करेंट अफेयर्स और संग्रह
होम / करेंट अफेयर्स और संग्रह
आपराधिक कानून
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अंतर्गत पुलिस शक्तियों का समावेशन
14-Jan-2026
|
विमल चिन्नाप्पन बनाम तमिलनाडु राज्य और अन्य "भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 35(1)(ख) केवल उन परिस्थितियों को निर्दिष्ट करती है जिनके अधीन एक पुलिस अधिकारी बिना वारण्ट के किसी व्यक्ति को गिरफ्तार कर सकता है और प्रत्यर्थियों को याचिकाकर्त्ता के विरुद्ध कोई मामला दर्ज न होने की स्थिति में उसे समन करने या उससे पूछताछ करने का अधिकार नहीं देती है।" न्यायमूर्ति सुंदर मोहन |
स्रोत: मद्रास उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सुंदर मोहन ने विमल चिन्नप्पन बनाम तमिलनाडु राज्य और अन्य (2026) के मामले में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 35(3) के अधीन एक पत्रकार को जारी किये गए पुलिस नोटिस को अपास्त कर दिया, यह मानते हुए कि पुलिस के पास पंजीकृत मामले के बिना व्यक्तियों को समन करने या पूछताछ करने की शक्ति नहीं है।
विमल चिन्नप्पन बनाम तमिलनाडु राज्य और अन्य (2026) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- याचिकाकर्त्ता, जो एक पत्रकार हैं, ने उप पुलिस अधीक्षक द्वारा जारी उस नोटिस को चुनौती दी, जिसमें उसे एक पत्रिका में प्रकाशित लेख के संबंध में स्पष्टीकरण प्रस्तुत करने के लिये समन किया गया था।
- उक्त लेख में पुलिस के विरुद्ध कथित रूप से मानहानिकारक कथन किये जाने का आरोप था।
- श्रीविल्लिपुथुर टाउन पुलिस स्टेशन के पुलिस निरीक्षक को एक अन्य मामले के अन्वेषण के दौरान यह लेख मिला था।
- पुलिस ने याचिकाकर्त्ता को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 35(3) के अधीन स्पष्टीकरण मांगने वाले नोटिस के साथ कुछ प्रश्न भेजे ।
- नोटिस में उस मामले की संख्या या अपराध संख्या का प्रकटीकरण नहीं किया गया था जिसके अधीन याचिकाकर्त्ता को समन किया जा रहा था।
- इससे पहले वाले मामले (जिसमें पुलिस को वह लेख मिला था) का अन्वेषण पहले ही पूर्ण हो चूका था और अंतिम रिपोर्ट दाखिल कर दी गई थी।
- याचिकाकर्त्ता के विरुद्ध पुलिस के विरुद्ध कथित रूप से मानहानिकारक कथन करने के आरोप में कोई पृथक् मामला दर्ज नहीं किया गया था।
- याचिकाकर्त्ता ने तर्क दिया कि यदि कोई संज्ञेय अपराध बनता है, तो पुलिस को पहले मामला दर्ज करना चाहिये और फिर विधि के अनुसार उसे समन करना चाहिये।
- सुनवाई के दौरान पुलिस ने स्वीकार किया कि मुख्य मामले में अन्वेषण पूर्ण हो चूका है और याचिकाकर्त्ता के विरुद्ध मानहानिकारक कथन करने के लिये कोई पृथक् मामला दर्ज नहीं किया गया है।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- न्यायालय ने टिप्पणी की कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 35(1)(ख) केवल उन परिस्थितियों को निर्दिष्ट करती है जिनके अधीन एक पुलिस अधिकारी बिना वारण्ट के किसी व्यक्ति को गिरफ्तार कर सकता है।
