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आपराधिक कानून
केवल विवाह का मिथ्या वचन बलात्संग नहीं माना जाता
17-Feb-2026
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अनिर्बन मुखर्जी बनाम पश्चिम बंगाल राज्य और अन्य "पाँच वर्ष के रिश्ते के बाद विवाह करने के वचन का मात्र उल्लंघन बलात्कार नहीं माना जाता।" न्यायमूर्ति चैताली चटर्जी दास |
स्रोत: कलकत्ता उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
कलकत्ता उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति चैताली चटर्जी दास ने अनिर्बन मुखर्जी बनाम पश्चिम बंगाल राज्य और अन्य (2026) के मामले में एक आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को स्वीकार करते हुए पश्चिम मेदिनीपुर के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष लंबित संपूर्ण आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।
- न्यायालय ने निर्णय दिया कि लगभग पाँच वर्ष के सहमतिपूर्ण संबंध के बाद विवाह के वचन का मात्र भंग भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 376 (भारतीय न्याय संहिता की धारा 64) के अधीन बलात्संग नहीं माना जाता है ।
अनिर्बन मुखर्जी बनाम पश्चिम बंगाल राज्य और अन्य (2026) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- परिवादकर्त्ता ने अभिकथित किया कि 2017 में याचिकाकर्त्ता अनिर्बन मुखर्जी के साथ उसका एक रोमांटिक रिश्ता बन गया था।
- 2018 में, उसने अभिकथित किया कि याचिकाकर्त्ता ने उसे शराब पीने के लिये विवश किया और उसका लैंगिक उत्पीड़न किया।
- तत्पश्चात्, विवाह के आश्वासन पर, उसने संबंध जारी रखा और दीघा और गोवा सहित कई स्थानों पर उसके साथ यात्रा की।
- परिवादकर्त्ता बाद में गर्भवती हो गई और उसने अभिकथित कि याचिकाकर्त्ता ने उसे गर्भ समापन के लिये विवश किया।
- गर्भसमापन के बाद, याचिकाकर्त्ता ने उससे विवाह करने से इंकार कर दिया तथा निजी/अंतरंग तस्वीरें प्रसारित करने की धमकी दी।
- याचिकाकर्त्ता के विरुद्ध भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 417 (छल), 376 (बलात्संग), 313 (सम्मति के बिना गर्भपात कराना) और 506 (आपराधिक अभित्रास) के अधीन आरोप पत्र दायर किया गया था।
- याचिकाकर्त्ता ने उक्त कार्यवाही को रद्द करने की मांग करते हुए कलकत्ता उच्च न्यायालय में एक आपराधिक पुनरीक्षण याचिका दायर की।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- न्यायालय ने मामले की डायरी, दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के अधीन अभिलिखित कथन, चिकित्सा अभिलेख और यात्रा विवरण की जांच की और पाया कि पक्षकारों ने 2017 से 2022 तक बिना किसी समकालीन परिवाद के आपसी सहमति से अंतरंग संबंध बनाए रखा।
- 2018 में लैंगिक उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए भी, परिवादकर्त्ता कई वर्षों तक याचिकाकर्त्ता के साथ कई स्थानों पर यात्रा करती रही और रहती रही, जिससे अभियोजन पक्ष द्वारा प्रपीड़न या मिथ्या धारणा के मामले को काफी कमजोर कर दिया गया।
- गर्भसमापन की प्रक्रिया परिवादकर्त्ता की सम्मति से की गई थी, जिसमें याचिकाकर्त्ता ने संरक्षक के रूप में हस्ताक्षर किये थे, जिससे भारतीय दण्ड संहिता की धारा 313 के अधीन लगाए गए आरोप का खंडन होता है।
- उच्चतम न्यायालय के विधिशास्त्र का हवाला देते हुए, न्यायालय ने दोहराया कि सम्मति केवल तभी अमान्य होती है जब विवाह का मिथ्या वचन शुरू से ही किया गया हो और उसे पूरा करने का कोई आशय न हो - विवाह से बाद में इंकार करने से सम्मति से बने अंतरंग संबंधों को भूतलक्षी रूप से अपराध नहीं ठहराया जा सकता है।
- न्यायालय ने कहा कि भारतीय दण्ड संहिता की धारा 90 के अधीन अपेक्षित "तथ्य की मिथ्या धारणा" इस मामले में स्पष्ट रूप से अनुपस्थित थी।
- भारतीय दण्ड संहिता की धारा 417 और 506 के अधीन लगाए गए आरोप भी मूलभूत तत्त्वों के अभाव में निराधार पाए गए।
- न्यायालय ने अभियोजन को जारी रखने को "न्यायालय की प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग" करार दिया और पूरी कार्यवाही को रद्द कर दिया।
क्या विवाह का मिथ्या वचन अपराध है?
