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करेंट अफेयर्स और संग्रह

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आपराधिक कानून

सामान्यतः अग्रिम जमानत को आरोप-पत्र दायर किये जाने तक सीमित नहीं किया जा सकता

 13-Feb-2026

सुमित बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य 

विधि की स्थिति सर्वविदित है: एक बार अग्रिम जमानत दिये जाने के बादयह सामान्यत: बिना किसी निश्चित समय सीमा के जारी रहती है। आरोप पत्र दाखिल करनासंज्ञान लेना या समन जारी करनाविशेष कारणों को अभिलिखित किये बिनाजमानत के संरक्षण को समाप्त नहीं करता है।” 

न्यायमूर्ति जे.बीपारदीवाला और के.वी. विश्वनाथन 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

सुमित बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य (2026)के मामले में न्यायमूर्ति जे.बी पारदीवाला और के.वी. विश्वनाथन की पीठ नेइलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस आदेश को अपास्त कर दिया था जिसमें अग्रिम जमानत संरक्षण को केवल पुलिस आरोप पत्र दाखिल होने तक ही सीमित रखा गया था और बाद में चार्जशीट दाखिल होने के पश्चात् एक नई अग्रिम जमानत याचिका को खारिज कर दिया गया था। 

  • उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि इस प्रकार का यांत्रिक प्रतिबंध स्थापित विधि के प्रतिकूल है। 

सुमित बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य (2026) के मामलेकी पृष्ठभूमि क्या थी ? 

  • उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा भारतीय न्याय संहिता की धारा 80(2)/85 तथा दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961 की धारा और के अधीन अपराधों के लिये प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज की गई। 
  • मृतक महिला के देवरअपीलकर्त्ता ने अग्रिम जमानत की मांग की। 
  • उच्च न्यायालय ने प्रारंभ में अग्रिम जमानत तो दे दीकिंतु इसे "पुलिस द्वारा आरोपपत्र दाखिल किये जाने तक" सीमित कर दिया। 
  • आरोपपत्र दाखिल होने के बादसुरक्षा का अधिकार समाप्त हो गया और दूसरी अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी गई। 
  • इससे व्यथित होकर अपीलकर्त्ता ने भारत के उच्चतम न्यायालय का रुख किया। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • न्यायालय ने उच्च न्यायालय के पूर्व आदेश को "अत्यंत असामान्य" करार दिया। 
  • इसमें पाया गया कि एक बार जब आरोपों और सौंपी गई भूमिका पर विचार करने के बाद अभियुक्त के पक्ष में विवेक का प्रयोग किया जाता हैतो केवल आरोपपत्र दाखिल होने तक ही सुरक्षा को सीमित करने का कोई औचित्य नहीं है। 
  • अग्रिम जमानत मंजूर या नामंजूर की जा सकती है। तथापिएक बार मंजूर हो जाने परयहसामान्यत: बिना किसी निश्चित समय सीमा के जारी रहती है। 
  • न्यायालय ने सुशीला अग्रवाल बनाम राज्य (एन.सी.टी. ऑफ दिल्ली) के मामले में संविधान पीठ के निर्णय पर विश्वास कियाजिसमें यह माना गया था किअग्रिम जमानत को सदैव एक निश्चित अवधि तक सीमित नहीं किया जाना चाहिये 
  • न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि, "जोखिम प्रबंधन को समय सीमा निर्धारित करके नहींअपितु सहयोगउपस्थिति और छेड़छाड़ न करने की शर्तें अधिरोपित कर के सुनिश्चित किया जा सकता है।"       
  • यदि परिस्थितियों में परिवर्तन होता हैतो भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 के अधीन संशोधन या रद्द करने की मांग की जा सकती है। अग्रिम जमानत प्रदान करते समय प्रारंभिक स्तर पर जोड़े गए समाप्ति उपबंध विधिसंगत नहीं हैं और अस्थिर माने जाएंगे।  

यदि बाद में और भी गंभीर अपराध जोड़ दिये जाएं तो क्या होगा? 