- न्यायालय ने निर्णय दिया कि धारा 35 पुलिस को किसी पंजीकृत मामले के अभाव में किसी व्यक्ति को समन करने या उससे पूछताछ करने का अधिकार नहीं देती है।
- न्यायालय ने यह भी कहा कि यदि याचिकाकर्त्ता को किसी अन्य मामले में जांच हेतु आवश्यक था, तो पुलिस को उस मामले के अपराध क्रमांक का स्पष्ट उल्लेख करना चाहिये था।
- न्यायालय ने इस तथ्य पर बल दिया कि याचिकाकर्त्ता के विरुद्ध कथित मानहानिकारक कथनों के संबंध में कोई मामला पंजीकृत नहीं किया गया था।
- न्यायालय ने निर्णय दिया कि पुलिस के पास मामला दर्ज किये बिना किसी को समन करने या पूछताछ करने का अधिकार नहीं है।
- न्यायालय ने याचिकाकर्त्ता को जारी किये गए विवादित नोटिस को अपास्त कर दिया ।
- तथापि, न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि याचिकाकर्त्ता के विरुद्ध कोई मामला दर्ज किया गया है और ऐसे मामले में जांच के लिये उसकी उपस्थिति आवश्यक है, तो पुलिस विधि के अनुसार आगे बढ़ सकती है।
- इस प्रकार न्यायालय ने नोटिस को रद्द कर दिया, परंतु भविष्य में विधिवत रूप से मामला दर्ज होने पर पुलिस को विधिक रूप से आगे बढ़ने का अधिकार सुरक्षित रखा।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 35 क्या है?
बारे में:
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 35 एक ऐसा उपबंध है, जो पुलिस अधिकारियों को कुछ निर्दिष्ट परिस्थितियों में मजिस्ट्रेट से वारण्ट प्राप्त किये बिना किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने की शक्ति प्रदान करता है, बशर्ते वह मामला संज्ञेय अपराध से संबंधित हो।
बिना वारण्ट के गिरफ्तारी के आधार:
तत्काल गिरफ्तारी की परिस्थितियाँ:
- जब कोई व्यक्ति पुलिस अधिकारी की उपस्थिति में संज्ञेय अपराध करता है।
- जब किसी व्यक्ति के विरुद्ध यह विश्वसनीय सूचना प्राप्त होती है कि उसने ऐसा संज्ञेय अपराध किया है, जो सात वर्ष से अधिक के कारावास से, चाहे जुर्माने सहित हो या बिना जुर्माने के, या मृत्युदण्ड से दण्डनीय है।
- जब किसी व्यक्ति को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन या राज्य सरकार के आदेश द्वारा उद्घोषित अपराधी घोषित किया गया हो।
- जब किसी व्यक्ति के कब्जे से चोरी की संपत्ति बरामद होती है और उसके द्वारा उससे संबंधित अपराध किये जाने का युक्तिसंगत संदेह हो।
- जब कोई व्यक्ति कर्त्तव्य निर्वहन में पुलिस अधिकारी को बाधा पहुँचाता है या विधिक अभिरक्षा से फरार हो जाता है या फरार होने का प्रयत्न करता है।
- जब किसी व्यक्ति पर सशस्त्र बलों से भगोड़ा होने का युक्तियुक्त संदेह हो।
- जब कोई व्यक्ति भारत के बाहर किये गए किसी ऐसे कृत्य में सम्मिलित होता है जो भारत में किये जाने पर अपराध के रूप में दण्डनीय होता है।
- जब कोई रिहा किया गया दोषसिद्ध व्यक्ति धारा 394(5) के अधीन बनाए गए नियमों का उल्लंघन करता है।
- जब किसी अन्य पुलिस अधिकारी से गिरफ्तारी का अनुरोध प्राप्त होता है।
सात वर्ष तक के अपराधों के लिये सशर्त गिरफ्तारी:
- ऐसे संज्ञेय अपराधों के लिये जिनमें सात वर्ष से कम या सात वर्ष तक के कारावास के दण्ड का उपबंध है, गिरफ्तारी केवल तभी अनुमत है जब विशिष्ट शर्तें पूरी हों:
