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आपराधिक कानून
जमानत और अपीलीय न्यायालय में उपस्थिति संबंधी आवश्यकताएँ
19-Jan-2026
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मीनाक्षी बनाम हरियाणा राज्य और अन्य "अपीलकर्त्ता-अभियुक्त को प्रत्येक सुनवाई की तारीख पर अपीलीय या पुनरीक्षण न्यायालयों के समक्ष उपस्थित होने का निदेश देना उचित नहीं है, विशेषत: दण्डादेश के निलंबन और जमानत दिये जाने के पश्चात्।" न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और प्रसन्ना बी. वराले |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
मीनाक्षी बनाम हरियाणा राज्य और अन्य (2026) के मामले में न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने यह निर्णय दिया कि अपीलकर्त्ता-अभियुक्त को हर सुनवाई की तारीख पर अपीलीय या पुनरीक्षण न्यायालयों के समक्ष उपस्थित होने का निदेश देना उचित नहीं है, विशेषत: दण्डादेश के निलंबन का आदेश पारित होने और जमानत दिये जाने के पश्चात्।
मीनाक्षी बनाम हरियाणा राज्य और अन्य (2026) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- यह मामला परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 (NI Act) की धारा 138 के अंतर्गत अभियोजन कार्यवाही से उत्पन्न हुआ, जिसमें अपीलकर्त्ता की माता द्वारा क्रमशः 7,00,000 रुपए और 5,00,240 रुपए की राशि के दो चेकों के अनादरण के लिये उक्त कार्यवाही आरंभ हुई थी।
- चेक अनादरण हो गए, जिसके परिणामस्वरूप अभियुक्त को दोषी ठहराया गया और दण्डादेश पारित किया गया।
- उक्त दोषसिद्धि एवं दण्डादेश के विरुद्ध आपराधिक अपील (CRA No. 956/2017) दायर की गई, जो अपीलीय न्यायालय के समक्ष लंबित रही।
- 10 अक्टूबर 2017 को अपीलकर्त्ता को दण्डादेश के निलंबन का लाभ प्रदान करते हुए जमानत पर छोड़ दिया गया। ।
- जमानत का आदेश समय-समय पर बढ़ाया गया किंतु अंततः अपीलीय न्यायालय द्वारा इसे नामंजूर कर दिया गया और निरस्त कर दिया गया।
- अपीलकर्त्ता ने छह से अधिक बार अपने अधिवक्ता बदले, जिसके कारण अपीलीय न्यायालय ने प्रतिकूल कार्यवाही की।
- अपीलकर्त्ता की माता, सुश्री मैरी पाराशर, का कथित तौर पर निधन हो गया था, और एक मृत्यु प्रमाण पत्र प्रस्तुत किया गया था, परंतु अपीलीय न्यायालय ने इसे स्वीकार नहीं किया और संबंधित थाना प्रभारी (SHO) को इसकी सत्यता सत्यापित करने का निदेश दिया।
- अपीलकर्त्ता ने स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं (हर्पीस ज़ोस्टर से पीड़ित होने) के कारण 22 अगस्त, 2025 को छूट के लिये आवेदन दायर किया, जिसे स्वीकार कर लिया गया और मामले को 4 सितंबर, 2025 तक के लिये स्थगित कर दिया गया।
- अपीलकर्त्ता के स्थगित तिथि पर न्यायालय पहुँचने से पहले ही मामले की सुनवाई शुरू हो गई, दण्डादेश का निलंबन और जमानत का आदेश वापस ले लिया गया और एक अजमानतीय वारण्ट (NBW) जारी कर दिया गया।
- 20 सितंबर, 2025 को अपीलकर्त्ता ने आत्मसमर्पण किया और जमानत मांगी, परंतु जमानत याचिका पर कोई आदेश पारित किये बिना ही उसे अभिरक्षा में ले लिया गया।
