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आपराधिक कानून
विवाद सुलझाने के प्रयास से पुलिस संज्ञान को रोका नहीं जा सकता
16-Mar-2026
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कुलदीप सिंह और अन्य बनाम पंजाब राज्य और अन्य "केवल सुलह का प्रयास करने से पुलिस को आपराधिक कृत्यों का संज्ञान लेने से नहीं रोका जा सकता।" न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति संजय कुमार और के. विनोद चंद्रन की पीठ ने कुलदीप सिंह और अन्य बनाम पंजाब राज्य और अन्य (2026) के मामले में अनुसूचित जाति समुदाय के सदस्यों द्वारा दायर अपील को स्वीकार करते हुए पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय द्वारा उच्च जाति के प्रत्यर्थियों को दी गई अग्रिम जमानत को रद्द कर दिया।
- न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि पुलिस द्वारा सुलह का प्रयास संज्ञेय अपराधों के लिये प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने में बाधक नहीं है, और किसी पुलिस अधिकारी के प्रत्यक्षदर्शी कथन के आधार पर दर्ज की गई प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) विधि की दृष्टि से पूर्णत: वैध है।
कुलदीप सिंह और अन्य बनाम पंजाब राज्य और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- पंजाब के एक क्षेत्र में दो समूहों के बीच विवाद उत्पन्न हुआ – अपीलकर्त्ता अनुसूचित जाति समुदाय से संबंधित थे और प्रत्यर्थी उच्च जाति समूह से थे।
- यह विवाद इस आरोप के कारण शुरू हुआ कि नाले का पानी अनुसूचित जाति के अपीलकर्त्ताओं के घरों में मोड़ा जा रहा था।
- पुलिस मौके पर पहुँची और विवाद को सुलझाने का प्रयास किया। यद्यपि, सुलह के प्रयासों के दौरान कथित तौर पर स्थिति हिंसक हो गई।
- अभियोजन पक्ष के अनुसार, इस दौरान अनुसूचित जाति समुदाय के सदस्यों पर गोलियां चलाई गईं और जाति आधारित गालियां दी गईं।
- घटना के प्रत्यक्षदर्शी पुलिस अधिकारी के प्रथम सूचना कथन के आधार पर बाद में प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज की गई।
- पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने प्रत्यर्थियों को अग्रिम जमानत दे दी, यह तर्क देते हुए कि प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) पीड़ितों के परिवाद के बजाय एक पुलिस अधिकारी के कथन पर आधारित थी।
- अनुसूचित जाति समुदाय के सदस्यों ने इस आदेश को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
पुलिस साक्षी द्वारा दर्ज प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) पर:
- न्यायालय ने उच्च न्यायालय के इस तर्क को खारिज कर दिया कि पुलिस अधिकारी के कथन पर आधारित प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) स्वाभाविक रूप से संदिग्ध होती है।
- न्यायालय ने माना कि किसी पुलिस अधिकारी के कथन के आधार पर प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) वैध रूप से दर्ज की जा सकती है, जिसने व्यक्तिगत रूप से अपराध होते हुए देखा हो, भले ही पीड़ितों ने स्वयं औपचारिक परिवाद दर्ज कराया हो या नहीं।
- "केवल इसलिये प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) पर संदेह नहीं किया जा सकता क्योंकि यह पुलिस के कथन पर आधारित है।"
सुलह और अपराध का संज्ञान:
- न्यायालय ने यह माना कि पुलिस का यह सांविधिक कर्त्तव्य है कि वह संज्ञेय अपराधों को दर्ज करे और उनका अन्वेषण करे, भले ही साथ ही साथ विवाद करने वाले पक्षकारों के बीच सुलह के प्रयास भी किये जा रहे हों।
- सुलह या मध्यस्थता के प्रयास - चाहे वे पुलिस द्वारा शुरू किये गए हों या किसी अन्य द्वारा - आपराधिक विधि को लागू करने के पुलिस के सांविधिक दायित्त्व को समाप्त या सीमित नहीं कर सकते।
