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आपराधिक कानून
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 17क का समावेश
13-Jan-2026
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सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17क की सांविधानिकता पर विभाजित फैसला आया है, जिसमें इस बात पर अलग-अलग विचार हैं कि क्या पूर्व स्वीकृति ईमानदार अधिकारियों का संरक्षण करती है या भ्रष्ट लोगों को संरक्षण प्रदान करती है। न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और के.वी. विश्वनाथन |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2025) के मामले में न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और के.वी. विश्वनाथन की न्यायपीठ ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 17क की सांविधानिकता पर विभाजित फैसला सुनाया, जिसे वर्ष 2018 के संशोधन द्वारा जोड़ा गया था, जो किसी लोक सेवक के विरुद्ध अन्वेषण प्रारंभ करने के लिये सरकार से पूर्व स्वीकृति अनिवार्य करता है।
सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2025) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 में वर्ष 2018 में किये गए संशोधनों की सांविधानिकता को चुनौती देते हुए सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन द्वारा यह रिट याचिका दायर की गई थी ।
- मुख्य चुनौती नई अंत:स्थापित धारा 17क के विरुद्ध थी।
- धारा 17क में यह प्रावधान है कि कोई भी पुलिस अधिकारी केंद्रीय या राज्य सरकार के सक्षम प्राधिकारी की पूर्व स्वीकृति के बिना आधिकारिक कार्यों के निर्वहन में लिये गए किसी भी निर्णय या सिफारिश के संबंध में किसी लोक सेवक के विरुद्ध कोई पूछताछ, अन्वेषण या जांच प्रारंभ नहीं कर सकता है।
- याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने तर्क दिया कि यह आवश्यकता एक ऐसे संरक्षण को पुनः लागू करती है जिसे उच्चतम न्यायालय पहले के मामलों में रद्द कर चुका है।
- भूषण ने विनीत नारायण बनाम भारत संघ और डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी बनाम निदेशक, सीबीआई के मामलों में दिये गए निर्णयों का हवाला दिया, जहां न्यायालय ने वरिष्ठ लोक सेवकों के विरुद्ध अन्वेषण से पहले पूर्व स्वीकृति की आवश्यकता वाले प्रावधानों को अमान्य कर दिया था।
- भूषण ने तर्क दिया कि धारा 17क कार्यपालिका के सदस्यों को, जिनमें वे मंत्री भी शामिल हैं जो स्वयं निर्णय लेने में शामिल हो सकते हैं, यह तय करने की अनुमति देती है कि अन्वेषण प्रारंभ किया जाना चाहिये या नहीं, जिससे हितों का टकराव पैदा होता है।
- सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इसका खंडन करते हुए कहा कि पहले के फैसलों में पूर्व अनुमोदन के सभी रूपों पर रोक नहीं लगाई गई थी और धारा 17क गुणात्मक रूप से भिन्न और संकीर्ण रूप से तैयार की गई थी।
- मेहता ने तर्क दिया कि धारा 17क केवल आधिकारिक कार्यों में निर्णय लेने की प्रक्रिया को ही संरक्षण देती है और इसका उद्देश्य उन तुच्छ और तंग करने वाली शिकायतों को रोकना है जिनसे नीतिगत गतिरोध उत्पन्न हो सकता है।
- उन्होंने माताजोग डोबे बनाम एचसी भारी के मामले का हवाला देते हुए तर्क दिया कि लोक सेवकों के विरुद्ध शिकायतों के अन्वेषण के लिये सांविधिक फिल्टर सांविधानिक रूप से अनुमेय थे।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं ?
