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आपराधिक कानून
न्यायालय कार्यवाही में प्रतिभू का प्रतिरूपण
27-Jan-2026
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शैलेंद्र शर्मा और अन्य बनाम मेसर्स इंडस रेजिडेंसी प्राइवेट लिमिटेड और अन्य "यद्यपि निष्पादन न्यायालय प्रतिरूपण के मामले की अन्वेषण के लिये पुलिस अधिकारियों को निदेश दे सकता है, किंतु प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज करने का विवेकाधिकार पुलिस अधिकारियों पर नहीं छोड़ा जाना चाहिये, अपितु अन्वेषण रिपोर्ट प्राप्त होने के बाद यह न्यायालय के पास ही रहना चाहिये।" न्यायमूर्ति विवेक जैन |
स्रोत: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
शैलेंद्र शर्मा और अन्य बनाम मेसर्स इंडस रेजिडेंसी प्राइवेट लिमिटेड और अन्य (2026) के मामले में न्यायमूर्ति विवेक जैन की पीठ ने न्यायालय की कार्यवाही में प्रतिभू के कथित प्रतिरूपण के मामले में अपनाई जाने वाली प्रक्रिया के संबंध में निष्पादन न्यायालय के आदेश को संशोधित किया, और ऐसे मामलों में न्यायिक पर्यवेक्षण के महत्त्व पर बल दिया
शैलेंद्र शर्मा और अन्य बनाम मेसर्स इंडस रेजिडेंसी प्राइवेट लिमिटेड और अन्य (2026) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- याचिकाकर्त्ताओं (डिक्रीदारों) ने एक वाद में प्रत्यर्थियों (निर्णीत ऋणियों) के विरुद्ध धन वसूली की डिक्री प्राप्त की थी।
- विचारण न्यायालय द्वारा पारित निर्णय और डिक्री के विरुद्ध प्रथम अपील संख्या 442/2022 दायर की गई थी और यह मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के समक्ष लंबित थी।
- प्रथम अपील में पारित अंतरिम आदेश के अनुसार, निर्णीत ऋणियों ने निष्पादन न्यायालय के समक्ष 35.25 लाख रुपए की डिक्री राशि का एक भाग जमा किया।
- निष्पादन न्यायालय ने आदेश दिया कि जुगल किशोर द्वारा सक्षम प्रतिभू प्रस्तुत करने पर राशि डिक्रीदारों को वितरित की जाए।
- बाद में यह पता चला कि जिस कृषि भूमि को प्रतिभूति के रूप में दर्शाया गया था, उस पर एक ही व्यक्ति द्वारा कुल 9 प्रतिभूति दी गई थीं।
- तत्पश्चात, जुगल किशोर स्वयं निष्पादन न्यायालय के समक्ष उपस्थित हुआ और कहा कि उसने कभी भी ऐसी कोई प्रतिभूति नहीं दी थी और किसी अन्य व्यक्ति ने 35.25 लाख रुपए की प्रतिभूति देते समय उनका रूप धारण किया था।
- तत्पश्चात निर्णीत ऋणियों ने धारा 379 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (धारा 340 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अनुरूप) के अधीन एक आवेदन दायर कर भारतीय दण्ड संहिता की विभिन्न धाराओं के अधीन डिक्रीदारों और प्रतिरूपण प्रतिभू के विरुद्ध अभियोजन की मांग की।
- 18.11.2025 को निष्पादन न्यायालय ने आदेश पारित करते हुए निदेश दिया कि प्रतिरूपण के मामले की पुलिस द्वारा जांच की जाए, और यदि पुलिस को पता चलता है कि प्रतिभूति बंधपत्र कपटपूर्ण प्रस्तुत किया गया है, तो उन्हें प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज करनी चाहिये और आगे की कार्यवाही करनी चाहिये।