न्यायालय ने जमानत मिलने के बाद नए संज्ञेय और अजमानतीय अपराधों के जुड़ने की स्थिति में विधिक स्थिति स्पष्ट की: 

  • अभियुक्त नए संज्ञेय और अजमानतीय अपराधों के लिये आत्मसमर्पण कर सकता है और जमानत के लिये आवेदन कर सकता है। यदि आवेदन अस्वीकार कर दिया जाता हैतो गिरफ्तारी हो सकती है। 
  • अन्वेषण अभिकरण अभियुक्त की गिरफ्तारी और अभिरक्षा के लिये दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 437(5) या 439(2) के अधीन आदेश मांग सकती है। 
  • जमानत रद्द होने के बाद न्यायालय गिरफ्तारी और अभिरक्षा का निदेश दे सकते हैं। 
  • पहले की जमानत को औपचारिक रूप से रद्द किये बिना भीयदि उचित हो तो अधिक गंभीर अपराधों के जुड़ने पर न्यायालय अभिरक्षा का आदेश दे सकते हैं। 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 482 क्या है ? 

  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 482 भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली मेंअग्रिम जमानत के लिये सांविधिक ढाँचा प्रदान करती है। 
  • यह उपबंध उच्च न्यायालय और सेशन न्यायालय को उन व्यक्तियों कोअग्रिम जमानत देनेका अधिकार देता है जिन्हें अजमानतीय अपराधों के कथित कृत्य के लिये गिरफ्तारी की आशंका है। 
  • धारा 482 उस विधिक तंत्र की स्थापना करती है जिसके माध्यम से कोई व्यक्ति संभावित गिरफ्तारी से न्यायिक सुरक्षा प्राप्त कर सकता हैअन्वेषण में सहयोग सुनिश्चित करते हुए व्यक्तिगत स्वतंत्रता को बनाए रख सकता है। 
  • इस उपबंध के अनुसारअजमानतीय अपराध के लिये संभावित गिरफ्तारी के संबंध में उचित विश्वास रखने वाला कोई भी व्यक्ति उच्च न्यायालय या सेशन न्यायालय के समक्ष अग्रिम जमानत के लिये आवेदन कर सकता है। 
  • आवेदन प्राप्त होने परन्यायालय कोआवेदक की गिरफ्तारी की स्थिति मेंजमानत पर छोड़े जाने का निदेश देने का विवेकाधीन अधिकार प्राप्त है। 
  • न्यायालय को अग्रिम जमानत देते समय विशिष्ट शर्तें अधिरोपित करने का अधिकार है जिससे व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अन्वेषण संबंधी आवश्यकताओं के बीच संतुलन बनाए रखा जा सके। 
  • अनिवार्य शर्तों में आवेदक को आवश्यकता पड़ने पर पुलिस पूछताछ के लिये उपलब्ध रहना शामिल है। 
  • आवेदक कोमामले के तथ्यों से परिचित साक्षियों या व्यक्तियों को किसी भी प्रकार का प्रलोभनधमकी या वचन सेप्रतिबंधित किया गया है। 
  • अग्रिम जमानत पाने वाले व्यक्ति को न्यायालय की पूर्व अनुमति के बिना भारत छोड़ने की मनाही है। 
  • न्यायालय भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 480(3) के अधीन आवश्यक समझे जाने पर अतिरिक्त शर्तें अधिरोपित कर सकता है। 
  • अग्रिम जमानत दिये जाने परयदि व्यक्ति को बाद में बिना वारण्ट के गिरफ्तार किया जाता हैतो जमानत प्रदान करने की तत्परता पर उसे जमानत पर छोड़ दिया जाएगा। 
  • यदि अपराध का संज्ञान लेने वाला मजिस्ट्रेट यह अवधारित करता है कि व्यक्ति के विरुद्ध वारण्ट जारी किया जाना चाहियेतो यह न्यायालय के निदेश के अनुरूप जमानतीय वारण्ट होना चाहिये 
  • यह उपबंध विशेष रूप से भारतीय न्याय संहिता की धारा 65 (कुछ मामलों में बलात्कार के लिये दण्ड) और धारा 70(2) (18 वर्ष से कम आयु की महिला पर सामूहिक बलात्संग) के अधीन आरोपों से जुड़े मामलों में इसकी प्रयोज्यता को बाहर करता है। 
  • धारा 482 , दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 438 में पूर्व में निहित उपबंध की विधायी निरंतरता का प्रतिनिधित्व करती है । 