- इसके बाद 23 सितंबर, 2025 को जमानत याचिका नामंजूर कर दी गई।
- अपीलकर्त्ता ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 528/दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के अंतर्गत, पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय में CRM-M-56737/2025 याचिका दायर की, जिसे समयाभाव के कारण बार-बार स्थगित किया जाता रहा।
- उच्चतम न्यायालय ने 27 नवंबर, 2025 को नोटिस जारी किया और तत्पश्चात् अपीलकर्त्ता को रिहा कर दिया।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- न्यायालय ने कहा कि यह "भयानक और चौंकाने वाला" था कि अपीलीय न्यायालय ने अपीलकर्त्ता की सुनवाई की प्रत्येक तारीख पर उपस्थिति पर बल दिया, विशेषत: तब जब सजादण्डादेश को निलंबित करने का आदेश पहले ही पारित हो चुका था।
- न्यायालय ने कहा कि अपीलीय न्यायालय के लिये उचित तरीका यह होता कि वह या तो एक एमिकस क्यूरी (न्यायालय मित्र) नियुक्त करे और अपील के गुण-दोष के आधार के आधार पर सुनवाई करे या यदि अधिवक्ता सहायता नहीं कर रहा हो तो अपीलकर्त्ता को वैकल्पिक व्यवस्था करने का अवसर प्रदान करे।
- न्यायालय ने स्वीकार किया कि अपीलीय कार्यवाही आठ वर्षों से अधिक समय से लंबित थी, जो "किसी भी आधार पर उचित नहीं थी," लेकिन यह माना कि केवल यही बात अपीलीय न्यायालय द्वारा अपनाए गए दृष्टिकोण को उचित नहीं ठहराएगी।
- न्यायालय ने यह स्वीकार किया कि हरियाणा में, दण्डादेश के निलंबन और जमानत दिये जाने के बाद भी, सभी सुनवाई तिथियों पर अपीलीय न्यायालयों के समक्ष अभियुक्त व्यक्तियों की उपस्थिति अनिवार्य करने की प्रथा प्रचलित थी।
- यह प्रथा दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की अनुसूची 2 में पाए जाने वाले प्रपत्र संख्या 45 (पुलिस स्टेशन या न्यायालय के प्रभारी अधिकारी के समक्ष उपस्थिति के लिये बंधपत्र और जमानत बंधपत्र) पर आधारित थी।
- न्यायालय ने माना कि पुनरीक्षण या अपीलीय न्यायालयों के समक्ष सुनवाई की प्रत्येक तिथि पर अभियुक्त को उपस्थित होने के लिये कहना अभियुक्त के लिये बोझिल होगा और यह बिल्कुल भी उचित नहीं है, और इसका कोई उद्देश्य नहीं है।
- न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि अपील या पुनरीक्षण याचिका खारिज होने की स्थिति में, इसके परिणाम स्वतः ही लागू होंगे और संबंधित मजिस्ट्रेट अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार ऐसे अभियुक्त की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिएयेपूरी तरह से सशक्त होगा।
- न्यायालय ने निदेश दिया कि आदेश की एक प्रति पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के माननीय मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखी जाए जिससे उचित परिपत्र जारी करके इसे जिला न्यायपालिका में प्रसारित किया जा सके।
- न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अपीलकर्त्ता को 27 नवंबर, 2025 को दी गई जमानत अपील के निपटारे तक प्रभावी रहेगी, और अपीलकर्त्ता अपील न्यायालय के साथ शीघ्र निपटारे में सहयोग करेगा, अधिमानतः तीन महीने के भीतर।
जमानत से संबंधित सांविधिक उपबंध क्या हैं?