- डिक्रीदारों ने इस याचिका के माध्यम से इस आदेश को चुनौती दी, यह तर्क देते हुए कि निष्पादन न्यायालय को प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज करने का विवेकाधिकार पुलिस अधिकारियों को नहीं देना चाहिये था।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- न्यायालय ने कहा कि कथित अपराध, ₹ 35.25 लाख की आंशिक डिक्री राशि के वितरण हेतु निष्पादन न्यायालय के समक्ष प्रतिभू के प्रतिरूपण के माध्यम से किया गया था।
- न्यायालय ने टिप्पणी की कि एक पुलिस अधिकारी न्यायालय में या न्यायालय की कार्यवाही के संबंध में अपराध किये जाने के बाद भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 215 के अधीन अपराधों के लिये सीधे अपराध दर्ज नहीं कर सकता है ।
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 379 के अनुसार, न्यायालय को प्रारंभिक जांच करानी होगी और उसके बाद वह लिखित में परिवाद दर्ज करा सकता है।
- न्यायालय ने पाया कि वर्तमान मामले में, निष्पादन न्यायालय ने कोई पूछताछ नहीं की थी, न ही कोई प्रथम दृष्टया संतुष्टि दर्ज की थी, और उसने केवल पुलिस अधिकारियों को अन्वेषण करने और एक रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निदेश दिया था।
- तथापि न्यायालय अपने विवेक से पुलिस अधिकारियों को मामले का अन्वेषण करने और रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निदेश दे सकता है, न्यायालय ने कहा कि प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज करने का विवेक पुलिस अधिकारियों के विवेक पर नहीं छोड़ा जाना चाहिये था।
- न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि पुलिस अधिकारियों से प्रारंभिक जांच रिपोर्ट प्राप्त होने के पश्चात् न्यायालय को ही इस मामले पर विचार करना होगा।
- न्यायालय ने दिनांक 18.11.2025 के विवादित आदेश में इस हद तक संशोधन किया कि एम.पी. नगर, भोपाल पुलिस थाने का संबंधित पुलिस अधिकारी मामले की अन्वेषण कर सकता है, परंतु कोई भी प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज करने से पहले, अन्वेषण रिपोर्ट निष्पादन न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत की जाएगी।
- न्यायालय ने निदेश दिया कि प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) केवल निष्पादन न्यायालय के आदेशों के अधीन ही दर्ज की जाएगी, न कि पुलिस अधिकारियों द्वारा स्वतः संज्ञान से।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 215 और 379 क्या हैं?
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 215 (पूर्व में दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 195) के बारे में:
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 215 में "लोक न्याय के विरुद्ध अपराधों के लिये और साक्ष्य में दिये गए दस्तावेज़ों से संबंधित अपराधों के लिये लोक सेवकों के विधिपूर्ण प्राधिकार के अवमान के लिये अभियोजन" का उपबंध है।
मुख्य उपबंध:
उचित परिवाद के बिना कोई भी न्यायालय निम्नलिखित मामलों में संज्ञान नहीं लेगा:
- भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 206 से 223 तक (धारा 209 के सिवाय) के अंतर्गत दण्डनीय अपराध, जो कि लोक सेवकों के विधिपूर्ण प्राधिकार की अवमान से संबंधित हैं।
