष्ट रूप से अस्थिर है।" 

न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और आर. महादेवन 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और आर. महादेवन की पीठ नेभारत संघ और अन्य बनाम रोहित नाथन और अन्य (2026) के मामलेमें भारत संघ द्वारा दायर अपीलों के एक समूह को खारिज कर दियाजिससे कई संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) अभ्यर्थियों को अनुतोष मिलाजिन्हें केवल उनके माता-पिता की वेतन आय के आधार पर क्रीमी लेयर में वर्गीकृत करके अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आरक्षण के लाभ से गलत तरीके से वंचित कर दिया गया था।  

  • न्यायालय ने निर्णय दिया कि क्रीमी लेयर का अवधारण मुख्य रूप से अभ्यर्थी के माता-पिता द्वारा धारित पद की स्थिति और श्रेणी द्वारा निर्देशित होना चाहियेजैसा कि ऐतिहासिक इंदिरा साहनी फैसले के बाद जारी 1993 के कार्यालय ज्ञापन (OM) में निर्धारित किया गया है,और यह कि 2004 के स्पष्टीकरण पत्र को इस तरह से नहीं पढ़ा जा सकता है कि केवल आय ही निर्णायक मानदंड हो। 

भारत संघ बनाम रोहित नाथन (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • यह विवाद सिविल सेवा परीक्षा के उन अभ्यर्थियों से उत्पन्न हुआ जिन्होंने अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) नॉन-क्रीमी लेयर श्रेणी के अधीन आरक्षण का दावा किया था। 
  • पात्रता सत्यापन के दौरानकार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) ने केवल उनके माता-पिता की वेतन आय को ध्यान में रखते हुए उन्हें क्रीमी लेयर में वर्गीकृत किया। 
  • जिन संरक्षकों की बात हो रही है उनमें से कई सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs), बैंकों या इसी तरह के संगठनों के कर्मचारी थे। 
  • सरकार ने 14 अक्टूबर 2004 के एक स्पष्टीकरण पत्र पर विश्वास कियाजिसमें यह प्रावधान था कि जहाँ सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के पदों और सरकारी पदों के बीच समतुल्यता निर्धारित नहीं की गई हैवहाँ आय/संपत्ति परीक्षण के अधीन वेतन आय पर अलग से विचार किया जा सकता है। 
  • परिणामस्वरूपजिन अभ्यर्थियों के माता-पिता की आय विहित आय सीमा से अधिक थीउन्हें अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आरक्षण का लाभ नहीं दिया गया।  
  • कई अभ्यर्थियों ने इन निर्णयों को केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण और मद्रासदिल्ली और केरल उच्च न्यायालयों सहित विभिन्न उच्च न्यायालयों के समक्ष चुनौती दीजिनमें से सभी ने उनके पक्ष में निर्णय दिया 
  • भारत सरकार ने उन निर्णयों के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय में अपील की। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • 1993 के कार्यालय ज्ञापन और सामाजिक स्थिति की प्रधानता पर:न्यायालय ने निर्णय दिया कि इंदिरा साहनी संधि के अनुसरण में तैयार किये गए 1993 के कार्यालय ज्ञापन में माता-पिता के पद की स्थिति और श्रेणी को सामाजिक उन्नति का प्राथमिक सूचक माना गया है। आय/संपत्ति परीक्षण के अंतर्गत अपवर्जन निर्धारित करते समय वेतन और कृषि आय को जानबूझकर सामान्य आय के दायरे से अपवर्जित किया गया था। न्यायालय ने कहा कि आय/संपत्ति परीक्षण लागू करने के उद्देश्य से वेतनकृषि या अन्य स्रोतों से प्राप्त आय को एक साथ नहीं जोड़ा जा सकता। 
  • 2004 के स्पष्टीकरण पर:न्यायालय ने 2004 के स्पष्टीकरण को इस सीमा तक विधिक रूप से अस्थिर पाया कि इसमें केवल वेतन आय को ही क्रीमी लेयर की स्थिति का निर्धारक बना दिया गया था। न्यायालय ने माना कि स्पष्टीकरण संबंधी निदेश ऐसी कोई ठोस शर्त नहीं जोड़ सकता जो मूल पॉलिसी में विद्यमान न हो। तदनुसार, 2004 का पत्र 1993 के कार्यालय ज्ञापन के अधीन स्थापित संरचनात्मक ढाँचे को निरस्त या कमजोर नहीं कर सकता।                                                        
  • सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के कर्मचारियों के बीच पक्षद्रोही विभेदकारी व्यवहार पर:न्यायालय ने पाया कि समूह C और समूह D के सरकारी कर्मचारीजिनका वेतन समय के साथ बढ़ता हैआरक्षण से स्वतः अपवर्जित नहीं होते। यद्यपिसरकार के निर्वचन के अनुसारसार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के कर्मचारियों के बच्चों को केवल इसलिये आरक्षण से अपवर्जित किया जा सकता है क्योंकि उनके माता-पिता का वेतन आय सीमा से अधिक हैभले ही पद निचले सरकारी सेवा श्रेणियों के समकक्ष हों। न्यायालय ने माना कि इस प्रकार का विभेदकारी व्यवहार संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन करता हैजो समान लोगों के साथ असमान व्यवहार करने के समान है। 
  • अनुतोष के संबंध में:न्यायालय ने विभाग को निदेश दिया कि वह प्रत्यर्थी अभ्यर्थियों और हस्तक्षेपकर्ताओं के दावों पर छह मास के भीतर विचार करेजिसमें माता-पिता के नियोजन से प्राप्त वेतन को सम्मिलित किये बिना क्रीमी लेयर टेस्ट लागू किया जाए। संसदीय समिति के समक्ष सरकार द्वारा अतिरिक्त पदों के संबंध में पहले दिये गए संकेत को ध्यान में रखते हुएन्यायालय ने यह भी निदेश दिया कि प्रभावित अभ्यर्थियों को समायोजित करने के लियेजहाँ जहां भी आवश्यक होऐसे पद सृजित किये जाएं। 