- भारतीय जमानत प्रणाली भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) के अध्याय 35 के अधीन संचालित होती है, जिसने दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 का स्थान लिया है । सांविधिक ढाँचा जमानतीय और अजमानतीय अपराधों के बीच एक द्विभाजित वर्गीकरण बनाता है, और रिहाई पर विचार के लिये विभिन्न प्रक्रियात्मक मार्ग स्थापित करता है।
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 479 के अधीन जमानतीय अपराधों के अभियुक्तों को उचित जमानत राशि जमा करने पर जमानत का पूर्ण अधिकार है। थानों और न्यायालयों के प्रभारी पुलिस अधिकारियों के पास निर्धारित जमानतीय अपराधों के लिये जमानत नामंजूर करने का विवेकाधिकार नहीं है, जिससे सांविधिक शर्तों का पालन करने पर तत्काल रिहाई सुनिश्चित होती है।
- धारा 480 के अंतर्गत अजमानतीय अपराधों के लिये न्यायिक मूल्यांकन की आवश्यकता होती है, जो अपराध की गंभीरता, साक्ष्य की मजबूती और अभियुक्त के पूर्ववृत्त सहित सांविधिक मानदंडों पर आधारित होता है। न्यायालयों को विवेकाधीन अधिकार का प्रयोग करते समय धारा 480(3) में निर्धारित कारकों पर विचार करना चाहिये, जिनमें साक्ष्य से छेड़छाड़ की संभावना, साक्षियों को धमकाना और भागने का जोखिम सम्मिलित है।
- धारा 482 अग्रिम जमानत का उपबंध करती है, जिससे अजमानतीय अपराधों के लिये गिरफ्तारी की आशंका रखने वाले व्यक्ति सेशन न्यायालयों या उच्च न्यायालयों से गिरफ्तारी से पहले सुरक्षा प्राप्त कर सकते हैं। यह उपबंध अन्वेषण प्राधिकरण को बनाए रखते हुए मनमानी निरोध के विरुद्ध सांविधानिक सुरक्षा प्रदान करता है।
- सांविधिक ढाँचा धारा 187 के अधीन स्वतः जमानत का उपबंध करता है जब अन्वेषण विहित समय सीमा से अधिक हो जाता है, जिससे बिना विचारण के अनिश्चितकालीन निरोध को रोकने के लिये "व्यतिकारी जमानत" सिद्धांत लागू होता है।
परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 138 क्या है?
बारे में:
- धारा 138 अपर्याप्त धनराशि या निर्धारित राशि से अधिक होने के कारण चेक के अनादरण को सांविधिक अपराध बनाती है।
- इस धारा के अंतर्गत अपराध गठित करने के लिये जिन आवश्यक तत्त्वों का पूरा होना आवश्यक है, वे निम्नलिखित हैं:
- प्राथमिक आवश्यकता : किसी व्यक्ति द्वारा अपने बैंक खाते से किसी अन्य व्यक्ति को धन के संदाय के लिये जारी किया गया चेक अपर्याप्त धनराशि या निर्धारित ओवरड्राफ्ट सीमा से अधिक होने के कारण बैंक द्वारा अवैतनिक लौटाया जाना चाहिये।
परंतुक के अंतर्गत तीन अनिवार्य शर्तें:
- चेक जारी होने की तारीख से छह मास के भीतर या उसकी वैधता अवधि के भीतर, जो भी पहले हो, बैंक में प्रस्तुत किया जाना चाहिये।
- चेक पाने वाला या धारक को चेक के अनादरण होने की सूचना बैंक से प्राप्त होने की तिथि से तीस दिनों के भीतर, चेक के लेखिवाल को लिखित मांग नोटिस जारी करना होगा।
- चेक लेखिवाल द्वारा उक्त नोटिस प्राप्त होने के पंद्रह दिनों के भीतर चेक की राशि का संदाय करने में असफल रहना चाहिये।
- दण्डात्मक उपबंध : इन शर्तों के पूरा होने पर, चेक लेखिवाल एक अपराध करता है जिसके लिये दो वर्ष तक का कारावास, या चेक की राशि के दोगुने तक का जुर्माना, या दोनों हो सकते हैं।
- दायरे की परिसीमा : इस धारा के अंतर्गत केवल वही ऋण अथवा दायित्त्व सम्मिलित होगा जो विधि द्वारा प्रवर्तनीय हो, जैसा कि इस धारा के स्पष्टीकरण में स्पष्ट किया गया है।
आपराधिक कानून
अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम के अधीन मामलों में दोषमुक्ति की याचिका
19-Jan-2026
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रेशमी ससींद्रन बनाम केरल राज्य और अन्य “पीड़ित व्यक्ति का कथन प्रथम दृष्टया अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम, 2018 की धारा 3(1)(थ) और 3(1)(द) के अधीन अपराधों के लिये आवश्यक तत्त्वों को प्रकट करेगा और एकमात्र पूर्णतः विश्वसनीय साक्षी का साक्ष्य भी इस प्रयोजन की पूर्ति के लिये पर्याप्त होगा।" न्यायमूर्ति ए. बदरुद्दीन |
स्रोत: केरल उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
केरल उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति ए. बदरुद्दीन ने रेशमी ससीन्द्रन बनाम केरल राज्य और अन्य (2026) के मामले में यह निर्णय दिया कि दोषमुक्ति याचिका पर विचार करते समय, पीड़ित व्यक्ति का कथन ही प्रथम दृष्टया अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के अधीन अपराधों के लिये आवश्यक तत्त्वों को प्रकट करेगा, और दोषमुक्ति याचिका की अस्वीकृति को चुनौती देने वाली आपराधिक अपील को खारिज कर दिया।
रेशमी ससीन्द्रन बनाम केरल राज्य और अन्य (2026) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- यह मामला 31 मार्च, 2023 को शाम 4:00 बजे भारत सर्विसेज फैसिलिटी मैनेजमेंट ऑफिस के सामने एक खुले स्थान पर आयोजित बैठक के दौरान घटी एक घटना से संबंधित है।
- यह कार्यालय इन्फोपार्क फेज-2, पदाथिक्कारा, पुथेंक्रूज गाँव के पास ट्रांस एशिया साइबर पार्क भवन के भूतल पर स्थित था।
- आरोप यह था कि अभियुक्त ने सार्वजनिक रूप से परिवादकर्त्ता को उसकी जाति के नाम से पुकार कर उसे अपमानित किया।
- यह घटना कथित तौर पर भरत सर्विसेज फैसिलिटी मैनेजमेंट ऑफिस के सफाई कर्मचारियों की मौजूदगी में घटी ।
- एर्नाकुलम शहर के इन्फोपार्क पुलिस स्टेशन में 9 मई, 2023 को प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज की गई थी।
- थ्रिक्कारा के सहायक पुलिस आयुक्त ने 12 अक्टूबर, 2023 को अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत की।
- अभियुक्त पर अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 3(1)(थ) और 3(1)(द) के अधीन दण्डनीय अपराधों का आरोप लगाया गया था।
- यह मामला अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (PoA) अधिनियम, 1989 के अधीन अपराधों के विचारण के लिये विशेष न्यायालय के समक्ष SC No. 1912/2023 के रूप में पंजीकृत किया गया था।
- अपीलकर्त्ता/अभियुक ने दिनांक 14 मई, 2025 को Crl. M.P. 901/2025 क्रमांकित एक दोषमुक्ति याचिका दायर की।
- विशेष न्यायालय ने 10 नवंबर, 2025 को अभियुक्त के विरुद्ध प्रथम दृष्टया मामला पाए जाने के बाद उसकी रिहाई याचिका खारिज कर दी।
- इसके बाद अभियुक्त ने आदेश को चुनौती देते हुए केरल उच्च न्यायालय में आपराधिक अपील संख्या 2319/2025 दायर की।
- इस अपील पर सुनवाई के लिये 13 जनवरी, 2026 का दिन निर्धारित किया गया था।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- न्यायालय ने कहा कि अपीलकर्त्ता के अधिवक्ता ने मुख्य रूप से वास्तविक परिवादकर्त्ता और साक्षी संख्या 2 के कथनों पर विश्वास किया, यह तर्क देते हुए कि साक्षी संख्या 2 के कथन में अपीलकर्त्ता पर आपराधिक दोष सिद्ध करने वाले स्पष्ट कृत्य शामिल नहीं थे।