- उक्त अपराधों के लिये दुष्प्रेरण, प्रयत्न अथवा आपराधिक षड्यंत्र।
- इस प्रकार के संज्ञान के लिये संबंधित लोक सेवक या उनके प्रशासनिक वरिष्ठ अधिकारी या अधिकृत लोक सेवक से लिखित परिवाद की आवश्यकता होती है।
न्यायालय की कार्यवाही में या उससे संबंधित किये गए अपराधों के लिये:
- भारतीय न्याय संहिता की धारा 229 से 233, 236, 237, 242 से 248 और 267 के अधीन अपराध, जब किसी न्यायालय की कार्यवाही में या उसके संबंध में किये जाते हैं।
- भारतीय न्याय संहिता की धारा 336(1), धारा 340(2), या धारा 342 के अधीन अपराध, जब न्यायालय में साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत या दिये गए दस्तावेज़ों के संबंध में किये जाते हैं।
- उपर्युक्त अपराधों के लिये आपराधिक षड्यंत्र, प्रयत्न या दुष्प्रेरण करना।
- संज्ञान लेने के लिये उस न्यायालय, या उस न्यायालय द्वारा अधिकृत अधिकारी, या उच्चतर न्यायालय से लिखित परिवाद आवश्यक है।
परिवाद वापस लेना:
- जहाँ किसी लोक सेवक द्वारा खण्ड (क) के अंतर्गत परिवाद किया जाता है, वहाँ कोई उच्च अधिकारी परिवाद वापस लेने का आदेश दे सकता है।
- वापसी आदेश की प्रति न्यायालय को भेजी जानी चाहिये।
- वापसी आदेश प्राप्त होने के बाद आगे कोई कार्यवाही नहीं की जाएगी।
- प्रथम दृष्टया विचारण समाप्त हो जाने के पश्चात् वापसी का आदेश नहीं दिया जा सकता।
"न्यायालय" की परिभाषा:
- इसमें सिविल, राजस्व या आपराधिक न्यायालय सम्मिलित हैं।
- इसमें वे अधिकरण भी सम्मिलित होंगे, जो केंद्रीय अथवा राज्य अधिनियमों के अंतर्गत गठित किये गए हों, बशर्ते उन्हें इस धारा के प्रयोजनों के लिये न्यायालय घोषित किया गया हो।
न्यायालयों की अधीनता:
- कोई न्यायालय उस न्यायालय के अधीनस्थ माना जाएगा, जिसमें उसके डिक्री या दण्डादेश के विरुद्ध सामान्यतः अपील प्रस्तुत की जाती है।
- ऐसे सिविल न्यायालय, जिनके आदेशों के विरुद्ध अपील का प्रावधान नहीं है, उन्हें उस क्षेत्र के प्रधान सिविल मूल अधिकारिता न्यायालय के अधीनस्थ माना जाएगा।
- जहाँ एक से अधिक अपीलीय न्यायालय हों, वहाँ निम्नतर अधिकारिता वाला अपीलीय न्यायालय, उच्चतर न्यायालय माना जाएगा।
- जहाँ सिविल और राजस्व दोनों न्यायालयों में अपील की जा सकती है, वहाँ अधीनता मामले की प्रकृति पर निर्भर करती है।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 379 (पूर्व में दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 340) के बारे में:
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 379 में "धारा 215 में उल्लिखित मामलों में प्रक्रिया" का उल्लेख किया गया है।
मुख्य उपबंध:
न्यायालय कब जांच प्रारंभ कर सकता है:
- न्यायालय उसके समक्ष प्रस्तुत आवेदन पर अथवा स्वतः संज्ञान से कार्यवाही प्रारंभ कर सकता है।
- न्यायालय को यह मत बनाना आवश्यक है कि न्याय के हित में जांच करना समीचीन है।
- धारा 215(1)(ख) के अंतर्गत आने वाले अपराधों पर लागू होता है - न्यायालय की कार्यवाही में या उससे संबंधित अपराध।