- "पुलिस भी यह मानती है कि क्षेत्र में तनाव का माहौल था, जिसके कारण आपराधिक कृत्य हुए।"
पुलिस की शक्तियों और कर्त्तव्यों पर:
- न्यायालय ने इस बात की पुनः पुष्टि की कि संज्ञेय अपराध के घटित होने की सूचना प्राप्त होने पर पुलिस के पास प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज करने का विवेकाधीन अधिकार है।
- इस शक्ति को केवल इसलिये कम नहीं किया जा सकता है क्योंकि पक्षकारों के बीच सुलह या मध्यस्थता की कार्यवाही एक साथ चल रही है।
- किसी भी तरह के विवाद समाधान के प्रयासों के होते हुए भी, आपराधिक अपराध होने पर पुलिस का कार्रवाई करना कर्त्तव्य है।
अनुतोष के संबंध में:
- न्यायालय ने अग्रिम जमानत देने के उच्च न्यायालय के आदेश को अपास्त कर दिया। यह देखते हुए कि प्रत्यर्थियों के विरुद्ध अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के अधीन प्रथम दृष्टया मामला बनता है, अग्रिम जमानत रद्द कर दी गई और अनुसूचित जाति समुदाय के सदस्यों की अपील मंजूर कर ली गई।
प्रमुख विधिक सिद्धांतों की पुनः पुष्टि:
- पुलिस कथन के आधार पर दर्ज प्रथम सूचना रिपोर्ट की वैधता: प्रथम सूचना रिपोर्ट तब भी वैध रूप से दर्ज की जाती है जब सूचना देने वाला व्यक्ति एक पुलिस अधिकारी हो जिसने अपराध को देखा हो और केवल इसी आधार पर उसकी विश्वसनीयता को खारिज नहीं किया जा सकता है।
- सांविधिक कर्त्तव्य का सुलह-समझौते पर वरीयता : पुलिस द्वारा मध्यस्थता या सुलह-समझौते का प्रयास किया जाना, उन्हें संज्ञेय अपराधों के संबंध में संज्ञान लेने तथा विधि द्वारा निर्धारित अपने सांविधिक कर्त्तव्य के निर्वहन से वंचित नहीं करता।
- अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के मामलों में अग्रिम जमानत: अग्रिम जमानत पर विचार करते समय न्यायालयों को अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के पीछे विधायी आशय का ध्यान रखना चाहिये, विशेष रूप से जहाँ प्रथम दृष्टया मामला बनता हो।
- सूचना का स्रोत महत्त्वहीन: प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज कराने के लिये सूचना का स्रोत - चाहे वह पीड़ित हो, साक्षी हो या पुलिस अधिकारी - उसकी विधिक वैधता निर्धारित नहीं करता है।
किसी अपराध का संज्ञान लेना क्या होता है?
बारे में:
- "संज्ञान लेना" से तात्पर्य उस समय से है जब कोई न्यायिक प्राधिकरण प्रथम बार किसी कथित अपराध के बारे में जागरूक होता है और न्यायिक संज्ञान लेता है।
- किसी भी आपराधिक कार्यवाही को प्रारंभ करने से पूर्व यह वह सीमा है जिसे पार करना आवश्यक है।
संज्ञान का अर्थ:
- यह वह महत्त्वपूर्ण क्षण होता है जब कोई मजिस्ट्रेट या न्यायाधीश किसी कथित अपराध से अनभिज्ञ होने की स्थिति से न्यायिक क्षमता में सक्रिय रूप से उस पर विचार करने की ओर अग्रसर होता है।
- इस परिवर्तन के अभियुक्त और अभियोजन पक्ष दोनों के लिये महत्त्वपूर्ण विधिक निहितार्थ हैं।
ऐतिहासिक विधिक पूर्व निर्णय:
- गोपाल बनाम सम्राट (1913) के मामले में , जिसे आर. चारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1951) में अनुमोदित किया गया था, न्यायालय ने निर्णय दिया कि संज्ञान "वह बिंदु है जब मजिस्ट्रेट या न्यायाधीश प्रथम बार किसी अपराध का न्यायिक संज्ञान लेता है" और कार्यवाही प्रारंभ करने के लिये एक पूर्व शर्त है।
- दो प्रमुख सिद्धांत सामने आते हैं - संज्ञान लेना कार्यवाही प्रारंभ करने से भिन्न है और उससे पहले होता है, और यह किसी भी आपराधिक प्रक्रिया के प्रारंभ होने से पूर्व एक अनिवार्य शर्त है।
समकालीन विधिक समझ:
- अजीत कुमार पालित बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1963) के मामले में, उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि "संज्ञान" का कोई रहस्यमय महत्त्व नहीं है - न्यायिक संदर्भ में इसका सीधा सा अर्थ है "जागरूक होना"।