न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना का विचार:
- न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि धारा 17क असांविधानिक है और इसे अमान्य कर दिया जाना चाहिये।
- उन्होंने कहा कि यह प्रावधान ईमानदार अधिकारियों का संरक्षण करने के बजाय "भ्रष्ट लोगों को संरक्षण देने" का प्रयास था।
- धारा 17क असांविधानिक है और इसे अमान्य किया जाना चाहिये। इसके लिये किसी पूर्व स्वीकृति की आवश्यकता नहीं है। यह प्रावधान विनीत नारायण और सुब्रमण्यम स्वामी के निर्णयों में पहले ही अमान्य किये जा चुके प्रावधान को पुनर्जीवित करने का प्रयास है।
- पूर्व स्वीकृति की आवश्यकता को अधिनियम के उद्देश्य के विपरीत पाया गया क्योंकि यह अन्वेषण को बाधित करता है और ईमानदार और सत्यनिष्ठ लोगों का संरक्षण करने के बजाय भ्रष्ट लोगों को संरक्षण प्रदान करता है।
न्यायमूर्ति के.वी विश्वनाथन का विचार:
- न्यायमूर्ति विश्वनाथन ने कहा कि धारा 17क सांविधानिक रूप से वैध है, बशर्ते कि मंजूरी का निर्णय राज्य के लोकपाल या लोकायुक्त द्वारा किया जाना चाहिये।
- उन्होंने धारा 17क को इस प्रकार संशोधित किया कि कार्यपालिका से मुक्त एक स्वतंत्र एजेंसी को ही मंजूरी के प्रश्न पर निर्णय लेना होगा।
- न्यायमूर्ति विश्वनाथन ने टिप्पणी की, कि इस प्रावधान को अमान्य करना "बच्चे को नहाने के पानी के साथ बाहर फेंकने" के समान होगा।
- उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि जब तक ईमानदार लोक सेवकों को तुच्छ जांचों से बचाया नहीं जाता, तब तक "नीतिगत गतिरोध" की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी।
- धारा 17क में अमान्य वर्गीकरण का कोई दोष नहीं है। दुरुपयोग की संभावना धारा 17क को अमान्य करने का आधार नहीं है।
- उन्होंने कहा कि यदि धारा 17क को अमान्य कर दिया जाता है, तो लोकपाल के माध्यम से प्रस्तुत शिकायतों को छँटनी की प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा, जबकि पुलिस के माध्यम से की गई शिकायतों के लिए ऐसी कोई प्रक्रिया लागू नहीं होगी, जिससे द्वैतता और संरचनात्मक असंतुलन उत्पन्न होगा।
मतभेद और संदर्भ:
- न्यायपीठ में मतभेद को देखते हुए, मामले को भारत के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखने का निर्देश दिया गया ताकि इस मुद्दे पर निर्णय लेने के लिये एक उपयुक्त न्यायपीठ का गठन किया जा सके।
- सुनवाई के दौरान, न्यायपीठ ने अनुच्छेद 14 के अधीन सांविधानिक वैधता के संबंध में दोनों पक्षकारों की चिंताओं को उठाया।
- न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि हर आधिकारिक निर्णय भ्रष्टाचार नहीं होता और उन्होंने एफआईआर दर्ज होने से उत्पन्न होने वाले कलंक और भय से ईमानदार अधिकारियों का संरक्षण करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
- भूषण ने सुझाव दिया कि धारा 17 (अन्वेषण करने वाले अधिकारी का स्तर) और धारा 19 (अभियोजन के लिये मंजूरी) जैसे मौजूदा सुरक्षा उपाय पहले से ही मौजूद हैं, और कार्यकारी अनुमोदन के बजाय न्यायालय या लोकपाल की देखरेख में प्रारंभिक अन्वेषण का प्रस्ताव रखा।
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम , 1988 की धारा 17क क्या है ?
