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सिविल कानून

कंपनियों का विलय और समामेलन

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 15-May-2026

परिचय 

विलय और समामेलनकंपनी अधिनियम, 2013 के अधीन उपलब्ध सबसे महत्त्वपूर्ण कॉर्पोरेट पुनर्गठन तंत्रों में से हैं। ये कंपनियों को संचालन को समेकित करनेपूंजी संरचना को अनुकूलित करने और अंशधारकोंलेनदारों और कर्मचारियों के हितों की रक्षा करने वाली विधिक रूप से विनियमित प्रक्रिया के माध्यम से रणनीतिक तालमेल हासिल करने में सक्षम बनाते हैं। 

  • धारा 232 सभी कंपनियों पर लागू होने वाले विलय के लिये अधिकरण द्वारा स्वीकृत मार्ग को नियंत्रित करती है। 
  • धारा 233 लघु कंपनियोंहोल्डिंग-सहायक कंपनियों के जोड़ों और निर्धारित वर्गों के लिये एक त्वरितकेंद्र सरकार-रजिस्ट्रीकृत मार्ग प्रदान करती है। 
  • धारा 234 विलय ढाँचे को सीमा पार संव्यवहार तक विस्तारित करती हैजिससे RBI की मंजूरी और केंद्र सरकार की अधिसूचना के अधीन भारतीय-रजिस्ट्रीकृत कंपनियों और विदेशी कंपनियों के बीच विलय की अनुमति मिलती है। 
  • ये तीनों प्रावधान मिलकर भारत में कॉर्पोरेट संयोजनों के लिये संपूर्ण विधायी संरचना का निर्माण करते हैं। 

धारा 232 — अधिकरण के माध्यम से विलय और समामेलन 

  • जहाँ धारा 230 के अधीन किसी समझौते या व्यवस्था में विलय या समामेलन शामिल हैवहाँ अधिकरण लेनदारों या सदस्यों की बैठकें आयोजित करने का आदेश दे सकता है और प्रक्रियात्मक आवश्यकताओं को पूरा किये जाने से संतुष्ट होने परबाध्यकारी आदेशों के साथ योजना को मंजूरी दे सकता है। 
  • विलय करने वाली कंपनियों को सदस्यों और लेनदारों को निम्नलिखित दस्तावेज़ प्रसारित करने होंगे: निदेशकों द्वारा अपनाई गई मसौदा योजनारजिस्ट्रार के पास फाइलिंग की पुष्टिअंशधारकोंप्रमुख प्रबंधकीय कर्मियों और प्रमोटरों पर पड़ने वाले प्रभाव को स्पष्ट करने वाली निदेशकों की रिपोर्टजिसमें अंश विनिमय अनुपात और मूल्यांकन संबंधी कठिनाइयाँ शामिल हैंयदि कोई हो तो विशेषज्ञ मूल्यांकन रिपोर्टऔर एक पूरक लेखा विवरणयदि अंतिम वार्षिक खाते पहली बैठक से छह महीने से अधिक पहले समाप्त हुए वित्तीय वर्ष से संबंधित हैं। 
  • स्वीकृति मिलने परअधिकरण निम्नलिखित आदेश दे सकता है: अंतरणकर्ता कंपनी के उपक्रमसंपत्ति या देनदारियों का अंतरिती कंपनी कोअंशों या डिबेंचरों का आवंटनलंबित विधिक कार्यवाही जारी रखनाअंतरणकर्ता कंपनी का परिसमापन किये बिना विघटनअसंतुष्ट व्यक्तियों के लिये प्रावधानऔर कर्मचारियों का अंतरण। सूचीबद्ध से गैर-सूचीबद्ध विलय के मामलों मेंअंतरिती कंपनी तब तक गैर-सूचीबद्ध रहती है जब तक वह अलग से सूचीबद्ध नहीं हो जातीऔर असंतुष्ट अंशधारकों को SEBI द्वारा निर्धारित मूल्य से कम का भुगतान नहीं किया जाना चाहिये 
  • किसी भी योजना को तब तक स्वीकृत नहीं किया जाएगा जब तक कि कंपनी का लेखा परीक्षक यह प्रमाणित न कर दे कि प्रस्तावित लेखांकन प्रक्रिया धारा 133 के अंतर्गत निर्धारित मानकों के अनुरूप है। योजना में एक निर्धारित तिथि निर्दिष्ट होनी चाहिये और वह उस तिथि से प्रभावी मानी जाएगी। कंपनियों को प्रतिवर्ष रजिस्ट्रार के पास अनुपालन विवरण दाखिल करना होगाजिसे चार्टर्ड अकाउंटेंटकॉस्ट अकाउंटेंट या प्रैक्टिसिंग कंपनी सेक्रेटरी द्वारा प्रमाणित किया जाना चाहिये। विवरण दाखिल न करने पर बीस हजार रुपए का जुर्माना लगेगाऔर व्यतिक्रम जारी रहने पर प्रति दिन एक हजार रुपए का जुर्माना लगेगाजिसकी अधिकतम सीमा तीन लाख रुपए है। 