बारे में:
- भारतीय दण्ड संहिता में ऐसा कोई स्पष्ट अपराध नहीं है। तथापि, ऐसा अपराध भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 69 में पाया जा सकता है।
- भारतीय न्याय संहिता की धारा 69 में प्रवंचनापूर्ण साधनों का प्रयोग करके लैंगिक संबंध बनाने आदि के लिये दण्ड का उपबंध है।
- इसमें कहा गया है कि जो कोई प्रवंचनापूर्ण साधनों द्वारा या किसी महिला को विवाह करने का वचन देकर, उसे पूरा करने के किसी आशय के बिना, उसके साथ मैथुन करता है, ऐसा मैथुन बलात्संग के अपराध की कोटि में नहीं आता है, तो वह दोनों में से किसी भाँति के ऐसी अवधि के कारावास से दण्डनीय होगा, जो दस वर्ष तक की हो सकेगी, और जुर्माने के लिये भी दायी होगा।
- स्पष्टीकरण — “प्रवंचनापूर्ण साधनों" में, नियोजन या प्रोन्नति, या पहचान छिपाकर विवाह करने के लिye, उत्प्रेरण या उनका मिथ्या वचन, सम्मिलित है।
आवश्यक तत्त्व:
- पहला आवश्यक तत्त्व अभियुक्त और परिवादकर्त्ता के बीच लैंगिक संबंध का सबूत होना है।
- दूसरे तत्त्व के अनुसार, ऐसा लैंगिक संबंध प्रवंचनापूर्ण साधनों या विवाह के मिथ्या वचन के माध्यम से प्राप्त किया गया होना चाहिये।
- तीसरे तत्त्व के लिये यह साबित करना आवश्यक है कि अभियुक्त का शुरू से ही विवाह के वचन को पूरा करने का कोई वास्तविक आशय नहीं था।
- चौथे तत्त्व में यह निर्दिष्ट किया गया है कि लैंगिक संबंध विद्यमान सांविधिक उपबंधों के अधीन बलात्संग का अपराध नहीं होना चाहिये।
- पाँचवें तत्त्व के लिये यह साबित करना आवश्यक है कि परिवादकर्त्ता की सम्मति विशेष रूप से प्रवंचनापूर्ण साधनों या मिथ्या विवाह के वचन के कारण प्राप्त की गई थी।
- सांविधिक स्पष्टीकरण में यह स्पष्ट किया गया है कि प्रवंचनापूर्ण साधनों में नियोजन, पदोन्नति या विवाह का मिथ्या वचन करके और अपनी वास्तविक पहचान छिपाकर प्रलोभन देना सम्मिलित है।
- अभियोजन पक्ष को यह साबित करना होगा कि अभियुक्त ने संबंध की शुरुआत से ही दुर्भावनापूर्ण आशय और गुप्त उद्देश्य रखे थे।
- कपटपूर्ण आशय का अनिवार्य तत्त्व इस अपराध को मात्र वचन भंग या अप्रत्याशित परिस्थितियों के कारण विवाह करने में असमर्थता से भिन्न करता है। समय संबंधी पहलू के लिये यह साबित करना आवश्यक है कि लैंगिक संबंध के समय प्रवंचना विद्यमान थी, न कि केवल बाद में मन बदलना।
- कारण स्थापित करने वाला तत्त्व यह सिद्ध करता है कि परिवादकर्त्ता मिथ्या वचन या प्रवंचनापूर्ण प्रस्तुतीकरण के बिना लैंगिक संबंध के लिये सहमति नहीं देती। इस धारा के अधीन यह साबित करना आवश्यक है कि अभियुक्त ने भावी विवाह की प्रवंचना से लैंगिक संबंध प्राप्त करने के लिये जानबूझकर प्रवंचना का सहारा लिया।
भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 64 क्या है?
