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सांविधानिक विधि
यदि अवैधता साबित हो जाए तो विवादित तथ्य रिट याचिका में बाधा नहीं बनते
20-Feb-2026
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डॉ. पोश चरक और अन्य बनाम जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश "अनुच्छेद 226 के अधीन रिट अधिकारिता को केवल "विवादित तथ्यों" की तकनीकी दलील उठाकर नकारा नहीं जा सकता, जबकि अभिलेख स्वयं विधिविरुद्ध राज्य कार्रवाई को उजागर करता है ।" न्यायमूर्ति रजनेश ओसवाल |
स्रोत: जम्मू और कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति रजनेश ओसवाल ने डॉ. पोश चरक और अन्य बनाम जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश (2026) के मामले में यह निर्णय दिया कि अनुच्छेद 226 के अधीन रिट अधिकारिता को केवल "विवादित तथ्यों" का हवाला देकर नकारा नहीं जा सकता, जबकि राज्य के अपने आधिकारिक अभिलेख और स्वीकृतियाँ ही अवैधता को स्थापित करती हैं।
डॉ. पोश चरक और अन्य बनाम जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- यह रिट याचिका दिवंगत ठाकुर लक्ष्मण सिंह चरक के विधिक वारिस डॉ. पोश चरक और अन्य लोगों द्वारा दायर की गई थी, जिसमें उनकी पैतृक भूमि की बहाली या वैध अधिग्रहण की मांग की गई थी।
- याचिकाकर्त्ताओं के पूर्वज उस भूमि के रजिस्ट्रीकृत स्वामी और कृषक थे। 1983 में उनकी मृत्यु के पश्चात्, भूमि विधिवत रूप से उनके वैधानिक उत्तराधिकारियों को हस्तांतरित हो गई।
- बिना किसी अधिग्रहण कार्यवाही, पंचाट या प्रतिकर के संदाय के, यह भूमि राज्य की संस्थाओं - SICOP/SIDCO - के भौतिक कब्जे में आ गई, जिन्होंने निजी भूमि पर एक सड़क का निर्माण भी कर दिया।
- जमाबंदी और खसरा गिरदावरी (2018-2024) सहित राजस्व अभिलेखों में याचिकाकर्त्ताओं के स्वामित्व और खेती को निरंतर दर्शाया गया है, जिसमें SICOP या SIDCO के पक्ष में कोई प्रविष्टि नहीं है।
- बीरपुर भूमि घोटाले के सिलसिले में अधिग्रहण किये जाने के कारण याचिकाकर्त्ता वर्षों से अपने राजस्व अभिलेखों तक पहुँच प्राप्त करने में असमर्थ थे।
- 2021 में, राजस्व अधिकारियों द्वारा किये गए सीमांकन के बाद, यह चौंकाने वाली सच्चाई सामने आई कि याचिकाकर्त्ताओं की भूमि पर SICOP का अनाधिकृत कब्जा था।
- SICOP की ओर से प्राप्त RTI के बाद के जवाब निर्णायक साबित हुए - SICOP ने कब्जे की बात तो स्वीकार की, लेकिन अधिग्रहण पंचाट या संदाय किये गए प्रतिकर के किसी भी सबूत का प्रकटीकरण करने में असफल रहा।
- बारी ब्राह्मणा के तहसीलदार ने स्पष्ट रूप से पुष्टि की कि राजस्व पुस्तकों में SICOP या SIDCO का कोई अधिकार, स्वामित्व या हित अभिलिखित नहीं है।
- वरिष्ठ अधिवक्ता श्री अजय शर्मा ने श्री नवनीद नाइक और श्री अर्जुन भारती के साथ मिलकर यह तर्क दिया कि अधिग्रहण के बिना निजी भूमि पर निरंतर कब्जा संविधान के अनुच्छेद 300-क का प्रत्यक्ष उल्लंघन है और विलंब और असावधानी किसी चल रहे सांविधानिक अपराध को वैध नहीं ठहरा सकती।
- राज्य की ओर से सुश्री मोनिका कोहली (वरिष्ठ AAG) और श्री रविंदर गुप्ता (AAG) ने याचिका का विलंब, असावधानी और तथ्यों के विवादित प्रश्नों के आधार पर विरोध किया और दावा किया कि भूमि दशकों पहले औद्योगिक उद्देश्यों के लिये अंतरित की गई थी।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- न्यायालय ने यह माना कि जब राज्य के स्वयं के अभिलेख अवैधता की पुष्टि करते हैं, तो मामला विवादित तथ्यात्मक विवाद नहीं रह जाता है और पूरी तरह से सांविधानिक प्रवर्तन का मामला बन जाता है, न कि केवल तथ्यात्मक निर्णय का।