क्रीमी लेयर की अवधारणा क्या है तथा इसे कैसे परिभाषित एवं लागू किया जाता है? 

परिभाषा एवं उद्देश्य: 

  • क्रीमी लेयर की अवधारणा एक सीमा निर्धारित करती है जिसके भीतर अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आरक्षण के लाभ लागू होते हैं।  
  • इसका उद्देश्य अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) श्रेणी के अपेक्षाकृत धनी व्यक्तियों को आरक्षण के लाभ से वंचित करना है। 
  • आरक्षण का लाभ वास्तव में वंचित लोगों तक पहुँचेयह सुनिश्चित करने के लिये उच्चतम न्यायालय द्वारा इंदिरा साहनी मामले (1992) में इस अवधारणा को पेश किया गया था।  

आय मानदंड: 

  • उच्च आय वर्ग के लिये वर्तमान में आय की सीमा लाख रुपए प्रति वर्ष है। 
  • यह सीमा वेतन और कृषि आय के अतिरिक्त अन्य स्रोतों से होने वाली आय पर लागू होती है। 
  • आय सीमा को हर तीन वर्ष में संशोधित किया जाना चाहियेलेकिन इसे आखिरी बार 2017 में अपडेट किया गया था। 

अन्य मापदंड: 

  • सरकारी कर्मचारियों के बच्चों के लियेउच्च आय वर्ग का अवधारण उनके माता-पिता के पद से होता हैन कि उनकी आय से। 
  • सांविधानिक पदों पर कार्यरत माता-पितासीधे भर्ती किये गए ग्रुप-A अधिकारियोंया दोनों माता-पिता के ग्रुप-B सेवाओं में कार्यरत बच्चों को क्रीमी लेयर के अंतर्गत रखा जाता है। 
  • उच्च पदस्थ सैन्य अधिकारियों (कर्नल और उससे ऊपर या समकक्ष) के बच्चे भी धनी वर्ग का भाग माने जाते हैं। 