- इस अवधारणा को स्पष्ट रूप से किसी अपराध का न्यायिक संज्ञान लेने के रूप में परिभाषित किया गया है, जिसमें इसके गूढ़ स्वरूप के बजाय व्यावहारिक स्वरूप पर बल दिया गया है।
व्यावहारिक अनुप्रयोग:
- सम्राट बनाम सौरिंद्र मोहन चकरबट्टी (1910) के मामले में न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि संज्ञान लेने में किसी भी प्रकार की औपचारिक कार्रवाई शामिल नहीं होती है।
- यह उस क्षण घटित होता है जब कोई मजिस्ट्रेट किसी अपराध के संदिग्ध कृत्य पर विचार करना शुरू करता है।
- जहाँ कोई विधि न्यायिक विचार के लिये विशिष्ट सामग्री निर्धारित करती है, वहाँ संज्ञान लेने से पहले उन आवश्यकताओं को पूरा किया जाना चाहिये।
सांविधिक ढांचा ढाँचा
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 210 और दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की संबंधित धारा 190, जो मजिस्ट्रेटों द्वारा अपराधों के संज्ञान से संबंधित है, इस प्रकार हैं –
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भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 210 |
दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 190 |
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“धारा 210: मजिस्ट्रेटों द्वारा अपराधों का संज्ञान – (1) इस अध्याय के उपबंधों के अधीन रहते हुए. कोई प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट और उपधारा (2) के अधीन विशेषतया सशक्त किया गया कोई द्वितीय वर्ग मजिस्ट्रेट, किसी भी अपराध का संज्ञान निम्नलिखित दशाओं में कर सकता है— (क) उन तथ्यों का, जिसमें किसी विशेष विधि के अधीन प्राधिकृत किए गए किसी व्यक्ति द्वारा दाखिल किया गया कोई परिवाद शामिल है, जिनसे ऐसा अपराध बनता है परिवाद प्राप्त होने पर; (ख) ऐसे तथ्यों के बारे में इलैक्ट्रॉनिक रीति सहित किसी रीति में प्रस्तुत पुलिस रिपोर्ट पर; (ग) पुलिस अधिकारी से भिन्न किसी व्यक्ति से प्राप्त इस इत्तिला पर या स्वयं अपनी इस जानकारी पर कि ऐसा अपराध किया गया है। (2) मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट किसी द्वितीय वर्ग मजिस्ट्रेट को ऐसे अपराधों का, जिनकी जांच या विचारण करना उसकी क्षमता के भीतर है, उपधारा (1) के अधीन संज्ञान करने के लिये सशक्त कर सकता है। |
“धारा 190: मजिस्ट्रेटों द्वारा अपराधों का संज्ञान- (1) इस अध्याय के उपबंधों के अधीन रहते हुए, कोई प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट और उपधारा (2) के अधीन विशेषतया सशक्त किया गया कोई द्वितीय वर्ग मजिस्ट्रेट, किसी भी अपराध का संज्ञान निम्नलिखित दशाओं में कर सकता है- (क) उन तथ्यों का, जिनसे ऐसा अपराध बनता है, परिवाद प्राप्त होने पर; (ख) ऐसे तथ्यों के बारे में पुलिस रिपोर्ट पर; (ग) पुलिस अधिकारी से भिन्न किसी व्यक्ति से प्राप्त इस इत्तिला पर या स्वयं अपनी इस जानकारी पर कि ऐसा अपराध किया गया है। (2) मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट किसी द्वितीय वर्ग मजिस्ट्रेट को ऐसे अपराधों का, जिनकी जांच या विचारण करना उसकी क्षमता के अंदर है, उपधारा (1) के अधीन संज्ञान करने के लिये सशक्त कर सकता है। |
सिविल कानून
नि:शुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम के अधीन 14 वर्ष की आयु के पश्चात् कक्षा 8 पूर्ण करना अवैध नहीं है
16-Mar-2026
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पंकज चौहान और अन्य बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य और अन्य "चौदह वर्ष की आयु प्राप्त करने के बाद कक्षा 8 पूरी करना नि: शुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 के अधीन निषिद्ध नहीं है।" न्यायमूर्ति अजय मोहन गोयल |
चर्चा में क्यों?
हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति अजय मोहन गोयल ने पंकज चौहान और अन्य बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य और अन्य (2026) के मामले में प्रत्यर्थी की अंशकालिक बहु-कार्यकारी के रूप में नियुक्ति को चुनौती देने वाली एक रिट याचिका को खारिज कर दिया, यह स्पष्ट करते हुए कि चौदह वर्ष की आयु प्राप्त करने के बाद कक्षा 8 पूरी करना नि:शुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 के अधीन निषिद्ध नहीं है।
- न्यायालय ने निर्णय दिया कि नि:शुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम एक ऐसी विधि है जिसे निर्दिष्ट आयु वर्ग के बालकों के लिये शिक्षा तक पहुँच को प्रत्याभूत करने के लिये बनाई गई है, और इसके प्रावधानों को उस आयु के बाद अपनी स्कूली शिक्षा जारी रखने वाले व्यक्तियों के लिये अयोग्यता उत्पन्न करने के रूप में नहीं पढ़ा जा सकता है।
पंकज चौहान और अन्य बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- याचिकाकर्त्ता पंकज चौहान ने हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले के एक सरकारी प्राथमिक विद्यालय में प्रत्यर्थी की अंशकालिक बहुकार्यकारी के रूप में नियुक्ति को चुनौती दी।
- याचिकाकर्त्ता ने आरोप लगाया कि चयनित अभ्यर्थी पहले कक्षा 8 में अनुत्तीर्ण हो गया था और चौदह वर्ष की आयु पार करने के बाद उसने एक निजी विद्यालय से कक्षा 8 का नया प्रमाण पत्र प्राप्त किया था।
- उन्होंने तर्क दिया कि ऐसा प्रमाण पत्र अवैध था और नि:शुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 के प्रावधानों के विपरीत था।
- याचिकाकर्त्ता द्वारा अंशकालिक बहुकार्यकारी योजना, 2020 के अधीन दायर की गई अपील को प्रथम अपीलीय प्राधिकारी ने इस आधार पर नामंजूर कर दिया कि कोई महत्त्वपूर्ण अनियमितता नहीं पाई गई।
- विद्यालय शिक्षा निदेशक के समक्ष की गई एक और अपील को भी इसी प्रकार नामंजूर कर दिया गया।
- इन आदेशों से असंतुष्ट होकर याचिकाकर्त्ता ने रिट याचिका के माध्यम से हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय का रुख किया।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- नि:शुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम के दायरे पर: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि नि:शुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 छह से चौदह वर्ष की आयु वर्ग के बालकों के लिये निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा सुनिश्चित करने के विशिष्ट उद्देश्य से अधिनियमित किया गया था। अधिनियम के प्रावधानों को ध्यानपूर्वक पढ़ने से पता चलता है कि चौदह वर्ष से अधिक आयु के किसी व्यक्ति को किसी भी विद्यालय में कक्षा 8 में प्रवेश लेने या उसे पूर्ण करने से रोकने वाला कोई सांविधिक प्रतिबंध नहीं है।
- प्रमाण पत्र की प्रकृति पर: न्यायालय ने पाया कि चयनित अभ्यर्थी द्वारा प्रस्तुत कक्षा 8 के प्रमाण पत्र का सक्षम अधिकारियों द्वारा विधिवत सत्यापन किया गया था। इसकी प्रामाणिकता पर संदेह करने का कोई आधार नहीं मिला, और याचिकाकर्त्ता ऐसी कोई महत्त्वपूर्ण अनियमितता प्रदर्शित करने में असफल रहा जिससे इसे अमान्य घोषित किया जा सके।
- नियुक्ति को चुनौती देने के संबंध में: न्यायालय ने याचिकाकर्त्ता के तर्कों में कोई योग्यता नहीं पाई और अपीलीय प्राधिकरण तथा विद्यालय शिक्षा निदेशक दोनों के निर्णयों को बरकरार रखते हुए पुष्टि की कि प्रत्यर्थी की नियुक्ति किसी भी विधिक कमी से दूषित नहीं थी।
नि:शुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम क्या है?