- न्यायालय ने वास्तविक परिवादकर्त्ता के कथन की परीक्षा की और पाया कि विशिष्ट आरोप हैं कि 31 मार्च, 2023 को लगभग शाम 4:00 बजे, अभियुक्त ने सफाई कर्मचारियों की उपस्थिति में उसे जातिगत नाम से पुकार कर गाली दी।
- न्यायालय ने अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (PoA) अधिनियम, 1989 की धारा 3(1)(थ) और 3(1)(द) के अधीन अपराधों के गठन के लिये आवश्यक तत्त्वों की रूपरेखा प्रस्तुत की।
- धारा 3(1)(थ) के अधीन अपराध के लिये अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के किसी गैर-सदस्य द्वारा अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति समुदाय के किसी सदस्य के विरुद्ध जानबूझकर अपमान या धमकी देना आवश्यक है, जिसका उद्देश्य सार्वजनिक रूप से ऐसे सदस्य को अपमानित करना हो।
- न्यायालय ने माना कि किसी गैर-सदस्य द्वारा सार्वजनिक रूप से अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति समुदाय के किसी सदस्य को जाति के नाम से गाली देना धारा 3(1)(थ) के तहत अपराध होगा।
- न्यायालय ने पाया कि वास्तविक परिवादकर्त्ता के कथन में धारा 3(1)(थ) और 3(1)(द) के अधीन अपराध आकर्षित करने वाले तत्त्व प्रकट हुए।
- न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि एक अकेले, पूरी तरह से विश्वसनीय साक्षी का साक्ष्य ही इस उद्देश्य के लिये पर्याप्त होगा।
- न्यायालय ने माना कि पीड़ित व्यक्ति के मात्र कथन से ही प्रथम दृष्टया आरोपित अपराधों के तत्त्व प्रकट हो जाते हैं।
- न्यायालय ने स्पष्ट किया कि मात्र संदेह के आधार पर आरोप विरचित करना पर्याप्त नहीं होगा।
- इन सिद्धांतों को लागू करते हुए, न्यायालय ने पाया कि विवादित आदेश में किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं थी और आपराधिक अपील को खारिज कर दिया।
अनुसूचित जनजाति/अनुसूचित जाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 क्या है?
अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम के बारे में:
- अनुसूचित जनजाति/अनुसूचित जाति अधिनियम 1989 संसद द्वारा पारित एक अधिनियम है जिसका उद्देश्य अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समुदायों के सदस्यों के विरुद्ध विभेद को प्रतिषिद्ध करना और उनके विरुद्ध अत्याचारों का निवारण करना है।
- यह अधिनियम भारत की संसद में 11 सितंबर 1989 को पारित हुआ और 30 जनवरी 1990 को अधिसूचित किया गया।
- यह अधिनियम इस दुखद वास्तविकता की भी स्वीकृति है कि कई उपाय होते हुए भी, अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के लोग उच्च जातियों के हाथों विभिन्न अत्याचारों के शिकार होते रहते हैं।
- यह अधिनियम भारत के संविधान, 1950 (COI) के अनुच्छेद 15, 17 और 21 में उल्लिखित स्पष्ट सांविधानिक सुरक्षा उपायों को ध्यान में रखते हुए बनाया गया है, जिसका दोहरा उद्देश्य इन कमजोर समुदायों के सदस्यों की रक्षा करना और साथ ही जाति-आधारित अत्याचारों के पीड़ितों को अनुतोष और पुनर्वास प्रदान करना है।
अनुसूचित जनजाति/अनुसूचित जाति (संशोधन) अधिनियम, 2015:
- इस अधिनियम को वर्ष 2015 में निम्नलिखित प्रावधानों के साथ और अधिक कठोर बनाने के उद्देश्य से संशोधित किया गया था:
- अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के विरुद्ध अपराधों के रूप में अत्याचार के अधिक मामलों को मान्यता दी गई।
- धारा 3 में अनेक नए अपराध जोड़े गए तथा मान्यता प्राप्त अपराधों की संख्या लगभग दोगुनी हो जाने के कारण संपूर्ण धारा का पुनः क्रमांकन किया गया।