सिविल कानून

मंदिर का पुजारी कोई 'कर्मकार' नहीं है

 13-Mar-2026

उमेश्वर अक्षयवर दुबे बनाम श्री साईनाथ सार्वजनिक सेवा मंडल ट्रस्ट एवं अन्य 

"मंदिर में पुजारी किसी भी प्रकार का शारीरिकअकुशलकुशलतकनीकीपरिचालनलिपिकीय या पर्यवेक्षणीय कार्य नहीं करता हैअपितु वह केवल धार्मिक भजनोंस्तोत्रों और आरती के अपने ज्ञान का उपयोग करता है और मंदिर में उनका पाठ करता है।" 

न्यायमूर्ति भार्गव डी. कारिया और न्यायमूर्ति एल.एस. पीरजादा 

स्रोत: गुजरात उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

गुजरात उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति भार्गव डी. कारिया और न्यायमूर्ति एल.एस. पीरजादा की खंडपीठ नेउमेशवर अक्षयवर दुबे बनाम श्री साईनाथ सार्वजनिक सेवा मंडल ट्रस्ट एवं अन्य (2026) के मामले में एक मंदिर पुजारी द्वारा दायर अपील को खारिज कर दियाजिनकी सेवा 2012 में समाप्त कर दी गई थी। न्यायालय ने यह निर्णय लिया कि वे औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 2(ध) के अंतर्गत 'कर्मकारकी श्रेणी में नहीं आते हैं और श्री साईबाबा मंदिर का प्रबंधन करने वाले प्रत्यर्थी न्यासी को अधिनियम की धारा 2(ञ) के अंतर्गत 'उद्योगनहीं माना जा सकता है। न्यायालय ने अधिकारिता के अभाव में श्रम न्यायालय द्वारा मामले को खारिज करने के निर्णय को बरकरार रखा। 

उमेश्वर अक्षयवर दुबे बनाम श्री साईनाथ सार्वजनिक सेवा मंडल ट्रस्ट एवं अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • अपीलकर्त्ता प्रत्यर्थी ट्रस्ट द्वारा संचालित श्री साईबाबा मंदिर में 10.03.1999 से पुजारी के रूप में काम कर रहा थापूजा और आरती करता था और उसे प्रारंभिक रूप से ₹1,200 प्रति माह का पारिश्रमिक मिलता था। 
  • अपीलकर्त्ता के अनुसारट्रस्ट में एक प्रबंधकदान संग्रहकर्तासामान्य प्रशासनिक कर्मचारीरसोइये और बूंदी लड्डू बनाने और परिसर की सफाई करने वाले कर्मचारी भी कार्यरत थे - जिनकी कुल संख्या लगभग 35 से 40 व्यक्ति थी। 
  • अपीलकर्त्ता की सेवाएँ 30.11.2012 को ट्रस्ट के एक प्रस्ताव द्वारा बिना नोटिसनोटिस वेतनछंटनी प्रतिकर या प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन किये बिना समाप्त कर दी गईं। 
  • उन्होंने अक्टूबर 2014 को सुलह अधिकारी के समक्ष एक औद्योगिक विवाद उठायाजिसे श्रम न्यायालय को भेज दिया गया। उन्होंने सेवा की निरंतरता और पूरे बकाया वेतन के साथ बहाली की मांग कीयह तर्क देते हुए कि ट्रस्ट एक 'उद्योगथा क्योंकि यह बूंदी लड्डूनारियल और अन्य पूजा सामग्री बेचकर वाणिज्यिक गतिविधि में संलग्न था। 
  • श्रम न्यायालय ने सितंबर 2016 को अपील खारिज कर दीयह मानते हुए कि अपीलकर्त्ता अधिनियम की धारा के अंतर्गत 'कर्मकारनहीं थाऔर इसलिये न्यायालय के पास अधिकारिता नहीं थी। एकल न्यायाधीश ने इस निर्णय को बरकरार रखाजिसके परिणामस्वरूप वर्तमान अपील दायर की गई। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

क्या ट्रस्ट (न्यास) को 'उद्योगकी श्रेणी में रखा जा सकता है: 