- न्यायमूर्ति रजनेश ओसवाल ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 226 के अधीन रिट अधिकारिता में विवादित तथ्यों का न्यायनिर्णय करने के विरुद्ध सिद्धांत केवल तभी लागू होता है जब तथ्यों को वास्तव में विद्यमान सामग्री के आधार पर हल नहीं किया जा सकता है - न कि जहाँ आधिकारिक स्वीकृति और सीमांकन रिपोर्ट सभी अस्पष्टता को दूर कर देती हैं।
- न्यायालय ने राज्य की विलंब और असावधानी की दलील को खारिज कर दिया और दृढ़ता से निर्णय दिया कि संपत्ति के अधिकारों के विधिविरुद्ध हनन को उचित ठहराने के लिये इस सिद्धांत का सहारा नहीं लिया जा सकता है।
- उच्चतम न्यायालय के कई निर्णयों पर विश्वास करते हुए, न्यायालय ने दोहराया कि संपत्ति का अधिकार, यद्यपि अब मौलिक अधिकार नहीं है, फिर भी एक सांविधानिक और मानवाधिकार बना हुआ है जो पूर्ण न्यायिक संरक्षण का हकदार है।
- न्यायालय ने सलाह दी कि केवल विलंब के आधार पर याचिका को खारिज करना राज्य की अवैधताओं को क्षमा करने के समान होगा, जिसकी अनुमति सांविधानिक अधिकारिता वाले किसी भी न्यायालय को नहीं देनी चाहिये।
- उच्च न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि SICOP और SIDCO द्वारा याचिकाकर्त्ताओं की भूमि पर कब्जा करना अतिक्रमण से कम नहीं था, और राज्य प्रशासनिक बल या नौकरशाही की निष्क्रियता के माध्यम से निजी संपत्ति को जब्त नहीं कर सकता है।
- न्यायालय ने SICOP और SIDCO सहित प्रत्यर्थियों को निदेश दिया कि वे या तो तीन महीने के भीतर याचिकाकर्त्ताओं को भूमि का कब्जा वापस सौंप दें, या उसी अवधि के भीतर उचित प्रतिकर और भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में पारदर्शिता के अधिकार अधिनियम, 2013 के अधीन अधिग्रहण की कार्यवाही शुरू करें।
भारत के संविधान का अनुच्छेद 226 क्या है?
बारे में:
- अनुच्छेद 226 संविधान के भाग 5 के अंतर्गत निहित है, जो उच्च न्यायालय को रिट जारी करने की शक्ति प्रदान करता है।
- भारत के संविधान के अनुच्छेद 226(1) में कहा गया है कि प्रत्येक उच्च न्यायालय को उन राज्यक्षेत्रों में सर्वत्र, जिनके संबंध में वह अपनी अधिकारिता का प्रयोग करता है,भाग 3 द्वारा प्रदत्त अधिकारों में से किसी को प्रवर्तित कराने के लिये और किसी अन्य प्रयोजन के लिये उन राज्यक्षेत्रों के भीतर किसी व्यक्ति या प्राधिकारी को या समुचित मामलों में किसी सरकार को ऐसे निदेश, आदेश या रिट जिनके अंतर्गत बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, अधिकार-पृच्छा और उत्प्रेषण रिट हैं, या उनमें से कोई निकालने की शक्ति होगी।
- अनुच्छेद 226(2) में कहा गया है कि उच्च न्यायालय को किसी भी व्यक्ति, सरकार या प्राधिकारी को रिट या आदेश जारी करने का अधिकार है।
- जो इसके अधिकारिता के भीतर स्थित या
- यदि वादहेतुक पूर्णतः या भागतः उत्पन्न होता है, अधिकारिता का प्रयोग करने वाले किसी उच्च न्यायालय द्वारा भी, इस बात के होते हुए भी किया जा सकेगा कि ऐसी सरकार या प्राधिकारी का स्थान या ऐसे व्यक्ति का निवास-स्थान उन राज्यक्षेत्रों के भीतर नहीं है।
- अनुच्छेद 226(3) में कहा गया है कि जब किसी पक्षकार के विरुद्ध उच्च न्यायालय द्वारा व्यादेश, स्थगन या अन्य माध्यमों से अंतरिम आदेश पारित किया जाता है, तो वह पक्ष न्यायालय में ऐसे आदेश को रद्द करने के लिये आवेदन कर सकता है और न्यायालय द्वारा ऐसे आवेदन का निपटारा दो सप्ताह की अवधि के भीतर किया जाना चाहिये।
- अनुच्छेद 226(4) कहता है कि इस अनुच्छेद द्वारा उच्च न्यायालय को दी गई शक्ति अनुच्छेद 32 के खण्ड (2) द्वारा उच्चतम न्यायालय को दी गई शक्ति को कम नहीं करेगी।