- इस अधिनियम ने अध्याय 4क की धारा 15क (पीड़ितों और साक्षियों के अधिकार) को जोड़ा और अधिकारियों द्वारा कर्त्तव्यों की उपेक्षा और जवाबदेही तंत्र को अधिक सटीक रूप से परिभाषित किया।
- इसमें अनन्य विशेष न्यायालयों और विशेष लोक अभियोजकों की स्थापना का उपबंध किया गया था।
- सभी स्तरों पर लोक सेवकों के संदर्भ में, इस अधिनियम ने जानबूझकर की गई उपेक्षा शब्द को परिभाषित किया है।
अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (संशोधन) अधिनियम, 2018:
- पृथ्वी राज चौहान बनाम भारत संघ (2020) के मामले में, उच्चतम न्यायालय ने अत्याचार निवारण अधिनियम में संसद द्वारा किये गए वर्ष 2018 के संशोधन की सांविधानिक वैधता को बनाए रखा। इस संशोधन अधिनियम की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं:
- मूल अधिनियम में धारा 18क को जोड़ा।
- अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के विरुद्ध किये जाने वाले विशिष्ट अपराधों को “अत्याचार” के रूप में परिभाषित किया गया तथा उनके प्रतिकार हेतु रणनीतियाँ एवं दण्ड निर्धारित किये गए।
- “अत्याचार” की परिभाषा को स्पष्ट किया गया तथा अधिनियम के अंतर्गत सूचीबद्ध सभी अपराधों को संज्ञेय घोषित किया गया, जिसके परिणामस्वरूप पुलिस को बिना वारण्ट अभियुक्त की गिरफ्तारी करने तथा बिना न्यायालयीय आदेश के अन्वेषण प्रारंभ करने का अधिकार प्राप्त हुआ।
- इस अधिनियम में सभी राज्यों से प्रत्येक जिले में विद्यमान सेशन न्यायालय को एक विशेष न्यायालय में परिवर्तित करने का आह्वान किया गया है जिससे उसके अंतर्गत पंजीकृत मामलों का विचारण किया जा सके और विशेष न्यायालयों में मामलों के संचालन के लिये लोक अभियोजकों/विशेष लोक अभियोजकों की नियुक्ति का उपबंध किया गया है।
- राज्यों को यह अधिकार प्रदान किया गया कि वे अधिक जातिगत हिंसा वाले क्षेत्रों को “अत्याचार-प्रवण क्षेत्र” घोषित कर सकें तथा विधि एवं व्यवस्था बनाए रखने हेतु योग्य अधिकारियों की नियुक्ति कर सकें।
- इसमें गैर-अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के लोक सेवकों द्वारा जानबूझकर कर्त्तव्यों की उपेक्षा करने पर दण्ड का उपबंध है।
- इसका कार्यान्वयन राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासनों द्वारा किया जाता है, जिन्हें उचित केंद्रीय सहायता प्रदान की जाती है।
अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम की धारा 3(1)(थ):
- इस अधिनियम की धारा 3 अत्याचारों से संबंधित अपराधों के लिये दण्ड का उपबंध करती है।
- धारा 3(1)(थ) के अनुसार, जो कोई भी, अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का सदस्य न होते हुए, सार्वजनिक रूप से किसी भी स्थान पर अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के सदस्य का अपमान करता है या उसे अपमानित करने के आशय से भयभीत करता है, वह न्यूनतम छह माह के कारावास से, जो पाँच वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है, तथा जुर्माने से दण्डनीय होगा।
अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम की धारा 3(1)(द):
- इस उपबंध के अधीन, यदि कोई व्यक्ति जो अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं है, सार्वजनिक स्थान पर किसी अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के सदस्य को जातिगत नाम से गाली देता है, तो यह एक अपराध है।
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