  • न्यायालय ने इंद्रवदन एन. अध्वर्यु पिपाला फली मोधवाड़ा बनाम लक्ष्मी नारायण देव ट्रस्ट के मामले में उच्चतम न्यायालय के दिनांक 29.01.2026 के आदेश का हवाला दियाजिसमें यह पुष्टि की गई थी किमंदिर ट्रस्ट "उद्योग" की श्रेणी में नहीं आता है, और यह भी कहा कि उच्चतम न्यायालय ने उस मामले में इस स्थिति की पुष्टि करते हुए केवल प्रतिकर के पहलू पर ही विचार किया था। 
  • न्यायालय ने तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम बनाम श्रम आयुक्त (1979) में आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के निर्णय पर भी विश्वास कियाजिसमें यह माना गया था कि तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम को अधिनियम की धारा 2(ञ) या व्यवसाय संघ अधिनियम के अधीन उद्योग नहीं माना जा सकता है। 
  • बैंगलोर वाटर सप्लाई एंड सीवरेज बोर्ड बनाम ए. राजप्पा (1978) के मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा दिये गए परीक्षण को लागू करते हुए - कि संस्था के प्रमुख चरित्र की जांच करनी चाहिये और यह कि छिटपुट वेतनभोगी कर्मचारी किसी संस्था को उद्योग में परिवर्तित नहीं करते हैं - न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि ट्रस्ट की प्राथमिक और मूल गतिविधि धार्मिक पूजा थीऔर भक्तों को लड्डू तैयार करने और वितरित करने का आकस्मिक कार्य इस चरित्र को परिवर्तित नहीं सकता था। 

क्या पुजारी को 'कर्मकारकी श्रेणी में रखा जा सकता है? 

  • न्यायालय ने निर्णय दिया कि पुजारी का कार्य— धार्मिक भजनोंकीर्तनों और आरती के ज्ञान का प्रयोग करना— धारा 2(में उल्लिखित किसी भी श्रेणी से बाहर हैअर्थात् शारीरिकअकुशलकुशलतकनीकीपरिचालनलिपिकीय या पर्यवेक्षणीय कार्य। संयोगवश मंदिर की अन्य क्रियाकलापों में सहायता करना भीइस भूमिका को सांविधिक परिभाषा के अंतर्गत नहीं लाता है। 

औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 क्या है? 

औद्योगिक विवाद 

  • औद्योगिक विवादनियोक्ताओं और कर्मचारियोंके बीच उत्पन्न होने वालेसंघर्षहैंजो अक्सर हितोंविचारों या अधिकारों के कथित उल्लंघन में अंतर के कारण होते हैं। 
  • इन विवादोंके दोनों पक्षकारों और अर्थव्यवस्था के समग्र कामकाज परदूरगामी प्रभाव पड़ सकते हैं। 
  • औद्योगिक विवादों के परिणामस्वरूपवादों और न्यायालय के आदेशों जैसीविधिक कार्रवाई हो सकती है। 
    • इससे संबंधित सभी पक्षकारों के लिये अतिरिक्त लागत और जटिलताएँ उत्पन्न हो सकती हैं। 
  • इन विवादों का निपटारा औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के अंतर्गत होता है और इनका निर्णयश्रम न्यायालय/औद्योगिक अधिकरणद्वारा किया जाता है । 
  • अधिनियम कीधारा 2(औद्योगिक विवाद को परिभाषित करती है। 

कर्मकार 

  • 1947 के अधिनियम के अधीन, 'कर्मकारसे तात्पर्यकिसी उद्योग में कार्यरतकिसी भी व्यक्ति से हैचाहे वह कुशल हो या अकुशलशारीरिक श्रम करने वाला हो या लिपिकीयतकनीकी हो या गैर-तकनीकी। 
  • कामगारों में कारखाने के श्रमिकों और मजदूरों से लेकर प्रशासनिक कर्मचारियों तकविविध प्रकार के व्यक्ति सम्मिलित होते हैंजो सभीएक औद्योगिक प्रतिष्ठान के कामकाज में योगदान करते हैं ।