बारे में:
- भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 में धारा 17क को 2018 के संशोधन के माध्यम से जोड़ा गया था।
- इसमें यह अनिवार्य किया गया है कि अधिनियम के अधीन किसी लोक सेवक के विरुद्ध अन्वेषण प्रारंभ करने के लिये सरकार से पूर्व स्वीकृति प्राप्त करना आवश्यक है।
- इस प्रावधान में कहा गया है कि कोई भी पुलिस अधिकारी सक्षम प्राधिकारी की पूर्व स्वीकृति के बिना आधिकारिक कार्यों के निर्वहन में लिये गए किसी भी निर्णय या सिफारिश के संबंध में किसी लोक सेवक के विरुद्ध कोई पूछताछ, अन्वेषण या जांच शुरू नहीं कर सकता है।
- सक्षम प्राधिकारी से तात्पर्य केंद्र या राज्य सरकार के उपयुक्त प्राधिकारी से है।
धारा 17क के पीछे का तर्क:
- यह प्रावधान लोक सेवकों के विरुद्ध निराधार और परेशान करने वाली शिकायतों को रोकने के लिये लागू किया गया था।
- इसका उद्देश्य लोक सेवकों को दुर्भावनापूर्ण अन्वेषण के माध्यम से उत्पीड़न से बचाना था।
- इसका उद्देश्य उन ईमानदार अधिकारियों को संरक्षण देना था जो आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन में सद्भावनापूर्ण निर्णय लेते हैं।
- समर्थकों ने तर्क दिया कि अन्वेषण के डर से उत्पन्न होने वाली नीतिगत गतिरोध को रोकने के लिये यह आवश्यक था।
- इस प्रावधान का उद्देश्य पूर्ण अन्वेषण से पहले शिकायतों का अन्वेषण के लिये एक सांविधिक फिल्टर बनाना था।
सिविल कानून
सरोगेसी अधिनियम के अंतर्गत आयु-सीमा वैध
13-Jan-2026
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सीमा चक्रवर्ती एवं अन्य बनाम भारत संघ एवं अन्य। “ये उपाय वैध राज्य हितों की पूर्ति के लिये किये गए हैं, विधायिका के उद्देश्य के साथ इनका तर्कसंगत संबंध है, और इन्हें अत्यधिक या दमनकारी नहीं कहा जा सकता। व्यक्तिगत कठिनाई, चाहे वह कितनी ही वास्तविक क्यों न हो, लोकहित में बनाई गई किसी वैधानिक नीति को अमान्य करने या शिथिल करने का आधार नहीं बन सकती।” मुख्य न्यायाधीश आशुतोष कुमार और न्यायमूर्ति अरुण देव चौधरी |
स्रोत: गुवाहाटी उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
सीमा चक्रवर्ती एवं अन्य बनाम भारत संघ एवं अन्य (2025) के मामले में मुख्य न्यायाधीश आशुतोष कुमार और न्यायमूर्ति अरुण देव चौधरी की खंडपीठ ने यह कहा कि सरोगेसी को नियंत्रित करने वाले वैधानिक प्रतिबंध सांविधानिक रूप से वैध हैं और व्यक्तिगत परिस्थितियों के आधार पर इनमें ढील नहीं दी जा सकती है।
सीमा चक्रवर्ती एवं अन्य बनाम भारत संघ एवं अन्य (2025) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी ?
- यह रिट याचिका एक विवाहित दंपति द्वारा दायर की गई थी जिसमें उन्होंने निर्धारित आयु सीमा पार करने के बाद और दाता-युग्मक संबंधी संशोधित प्रतिबंधों के कारण सरोगेसी कराने के लिये अपनी अपात्रता को चुनौती दी थी।
- याचिकाकर्ता चिकित्सकीय रूप से प्रमाणित ऐसी स्थितियों से पीड़ित थे जिनके कारण प्राकृतिक गर्भाधान असंभव था।
- उन्होंने इससे पहले न्यायालय की अनुमति से सरोगेसी का प्रयास किया था, लेकिन चिकित्सकीय कारणों से यह प्रयास विफल रहा।
- जब 14.03.2023 का संशोधन लागू हुआ, तब याचिकाकर्ताओं की कोई सरोगेसी प्रक्रिया जारी नहीं थी, क्योंकि पिछला प्रयास पहले ही विफल हो चुका था।
- इस बीच, याचिकाकर्ताओं ने सरोगेसी (विनियमन) अधिनियम 2021 की धारा 4(iii)(ख)(I) के अधीन निर्धारित ऊपरी आयु सीमा को पार कर लिया।
- इसके बाद जब याचिकाकर्ताओं ने सरोगेसी शुरू करने के लिये नई अनुमति मांगी, तो अधिकारियों ने वैधानिक अपात्रता और संशोधित फॉर्म-2 का अनुपालन न करने के आधार पर अनुरोध को अस्वीकार कर दिया।
- याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि अस्वीकृति भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के अधीन उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है।
- उन्होंने तर्क दिया कि प्रजनन संबंधी स्वायत्तता व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गरिमा का एक अभिन्न अंग है।
- उन्होंने तर्क दिया कि जब उन्होंने पहली बार सरोगेसी का प्रयास किया था तब वे इसके लिये पात्र थे और प्रक्रिया की विफलता अनैच्छिक थी।
- याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि बाद में किये गए वैधानिक परिवर्तनों को उनके पितृत्व के अधिकार को स्थायी रूप से समाप्त करने के लिये लागू नहीं किया जा सकता है।
- फॉर्म-2 में किये गए संशोधन को विवेकाधीन बताकर इसकी आलोचना की गई, क्योंकि दाता युग्मकों की अनुमति एकल महिलाओं की विशिष्ट श्रेणियों के लिये तो है, लेकिन विवाहित जोड़ों के लिये नहीं।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
पात्रता और वैधानिक अनुपालन पर :
- न्यायालय ने यह कहा कि पात्रता की शर्तें लाभ का दावा किये जाने की तिथि पर पूरी होनी चाहिये, जब तक कि विधि में स्पष्ट रूप से अन्यथा प्रावधान न हो।
- हालांकि पहले किये गए सरोगेसी के प्रयास की विफलता दुर्भाग्यपूर्ण थी, लेकिन इससे बाद में अधिनियमित या संशोधित वैधानिक आवश्यकताओं की अवहेलना करते हुए सरोगेसी को फिर से शुरू करने का कोई निहित अधिकार प्राप्त नहीं होता है।
- न्यायालय ने पाया कि सरोगेसी के संदर्भ में, आयु सीमा स्पष्ट रूप से बच्चे के स्वास्थ्य, दीर्घायु और दीर्घकालिक कल्याण से संबंधित चिंताओं से जुड़ी हुई है।
वैध अपेक्षा पर :
- न्यायालय ने वैध अपेक्षा की दलील को खारिज कर दिया।
- न्यायालय ने यह माना कि वैध अपेक्षा को न तो किसी विधि के विरुद्ध संचालित किया जा सकता है और न ही इसे किसी स्पष्ट विधायी आदेश को विफल करने के लिये इस्तेमाल किया जा सकता है।
दाता युग्मकों पर प्रतिबंध के संबंध में :
- न्यायालय ने विवाहित जोड़ों द्वारा दाता युग्मकों के उपयोग को प्रतिबंधित करने वाले संशोधित प्रपत्र-2 को बरकरार रखा।
- यह प्रतिबंध एक नीतिगत विकल्प को दर्शाता है जिसका उद्देश्य बच्चे और भावी माता-पिता के बीच आनुवंशिक संबंध सुनिश्चित करना है, एक ऐसा विचार जिसे संसद प्राथमिकता देने का हकदार था।
पूर्वव्यापी प्रभाव पर :
- न्यायालय ने भूतलक्षी प्रभाव के तर्क को खारिज कर दिया।
- न्यायालय ने पाया कि याचिकाकर्ता संशोधन के लागू होने के बाद एक नई सरोगेसी प्रक्रिया शुरू करने की कोशिश कर रहे थे।
- विवादित प्रावधान भूतलक्षी रूप से लागू नहीं किये जा रहे हैं, बल्कि अधिनियम 2021 और नियम 2022 के प्रारंभ या संशोधन के बाद शुरू किये गए सरोगेसी के नए प्रयास पर लागू किये जा रहे हैं।
सांविधानिक वैधता पर :
- न्यायालय ने माना कि ये उपाय वैध राज्य हितों की पूर्ति करते हैं और विधि के उद्देश्य के साथ एक तर्कसंगत संबंध रखते हैं।
- इन प्रतिबंधों को अत्यधिक या दमनकारी नहीं कहा जा सकता।
- चाहे व्यक्तिगत कठिनाई कितनी भी वास्तविक क्यों न हो, सार्वजनिक हित में बनाई गई वैधानिक नीति को रद्द करने या उसमें ढील देने का आधार नहीं हो सकती।
- न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि यद्यपि वह याचिकाकर्ताओं की दुर्दशा से अनभिज्ञ नहीं है, लेकिन सांविधानिक न्यायनिर्णय केवल सहानुभूति के आधार पर नहीं किया जा सकता है।
- विवादित प्रावधान एक सुविचारित विधायी नीति का प्रतिनिधित्व करते हैं और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 या 21 का उल्लंघन नहीं करते हैं।
- तदनुसार, रिट याचिका खारिज कर दी गई।
सरोगेसी क्या है?
