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करेंट अफेयर्स और संग्रह

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सिविल कानून

नगरपालिका विधियों का उल्लंघन करने वाले अतिक्रमणों को हटाने का निदेश राष्ट्रीय हरित अधिकरण द्वारा नहीं दे सकती

 18-Mar-2026

नरेंद्र भारद्वाज बनाम एम./एस. 108 सुपर कॉम्प्लेक्स आर.डब्ल्यू.. और अन्य 

"राष्ट्रीय हरित अधिकरण के पास कथित अतिक्रमण और कथित अवैध निर्माण को हटाने का निदेश देने की कोई अधिकारिता नहीं हैजो कि राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम की अनुसूची में निर्दिष्ट विधियों के उल्लंघन में किया गया हो।" 

न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और आलोक आराधे 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

भारत के उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और आलोक आराधे की पीठ नेनरेंद्र भारद्वाज बनाम एम./एस. 108 सुपर कॉम्प्लेक्स आर.डब्ल्यू.. और अन्य (2026) के मामलेमें राष्ट्रीय हरित अधिकरण (नई दिल्ली) के उस आदेश को अपास्त कर दियाजिसमें गाजियाबाद जिले के वसुंधरा जिले के सेक्टर-16A में खुले स्थान/पार्क के रूप में नामित भूमि पर कथित रूप से अवैध रूप से निर्मित मंदिर को हटाने का निदेश दिया गया था। 

  • न्यायालय ने निर्णय दिया कि राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 की धारा 14 के अधीन राष्ट्रीय हरित अधिकरण की अधिकारिता अनुसूची में सूचीबद्ध विधियों के अंतर्गत पर्यावरण से संबंधित विधि के महत्त्वपूर्ण प्रश्नों तक ही सीमित हैऔर नगरपालिका या नगर नियोजन विधियों के उल्लंघन में अनधिकृत निर्माण से जुड़े विवाद पूरी तरह से इस अधिकारिता से बाहर हैं।  

नरेंद्र भारद्वाज बनाम एम./एस. 108 सुपर कॉम्प्लेक्स आर.डब्ल्यू.. और अन्य (2026) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • एक रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन (RWA) ने गाजियाबाद जिले के वसुंधरा जिले के सेक्टर 16Aमें खुले स्थान/पार्क के रूप में निर्धारित भूमि पर कथित रूप से निर्मित मंदिर को हटाने की मांग करते हुए राष्ट्रीय हरित अधिकरण से संपर्क किया।  
  • रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन ने तर्क दिया कि निर्माण अनधिकृत था और नगरपालिका विधियों और नगर नियोजन अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन करते हुए किया गया था। 
  • नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने याचिका स्वीकार कर ली और कथित अनाधिकृत निर्माण को हटाने का आदेश पारित किया।  
  • इस आदेश से असंतुष्ट होकर अपीलकर्त्ता नरेंद्र भारद्वाज ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण के आदेश को भारत के उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम की धारा 14 के दायरे पर:न्यायालय ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 की धारा 14 अधिकरण को केवल पर्यावरण से संबंधित महत्त्वपूर्ण विधिक प्रश्नों पर ही निर्णय देने का अधिकार देती हैऔर वह भी केवल अनुसूची में विशेष रूप से सूचीबद्ध विधियों के संबंध में – अर्थात् वायु अधिनियमजल अधिनियमवन अधिनियमपर्यावरण संरक्षण अधिनियम और अन्य संबंधित विधि। राष्ट्रीय हरित अधिकरण की अधिकारिता व्यापक नहीं हैयह इस सांविधिक ढाँचे द्वारा सख्ती से सीमित है।  
  • विवाद की प्रकृति पर:न्यायालय ने पाया कि रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन (RWA) द्वारा उठाई गई शिकायत कथित तौर पर नगरपालिका विधियों और नगर नियोजन अधिनियम के उल्लंघन में किये गए अनधिकृत निर्माण को हटाने से संबंधित थी - इनमें से किसी का भी उल्लेख राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम की अनुसूची I में नहीं है। अतःयह विवाद्यक मूलतः नगरपालिका विधि और शहरी नियोजन का थान कि पर्यावरण विधि का। न्यायालय ने माना कि ऐसा विवाद अधिनियम के अर्थ के अंतर्गत पर्यावरण से संबंधित किसी भी महत्त्वपूर्ण विधिक प्रश्न को जन्म नहीं देता है। 
  • राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की अधिकारिता के प्रयोग पर:न्यायालय ने माना कि धारा 14 के अधीन अधिकरण की अधिकारिता का प्रयोग करने के लिये आवश्यक शर्तें इस मामले में पूरी नहीं हुईं। तदनुसारसंरचना को हटाने का निदेश देने वाला राष्ट्रीय हरित अधिकरण का आदेश अधिकारिता से बाहर पाया गया और उसे अपास्त कर दिया गया। 
  • रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन (RWA) को अनुतोष के संबंध में:विवादित आदेश को अपास्त करते हुएन्यायालय ने RWA की यह स्वतंत्रता बरकरार रखी कि वह अपनी शिकायत के उचित निवारण के लिये लागू नगरपालिका या नगर नियोजन ढाँचे के अधीन सक्षम प्राधिकारी से संपर्क कर सकता है। 
  • अपीलकर्त्ताओं के संरक्षण पर:न्यायालय ने राज्य को निदेश दिया कि वह अपीलकर्त्ताओं और प्रभावित पक्षकारों को नोटिस जारी किये बिना उनके विरुद्ध कोई भी दण्डात्मक कार्रवाई न करे। 

राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) क्या है? 

स्थापना एवं पृष्ठभूमि: 

  • पर्यावरण संबंधी मामलों के शीघ्र निपटान के लियेराष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के अधीन स्थापित। 
  • भारत विश्व स्तर पर (ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के बाद) तीसरा और पहला विकासशील देश था जिसने एक विशेष पर्यावरण अधिकरण की स्थापना की। 
  • मामले दर्ज होने के महीने के भीतर उनका निपटारा करना अनिवार्य है। 

संरचना: 

  • इसमें अध्यक्षन्यायिक सदस्य और विशेषज्ञ सदस्य शामिल होते हैं। 
  • कार्यकाल: 3 वर्ष या 65 वर्ष की आयु तकजो भी पहले होपुनर्नियुक्ति नहीं। 
  • सदस्यों की संख्या: न्यूनतम 10, अधिकतम 20 पूर्णकालिक सदस्य। 
  • पीठें(Benches) - प्रधान पीठ नई दिल्ली मेंअन्य भोपालपुणेकोलकाता और चेन्नई में। 

शक्तियां एवं अधिकारिता: 

  • इसमें पर्यावरण संबंधी महत्त्वपूर्ण प्रश्नों से जुड़े सभी सिविल मामले सम्मिलित हैं। 
  • उसे स्वप्रेरित होने कीशक्तियां प्राप्त हैं (उच्चतम न्यायालय द्वारा 2021 में पुष्टि की गई)। 
  • सिविल प्रक्रिया संहिता या भारतीय साक्ष्य अधिनियम से बाध्य नहीं; प्राकृतिक न्याय द्वारा निर्देशित। 
  • यह प्रदूषण फैलाने वाले से भुगतान लेने , एहतियाती उपायों और सतत विकास के सिद्धांतों कोलागू करता है । 
  • ये आदेशसिविल न्यायालय के निर्णयोंके समान ही लागू होंगे इनके विरुद्ध 90 दिनों के भीतर उच्चतम न्यायालय में अपील की जा सकती है। 

शास्ति: 

  • वर्षतक का कारावास, 10 करोड़ रुपएतक का जुर्मानाया दोनों। 

मुख्य विधियाँ (अनुसूची I) 

  • जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974। 
  • जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) उपकर अधिनियम, 1977। 
  • वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980। 
  • वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1981। 
  • पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986। 
  • लोक दायित्त्व बीमा अधिनियम, 1991। 
  • जैव विविधता अधिनियम, 2002। 

इन विधियों से संबंधित किसी भी उल्लंघन या इन विधियों के अधीन सरकार द्वारा लिये गए किसी भी निर्णय को राष्ट्रीय हरित अधिकरण के समक्ष चुनौती दी जा सकती है।  

सुदृढ़ताएँ : 

  • उच्च न्यायालयों एवं उच्चतम न्यायालय पर भार को कम करता है । 
  • नियमित न्यायालयों की तुलना में अधिक तीव्रकम खर्चीला एवं कम औपचारिक मंच प्रदान करता है 
  • पुनर्नियुक्ति के अभाव के कारण स्वतंत्र एवं निष्पक्ष निर्णय सुनिश्चित करता है 
  • पर्यावरण प्रभाव आकलन के अनुपालन को सुदृढ़ करता है।  

सिविल कानून

वन निवासी का दर्जा प्राप्त करने हेतु निवास एवं आजीविका हेतु कृषि का होना आवश्यक है