सिविल कानून

विदेशी डिक्रियों के निष्पादन में विवाद्यकों की विरचना अनिवार्य नहीं है

 13-Feb-2026

एलिस जेन क्विनलान और अन्य बनाम नवीन कुमार सेठ 

यह हर मामले में आवश्यक नहीं है कि संहिता की धारा 13 के खंड (क) से (च) के अंतर्गत सूचीबद्ध परिस्थितियों की जांच के लिये विवाद्यकों की विरचना की जाएं और साक्ष्य प्रस्तुत किये जाएं। ऐसा इसलिये है क्योंकि विधायी उद्देश्य व्यतिकारी राज्यक्षेत्र में विदेशी न्यायालय द्वारा पारित डिक्री का त्वरित और शीघ्र निष्पादन सुनिश्चित करना है।” 

न्यायमूर्ति संदीप वी. मार्ने 

स्रोत: बॉम्बे उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

बॉम्बे हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति संदीप वी. मार्ने ने एलिस जेन क्विनलान और अन्य बनाम नवीन कुमार सेठ (2026)के मामले मेंविदेशी डिक्रीदारों द्वारा दायर एक रिट याचिका को खारिज कर दियाजिसमें जिला न्यायाधीश के उस आदेश को चुनौती दी गई थी जिसमें विवाद्यकों की विरचना की गई थी और सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) की धारा 44क के अधीन निष्पादन कार्यवाही में साक्ष्य पेश करने की अनुमति दी गई थी। 

  • न्यायालय ने स्पष्ट किया कि व्यतिकारी राज्यक्षेत्रों से विदेशी डिक्रियों के निष्पादन में विवाद्यकों की विरचना अनिवार्य नहीं है।  

एलिस जेन क्विनलान और अन्य बनाम नवीन कुमार सेठ (2026) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • यह निर्णय संयुक्त अरब अमीरात के फुजैराह सिविल न्यायालय ने दिया 
  • संयुक्त अरब अमीरात को सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 44क के अधीन व्यतिकारी राज्यक्षेत्र के रूप में अधिसूचित किया गया था। 
  • डिक्रीदारों ने भारत में निष्पादन कार्यवाही प्रारंभ की। 
  • निर्णय के देनदार ने विवाद्यकों की विरचना करने और साक्ष्य प्रस्तुत करने की अनुमति मांगने के लिये एक आवेदन दायर किया। 
  • निष्पादन न्यायालय ने निम्नलिखित से संबंधित कई विवाद्यकों की विरचना की: 
    • कपट 
    • प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन 
    • तात्विक तथ्यों का दमन 
    • परिसीमा  
    • पोषणीयता  
  • इससे व्यथित होकरडिक्रीदारों ने रिट याचिका के अधीन उच्च न्यायालय का रुख किया। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

व्यतिकारी और अव्यतिकारी राज्यक्षेत्रों के बीच अंतर: 

न्यायालय ने धारा 13, 14 और 44क सिविल प्रक्रिया संहिता की योजना की परीक्षा की और मौलिक अंतर को दोहराया: 

  • व्यतिकारी राज्यक्षेत्र – विदेशी डिक्री को घरेलू डिक्री की तरह ही निष्पादित किया जा सकता हैकेवल धारा 13 सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन सीमित अपवादों के अधीन। 
  • अव्यतिकारी राज्यक्षेत्र – विदेशी निर्णय के आधार पर एक नया वाद करना होगाजिससे पूर्ण विचारण होगा 

इस प्रकारधारा 44क के अधीन कार्यवाही किसी विदेशी निर्णय पर संस्थित करने के समकक्ष नहीं है। 

धारा 44क के अंतर्गत जांच की प्रकृति: 

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि: 