- सरोगेसी एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें एक महिला (सरोगेट) किसी अन्य व्यक्ति या दंपत्ति (इच्छित माता-पिता) की ओर से बच्चे को गर्भ में धारण करने और जन्म देने के लिये सहमत होती है।
- सरोगेट माता, जिसे कभी-कभी जेस्टेशनल कैरियर भी कहा जाता है, वह महिला होती है जो किसी अन्य व्यक्ति या दंपत्ति (इच्छित माता-पिता) के लिये बच्चे को गर्भ धारण करती है, उसे जन्म देती है और उसे गर्भ धारण करने की प्रक्रिया से गुजरती है।
- सरोगेसी, जिसमें गर्भावस्था के दौरान चिकित्सा खर्च और बीमा कवरेज के अलावा सरोगेट माता को कोई मौद्रिक मुआवजा नहीं दिया जाता है, उसे अक्सर परोपकारी सरोगेसी कहा जाता है।
- वह सरोगेसी जो बुनियादी चिकित्सा खर्चों और बीमा कवरेज से अधिक मौद्रिक लाभ या पुरस्कार (नकद या वस्तु के रूप में) के लिये की जाती है, उसे व्यावसायिक सरोगेसी कहा जाता है।
भारत में सरोगेसी से संबंधित विधिक प्रावधान क्या हैं?
सरोगेसी (विनियमन) अधिनियम, 2021:
- सरोगेसी (विनियमन) अधिनियम, 2021 के अंतर्गत, 35 से 45 वर्ष की आयु के बीच की विधवा या तलाकशुदा महिला या विधिक रूप से विवाहित महिला और पुरुष के रूप में परिभाषित दंपत्ति, यदि उनकी कोई चिकित्सीय स्थिति इस विकल्प को आवश्यक बनाती है, तो सरोगेसी का लाभ उठा सकते हैं।
- भावी दंपत्ति विधिक रूप से विवाहित भारतीय पुरुष और महिला होने चाहिये, पुरुष की आयु 26-55 वर्ष के बीच और महिला की आयु 25-50 वर्ष के बीच होनी चाहिये, और उनका कोई भी जैविक, गोद लिया हुआ या सरोगेट बच्चा नहीं होना चाहिये।
- इसमें व्यावसायिक सरोगेसी पर भी प्रतिबंध लगाया गया है, जिसके लिये 10 वर्ष तक का कारावास और 10 लाख रुपये तक का जुर्माना हो सकता है।
- यह विधि केवल परोपकारी सरोगेसी की अनुमति देता है, जिसमें पैसों का लेन-देन न हो और जहां सरोगेट माता बच्चे की चाह रखने वाले व्यक्ति से आनुवंशिक रूप से संबंधित हो।
सरोगेसी (विनियमन) नियम, 2022:
- सरोगेसी (विनियमन) नियम, 2022, जो सरोगेसी क्लिनिक के पंजीकरण और शुल्क के लिये प्रपत्र और तरीका तथा पंजीकृत सरोगेसी क्लिनिक में कार्यरत व्यक्तियों के लिये आवश्यकता और योग्यता प्रदान करता है।
- सरोगेसी क्लीनिक में कम से कम एक स्त्री रोग विशेषज्ञ, एक एनेस्थेटिस्ट, एक भ्रूण विशेषज्ञ और एक परामर्शदाता होना चाहिये।
- इच्छुक महिला या दंपत्ति को सरोगेट माता के पक्ष में छत्तीस महीने की अवधि के लिये किसी बीमा कंपनी या एजेंट से सामान्य स्वास्थ्य बीमा कवरेज खरीदना होगा, जिसकी राशि गर्भावस्था से उत्पन्न होने वाली सभी जटिलताओं और प्रसवोत्तर जटिलताओं के सभी खर्चों को कवर करने के लिये पर्याप्त हो।
- सरोगेट माता पर किसी भी सरोगेसी प्रक्रिया के प्रयासों की संख्या तीन बार से अधिक नहीं होनी चाहिये।
- सरोगेट माता की सहमति प्रपत्र 2 में निर्दिष्ट अनुसार होगी।
सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकी (विनियमन) अधिनियम, 2021:
- यह अधिनियम राष्ट्रीय सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकी और सरोगेसी बोर्ड की स्थापना करके सरोगेसी संबंधी विधि के कार्यान्वयन के लिये एक प्रणाली प्रदान करता है।
- इसका उद्देश्य एआरटी क्लीनिकों और सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकी बैंकों का विनियमन और पर्यवेक्षण करना, दुरुपयोग की रोकथाम करना और एआरटी सेवाओं का सुरक्षित और नैतिक तरीके से संचालन सुनिश्चित करना है।
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