- यह अनुच्छेद सरकार सहित किसी भी व्यक्ति या प्राधिकारी के विरुद्ध जारी किया जा सकता है।
- यह मात्र एक सांविधानिक अधिकार है, मौलिक अधिकार नहीं, और आपातकाल के दौरान भी इसे निलंबित नहीं किया जा सकता है।
- अनुच्छेद 226 मौलिक अधिकारों के मामले में अनिवार्य प्रकृति का है और जब इसे "किसी अन्य प्रयोजन" के लिये जारी किया जाता है तो विवेकाधीन प्रकृति का होता है।
- यह न केवल मौलिक अधिकारों को अपितु अन्य विधिक अधिकारों को भी लागू करता है।
अनुच्छेद 226 के अधीन उपलब्ध रिट याचिकाएँ:
- बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका:
- यह एक लैटिन वाक्यांश है जिसका अर्थ है “शरीर प्रस्तुत करो” अथवा “व्यक्ति को न्यायालय के समक्ष उपस्थित करो।
- यह सबसे अधिक प्रयोग किये जाने वाली याचिका है।
- जब किसी व्यक्ति को सरकार द्वारा सदोष रूप से निरोध में लिया जाता है, तो वह व्यक्ति, या उसका परिवार या मित्र, उस व्यक्ति को छोड़ने के लिये बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर कर सकते हैं।
- परमादेश (Mandamus) याचिका:
- यह एक लैटिन वाक्यांश है जिसका अनुवाद 'हम आदेश देते हैं' होता है।
- परमादेश एक न्यायिक आदेश है जो सभी लोक अधिकारियों को लोक कर्त्तव्य निर्वहन हेतु किया जाता है।
- इसका प्रयोग सांविधानिक, सांविधिक, असांविधिक, विश्वविद्यालयों, न्यायालयों और अन्य निकायों द्वारा लोक कर्त्तव्यों के निष्पादन के लिये किया जाता है।
- इस रिट का प्रयोग करने की एकमात्र शर्त यह है कि लोक कर्त्तव्य होना चाहिये।
- उत्प्रेषण (Certiorari) याचिका:
- यह एक लैटिन वाक्यांश है जिसका अर्थ है ' सूचित होना'।
- यह उच्च न्यायालय द्वारा अधीनस्थ न्यायालय को जारी किया गया एक आदेश या निदेश है।
- यह तब जारी की जाती है जब अधीनस्थ न्यायालय प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन करते हैं।
- यदि उच्च न्यायालय को अधीनस्थ न्यायालय द्वारा दिये गए आदेश में कोई त्रुटि मिलती है, तो वह उसे रद्द कर सकता है।
- प्रतिषेध (Prohibition) याचिका:
- इसका शाब्दिक अर्थ है — “रोकना”।
- यह रिट उच्च न्यायालय द्वारा अधीनस्थ न्यायालयों, अधिकरणों अथवा अर्ध-न्यायिक निकायों के विरुद्ध तब जारी की जाती है, जब वे अपनी अधिकारिता से परे कार्य कर रहे हों या विधि-विरुद्ध कार्यवाही कर रहे हों।
- अधिकार-पृच्छा (Quo Warranto) याचिका:
- अधिकार-पृच्छा शब्द का अर्थ है 'किस अधिकार से'।
- यह किसी निजी व्यक्ति के विरुद्ध उस अधिकार के अधीन जारी की जाती है जिसके अधीन वह ऐसे पद पर आसीन है जिस पर उसे कोई अधिकार नहीं है।
- इस रिट के माध्यम से न्यायालय लोक अधिकारियों की नियुक्ति को नियंत्रित कर सकता है और किसी नागरिक को उस लोक पद से वंचित होने से बचा सकता है जिसका वह हकदार हो सकता है।
विधिक निर्णय:
- बंधुआ मुक्ति मोर्चा बनाम भारत संघ (1984) के मामले में, उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि अनुच्छेद 226 का दायरा अनुच्छेद 32 की तुलना में कहीं अधिक व्यापक है क्योंकि अनुच्छेद 226 को विधिक अधिकारों की रक्षा के लिये भी जारी किया जा सकता है।
- कॉमन कॉज बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2018) के मामले में, उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि लोक प्राधिकारियों द्वारा लोक उत्तरदायित्त्व के प्रवर्तन के लिये अनुच्छेद 226 के अधीन रिट भी जारी की जा सकती है।
सांविधानिक विधि
राज्य द्वारा आयोजित मंदिर उत्सवों में जातिगत नामों का स्थायीकरण नहीं किया जा सकता
20-Feb-2026