धारा 233 — त्वरित विलय 

  • धारा 233 दो या दो से अधिक छोटी कंपनियोंएक होल्डिंग कंपनी और उसकी पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनीऔर ऐसे अन्य वर्गों के लिये उपलब्ध अधिकरण को दरकिनार करने का मार्ग प्रदान करती हैजैसा कि विहित किया जा सकता है। 
  • अंतरणकर्ता और अंतरिती कंपनियों को रजिस्ट्रारआधिकारिक परिसमापक और प्रभावित व्यक्तियों को प्रस्तावित योजना की सूचना जारी करनी होगी और तीस दिनों के भीतर आपत्तियां आमंत्रित करनी होंगी। योजना को आम बैठकों में कुल शेयरों के कम से कम नब्बे प्रतिशत धारक सदस्यों द्वारा अनुमोदित किया जाना चाहिये। प्रत्येक कंपनी को रजिस्ट्रार के पास दिवालिया की घोषणा दाखिल करनी होगी। लेनदारों की स्वीकृति उन लोगों से प्राप्त की जानी चाहिये जो मूल्य में नौ-दसवें अंश का प्रतिनिधित्व करते हैंया तो इक्कीस दिनों की पूर्व सूचना पर आयोजित बैठक में या लिखित रूप में। 
  • अंतरिती कंपनी अनुमोदित योजना को केंद्र सरकाररजिस्ट्रार और आधिकारिक परिसमापक के पास दाखिल करती है। यदि रजिस्ट्रार या आधिकारिक परिसमापक कोई आपत्ति नहीं उठाते हैंतो केंद्र सरकार योजना को पंजीकृत करती है और पुष्टि जारी करती है। यदि आपत्ति उठाई जाती हैतो रजिस्ट्रार या आधिकारिक परिसमापक को तीस दिनों के भीतर लिखित रूप में इसकी सूचना देनी होगीमौन को आपत्ति न होने के रूप में माना जाता है। 
  • यदि केंद्र सरकार को लगता है कि यह योजना जनहित या लेनदारों के हितों के विपरीत हैतो वह साठ दिनों के भीतर अधिकरण से संपर्क कर सकती है। अधिकरण तब या तो धारा 232 के अधीन योजना को आगे बढ़ाने का निदेश दे सकता है या स्वतंत्र रूप से इसकी पुष्टि कर सकता है।  
  • योजना के रजिस्ट्रीकरण से अंतरणकर्ता कंपनी का परिसमापन किये बिना ही विघटन हो जाता है और इसके परिणामस्वरूप: सभी संपत्ति और देनदारियों का अंतरण स्वतः ही अंतरिती कंपनी को हो जाता हैअंतरित संपत्ति पर विद्यमान भार लागू रहते हैंलंबित विधिक कार्यवाही जारी रहती हैऔर असंतुष्ट अंशधारकों या लेनदारों को देय अवैतनिक राशियों के लिये अंतरिती कंपनी की देयता समाप्त हो जाती है। अंतरणकर्ता द्वारा अपनी अधिकृत पूंजी पर भुगतान की गई फीस को विलय के बाद अंतरिती द्वारा अपनी बढ़ी हुई पूंजी पर देय फीस के विरुद्ध समायोजित किया जाता है।  
  • धारा 232 और 233 दोनों मेंअंतरिती कंपनी को अपने नाम से या अपनी ओर सेअपनी सहायक कंपनियों या सहयोगियों की ओर से किसी ट्रस्ट के माध्यम से शेयर रखने से प्रतिबंधित किया गया है - विलय पर ऐसे सभी शेयर रद्द या समाप्त हो जाते हैं। 