  • धारा 44क (3) के साथ धारा 13 सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन जांच सामान्यत:संक्षिप्त प्रकृति की होतीहै । 
  • यह साबित करने का भार कि डिक्री धारा 13 सिविल प्रक्रिया संहिता के खण्ड (क) से (च) के अंतर्गत किसी अपवाद के अंतर्गत आती हैनिर्णितऋणी पर है। 
  • अपवादों का अस्तित्व सामान्यतः निम्नलिखित से ज्ञात किया जा सकता है: 
    • अभिवचन 
    • विदेशी निर्णय 
    • विदेशी न्यायालय के समक्ष कार्यवाही 

अंतिम निदेश: 

  • रिट याचिका खारिज कर दी गई। 
  • जिला न्यायाधीश को निदेश दिया गया कि वे विवाद्यकों की विरचना पर शीघ्रता सेअधिमानतःतीन महीनेके भीतरअपने निष्कर्ष प्रस्तुत करें। 

सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 13 क्या है? 

सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 13 मेंकहा गया है कि विदेशी निर्णय उसके द्वारा उन्हीं पक्षकारों के बीच या उसी हक के अधीन मुकदमा करने वाले ऐसे पक्षकारों के बीचजिनसे व्युत्पन्न अधिकार के अधीन वे या उनमें से कोई दावा करते हैंप्रत्यक्षतः न्यायनिर्णीत किसी विषय के बारे में वहाँ के सिवाय निश्चायक होगा जहाँ 

  • (क) वह सक्षम अधिकारिता वाले न्यायालय द्वारा नहीं सुनाया गया है; 
  • (ख) वह मामले के गुणागुण के आधार पर नहीं दिया गया है; 
  • (ग) कार्यवाहियों के सकृत दर्शने स्पष्ट है कि वह अंतर्राष्ट्रीय विधि के अशुद्ध बोध पर या भारत की विधि को उन मामलों में जिनको वह लागू हैमान्यता देने से इंकार करने पर आधारित है; 
  • (घ) वे कार्यवाहियाँजिनमें वह निर्णय अभिप्राप्त किया गया थानैसर्गिक न्याय के विरुद्ध हैं; 
  • (ङ) वह कपट द्वारा अभिप्राप्त किया गया है; 
  • (च) वह भारत में प्रवृत्त किसी विधि के भंग पर आधारित दावे को ठीक ठहराता है 

इस धारा में यह उपबंधित किया गया है कि उपर्युक्त छह खण्डों के सिवाय, कोई विदेशी निर्णय पूर्व-निर्णय के रूप में कार्य कर सकता है। 

(क) सक्षम न्यायालय द्वारा नहीं दिया गया विदेशी निर्णय 

  • पक्षकारों के मध्य निश्चायक होने के लिये विदेशी न्यायालय का निर्णय ऐसे न्यायालय द्वारा पारित होना चाहियेजो सक्षम अधिकारिता रखता हो 
  • सक्षम न्यायालय से आशय ऐसा न्यायालय हैजिसे पक्षकारों तथा विवाद के विषय-वस्तु पर अधिकारिता प्राप्त हो 
  • किसी विदेशी देश के न्यायालय को निम्नलिखित परिस्थितियों में अधिकारिता प्राप्त मानी जाती है: 
  • जहाँ वाद की शुरुआत के समय प्रतिवादी उस देश में निवास करता हो अथवा वहाँ उपस्थित होजिससे उसे उस देश की विधयों का संरक्षण तथा लाभ प्राप्त हो 
    • जहाँ निर्णय के समय प्रतिवादी उस देश का नागरिक या प्रजा हो। 
    • जहाँ विदेशी न्यायालय की अधिकारिता पर आक्षेप करने वाले पक्षकार ने अपने आचरण द्वारा उस अधिकारिता को स्वीकार कर लिया हो, 
      • वादी के रूप में उपस्थित होकर या प्रतिदावा करकेया 
      • प्रतिवादी के रूप में स्वेच्छा से उपस्थित होकरया 
      • अभिव्यक्त या विवक्षित रूप से यह संविदा करने कि वह ऐसे न्यायालय की अधिकारिता को स्वीकार करेगा।  
  • भारत निधि लिमिटेड बनाम मेघ राज महाजन (1964)के मामले में यह निर्णय दिया गया था कि किसी विदेशी निर्णय कोभारतीय न्यायालयों मेंपूर्व-निर्णयके रूप में लागू होने के लिये केवल सक्षम अधिकारिता वाले विदेशी न्यायालय द्वारा हीपारित किया जाना चाहिये 