- भारतीय न्याय संहिता की धारा 64 बलात्संग के लिये दण्ड का उपबंध करती है।
- इससे पहले इस प्रकार के मामलों का विनियमन भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 376 के अधीन किया जाता था।
- धारा 64(1) बलात्संग के लिये सामान्य दण्ड के रूप में कम से कम दस वर्ष की कठोर कारावास की अवधि निर्धारित करती है, जिसे जुर्माने के साथ आजीवन कारावास तक बढ़ाया जा सकता है।
- धारा 64(2) बलात्संग के गुरुतर या अतिगंभीर रूपों के लिये अधिक कठोर दण्ड का उपबंध करती है।
- धारा 64(2)(ज) विशेष रूप से ऐसी स्थिति से संबंधित है जहाँ कोई व्यक्ति "किसी महिला के गर्भवती होने की जानकारी होते हुए भी उसके साथर बलात्संग करता है।"
- धारा 64(2)(ज) के अधीन अपराधों के लिये विहित दण्ड कम से कम दस वर्ष का कठोर कारावास है, जिसे आजीवन कारावास (अर्थात् व्यक्ति के शेष प्राकृत जीवनकाल) तक बढ़ाया जा सकता है, साथ ही जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।
- यह उपबंध गर्भवती महिला के साथ बलात्संग को लैंगिक उत्पीड़न का एक गुरुतर रूप मानता है, जो गर्भवती पीड़ितों की अतिरिक्त भेद्यता और महिला और उसके अजन्मे बच्चे दोनों को होने वाले संभावित नुकसान को मान्यता देता है।
- धारा 64(2)(ज) धारा 64(2) में सूचीबद्ध कई परिस्थितियों में से एक है जहाँ विधि अपराध की विशेष रूप से जघन्य प्रकृति के कारण अधिक गंभीर दण्ड अधिरोपित करता है।
- यह धारा इस बात को स्वीकार करती है कि पीड़िता के गर्भवती होने की जानकारी होते हुए भी बलात्संग करना गंभीर अपराध है, जिसके लिये कठोर दण्ड दिया जाना चाहिये।
- इस अपराध का वर्गीकरण धारा 64(1) के बजाय धारा 64(2) के अधीन करना विधायिका के ऐसे मामलों से अधिक गंभीरता से निपटने के आशय को दर्शाता है।
आपराधिक कानून
समानता का सिद्धांत
17-Feb-2026
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बालमुकुंद सिंह गौतम बनाम मध्य प्रदेश राज्य एवं अन्य "जो अभियुक्त जानबूझकर विचारण से पलायन करता हुआ फरार रहता है, वह केवल इस आधार पर कि किसी सह-अभियुक्त को विचारण में दोषमुक्त कर दिया गया है, समानता के सिद्धांत का सहारा लेकर अग्रिम जमानत की मांग नहीं कर सकता।" न्यायमूर्ति जे.बी. परदीवाला और विजय बिश्नोई |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
बालमुकुंद सिंह गौतम बनाम मध्य प्रदेश राज्य और अन्य (2026) के मामले में न्यायमूर्ति जे.बी. परदीवाला और विजय बिश्नोई की पीठ ने निर्णय दिया कि फरार अभियुक्त केवल इसलिये अग्रिम जमानत मांगने के लिये समानता के सिद्धांत का सहारा नहीं ले सकता क्योंकि सह-अभियुक्तों को विचारण में दोषमुक्त कर दिया गया है।
बलमुकुंद सिंह गौतम बनाम मध्य प्रदेश राज्य और अन्य (2026) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- परिवादकर्त्ता मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ के उस आदेश से व्यथित था जिसमें प्रत्यर्थी संख्या 2-अभियुक्त को अग्रिम जमानत दी गई थी, जिसे फरार घोषित किया गया था।
- उच्च न्यायालय ने अग्रिम जमानत केवल इसलिये दी क्योंकि संबंधित प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) में सह-अभियुक्तों को विचारण न्यायालय ने दोषमुक्त कर दिया था।
- अभियुक्त लगभग छह वर्ष तक अन्वेषण और विचारण से फरार रहा था।
- अभियुक्त ने घायल पीड़ित शैलेंद्र उर्फ पिंटू को, जो इस प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) में प्रत्यक्षदर्शी भी है, उसकी जमानत याचिका का विरोध करने पर जान से मारने की धमकी दी थी।
- अभियुक्त के विरुद्ध साक्षी को धमकाने के आरोप में प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) संख्या 272/2019 दिनांक 10.05.2019 को दर्ज की गई थी।
- अभियुक्त की अग्रिम जमानत याचिका पहले ही नामंजूर हो चुकी थीं।
- परिवादकर्त्ता ने उच्च न्यायालय के आदेश को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी और तर्क दिया कि फरार अभियुक्त द्वारा समानता का दावा नहीं किया जा सकता है।
- परिवादकर्त्ता ने तर्क दिया कि सह-अभियुक्त व्यक्ति की दोषमुक्त होने का निर्णय उनसे संबंधित विशिष्ट साक्ष्यों पर आधारित था और इसका फरार अभियुक्त से कोई संबंध नहीं था।
- राज्य (प्रत्यर्थी संख्या 1) ने परिवादकर्त्ता की अपील का समर्थन किया, तथापि उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध अपील न करने के उनके निर्णय पर प्रश्न उठाया।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- न्यायालय ने टिप्पणी की कि समानता के सिद्धांत का हवाला उस फरार अभियुक्त द्वारा नहीं दिया जा सकता है जो जानबूझकर विचारण से बचने के लिये केवल इसलिये अग्रिम जमानत की मांग करता है क्योंकि उसके एक सह-अभियुक्त को दोषमुक्त कर दिया गया है।
- न्यायालय ने कहा, "फरार अभियुक्त को अग्रिम जमानत देना एक दोषपूर्ण और अनुचित पूर्व निर्णय स्थापित करता है और यह संदेश देता है कि विचारण का सामना करने वाले विधि का पालन करने वाले सह-अभियुक्तों का विचारण की प्रक्रिया में लगन से उपस्थित होना गलत था, और इसके अतिरिक्त, यह लोगों को विधि की प्रक्रिया से बेखौफ होकर बचने के लिये प्रोत्साहित करता है।"
- न्यायालय ने पाया कि अभियुक्त द्वारा उठाया गया यह आधार कि अन्य सह-अभियुक्तों को दोषमुक्त कर दिया गया था,"स्वयं ही उसे समानता के आधार पर अग्रिम जमानत के अनुतोष का हकदार नहीं बनाता है, विशेषत: तब जब अभियुक्त स्वयं न्यायालय के साथ सहयोग करने में विफल रहा और फरार होकर अन्य सह-अभियुक्तों के विचारण में विलंब किया।"
- उच्च न्यायालय द्वारा केवल ठोस साक्ष्यों के अभाव और सह-अभियुक्तों के दोषमुक्त होने के आधार पर अग्रिम जमानत देने के तर्क को उच्चतम न्यायालय ने त्रुटिपूर्ण करार दिया।
- न्यायालय ने पाया कि उच्च न्यायालय इस बात पर विचार करने में विफल रहा कि विचारण न्यायालय द्वारा फरार अभियुक्त के विरुद्ध या उसके पक्ष में अभिलिखित किया गया कोई भी निर्णय जमानत आवेदन पर निर्णय लेने के लिये पूरी तरह से अप्रासंगिक है, क्योंकि सह-अभियुक्तों के विचारण के दौरान अभियोजन पक्ष को फरार अभियुक्त के विरुद्ध कोई सबूत पेश करने की आवश्यकता नहीं थी।
- न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि अभियुक्त लगभग 6 वर्षों से फरार था और उसने न्यायिक प्रक्रिया का मजाक उड़ाया था।
- न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यद्यपि सामान्य नियम के अनुसार फरार अभियुक्त अग्रिम जमानत का हकदार नहीं होता है, लेकिन असाधारण मामलों में जहाँ प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR), केस डायरी और अन्य प्रासंगिक सामग्रियों की जांच करने पर न्यायालय की प्रथम दृष्टया यह राय हो कि फरार अभियुक्त के विरुद्ध कोई मामला नहीं बनता है, तो अग्रिम जमानत देने की शक्ति का प्रयोग किया जा सकता है।
- न्यायालय ने माना कि उच्च न्यायालय ने अग्रिम जमानत देने के लिये अपने विवेक का सही ढंग से प्रयोग नहीं किया था क्योंकि यह इस प्रकार के अनुतोष के लिये उपयुक्त मामला नहीं था।
- अपील मंजूर कर ली गई और अभियुक्त को निर्णय की तारीख से चार सप्ताह के भीतर संबंधित न्यायालय के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निदेश दिया गया।
समानता का सिद्धांत क्या है?
अर्थ एवं परिभाषा:
- समानता के सिद्धांत का अर्थ है कि दण्ड "समान परिस्थितियों में अधिरोपित किये गए समान अपराधों के लिये समान अपराधियों को दिये गए दण्ड के समान" होना चाहिये।
- दण्ड निर्धारण की प्रक्रिया स्वभावतः व्यक्तिपरक होते हुए भी, प्रत्येक दण्डादेश को समानता के सिद्धांत का सम्मान करना चाहिये।
- समान अथवा मिलते-जुलते अपराधों के लिये दोषसिद्ध व्यक्तियों को परस्पर अत्यधिक भिन्न दण्ड नहीं दिया जाना चाहिये।
- दण्ड लगभग एक समान होना चाहिये, जिसमें व्यक्ति विशेष से संबंधित गंभीर और हल्के कारकों को ध्यान में रखा जाए।
- समानता का अर्थ एकरूपता नहीं है और इससे आनुपातिकता की आवश्यकता पर ध्यान कम नहीं होना चाहिये।
उद्देश्य:
- समानता के सिद्धांत का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जिन दोषसिद्ध व्यक्तियों के विरुद्ध मूलतः समान तथ्य एवं परिस्थितियाँ विद्यमान हों, उनके बीच असंगत या असमान दण्डादेश न दिए जाएँ, जिससे न्यायसंगतता बनी रहे।
- यह सिद्धांत दण्ड निर्धारण में व्यक्तिगत दृष्टिकोण को रद्द नहीं करता है।
- इसका उद्देश्य दण्डादेश को पूर्णतः समान बनाना नहीं, अपितु न्यायसंगतता एवं समरूपता को बढ़ावा देना है।
जमानत मामलों में समानता
- जमानत के मामलों में, समानता के सिद्धांत का सहारा तब लिया जाता है जब किसी सह-अभियुक्त को जमानत दी जा चुकी हो और अभियुक्त समान स्थिति में होने के आधार पर समान अनुतोष की मांग करता हो।
- इस सिद्धांत के अधीन अभियुक्त इस आधार पर जमानत का दावा कर सकता है कि उसी प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) में उसके सह-अभियुक्त को जमानत मिल गई है या उसे दोषमुक्त कर दिया गया है।
जमानत में समानता की परिसीमाएँ:
- समानता को पूर्ण अधिकार के रूप में दावा नहीं किया जा सकता; इसका मूल्यांकन व्यक्तिगत परिस्थितियों के आलोक में किया जाना चाहिये।
- फरार अभियुक्त केवल इसलिये अग्रिम जमानत मांगने के लिये समानता के सिद्धांत का हवाला नहीं दे सकता क्योंकि उसके सह-अभियुक्तों को दोषमुक्त कर दिया गया है।
- सह-अभियुक्तों की दोषमुक्त होने का निर्णय उनके विचारण से संबंधित विशिष्ट साक्ष्यों पर आधारित है और इससे स्वतः ही उस फरार अभियुक्त को लाभ नहीं मिलता जिसने पूरे विचारण की प्रक्रिया से बचने की कोशिश की हो।
- सह-अभियुक्त के विचारण के दौरान विचारण न्यायालय द्वारा फरार अभियुक्त के पक्ष या विपक्ष में अभिलिखित किये गए कोई भी निष्कर्ष फरार अभियुक्त की जमानत याचिका पर निर्णय लेने के लिये पूरी तरह से अप्रासंगिक हैं।
- समानता के आधार पर फरार अभियुक्त को अग्रिम जमानत देना एक दोषपूर्ण और अनुचित पूर्व निर्णय स्थापित करता है और न्यायिक प्रक्रिया से बचने के लिये प्रोत्साहन देता है।
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