- अपराध उस न्यायालय में हुई कार्यवाही में या उससे संबंधित कार्यवाही में, या उस न्यायालय में साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत या दिये गए किसी दस्तावेज़ के संबंध में किया गया प्रतीत होना चाहिये।
प्रारंभिक जांच के पश्चात् की प्रक्रिया:
न्यायालय द्वारा आवश्यक समझी जाने वाली प्रारंभिक जांच करने के पश्चात्, न्यायालय निम्नलिखित कार्य कर सकता है:
- यह अभिलिखित करना कि अपराध किया गया है।
- उसके संबंध में लिखित परिवाद प्रस्तुत करना ।
- परिवाद को अधिकारिता रखने वाले प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट के पास प्रेषित करना।
- अभियुक्त की मजिस्ट्रेट के समक्ष पेशी के लिये पर्याप्त प्रतिभूति की व्यवस्था करना।
- यदि कथित अपराध अजमानतीय है और न्यायालय आवश्यक समझे, तो अभियुक्त को अभिरक्षा में लेकर ऐसे मजिस्ट्रेट के पास भेजना।
- किसी भी व्यक्ति को ऐसे मजिस्ट्रेट के समक्ष उपस्थित होने और साक्ष्य देने के लिये बाध्य करना।
उच्चतर न्यायालय की शक्ति:
- यदि न्यायालय ने न तो कोई परिवाद दर्ज किया है और न ही ऐसा परिवाद दर्ज करने के लिये आवेदन को नामंजूर किया है।
- उच्चतर न्यायालय (धारा 215(4) के अर्थ में) उपधारा (1) के अधीन प्रदत्त शक्ति का प्रयोग कर सकता है।
- यह प्रावधान अनुक्रमिक न्यायिक पर्यवेक्षण सुनिश्चित करता है।
परिवाद पर हस्ताक्षर:
- यदि परिवादकर्त्ता न्यायालय उच्च न्यायालय है: तो परिवाद पर न्यायालय द्वारा नियुक्त अधिकारी के हस्ताक्षर होंगे।
- अन्य किसी भी मामले में: न्यायालय के पीठासीन अधिकारी या न्यायालय द्वारा लिखित रूप से अधिकृत अधिकारी द्वारा हस्ताक्षर होने चाहिये।
परिभाषा:
- "न्यायालय" का वही अर्थ है जो धारा 215 में है (इसमें सिविल, राजस्व, आपराधिक न्यायालय और निर्दिष्ट अधिकरण सम्मिलित हैं) ।
सामान्य आपराधिक प्रक्रिया से मुख्य अंतर:
- पुलिस इन अपराधों के लिये सीधे प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज नहीं कर सकती।
- न्यायालय को प्रारंभिक जांच करनी चाहिये और अपने न्यायिक विवेक का प्रयोग करना चाहिये।
- लिखित परिवाद दर्ज करने से पहले न्यायालय को प्रथम दृष्टया संतुष्टि दर्ज करनी होगी।
- यह संपूर्ण व्यवस्था न्यायिक पर्यवेक्षण सुनिश्चित करती है तथा तुच्छ, दुर्भावनापूर्ण अथवा प्रेरित अभियोजनों को रोकने हेतु अभिप्रेत है।
सिविल कानून
रजिस्ट्री न्यायिक विशिष्ट निर्णयों पर प्रश्न नहीं उठा सकती
27-Jan-2026
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श्री मुकुंद महेश्वर और अन्य बनाम एक्सिस बैंक लिमिटेड और अन्य "रजिस्ट्री न्यायपालिका की अनन्य अधिकारिता में हस्तक्षेप नहीं कर सकती और यह स्पष्टीकरण नहीं मांग सकती कि किसी विशेष पक्षकार को प्रत्यर्थी के रूप में क्यों सम्मिलित किया गया है।" न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और सतीश चंद्र शर्मा |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
श्री मुकुंद महेश्वर और अन्य बनाम एक्सिस बैंक लिमिटेड और अन्य (2026) के मामले में न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने निर्णय दिया कि रजिस्ट्री किसी याचिकाकर्त्ता के कुछ पक्षकारों को प्रत्यर्थी के रूप में सम्मिलित करने के निर्णय पर प्रश्न नहीं उठा सकती, इस बात पर बल देते हुए कि ऐसे मामले न्यायपालिका की अनन्य अधिकारिता में आते हैं