- पुलिस अधिकारी के पास यह विश्वास करने का कारण हो कि संबंधित व्यक्ति ने अपराध किया है, जो युक्तिसंगत परिवाद, विश्वसनीय सूचना अथवा युक्तिसंगत संदेह पर आधारित हो।
- पुलिस अधिकारी इस बात से संतुष्ट है कि आगे के अपराधों को रोकने, उचित अन्वेषण करने, साक्ष्यों से छेड़छाड़ को रोकने, साक्षियों को प्रलोभन या धमकी देने से रोकने या न्यायालय में पेशी सुनिश्चित करने के लिये गिरफ्तारी आवश्यक है।
- गिरफ्तारी करते समय पुलिस अधिकारी को कारणों को लिखित रूप में अभिलिखित करना होगा।
- नोटिस प्रक्रिया (गिरफ्तारी का विकल्प):
- जब उपरोक्त उपबंधों के अधीन गिरफ्तारी आवश्यक न हो, तो पुलिस अधिकारी को एक नोटिस जारी करना होगा जिसमें व्यक्ति को उसके समक्ष या किसी निर्दिष्ट स्थान पर उपस्थित होने का निदेश दिया गया हो।
- संबंधित व्यक्ति का यह कर्त्तव्य है कि वह नोटिस की शर्तों का पालन करे, और जब तक वह इनका पालन करता है, तब तक उसे गिरफ्तार नहीं किया जा सकता, जब तक कि पुलिस अधिकारी गिरफ्तारी की आवश्यकता के विशिष्ट कारणों को अभिलिखित न कर ले।
- परिणाम और सुरक्षा उपाय:
- यदि कोई व्यक्ति नोटिस का पालन करने में असफल रहता है या अपनी पहचान बताने से इंकार करता है, तो पुलिस अधिकारी सक्षम न्यायालय द्वारा पारित किसी भी आदेश के अधीन, नोटिस में उल्लिखित अपराध के लिये उसे गिरफ्तार कर सकता है।
- तीन वर्ष से कम कारावास के दण्ड वाले अपराधों के लिये, कमजोर व्यक्तियों या साठ वर्ष से अधिक आयु के व्यक्तियों को गिरफ्तार करने से पहले पुलिस उप अधीक्षक से कम रैंक के अधिकारी से पूर्व अनुमति लेना आवश्यक है।
- यह उपबंध एक महत्त्वपूर्ण प्रक्रियात्मक संरक्षण प्रदान करता है, जिसके अंतर्गत गिरफ्तारी न किये जाने की स्थिति में भी पुलिस अधिकारी को अपने कारण लिखित रूप में अभिलिखित करने होते हैं, जिससे उत्तरदायित्त्व सुनिश्चित होता है और मनमानी गिरफ्तारियों की संभावना न्यूनतम होती है, साथ ही विधि प्रवर्तन की आवश्यकताओं और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित होता है।
सिविल कानून
लंबित वाद के दौरान अंतरिती का समावेश
14-Jan-2026
|
अलका श्रीरंग चव्हाण और अन्य बनाम हेमचंद्र राजाराम भोंसले और अन्य "वाद की लंबितता के दौरान किया गया कोई भी अंतरण संपत्ति अंतरण अधिनियम की धारा 52 के अंतर्गत आता है और मुकदमे के परिणाम के अधीन रहता है।" न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और उज्ज्वल भुयान |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
अलका श्रीरंग चव्हाण और अन्य बनाम हेमचंद्र राजाराम भोंसले और अन्य (2026) के मामले में न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और उज्ज्वल भुयान की पीठ ने बॉम्बे उच्च न्यायालय के उस निर्णय को बरकरार रखा जिसके द्वारा लंबित वाद के दौरान अंतरिती द्वारा दायर अपील को निरस्त कर दिया गया था। उक्त अपील में अंतरिती ने सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 की आदेश 21 नियम 97 के अंतर्गत विनिर्दिष्ट पालन की डिक्री के निष्पादन के विरुद्ध उसके आक्षेपों को नामंजूर किये जाने को चुनौती दी थी।