पृष्ठभूमि:
- यह अधिनियम अगस्त 2009 में संसद द्वारा पारित किया गया तथा वर्ष 2010 में प्रभावी हुआ।।
- अनुच्छेद 21क (86वाँ सांविधिक संशोधन, 2002) के आधार पर, शिक्षा को 6-14 वर्ष की आयु के बालकों के लिये मौलिक अधिकार बना दिया गया।
मुख्य प्रावधान:
- 6 से 14 वर्ष की आयु के सभी बालकों के लिये पड़ोस के विद्यालयों में निःशुल्क एवं अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा का प्रावधान।
- किसी भी प्रकार की फीस या शुल्क नहीं लिया जाएगा जिससे बच्चे की शिक्षा पूर्ण करने में बाधा उत्पन्न हो।
- जो बच्चे विद्यालय में नामांकित नहीं हैं, उन्हें आयु के अनुरूप कक्षा में प्रवेश दिया जाएगा।
- इसमें केंद्र/राज्य सरकारों, स्थानीय अधिकारियों और संरक्षकों के कर्त्तव्यों का उल्लेख किया गया है।
- यह विधेयक छात्र-शिक्षक अनुपात (PTR), आधारभूत संरचना, कार्य दिवसों और शिक्षकों की योग्यता के लिये मानदंड निर्धारित करता है।
- शिक्षकों की नियुक्ति में शहरी-ग्रामीण असंतुलन नहीं है; शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों के लिये प्रयोग नहीं किया जा सकता (सिवाय जनगणना, निर्वाचन, आपदा अनुतोष के)।
निषेध:
- शारीरिक दण्ड तथा मानसिक उत्पीड़न
- प्रवेश हेतु स्क्रीनिंग प्रक्रियाएँ
- प्रति व्यक्ति फीस
- शिक्षकों द्वारा निजी ट्यूशन
- अमान्यता प्राप्त विद्यालयों का संचालन
महत्त्व:
- निजी विद्यालयों में 25% सीटें आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS)/वंचित वर्गों के लिये आरक्षित हैं (धारा 12(1)(ग))।
- विद्यालय प्रबंधन समितियों (SMC) का गठन, जिससे सहभागी शासन सुनिश्चित हो सके।।
- कक्षा 8 तक नो-डिटेंशन नीति (No Detention Policy) तथा सतत एवं समग्र मूल्यांकन (CCE) प्रणाली की शुरुआत।।
- जाति, धर्म या लिंग के आधार पर विभेद के प्रति शून्य सहिष्णुता (Zero tolerance)।
- उच्च प्राथमिक स्तर पर नामांकन में 19.4% की वृद्धि हुई (2009-2016)।
आलोचनाएँ:
- 6 वर्ष से कम आयु के बालकों को इस अधिनियम के अंतर्गत शामिल नहीं किया गया।।
- अधिनियम का प्रारूप शीघ्रता में तैयार किया गया, जिसमें शिक्षा की गुणवत्ता पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया गया।
- निजी विद्यालयों में 25% EWS आरक्षण के क्रियान्वयन में व्यावहारिक कठिनाइयाँ।
- अनाथ बच्चों के लिये आवश्यक दस्तावेज़ों (जन्म प्रमाण पत्र, BPL कार्ड आदि) की अनुपलब्धता के कारण बहिष्करण।
- 2019 संशोधन द्वारा कक्षा 5 एवं 8 में परीक्षाएँ पुनः प्रारंभ की गईं, जिससे नो-डिटेंशन नीति का आंशिक ह्रास हुआ।
- शिक्षकों के पर्याप्त प्रशिक्षण के अभाव में CCE प्रणाली के प्रभावी क्रियान्वयन में कठिनाई।