धारा 234 — विदेशी कंपनियों के साथ सीमा पार विलय 

  • धारा 234 भारत के विलय ढाँचे को सीमा पार संव्यवहार तक विस्तारित करती है। कंपनी अधिनियम, 2013 के अध्याय 15 के प्रावधान अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत कंपनियों और केंद्र सरकार द्वारा समय-समय पर अधिसूचित विदेशी अधिकारिता में निगमित कंपनियों के बीच विलय और समामेलन की योजनाओं पर यथावश्यक परिवर्तनों के साथ लागू होते हैं। केंद्र सरकार भारतीय रिजर्व बैंक के परामर्श से ऐसे सीमा पार विलय के लिये नियम बनाने के लिये सशक्त है। 
  • उपधारा (2) के अधीनकोई विदेशी कंपनी भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की पूर्व स्वीकृति से किसी भारतीय रजिस्ट्रीकृत कंपनी में विलय कर सकती हैया इसके विपरीतकोई भारतीय कंपनी किसी विदेशी कंपनी में विलय कर सकती है। योजना की शर्तों के अनुसारविलय करने वाली कंपनी के अंशधारकों को नकदडिपॉजिटरी रसीदों मेंया आंशिक रूप से नकद और आंशिक रूप से डिपॉजिटरी रसीदों में भुगतान किया जा सकता हैजैसा कि योजना अवधारित करे। 
  • इस संदर्भ में "विदेशी कंपनी" शब्द का अर्थ भारत के बाहर निगमित कोई भी कंपनी या निगमित निकाय हैचाहे उसका भारत में कोई व्यावसायिक स्थान हो या न हो। यह व्यापक परिभाषा सुनिश्चित करती है कि सीमा पार विलय का ढाँचा केवल भारत में भौतिक उपस्थिति वाली कंपनियों तक ही सीमित न रहेअपितु किसी भी विदेशी निगमित इकाई पर लागू हो जो किसी भारतीय कंपनी के साथ विलय करना चाहती हो। 

निष्कर्ष  

कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 232, 233 और 234 भारत में कॉर्पोरेट विलय और समामेलन के लिये एक स्तरीयव्यापक ढाँचा स्थापित करती हैं। धारा 232 सभी प्रकार की कंपनियों से जुड़े जटिल पुनर्गठनों के लिये अधिकरण की कठोर निगरानी सुनिश्चित करती है। धारा 233 योग्य छोटी संस्थाओं के लिये एक तेज़कम विवाद वाला मार्ग प्रदान करती हैजिसके अधीन केंद्र सरकार के माध्यम से अनुमोदन किया जाता हैजबकि अधिकरण दुरुपयोग पर नियंत्रण बनाए रखता है। धारा 234 भारतीय कॉर्पोरेट विधि को वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिये खोलती हैजिससे RBI की निगरानी और केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित अधिकारिताओं के अधीन सीमा पार विलय संभव हो पाता है। ये प्रावधान सभी हितधारकों के लिये सांविधिक संरक्षण के साथ व्यावसायिक लचीलेपन का संतुलन बनाते हैं - जिससे न्यायपालिका में करियर बनाने के इच्छुक अभ्यर्थियोंविधिक पेशेवरों और कॉर्पोरेट पेशेवरों के लिये इन प्रावधानों का ज्ञान अनिवार्य हो जाता है।