अलका श्रीरंग चव्हाण और अन्य बनाम हेमचंद्र राजाराम भोंसले और अन्य (2026) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- यह विवाद मूल विक्रेता और क्रेता के बीच 1973 में हुए विक्रय करार से जुड़ा है।
- विक्रेता के व्यतिक्रम के पश्चात्, प्रत्यर्थी संख्या 1-मूल क्रेता द्वारा 1986 में विनिर्दिष्ट पालन के लिये एक वाद दायर किया गया था।
- वाद की डिक्री वर्ष 1990 में मूल क्रेता के पक्ष में पारित की गई।
- वाद के लंबित रहने के दौरान, निर्णीतऋणी-विक्रेता ने संपत्ति के कुछ अंशों को पर-पक्षकार को बेच दिया।
- वर्तमान अपीलकर्त्ताओं ने बाद में उन पर-पक्षकारों से स्वामित्व प्राप्त किया जिन्होंने वाद लंबित रहते हुए संपत्ति क्रय की थी।
- इसके परिणामस्वरूप डिक्री के निष्पादन में बार-बार अवरोध उत्पन्न हुआ।
- निष्पादन की कार्यवाही 1991 में आरंभ हुई और न्यायालय द्वारा अधिकृत विक्रय विलेख 1993 में निष्पादित किया गया।
- तथापि, पश्चात्वर्ती अंतरितीयों द्वारा कब्जे को रोक दिया गया था।
- 2019 में, अपीलकर्त्ताओं ने सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 21 नियम 97 के अधीन एक आवेदन दाखिल करके कब्जे की सुपुर्दगी में बाधा डाली।
- उनके आक्षेपों को निष्पादन न्यायालय, प्रथम अपीलीय न्यायालय और बॉम्बे उच्च न्यायालय ने नामंजूर कर दिया।
- इसके परिणामस्वरूप इन नामंजूरी को चुनौती देते हुए उच्चतम न्यायालय में अपील दायर की गई।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- न्यायालय ने यह माना कि किसी वाद की लंबितता के दौरान किया गया अंतरण संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 की धारा 52 के अंतर्गत आता है और वाद के परिणाम के अधीन रहता है।
- चूँकि अपीलकर्त्ता ने विनिर्दिष्ट पालन में वाद की लंबितता के दौरान संपत्ति क्रय की थी, इसलिये क्रेता के पक्ष में दिया गया निर्णय प्रभावी हुआ।
- अपीलकर्त्ता के पास संपत्ति पर कोई स्वतंत्र अधिकार नहीं बचा था, साथ ही सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 21 नियम 102 के अधीन निहित विनिर्दिष्ट रोक के कारण वह डिक्री के निष्पादन का विरोध भी नहीं कर सकता था।
- न्यायालय ने पाया कि संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम की धारा 52 में निहित मुकदमे की लंबितता का सिद्धांत पूरी तरह से लागू होता है।
- सभी न्यायालयों ने इस तथ्य की स्पष्ट पुष्टि की है कि अपीलकर्त्ताओं को वाद की लंबितता की पूरी जानकारी थी।
- न्यायालय ने कहा कि जागरूकता भी आवश्यक नहीं है, क्योंकि न्यायनिर्णय का दायरा इस बात तक सीमित है कि आपत्तिकर्ता लंबित वाद अंतरिती है या नहीं।
- यदि निर्णय सकारात्मक आता है, तो ऐसे अंतरिती को निष्पादन का विरोध करने का कोई अधिकार नहीं है।
- न्यायालय ने इस बात की पुष्टि की कि चूँकि अपीलकर्त्ताओं द्वारा वाद की लंबितता के दौरान संपत्ति क्रय की गई थी, और मूल क्रेता के पक्ष में डिक्री पारित की गई थी, इसलिये वे डिक्री के निष्पादन का विरोध करने के हकदार नहीं होंगे।