श्री मुकुंद महेश्वर और अन्य बनाम एक्सिस बैंक लिमिटेड और अन्य (2026) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- यह मामला संविधान के अनुच्छेद 226 के अधीन दायर एक रिट याचिका से संबंधित SARFAESI विवाद से उत्पन्न हुआ है।
- याचिकाकर्त्ता ने यह आरोप लगाया कि न्यायालय द्वारा नियुक्त आयुक्त ने वित्तीय आस्तियों का प्रतिभूतिकरण और पुनर्गठन तथा प्रतिभूति हित का प्रवर्तन अधिनियम (SARFAESI Act) और उसके अधीन बनाए गए नियमों का उल्लंघन करते हुए, सुरक्षित संपत्ति का कब्ज़ा लेने में कपटपूर्ण एवं मिलीभगतपूर्ण आचरण किया।
- तेलंगाना उच्च न्यायालय रजिस्ट्री ने याचिका में शामिल प्रार्थना खंड और पक्षकारों की सूची पर आक्षेप उठाया ।
- उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने रजिस्ट्री के आक्षेपों से सहमत होते हुए रिट याचिका को नामंजूर कर दिया और कागजात वापस करने का निदेश दिया।
- प्रक्रियात्मक आधार पर याचिका को नामंजूर करने के उच्च न्यायालय के निर्णय से व्यथित होकर याचिकाकर्त्ता ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- न्यायालय ने कहा कि रजिस्ट्री न्यायपालिका की अनन्य अधिकारिता के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों में हस्तक्षेप नहीं कर सकती और यह स्पष्टीकरण नहीं मांग सकती कि किसी विशेष पक्षकार को प्रत्यर्थी के रूप में क्यों सम्मिलित किया गया है।
- न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि याचिकाकर्त्ता, मुकदमे का स्वामी (dominus litis) होने के नाते, यह तय करने के लिये सशक्त है कि किसे पक्षकार के रूप में सम्मिलित किया जाना है और किसे नहीं।
- न्यायालय ने टिप्पणी की कि उच्च न्यायालय सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 1 नियम 10 के सिद्धांतों का हवाला देते हुए अनावश्यक पक्षकारों को हटा सकता है, और यदि किसी पक्षकार को दुर्भावनापूर्ण तरीके से जोड़ा गया है, तो उच्च न्यायालय न्यायिक पक्ष से स्थिति से उचित ढंग से निपट सकता है।
- न्यायालय ने कहा कि "हमें यह देखकर दुख होता है कि उच्च न्यायालय ने अपनी न्यायिक भूमिका का परित्याग कर दिया है", और उच्च न्यायालय द्वारा अपने न्यायिक विवेक का प्रयोग करने में दिखाई गई लापरवाही की ओर इशारा किया।
न्यायालय के निदेश:
- अपील मंजूर कर ली गई, और रिट याचिका को उच्च न्यायालय के समक्ष पुनर्जीवित किया गया।
- रजिस्ट्री द्वारा उठाए गए आक्षेपों को खारिज कर दिया गया है, और परिणामस्वरूप, विवादित आदेश को अपास्त कर दिया गया है।
- इसके परिणामस्वरूप रिट याचिका को पुनर्जीवित किया गया, जिसे विधिवत पंजीकृत किया जाएगा और दोषरहित के रूप में चिह्नित किया जाएगा।
- उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को निदेश दिया गया कि वे याचिका को उस पीठ के अतिरिक्त किसी अन्य खंडपीठ के समक्ष सूचीबद्ध करें जिससे विवादित आदेश जारी हुआ था।
- नई खंडपीठ द्वारा मामले की विधि के अनुसार सुनवाई की जाएगी।
डोमिनस लिटिस (Dominus Litis) का सिद्धांत क्या है?