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एन. समरन बनाम आयुक्त और अन्य "देश में प्रत्येक प्राधिकारी का प्रयास केवल जाति व्यवस्था का उन्मूलन होना चाहिये, न कि उसे स्थिर रखना ।" न्यायमूर्ति भरत चक्रवर्ती |
स्रोत: मद्रास उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति भरत चक्रवर्ती ने एन समरन बनाम आयुक्त और अन्य (2026) के मामले में टिप्पणी की कि हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती (HR&CE) विभाग के माध्यम से राज्य द्वारा आयोजित मंदिर उत्सवों को उत्सव के निमंत्रणों में जाति के नामों का प्रमुखता से विज्ञापन करके जाति को स्थापित रखने की अनुमति नहीं दी जा सकती है।
एन. समरान बनाम कमिश्नर और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- एन. समरन द्वारा दायर याचिका में हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती (HR&CE) के आयुक्त, संयुक्त आयुक्त और अरुलमिगु कंधासामी थिरुकोविल के कार्यकारी अधिकारी को आगामी मंदिर उत्सव के निमंत्रण पत्रों में जातिगत नामों के उपयोग पर रोक लगाने के निदेश देने की मांग की गई थी।
- याचिकाकर्त्ता ने इसके अतिरिक्त यह निदेश देने की भी मांग की कि केवल कार्यकारी अधिकारी द्वारा अधिकृत व्यक्तियों को ही "श्री पद्मथांगी" के रूप में जुलूस के दौरान मूर्ति ले जाने की अनुमति दी जाए।
- जब इस मामले पर सुनवाई हुई, तो राज्य ने न्यायालय को सूचित किया कि मंदिर स्वयं किसी जाति के नाम का उपयोग नहीं कर रहा था, लेकिन यह स्वीकार किया कि उत्सव के निमंत्रण पत्र में व्यक्तियों के जातिगत नाम मुद्रित किये गए थे।
- राज्य ने यह तर्क दिया कि चूँकि निमंत्रण पत्र पहले ही छप चुके हैं, इसलिये वर्तमान महोत्सव वर्ष के लिये कोई और निदेश जारी नहीं किये जा सकते।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- न्यायालय ने कहा कि जाति केवल लोगों के मन में ही विद्यमान है और जाति की अवधारणा पूरी तरह से जन्म पर आधारित है, जो अकेले ही लोगों को विभाजित करती है।
- न्यायमूर्ति चक्रवर्ती ने इस बात पर बल दिया कि भारत के संविधान का अनुच्छेद 14 समता के सिद्धांत को स्थापित करता है और भारत के गणतंत्र बनने का मूल उद्देश्य सभी के साथ समान व्यवहार करना था।
- न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि यदि कोई ऐसा त्योहार जिसमें सरकारी विभाग, अर्थात् हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती विभाग शामिल है, जाति का प्रचार करने और अपनी जाति का विज्ञापन करने या उस पर गर्व करने के उद्देश्य से आयोजित किया जाता है, तो इसकी अनुमति नहीं दी जा सकती।
- न्यायालय ने निदेश दिया कि आगामी त्योहार से आगे, यदि कोई व्यक्ति अपने नाम के साथ अपनी जाति का नाम जोड़ता है, तो केवल जाति का प्रत्यय हटा दिया जाएगा और निमंत्रण पत्र में केवल नाम ही मुद्रित किया जाएगा।
- न्यायालय ने मामले को मंदिर के लिये खुला छोड़ने की राज्य की प्रार्थना को खारिज कर दिया और उपरोक्त निदेश जारी किया।
- जुलूस के लिये व्यक्तियों की नियुक्ति संबंधी प्रार्थना के संबंध में, न्यायालय ने कहा कि स्वयंसेवक सामान्यत: मूर्ति को ले जाते हैं और सामान्यत: इसे मौके पर ही सक्षम भक्तों द्वारा संभाला जाता है।
- न्यायालय ने मंदिर की शोभायात्राओं के लिये कोई मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तैयार करने से इंकार कर दिया, यह देखते हुए कि इस तरह के सूक्ष्म प्रबंधन से कई समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं और इसे मंदिर का जमीनी स्तर पर प्रबंधन करने वाले व्यक्तियों पर छोड़ देना चाहिये।
भरता के संविधान का अनुच्छेद 14 क्या है?