 18-Mar-2026

.सी. मुरुगेसन और अन्य बनाम जिला कलेक्टर और अन्य 

"वन क्षेत्र में निरंतर निवास करना और आजीविका के लिये कृषि करके वन पर निर्भर रहनाअनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 के अधीन वन निवासी घोषित होने के लिये आवश्यक है।" 

न्यायमूर्ति एस.एम. सुब्रमण्यम और न्यायमूर्ति के. सुरेंद्र 

स्रोत: मद्रास उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति एस.एम. सुब्रमण्यम और न्यायमूर्ति के. सुरेंद्र की पीठ ने, ए.सी. मुरुगेसन और अन्य बनाम जिला कलेक्टर और अन्य (2026) के मामलेमेंआरक्षित वन घोषित भूमि पर अपने कब्जे के अधिकार की घोषणा की मांग करने वाले व्यक्तियों के एक समूह द्वारा दायर अपीलों को खारिज कर दियायह मानते हुए कि वन क्षेत्र में निरंतर निवास और कृषि के माध्यम से आजीविका के लिये वन पर निर्भरताअनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 के अधीन वन निवासी घोषित होने के लिये आवश्यक और गैर-परक्राम्य शर्तें हैं। 

.सी. मुरुगेसन और अन्य बनाम जिला कलेक्टर और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • अपीलकर्त्ताओं ने दावा किया कि उनके पूर्वज वन भूमि पर कब्जा रखते थेउस पर कृषि करते थे और 75 वर्षों से अधिक समय से वन क्षेत्र में रह रहे थे। 
  • पनामाराथुपट्टी झील और जलाशयके निर्माण के दौरानक्षेत्र में भूमि के विशाल विस्तार का अधिग्रहण किया गयाजिससे अपीलकर्त्ताओं के दावे वाली संपत्तियों पर प्रभाव पड़ा। 
  • अपीलकर्त्ताओं ने जिला कलेक्टर के समक्ष एक आवेदन दायर कर आरक्षित वनके रूप में नामित भूमि पर अपने कब्जे के अधिकार की घोषणा की मांग की । 
  • जिला कलेक्टर ने दावे का समर्थन करने के लिये अपर्याप्त साक्ष्य पाते हुए उनका आवेदन खारिज कर दिया। 
  • अपीलकर्त्ताओं ने इस नामंजूरी को रिट न्यायालय के समक्ष चुनौती दीतथापिरिट न्यायालय ने उनकी याचिका खारिज कर दी। 
  • इससे व्यथित होकरअपीलकर्त्ताओं ने मद्रास उच्च न्यायालय में अपील दायर कीजिसमें उन्होंनेअधिनियम के अधीनअन्य पारंपरिक वन निवासियों के रूप में अपने दावे को दोहराया। 
  • अपीलकर्त्ताओं ने स्वीकार किया कि वे वर्तमान में वन क्षेत्र के बाहर रह रहे हैंलेकिन उन्होंने तर्क दिया कि वे भूमि पर कृषि करना जारी रखते हैंऔर 75 वर्षों से अधिक के उनके पैतृक संबंध उन्हें अनुतोष पाने का अधिकार देते हैं। 
  • राज्य ने इस दावे का विरोध करते हुए कहा कि अपीलकर्त्ता स्थानीय निवासी नहीं थेकिसी आदिवासी समुदाय से संबंधित नहीं थेऔर उनके पास प्राथमिक निवास या आजीविका के लिये जंगल पर वास्तविक निर्भरता का कोई साक्ष्य नहीं था। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • अधिनियम के अंतर्गत आवश्यक शर्तों पर:न्यायालय ने माना कि दो शर्तें निश्चायक रूप से स्थापित होनी चाहिये - वन क्षेत्र में निवास और आजीविका के लिये कृषि। इन मूलभूत आवश्यकताओं के सबूत के अभाव में अधिनियम के अंतर्गत कोई अनुतोष प्रदान नहीं किया जा सकता 
  • धारा 2(ण) के अधीन 'अन्य पारंपरिक वन निवासीकी परिभाषा पर:न्यायालय ने धारा 2(ण) का उल्लेख कियाजिसके अनुसार दावेदार को 13 दिसंबर, 2005 से पहले कम से कम तीन पीढ़ियों तक प्राथमिक रूप से वन या वन भूमि में निवास करता रहा है और जो जीविका की वास्तविक आवश्यकताओं के लिये उन पर निर्भर रहा है - एक ऐसी सीमा जिसे अपीलकर्त्ता पूरा करने में असफल रहे थे। 
  • वास्तविक कृषि बनाम वाणिज्यिक दोहन:न्यायालय ने स्पष्ट किया कि वास्तविक कृषि का अर्थ जीवन निर्वाह के लिये जुताईसिंचाई और रोपण करना हैन कि व्यावसायिक दोहन। चूँकि वन भूमि का वाणिज्यिक उपयोग किया जा रहा थाइसलिये अपीलकर्त्ता अधिनियम के संरक्षण क्षेत्र से बाहर थे। 
  • वन क्षेत्र से बाहर स्थानांतरण के संबंध में:यदि यह मान भी लिया जाए कि अपीलकर्त्ता अपने पूर्वजों के साथ वन में ही निवास करते थेतब भी वे वर्तमान में कहीं और निवास कर रहे थे। न्यायालय ने माना कि केवल इस स्थानांतरण के कारण ही वे वन निवासी का दर्जा प्राप्त करने के पात्र नहीं रह जातेक्योंकि वर्तमान निवास एक अनिवार्य शर्त है। 
  • अपील खारिज होने पर:अपीलकर्त्ताओं द्वारा कोई विधिक अधिकार स्थापित न होने के कारणन्यायालय ने जिला कलेक्टर और रिट न्यायालय के आदेशों को बरकरार रखते हुए अपील खारिज कर दी। 

अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 क्या है? 

पृष्ठभूमि: 

  • यह अधिनियम वर्ष 2006 में अधिनियमित किया गया तथा वर्ष 2008 में प्रवर्तन में लाया गयाइसे सामान्यतः “वन अधिकार अधिनियम (FRA)” अथवा “वन अधिकार अधिनियम” भी कहा जाता है।  
  • यह अधिनियम उन वन-निवासी समुदायों के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय को दूर करने के लिये बनाया गया था जो पीढ़ियों से जंगलों में रहते आए थे और उन पर निर्भर थेलेकिन जिन्हें उनके अधिकारों की विधिक मान्यता से वंचित रखा गया था। 
  • यह संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 46 के अधीन अनुसूचित जनजातियों और वन निवासियों के प्रति संवैधानिक प्रतिबद्धता को प्रभावी बनाता है। 

मुख्य उपबंध: 

  • यह व्यक्तिगत वन अधिकारों (13 दिसंबर, 2005 से पूर्व कब्जे वाली वन भूमि पर कृषि करने और रहने का अधिकार) और सामुदायिक वन अधिकारों (सामुदायिक वन संसाधनों की रक्षाप्रबंधन और उपयोग करने का अधिकार) को मान्यता देता है और उन्हें प्रदान करता है। 
  • इसमें वन क्षेत्रों में रहने वाली अनुसूचित जनजातियाँ और अन्य पारंपरिक वैन निवासी शामिल हैं - जिन्हें धारा 2(ण) के अधीन उन समुदायों के रूप में परिभाषित किया गया है जो 13 दिसंबर, 2005 से पूर्व कम से कम तीन पीढ़ियों (75 वर्ष) से ​​जंगलों में रह रहे हैं। 
  • ग्राम सभा वन अधिकारों के अवधारण की प्रक्रिया शुरू करने वाली प्राथमिक संस्था है। 
  • मान्यता प्राप्त अधिकारों में निवासकृषिपशुपालनमछली पकड़ने और वन उत्पादों तक पहुँच के अधिकार शामिल हैं। 

संस्थागत तंत्र: 

  • दावों का निर्णय तीन स्तरों पर किया जाता है — उप-मंडल स्तरीय समितिजिला स्तरीय समिति और राज्य स्तरीय निगरानी समिति। 
  • अधिकारों को मान्यता देने का अंतिम अधिकार जिला स्तरीय समिति के पास निहित है। 
  • दावों के सत्यापन और अनुशंसा में ग्राम सभाओं की केंद्रीय भूमिका होती है। 

महत्त्व: 

  • यह लाखों वन-निवासी के परिवारों को भूमि स्वामित्व की सुरक्षा प्रदान करता है। 
  • यह सामुदायिक वन संसाधन अधिकारों के माध्यम से समुदायों को वनों के संरक्षण और प्रबंधन के लिये सशक्त बनाता है। 
  • इसे आदिवासी अधिकारोंपर्यावरण विधि और सामाजिक न्याय के अंतर्संबंध में एक ऐतिहासिक विधि के रूप में मान्यता प्राप्त है। 
  • इसके लागू होने के बाद से इसे पूरे भारत में वन-निवासी के परिवारों को वितरित किया गया है।