- न्यायालय ने टिप्पणी की कि चूँकि प्रत्यर्थी संख्या 1 के पक्ष में डिक्री और अंतरण अंतिम रूप ले चुके हैं, इसलिये लंबित वाद के अंतरिती को रास्ता देना होगा और वाद संपत्ति का वास्तविक भौतिक कब्जा प्रत्यर्थी संख्या 1 को सौंपना होगा।
- उच्च न्यायालय ने यह माना था कि यदि पश्चात्वर्ती अंतरिती को वाद दायर करने से पहले संबंधित संपत्ति के संबंध में अधिकार, स्वामित्व और हित प्राप्त हो जाता है, तो लाला दुर्गा प्रसाद मामले में निर्धारित विधि लागू होगी।
- चूँकि वर्तमान मामले में अंतरण लंबित वाद के दौरान किया गया हैं, इसलिये ऐसे संव्यवहार संपत्ति अंतरण अधिनियम की धारा 52 के अंतर्गत आते हैं और इसलिये लाला दुर्गा प्रसाद मामले में निर्धारित विधि लागू नहीं होगी।
- तदनुसार, अपील खारिज कर दी गई।
लंबित वाद अंतरिती (Transferee Pendente Lit) क्या है?
- लंबित वाद अंतरिती वह व्यक्ति होता है जो किसी संपत्ति से संबंधित वाद के लंबित रहने के दौरान उस संपत्ति को प्राप्त करता है।
- "pendente lite" शब्द का अर्थ है "वाद के लंबित रहने के दौरान"।
- इस प्रकार के अंतरण संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 की धारा 52 द्वारा शासित होते हैं, जिसमें वाद की लंबितता का सिद्धांत निहित है।
- इस सिद्धांत के अनुसार, किसी वाद के लंबित रहने के दौरान संपत्ति का कोई भी अंतरण उस वाद में पारित अंतिम डिक्री के अधीन होता है।
- लंबित वाद अंतरिती संपत्ति को उन सभी अधिकार और दायित्त्वों के अधीन प्राप्त करता है, जैसा कि लंबित वाद में अंततः निर्धारित किया जाए।
सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 21 नियम 97 क्या है?
सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 21 नियम 97 - कब्जे प्राप्ति में प्रतिरोध या बाधा:
- आदेश 21 नियम 97 में उस स्थिति में उपचार का उपबंध है जब किसी डिक्री के अधीन स्थावर संपत्ति का कब्जा प्राप्त करने में प्रतिरोध या अवरोध उत्पन्न किया जाता है।
- उपनियम (1) डिक्री के धारक या क्रेता को न्यायालय में आवेदन दाखिल करने की अनुमति देता है यदि कोई व्यक्ति उन्हें स्थावर संपत्ति का कब्जा प्राप्त करने में प्रतिरोध करता है या बाधा डालता है।
- यह आवेदन स्थावर संपत्ति पर कब्जे के लिये डिक्रीदार या डिक्री के निष्पादन में बेची गई ऐसी संपत्ति के क्रेता द्वारा दायर किया जा सकता है।
- जब किसी व्यक्ति द्वारा कब्जा प्राप्त करने में वास्तविक प्रतिरोध या बाधा उत्पन्न होती है, तो यह उपचार उपलब्ध होता है।
- उपनियम (2) में यह अनिवार्य है कि ऐसा आवेदन प्राप्त होने पर न्यायालय नियम में निहित उपबंधों के अधीन उसका अवधारण करेगा।
- यह उपबंध डिक्रीदार को डिक्री द्वारा प्रदत्त संपत्ति पर कब्जा लेने में आने वाली बाधाओं को दूर करने के लिये न्यायालय के हस्तक्षेप की मांग करने में सक्षम बनाता है।
- इस नियम का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि वाद में सफल पक्षकार अपनी डिक्री का प्रभावी रूप से प्रवर्तन कर सके तथा संपत्ति का वास्तविक भौतिक कब्जा प्राप्त कर सके।
.jpg)