परिचय:
- डोमिनस लिटिस का सिद्धांत, एक लैटिन शब्द है, जिसका शाब्दिक अर्थ "वाद का स्वामी" होता है।
- सिविल प्रक्रिया के सिद्धांतों से उत्पन्न, यह उस पक्षकार की पहचान करता है, जिसे वाद की कार्यवाही पर नियंत्रण प्राप्त होता है।
- डोमिनस लिटिस का सिद्धांत वादी को वाद के पक्षकारों को चुनने का अधिकार देता है, फिर भी यह अधिकार पूर्ण नहीं है, जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) के आदेश 1, नियम 10 के अधीन है ।
- न्यायालय अपने विवेकानुसार पक्षकारों को जोड़ या हटा सकता है, यह सुनिश्चित करते हुए कि व्यापक समाधान के लिये सभी आवश्यक पक्षकार उपस्थित हों।
- न्यायालय विवाद को सुलझाने में पक्षकारों के प्रत्यक्ष हित और उनके योगदान का आकलन करता है, और परिस्थितियों के आधार पर दावों को स्वीकार या अस्वीकार करने का विवेक अपने पास रखता है; किसी को भी स्वतः पक्षकार बनने का अधिकार नहीं है।
डोमिनस लिटिस (Dominus Litis) के सिद्धांत का उद्देश्य:
- "डोमिनस लिटिस" उस व्यक्ति को संदर्भित करता है जो किसी विधिक वाद का स्वामी या नियंत्रक होता है और उसके परिणाम में वास्तविक रुचि रखता है।
- इस व्यक्ति को अनुकूल निर्णय से लाभ हो सकता है या प्रतिकूल निर्णय के दुष्परिणाम वहन करने पड़ते हैं।
- यह सिद्धांत ऐसे व्यक्ति पर लागू होता है जो मूल पक्षकार न होते हुए भी मामले में हस्तक्षेप करता है और एक पक्षकार पर नियंत्रण स्थापित कर लेता है, और न्यायालय द्वारा उसे उत्तरदायी पक्षकार के रूप में माना जाता है।
- सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 1, नियम 10 के अधीन न्यायालय की शक्ति पक्षकारों को जोड़ने को नियंत्रित करती है, इस बात पर बल देते हुए कि वादी, "वाद के स्वामी" के रूप में, किसी अवांछित पक्षकार के विरुद्ध मुकदमा चलाने के लिये बाध्य नहीं किया जा सकता है।
- तथापि, न्यायालय, व्यापक समाधान सुनिश्चित करने के लिये, औपचारिक आवेदन के बिना भी आवश्यक पक्षकारों को सम्मिलित करने का आदेश दे सकता है ।
- डोमिनस लिटिस के सिद्धांत का अनुप्रयोग सावधानीपूर्वक किया जाना चाहिये, और पक्षकारों को जोड़ने के लिये न्यायालय का अधिकार आदेश 1, नियम 10(2) सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन व्यापक है ।
डोमिनस लिटिस (Dominus Litis) के सिद्धांत की प्रयोज्यता और अप्रयोज्यता:
- प्रयोज्यता:
- सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा के अधीन, कार्यवाही:
- न्यायालय को सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 92 के अधीन किसी वाद में किसी पक्षकार को प्रतिवादी के रूप में शामिल करने का अधिकार है, जैसा कि किसी अन्य वाद में होता है।
- वाद करने का अधिकार सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 1, नियम 10 द्वारा नियंत्रित होता है।
- विनिर्दिष्ट पालन का वाद:
- विक्रय संविदा के लिये विनिर्दिष्ट पालन का वाद आरंभ करने वाले वादी को डोमिनस लिटिस माना जाता है और उसे उन पक्षकारों को सम्मिलित करने के लिये विवश नहीं किया जा सकता है जिनके विरुद्ध वे वाद नहीं करना चाहते हैं, जब तक कि विधिक आवश्यकताओं द्वारा विवश न किया जाए।
- सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा के अधीन, कार्यवाही:
- अप्रयोज्यता:
- विभाजन का वाद:
- विभाजन वादों में डोमिनस लिटिस का सिद्धांत कठोर रूप से लागू नहीं होता है क्योंकि वादी और प्रतिवादी दोनों सहभागी/सह-स्वामी (sharers) होते हैं।
- निष्पादन याचिका:
- चांगंती लखमी राजयम और अन्य बनाम कोल्ला रामा राव (1998) के मामले में यह निर्णय दिया गया था कि सिविल प्रक्रिया संहिता का आदेश 1 नियम 10 वादों और अपीलों के लिये सुसंगत है, किंतु निष्पादन कार्यवाही पर लागू नहीं होता है।
- विभाजन का वाद:
- सीमित प्रयोज्यता
- वाद-हेतुक:
- मोहननकुमारन नायर बनाम विजयकुमारन नायर (2008) के मामले में, उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि डोमिनस लिटिस के सिद्धांत का अनुप्रयोग सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 15 से 18 के अंतर्गत आने वाले वाद-हेतुक तक सीमित है।
- वाद-हेतुक: