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आपराधिक कानून
जघन्य अपराधों के लिये लागू जमानत के सिद्धांत गंभीर आर्थिक अपराधों पर भी समान रूप से लागू होते हैं
18-Feb-2026
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राकेश मित्तल बनाम अजय पाल गुप्ता उर्फ सोनू चौधरी एवं अन्य "जघन्य अपराधों में जमानत से संबंधित सिद्धांत गंभीर आर्थिक अपराधों पर भी समान रूप से लागू होते हैं, क्योंकि ऐसे अपराध प्रत्यक्षत: नागरिकों की आर्थिक भलाई और जीवन की गुणवत्ता को कमजोर करते हैं।" न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
राकेश मित्तल बनाम अजय पाल गुप्ता उर्फ सोनू चौधरी और अन्य (2026) के मामले में न्यायमूर्ति संजय कुमार और के. विनोद चंद्रन की पीठ ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के उस आदेश को अपास्त कर दिया, जिसमें एक आभ्यासिक वित्तीय कपट करने वाले को जमानत दी गई थी। पीठ ने निर्णय दिया कि जघन्य अपराधों में जमानत के लिये लागू सिद्धांत गंभीर आर्थिक अपराधों पर भी समान रूप से लागू होते हैं। न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि जीवन और स्वतंत्रता का मूल्य व्यक्तिगत सुरक्षा से कहीं अधिक है और इसमें नागरिकों की आर्थिक भलाई भी सम्मिलित है।
राकेश मित्तल बनाम अजय पाल गुप्ता उर्फ सोनू चौधरी और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- यह याचिका इलाहाबाद उच्च न्यायालय (लखनऊ पीठ) के उस आदेश के विरुद्ध दायर की गई है जिसमें बड़े पैमाने पर छल, आपराधिक न्यासभंग, कूटरचना और आपराधिक अभित्रास से जुड़े एक मामले में अभियुक्त को जमानत दी गई थी।
- अपीलकर्त्ता-परिवादकर्त्ता ने अभिकथित किया कि उसने अभियुक्त और उसके सहयोगियों को 11.52 करोड़ रुपए से अधिक मूल्य का अनाज दिया था, लेकिन उसे केवल 5.02 करोड़ रुपए का संदाय प्राप्त हुआ। शेष राशि को कथित तौर पर कूटरचित दस्तावेज़ों, फर्जी पतों और कई मिथ्या पहचानों के माध्यम से हड़प लिया गया।
- प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) भारतीय दण्ड संहिता की धारा 406, 419, 420, 467, 468, 471 और 506 के अधीन दर्ज की गई थी। अन्वेषण के दौरान, भारतीय दण्ड संहिता की धारा 409 (विश्वास के पद पर आसीन व्यक्ति द्वारा आपराधिक न्यासभंग) भी जोड़ी गई।
- अभियोजन पक्ष ने अभिकथित किया कि अभियुक्त कई उपनामों से काम करता था, उसके पास कई कूटरचित आधार और पैन कार्ड थे, वह लगभग 20 महीनों तक फरार रहा और इनाम की घोषणा के बाद ही उसे गिरफ्तार किया गया।
- सेशन न्यायालय ने आपराधिक पृष्ठभूमि छिपाने और जानबूझकर न्यायालय को गुमराह करने का हवाला देते हुए पहले जमानत याचिका खारिज कर दी थी। तथापि, उच्च न्यायालय ने सह-अभियुक्तों के साथ समानता के आधार पर जमानत दे दी, यह देखते हुए कि अपराध मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय था, आरोप पत्र दाखिल किया जा चुका था और अभियुक्त कुछ समय अभिरक्षा में बिता चुका था।
- उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देते हुए परिवादकर्त्ता ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन द्वारा लिखित निर्णय में पीठ ने निम्नलिखित प्रमुख टिप्पणियां कीं:
- न्यायालय ने निर्णय दिया कि यद्यपि नीरू यादव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2014) और सुधा सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2021) जैसे पूर्व के निर्णय जघन्य और हिंसक अपराधों से संबंधित थे, परंतु उनमें निहित अंतर्निहित सिद्धांत वित्तीय कपट से जुड़े मामलों पर भी समान रूप से लागू होते हैं।
- न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि जीवन और स्वतंत्रता का मूल्य केवल शारीरिक व्यक्ति तक ही सीमित नहीं है, अपितु इसमें जीवन की गुणवत्ता भी सम्मिलित है, जिसमें आर्थिक कल्याण भी सम्मिलित है - जिससे जमानत संबंधी विधिशास्त्र के प्रयोजनों के लिये गंभीर आर्थिक अपराध हिंसक अपराधों से कम गंभीर नहीं हैं।
- पीठ ने पाया कि उच्च न्यायालय ने अपराध में अभियुक्त की सक्रिय भूमिका, उसके बार-बार अपराध करने के इतिहास, कई फर्जी पहचानों के प्रयोग और जमानत मिलने के बावजूद फरार होने के उसके पूर्व आचरण पर विचार किये बिना, समानता के सिद्धांत को अंधाधुंध लागू करने में त्रुटी की।
- न्यायालय ने अभियुक्त को एक पेशेवर अपराधी और समाज के लिये खतरा पाया , यह देखते हुए कि उसने पहले प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) संख्या 229/2017 में जमानत प्राप्त की थी, उसके बाद फरार हो गया और उसी तरह की कपटपूर्ण क्रियाकलापों में लिप्त रहा, जिसके परिणामस्वरूप वर्षों में कई प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज की गईं।
- न्यायालय ने माना कि आपराधिक इतिहास, फरार होने के आचरण, फर्जी पहचान के उपयोग और बार-बार अपराध करने की संभावना को नजरअंदाज करने से जमानत आदेश विकृत हो जाता है और अपीलीय हस्तक्षेप के लिये कमजोर हो जाता है ।
आर्थिक अपराध क्या हैं?
बारे में:
- आर्थिक अपराध वे अपराध हैं जो आर्थिक या व्यावसायिक क्रियाकलापों के दौरान किये जाते हैं और जिनसे वित्तीय नुकसान होता है तथा देश की आर्थिक भलाई और वित्तीय स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
- इन अपराधों में सामान्यत: कर चोरी, मनी लॉन्ड्रिंग, बैंक कपट, प्रतिभूति घोटाले, कॉर्पोरेट कपट, तस्करी और भ्रष्टाचार जैसी कपटपूर्ण क्रियाकलाप शामिल होते हैं जो सार्वजनिक और निजी दोनों वित्तीय हितों को प्रभावित करते हैं।
- तथापि भारत में ऐसा कोई विशिष्ट विधान नहीं है जो आर्थिक अपराधों को व्यापक रूप से परिभाषित करता हो, फिर भी उन्हें अपराधों की एक भिन्न श्रेणी के रूप में माना जाता है, जिन पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता होती है - जिसे प्रथम बार भारत के 47वें विधि आयोग (1972) द्वारा मान्यता दी गई थी ।
- आर्थिक अपराधों को पारंपरिक अपराधों की तुलना में अधिक गंभीर माना जाता है क्योंकि वे पूरी अर्थव्यवस्था को प्रभावित करते हैं, देश के वित्तीय स्वास्थ्य के लिये गंभीर संकट उत्पन्न करते हैं और वित्तीय प्रणाली में जनता के विश्वास को हिला देते हैं।
- इन अपराधों में अक्सर जटिल संव्यवहार, परिष्कृत तरीके और सार्वजनिक धन की महत्त्वपूर्ण मात्रा शामिल होती है, जो इन्हें नियमित आपराधिक अपराधों से भिन्न बनाती है और इसके लिये विशेष अन्वेषण और अभियोजन दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है।
आर्थिक अपराधों से संबंधित विधिक उपबंध:
भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023:
- भारतीय न्याय संहिता ने भारतीय दण्ड संहिता, 1860 का स्थान लिया है और आर्थिक अपराधों से संबंधित उपबंधों को बरकरार रखते हुए उन्हें समेकित किया है। भारतीय न्याय संहिता की धारा 316 छल और बेईमानी से संपत्ति सौंपने के लिये प्रेरित करने से संबंधित है। धारा 316(2) विशेष रूप से लोकहित से जुड़े छल के मामलों को संबोधित करती है। आपराधिक न्यासभंग (धारा 316 को धारा 318 के साथ सहपठित), कूटरचना (धारा 336-340) और आपराधिक दुर्विनियोग (धारा 314) से संबंधित उपबंध नई संहिता के अधीन वित्तीय कपट के मामलों को नियंत्रित करते रहेंगे।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023:
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता ने दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 का स्थान लिया है और आर्थिक अपराधों के मामलों में जमानत के प्रक्रियात्मक पहलुओं को नियंत्रित करता है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 482 अग्रिम जमानत से संबंधित है, जिसमें आर्थिक अपराध के मामले भी सम्मिलित हैं। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 479 जमानतीय अपराधों में जमानत को नियंत्रित करती है, जबकि धारा 480 अजमानतीय अपराधों में जमानत को नियंत्रित करती है। वित्तीय कपट के मामलों में आपराधिक पृष्ठभूमि, भागने का जोखिम और बार-बार अपराध करने की संभावना पर विचार करते समय ये दोनों धाराएँ सुसंगत होती हैं।
धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA), 2002:
- धारा 2(प) "अपराध की आगम" को आपराधिक गतिविधि से प्राप्त या अर्जित संपत्ति के रूप में परिभाषित करती है।
- धारा 3 धन शोधन को अपराध की आय से संबंधित प्रक्रियाओं में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से लिप्त होने, साशय सहायता करने, पक्षकार बनने या शामिल होने के प्रयासों के रूप में परिभाषित करती है।
- धन शोधन निवारण अधिनियम के अधीन जमानत धारा 45 के अधीन कठोर दोहरी शर्तों के अधीन है, जिसके लिये न्यायालय को संतुष्ट होना आवश्यक है कि यह मानने के लिये उचित आधार हैं कि अभियुक्त दोषी नहीं है और जमानत पर रहते हुए कोई अपराध करने की संभावना नहीं है।
कंपनी अधिनियम, 2013:
- धारा 447 कपट की एक व्यापक परिभाषा प्रदान करती है, जिसमें कृत्य और लोप, तथ्यों को छिपाना, पद का दुरुपयोग, अनुचित लाभ के लिये की गई कार्रवाई और कंपनी या हितधारकों के हितों को नुकसान पहुँचाने वाली कार्रवाई सम्मिलित हैं।
आयकर अधिनियम, 1961:
- यह अधिनियम कर चोरी और आय छिपाने को अपराध घोषित करता है, और रिटर्न प्रस्तुत करने में विफलता, नोटिस का अनुपालन न करने और आय या अतिरिक्त लाभ संबंधी विवरणों को छिपाने के लिये दण्ड का प्रावधान करता है।
सीमा शुल्क अधिनियम, 1962:
- यह अधिनियम देश के अंदर और बाहर माल की आवाजाही को नियंत्रित करता है, अवैध रूप से आयातित माल की जब्ती का प्रावधान करता है, और तस्करी के विरुद्ध सुरक्षा उपाय प्रदान करता है।
भगोड़ा आर्थिक अपराधी अधिनियम, 2018:
- यह विधान उन अपराधियों को लक्षित करता है जो अभियोजन से बचने के लिये भारत से भाग गए हैं। यह धन शोधन निवारण अधिनियम के अधीन निदेशकों और उप निदेशकों को अधिकार प्रदान करता है और भगोड़े आर्थिक अपराधियों की संपत्तियों की कुर्की और ज़ब्ती का प्रावधान करता है।
दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता, 2016:
- दण्ड प्रावधानों में कपटपूर्ण दिवालिया कार्यवाही के लिये कम से कम 1 लाख रुपए के दण्ड का उपबंध है, जिसे 1 करोड़ रुपए तक बढ़ाया जा सकता है।
अन्य विशिष्ट विधियाँ:
- कई अन्य विधि आर्थिक अपराधों की विशिष्ट श्रेणियों को संबोधित करती हैं, जिनमें केंद्रीय उत्पाद शुल्क अधिनियम, 1944 (उत्पाद शुल्क की चोरी), सेबी विनियम, 1995 (शेयर बाजार में हेरफेर), सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (क्रेडिट कार्ड कपट एवं साइबर अपराध), तथा राज्य-विशिष्ट भूमि हड़पने से संबंधित विधि, जैसे आंध्र प्रदेश भूमि हड़प प्रतिषेध अधिनियम, 1982, सम्मिलित हैं।
ऐतिहासिक मील के पत्थर माने जाने वाले मामले:
- हर्षद मेहता सिक्योरिटीज घोटाला (1992):
- बैंकिंग प्रणाली और शेयर बाजार में हेरफेर से जुड़ा पहला बड़ा वित्तीय घोटाला।
- फर्जी बैंक रसीदों और प्रतिभूतियों के माध्यम से ₹4,000 करोड़ का नुकसान हुआ।
- सत्यम घोटाला (2009):
- राजस्व में हेरफेर और 14,000 करोड़ रुपए के फर्जी बिलों से जुड़ा एक ऐतिहासिक कॉर्पोरेट कपट मामला।
- भारत में कॉर्पोरेट गवर्नेंस सुधारों के लिये एक महत्त्वपूर्ण पूर्व निर्णय स्थापित किया।
- 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला (2011):
- स्पेक्ट्रम लाइसेंसों के अनियमित एवं मनमाने आवंटन से संबंधित सबसे बड़ा दूरसंचार घोटाला।
- इसके परिणामस्वरूप ₹1.76 लाख करोड़ का नुकसान हुआ और 122 लाइसेंस रद्द कर दिये गए।
- PNB कपट मामला (2018):
- फर्जी लेटर ऑफ क्रेडिट से जुड़ा एक बड़ा बैंकिंग घोटाला, जिसकी कीमत ₹14,000 करोड़ है।
- बैंकिंग प्रणाली में उजागर हुई कमजोरियों के कारण बड़े मूल्य के संव्यवहार की कठोर निगरानी शुरू हुई।
आपराधिक कानून
पुलिस अभिरक्षा के बाहर किया गया प्रकटीकरण कथन साक्ष्य के रूप में ग्राह्य नहीं
18-Feb-2026
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रोहित जांगड़े बनाम छत्तीसगढ़ राज्य "साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि किसी अपराध के अभियुक्त व्यक्ति से पुलिस अभिरक्षा में रहते हुए प्राप्त सूचना, जिसके परिणामस्वरूप किसी तथ्य का पता चलता है, विचारण में सबूत के रूपर में प्रयोग किया जा सकता है। कथन करते समय अभियुक्त पुलिस अभिरक्षा में नहीं था, इसलिये यह धारा 27 के दायरे से बाहर है ।" न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
रोहित जांगडे बनाम छत्तीसगढ़ राज्य (2026) के मामले में न्यायमूर्ति संजय कुमार और के. विनोद चंद्रन की पीठ ने अपनी छह वर्षीय सौतेली पुत्री की हत्या के दोषी व्यक्ति को दोषमुक्त कर दिया, यह निर्णय देते हुए कि साक्ष्य की बरामदगी की ओर ले जाने वाला प्रकटीकरण कथन भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (IEA) की धारा 27 के अधीन तभी ग्राह्य है जब कथन करते समय अभियुक्त पुलिस अभिरक्षा में था।
रोहित जांगडे बनाम छत्तीसगढ़ राज्य (2026) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- अभियुक्त को अपनी छह वर्षीय सौतेली पुत्री की हत्या का दोषी पाया गया।
- अभियोजन पक्ष का मामला काफी हद तक अभियुक्त द्वारा किये गए एक प्रकटीकरण कथन पर आधारित था, जिसके कारण मृतक के अस्थि अवशेषों की खोज हुई।
- धारा 27 के अधीन ज्ञापन 13 अक्टूबर, 2018 को सुबह 10:30 बजे अभिलिखित किया गया था, जबकि गिरफ्तारी ज्ञापन से पता चलता है कि अभियुक्त को उसी दिन रात 10:00 बजे गिरफ्तार किया गया था – कथन अभिलिखित होने के लगभग बारह घंटे बाद।
- अभियुक्त को प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज होने से दो दिन पहले, 8 अक्टूबर 2018 को छोड़ दिया गया था।
- DNA साक्ष्य से बच्चे की मृत्यु की पुष्टि होते हुए भी, मृत्यु का निश्चित समय निर्धारित नहीं किया जा सका, क्योंकि अपराध के साक्ष्य बरामद नहीं हुए थे।
- परिवार और पुलिस को सूचित किया गया था कि बच्चा आखिरी बार अभियुक्त के साथ गया था, फिर भी लापता बच्चे के संबंध में काफी समय तक कोई परिवाद नहीं किया गया और उस दौरान अभियुक्त से पूछताछ नहीं की गई।
- अधीनस्थ न्यायालय ने अभियुक्त को दोषी ठहराया था और अपील के जरिए मामला उच्चतम न्यायालय के समक्ष आया।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
धारा 27 के अधीन ग्राह्यता पर – अभिरक्षा अनिवार्य शर्त:
- पीठ ने निर्णय दिया कि अभियुक्त के प्रकटीकरण कथनों के आधार पर मृतक के अस्थि-अवशेषों की हुई बरामदगी को साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि ऐसे प्रकटीकरण कथन करते समय अभियुक्त पुलिस अभिरक्षा में नहीं था।
- न्यायालय ने दुर्लाव नामासुद्र बनाम सम्राट (1931) के निर्णय का हवाला दिया , जिसमें यह प्रतिपादित किया था कि पुलिस अभिरक्षा में न होने वाले व्यक्ति से प्राप्त जानकारी को धारा 27 के अंतर्गत नहीं लाया जा सकता है।
"अभिरक्षा" के अर्थ पर:
- यद्यपि, न्यायालय ने स्वीकार किया कि "अभिरक्षा" का अर्थ औपचारिक गिरफ्तारी होना आवश्यक नहीं है और इसमें निगरानी या अवरोध सम्मिलित हो सकता है।
- ज्ञापन दर्ज करने और औपचारिक गिरफ्तारी के बीच बारह घंटे से अधिक का अंतराल निर्णायक साबित हुआ।
धारा 8 के अधीन आचरण साक्ष्य के रूप में ग्राह्यता:
- आंध्र प्रदेश राज्य बनाम गंगुला सत्य मूर्ति (1997) के पूर्व पूर्व निर्णय पर विश्वास करते हुए, न्यायालय ने माना कि यद्यपि अभिरक्षा से बाहर दिया गया प्रकटीकरण कथन धारा 27 के दायरे से बाहर आता है, फिर भी इसे साक्ष्य अधिनियम की धारा 8 के अधीन अभियुक्त के आचरण को दर्शाने के लिये ग्राह्य माना जा सकता है ।
- तथापि, पीठ ने इस बात पर बल दिया कि ऐसे सबूत कमजोर हैं और अकेले ही दोषसिद्धि का आधार नहीं बन सकते।
संदेह का लाभ एवं दोषमुक्ति:
- न्यायमूर्ति चंद्रन द्वारा लिखित निर्णय में यह उल्लेख किया गया कि DNA साक्ष्य से बालिका की मृत्यु की पुष्टि तो होती है, किंतु यह अभियुक्त को अपराध से निश्चायक रूप से नहीं जोड़ता, विशेष रूप से तब जब मृत्यु के समय के संबंध में कोई निश्चित निष्कर्ष उपलब्ध नहीं है तथा बालिका के लापता होने की सूचना देने में परिवार द्वारा की गई दीर्घ एवं अस्पष्टीकृत देरी भी विद्यमान है।
- अपील मंजूर कर ली गई।
प्रकटीकरण कथन क्या हैं?
बारे में:
- यह प्रकटीकरण कथन भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 के अधीन उपबंधित किया गया है।
- यह धारा पश्चात्वर्ती घटनाओं द्वारा पुष्टि के सिद्धांत पर आधारित है - एक तथ्य वास्तव में दी गई जानकारी के परिणामस्वरूप खोजा जाता है, जिसके परिणामस्वरूप एक भौतिक वस्तु की बरामदगी होती है।
भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 27:
- यह अन्य उपबंधों के लिये एक शर्त के रूप में है।
- किसी अपराध के अभियुक्त व्यक्ति से प्राप्त जानकारी के आधार पर ही तथ्य का पता लगाया जाना चाहिये।
- अभियुक्त को पुलिस की अभिरक्षा में होना चाहिये।
- इस प्रकार खोजे गए तथ्य से संबंधित जितनी भी जानकारी स्पष्ट रूप से उपलब्ध हो, उसे साबित किया जा सकता है।
- यह इस बात से अप्रभावित है कि कथन संस्वीकृति के समान है या नहीं।
- पुलुकुरी कोट्टाया बनाम सम्राट (1947) के मामले में, सर जॉन ब्यूमोंट ने निर्णय दिया कि धारा 27 केवल भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 26 का परंतुक है।
- यद्यपि, हाल ही में जाफरूद्दीन बनाम केरल राज्य (2022) के मामले में, उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया है कि धारा 27 पूर्ववर्ती धाराओं, विशेष रूप से धारा 25 और धारा 26 का अपवाद है।
भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 को लागू करने के लिये आवश्यक शर्तें:
- यह बात पेरुमल राजा उर्फ पेरुमल बनाम पुलिस निरीक्षक द्वारा राज्य प्रतिनिधि (2024) के मामले में निर्धारित की गई थी, जहाँ न्यायालय ने निम्नलिखित निर्णय दिया:
- सर्वप्रथम, तथ्यों की खोज होनी चाहिये। ये तथ्य अभियुक्त व्यक्ति से प्राप्त जानकारी के आधार पर सुसंगत होने चाहिये।
- द्वितीयतः, ऐसे तथ्य की खोज के संबंध में साक्ष्य प्रस्तुत किया जाना आवश्यक है। इसका अभिप्राय यह है कि वह तथ्य पूर्व से ही पुलिस के ज्ञान में नहीं होना चाहिये।
- तृतीयतः, सूचना प्राप्त किये जाने के समय अभियुक्त पुलिस अभिरक्षा में होना चाहिये।
- अंत में केवल उतनी ही सूचना साक्ष्य के रूप में ग्राह्य होगी, जो स्पष्टतः उस तथ्य से संबंधित हो, जिसकी खोज की गई है।
- इस खोजे गए तथ्य में निम्नलिखित बातें सम्मिलित होंगी:
- वह स्थान जहाँ से कोई वस्तु प्राप्त/उत्पन्न की गई हो; तथा।
- उक्त तथ्य के संबंध में अभियुक्त का ज्ञान।
भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 का कौन सा प्रावधान प्रकटीकरण विवरण प्रदान करता है?
- यह भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (BSA) की धारा 23 (2) के परंतुक के रूप में निहित है ।
- धारा 23 (2) में उपबंधित किया गया है:
- कोई भी संस्वीकृति, जो किसी व्यक्ति ने उस समय की हो जब वह पुलिस अधिकारी की अभिरक्षा में हो, उसके विरुद्ध साबित न की जाएगी जब तक, कि वह मजिस्ट्रेट की साक्षात् उपस्थिति में न की गई हो।
- परंतु जब किसी तथ्य के बारे में यह अभिसाक्ष्य दिया जाता है कि किसी अपराध के अभियुक्त व्यक्ति से, जो पुलिस अधिकारी की अभिरक्षा में हो. प्राप्त जानकारी के परिणामस्वरूप उसका पता चला है, तब ऐसी जानकारी में से, उतनी चाहे वह संस्वीकृति की कोटि में आती हो या नहीं, जितनी पता चले हुए तथ्य से स्पष्टतया संबंधित है, साबित की जा सकेगी।
भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 पर महत्त्वपूर्ण विधिक मामले कौन से हैं?
- मोहम्मद इनायतुल्लाह बनाम महाराष्ट्र राज्य (1976):
- यह निर्णय दिया गया है कि धारा को लागू करने के लिये अधिरोपित की गई प्रथम और आवश्यक शर्त एक ऐसे तथ्य की खोज है जो किसी अपराध के अभियुक्त व्यक्ति से प्राप्त जानकारी के परिणामस्वरूप एक सुसंगत तथ्य होना चाहिये।
- दूसरी बात यह है कि ऐसे तथ्य की खोज का प्रमाण देना आवश्यक है । पुलिस को पहले से ज्ञात तथ्य इस शर्त को पूरा नहीं करेगा और इस श्रेणी में नहीं आएगा।
- तीसरी शर्त यह है कि सूचना प्राप्त होने के समय अभियुक्त पुलिस अभिरक्षा में होना चाहिये।
- अंत में, केवल उतनी ही जानकारी ग्राह्य है जो किसी भौतिक वस्तु की बरामदगी के परिणामस्वरूप खोजे गए तथ्य से स्पष्ट रूप से संबंधित हो ।
- पेरुमल राजा उर्फ पेरुमल बनाम पुलिस निरीक्षक द्वारा राज्य प्रतिनिधि (2024):
- धारा 27 को लागू करने के लिये आवश्यक शर्तें निम्नलिखित हैं:
- सर्वप्रथम, तथ्यों की खोज होनी चाहिये। ये तथ्य अभियुक्त व्यक्ति से प्राप्त जानकारी के आधार पर सुसंगत होने चाहिये।
- दूसरे, ऐसे तथ्य की खोज के संबंध में साक्ष्य प्रस्तुत किया जाना आवश्यक है। इसका तात्पर्य यह है कि वह तथ्य पूर्व से ही पुलिस के संज्ञान में नहीं होना चाहिये।
- तीसरा, सूचना प्राप्त होने के समय अभियुक्त पुलिस की अभिरक्षा में होना चाहिये।
- अंत में, केवल उतनी ही जानकारी ग्राह्य है जो इस प्रकार खोजे गए तथ्य से स्पष्ट रूप से संबंधित हो।
- धारा 27 को लागू करने के लिये आवश्यक शर्तें निम्नलिखित हैं:
- दिल्ली एन.सी.टी. राज्य बनाम नवजोत संधू उर्फ अफसान गुरु (2005):
- उच्चतम न्यायालय ने इस बात की पुष्टि की कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 के अर्थ में खोजा गया तथ्य कोई ठोस तथ्य होना चाहिये जिससे जानकारी प्रत्यक्ष रूप से संबंधित हो।
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