(ख) गुण-दोष पर आधारित न होने वाला विदेशी निर्णय 

  • विदेशी निर्णय तभी निश्चायक माना जाएगा जब वह गुण-दोष पर आधारित होअर्थात् न्यायालय द्वारा मामले की सत्यता या असत्यता पर विचार कर पारित किया गया हो 
  • यह निर्धारित करने की वास्तविक कसौटी यह है कि क्या निर्णय मात्र औपचारिक रूप से अथवा प्रतिवादी के आचरण के दण्डस्वरूप पारित किया गया हैया फिर वादी के दावे की सत्यता/असत्यता पर विचार कर दिया गया है।  

(ग) भारतीय या अंतर्राष्ट्रीय विधि के प्रतिकूल विदेशी निर्णय 

  • ऐसा निर्णयजो अंतरराष्ट्रीय विधि की गलत व्याख्या पर आधारित हो या जहाँ लागू होने पर भी भारतीय विधि को मान्यता देने से इंकार किया गया होनिर्णायक नहीं माना जाएगा 
  • यह त्रुटि कार्यवाही के अभिलेख से स्पष्ट रूप से दिखाई देनी चाहिये 

(घ) प्राकृतिक न्याय के विरुद्ध विदेशी निर्णय 

  • विदेशी निर्णय को प्राकृतिक न्याय की न्यूनतम आवश्यकताओं का पालन करना चाहियेअर्थात् पक्षकारों को युक्तिसंगत सूचना दी गई हो तथा प्रत्येक पक्षकार को अपना पक्ष प्रस्तुत करने का समुचित अवसर प्रदान किया गया हो 
  • मात्र यह तथ्य कि विदेशी न्यायालय ने भारतीय न्यायालयों की प्रक्रिया का अनुसरण नहीं कियाअपने आप में निर्णय को प्राकृतिक न्याय के प्रतिकूल नहीं बनाता 
  • शंकरन बनाम लक्ष्मी (1974)के मामले मेंउच्चतम न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि प्राकृतिक न्याय अभिव्यक्तिमामले की गुण-दोष के बजाय प्रक्रिया में अनियमितताओं से संबंधित है। 

(कपट द्वारा प्राप्त विदेशी निर्णय 

  • निजी अंतर्राष्ट्रीय विधि का यह एक सुस्थापित सिद्धांत है कि यदि विदेशी निर्णय कपट से प्राप्त किया गया हैंतो वेपूर्व-निर्णय के रूप में कार्य नहीं करेंगा 
    • अधिकारिता से संबंधित तथ्यों पर किया गया कपट सभी न्यायिक कार्यों को दूषित कर देता है।  
    • यह कपट या तोउस पक्षकार के साथ हो सकता है जो किसी विदेशी निर्णय को अमान्य ठहरा रहा हैजिसके पक्ष में निर्णय दिया गया हैयाफिर उस न्यायालय के साथ हो सकता है जिसने निर्णय दिया है। 
  • सत्य बनाम तेजा सिंह (1975)के मामले में, उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि वादी द्वारा विदेशी न्यायालय को उसकी अधिकारिता के संबंध में गुमराह किये जाने के कारण प्राप्त निर्णय कपटयुक्त था और इसलिये वह निश्चायक नहीं है। 

(भारतीय विधि के उल्लंघन पर आधारित विदेशी निर्णय  

  • धारा 13(च) केअधीन यह आवश्यक नहीं है कि विदेशी न्यायालय की प्रक्रिया भारत में न्यायालयों की प्रक्रिया के समान या समरूप हो। 
  • तथापिजब कोई विदेशी निर्णय भारत में लागू किसी विधि के उल्लंघन पर आधारित होता हैतोउसे भारत में लागू नहीं किया जाएगा।