बारे में:
- भारत के संविधान, 1950 का अनुच्छेद 14 सभी व्यक्तियों को "विधि के समक्ष समता" और "विधियों के समान संरक्षण" के मौलिक अधिकार की पुष्टि करता है।
- पहला वाक्यांश "विधि के समक्ष समता" इंग्लैंड की देन है और दूसरा वाक्यांश "विधियों के समान संरक्षण" अमेरिकी संविधान से लिया गया है।
- समता भारत के संविधान की उद्देशिका में निहित एक प्रमुख सिद्धांत है, जिसे इसके प्राथमिक उद्देश्य के रूप में वर्णित किया गया है।
- यह सभी मनुष्यों के साथ निष्पक्षता और समान व्यवहार करने की एक प्रणाली है।
- यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 15 में उल्लिखित आधारों पर विभेदकारी प्रणाली भी स्थापित करता है।
अवधारणा:
- विधि के समक्ष समता की प्रत्याभूत, डाइसी द्वारा वर्णित विधि के शासन का एक पहलू है।
- रुबिंदर सिंह बनाम भारत संघ (1983) के मामले में यह निर्णय दिया गया था कि विधि का शासन यह मांग करता है कि किसी भी व्यक्ति को कठोर, असभ्य या विभेदकारी व्यवहार के अधीन नहीं किया जाएगा, भले ही इसका उद्देश्य विधि और व्यवस्था की सर्वोपरि आवश्यकताओं को सुनिश्चित करना हो।
- अनुच्छेद 14 का उद्देश्य समान परिस्थितियों वाले व्यक्तियों को प्रदत्त विशेषाधिकारों और अधिरोपित किये गए दायित्त्वों दोनों में समान व्यवहार प्रदान करना है।
- वर्गीकरण मनमाना नहीं अपितु तर्कसंगत होना चाहिये।
- इंदिरा नेहरू गांधी बनाम राज नारायण (1975) के मामले में यह निर्णय दिया दिया गया था कि अनुच्छेद 14 में निहित विधि का शासन भारतीय संविधान की मूल विशेषता है और इसलिये इसे भारत के संविधान के अनुच्छेद 368 के अधीन संविधान में संशोधन द्वारा भी नष्ट नहीं किया जा सकता है।
- अनुच्छेद 14 के अंतर्गत आने वाला संरक्षण नागरिकों और गैर-नागरिकों दोनों पर लागू होता है।
परिभाषाएँ
- अनुच्छेद 14: विधि के समक्ष समता - "राज्य भारत के क्षेत्र के भीतर किसी भी व्यक्ति को विधि के समक्ष समता या विधियों के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा।"
- जेनिंग्स - "विधि के समक्ष समता का अर्थ है कि समान लोगों के बीच विधि समान होनी चाहिये और समान रूप से प्रशासित होनी चाहिये, कि समान लोगों के साथ समान व्यवहार किया जाना चाहिये।"
- मुख्य न्यायाधीश पतंजलि शास्त्री ने कहा, “दूसरी अभिव्यक्ति पहली अभिव्यक्ति का परिणाम है और ऐसी स्थिति की कल्पना करना कठिन है जिसमें विधियों के समान संरक्षण का उल्लंघन विधि के समक्ष समता का उल्लंघन न हो। इस प्रकार, सार रूप में दोनों अभिव्यक्तियों का अर्थ एक ही है।”
अपवाद
- अनुच्छेद 361क संसद सदस्यों (MP) और राज्य विधान सभा सदस्यों (MLA) को सत्र के दौरान किसी भी न्यायालय के समक्ष उपस्थित न होने का विशेष विशेषाधिकार प्रदान करता है।
- अनुच्छेद 105 और 194 विधायकों और सांसदों को उनके भाषणों और विचारों के लिये न्यायालय के समक्ष जवाबदेह होने से रोकते हैं।
- अनुच्छेद 361 के अधीन राष्ट्रपति और राज्यपालों को अपने कर्त्तव्यों और शक्तियों के क्रियान्वयन के संबंध में किसी भी न्यायालय के प्रति उत्तरदायी न होने का विशेषाधिकार प्राप्त है।
- अनुच्छेद 361 के अधीन उपर्युक्त अधिकारियों को उनके कार्यकाल के दौरान किसी भी प्रकार की गिरफ्तारी से छूट प्राप्त है।
- राष्ट्रपति और राज्यों के राज्यपालों के विरुद्ध कोई भी आपराधिक मामला दर्ज नहीं किया जा सकता है।
- राष्ट्रपति और राज्यपालों के विरुद्ध कोई भी सिविल कार्यवाही 2 महीने की पूर्व सूचना के बाद ही शुरू की जा सकती है।
- अनुच्छेद 31ग, अनुच्छेद 14 का अपवाद है। यह उपबंध करता है कि अनुच्छेद 39 के खण्ड (ख) या खण्ड (ग) में निहित नीति निदेशक तत्त्वों को लागू करने के लिये राज्य द्वारा बनाई गई विधि को इस आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती कि वे अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करते हैं। संजीव कोक मैन्युफैक्चरिंग कंपनी बनाम भारत कुकिंग कोल लिमिटेड (1982) के मामले में यह निर्णय दिया गया था कि, "जहाँ अनुच्छेद 31ग लागू होता है, वहाँ अनुच्छेद 14 लागू नहीं होता"।
- विदेशी शासकों, राजदूतों और राजनयिकों को आपराधिक और सिविल कार्यवाही से छूट प्राप्त है।
- संयुक्त राष्ट्र संगठन और उसकी अभिकरणों को राजनयिक की प्रतिरक्षा प्राप्त है।
उचित वर्गीकरण के लिये परीक्षा
- अनुच्छेद 14 वर्ग विधान को प्रतिबंधित करता है, तथापि, यह विशिष्ट प्रयोजनों की प्राप्ति के लिये विधायिका द्वारा व्यक्तियों, वस्तुओं और संव्यवहार के उचित वर्गीकरण को प्रतिबंधित नहीं करता है।
- पश्चिम बंगाल राज्य बनाम अनवर अली सरकार (1952) के मामले में दो शर्तें निर्धारित की गईं ।
- बोधगम्य भिन्नता का अस्तित्व होना आवश्यक है, जहाँ विधि का अनुप्रयोग प्रत्येक मनुष्य पर सार्वभौमिक नहीं होना चाहिये।
- लागू किये गए भेदभाव राज्य के मूल उद्देश्य के अनुरूप होने चाहिये।
मनमानी का सिद्धांत
- निष्पक्षता और मनमानी एक दूसरे के विपरीत हैं, दोनों अवधारणाओं को एक ही दायरे में नहीं रखा जा सकता है।
- इसलिये, न्यायालय ने मनमानी वाले निर्णयों को सूची से बाहर करके उचित वर्गीकरण की सूची में एक विकास लाने का प्रयास किया।
- यह सिद्धांत पी. रायप्पा बनाम तमिलनाडु राज्य (1973) के मामले में प्रतिपादित किया गया था, जहाँ पीठ ने समता को एक गतिशील अवधारणा बताया और कहा कि उचित वर्गीकरण के दायरे को मनमानी के उपयोग से परिवर्तित नहीं नहीं जा सकता है।
- इस सिद्धांत को बाद में मेनका गांधी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (1978) और आर.डी. शेट्टी बनाम इंटरनेशनल एयरपोर्ट अथॉरिटी (1979) के मामलों में लागू किया गया, जिसमें न्यायालयों ने राय दी कि मनमानी का तात्पर्य समता से वंचित करना है।
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