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करेंट अफेयर्स और संग्रह

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आपराधिक कानून

मृतक के भाई का पीड़ित के रूप में समावेश करना

 24-Feb-2026

मनोज कुमार बनाम बिहार राज्य 

"मृत विवाहित महिला का भाई आपराधिक मामले/अपील में पैरवी करने के उद्देश्य से मृतक पीड़िता का विधिक उत्तराधिकारी होता हैऔर इस प्रकारउसे पीड़िता माना जाता है।" 

न्यायमूर्ति बिबेक चौधरी और न्यायमूर्ति डॉ.अंशुमान 

स्रोत: पटना उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

पटना उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति बिबेक चौधरी और न्यायमूर्ति डॉ. अंशुमन की खंडपीठ नेमनोज कुमार बनाम बिहार राज्य (2025) के मामले में यह निर्णय दिया कि मृतक महिला का भाईदण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 2(बक) ( भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 2(1)()) के अर्थ में "पीड़ित" की श्रेणी में आताहै और मृतक की हत्या के लिये दोषी द्वारा दायर अपील सहित आपराधिक कार्यवाही में भाग लेने का हकदार है। 

मनोज कुमार बनाम बिहार राज्य (2025) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • मृतक महिला विवाहित थी और गोली लगने से उसकी मृत्यु हो गई। उसके पति ने पहले परिवाद दायर कियातत्पश्चात् शेखपुरा पुलिस थाने में धारा 307 भारतीय दण्ड संहिता और धारा 27 आयुध अधिनियम के अधीन मामला संख्या 657/2023 दर्ज किया गया। 
  • पीड़िता की मृत्यु के बादमामले में भारतीय दण्ड संहिता की धारा 302 जोड़ी गई। अन्वेषण के दौरानपुलिस को पता चला कि पति ने स्वयं अपनी पत्नी को गोली मारी थी। तदनुसारउसके विरुद्ध आरोपपत्र दाखिल किया गया। 
  • तत्पश्चात् पति को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 302 और आयुध अधिनियम की धारा 27 के अधीन दोषसिद्ध ठहराया गया और अगस्त 2025 के निर्णय द्वारा उसे आजीवन कारावास का दण्ड दिया गया 
  • पटना उच्च न्यायालय में दोषी पति द्वारा दायर अपील के लंबित रहने के दौरानमृतक के भाई ने आपराधिक अपील में प्रत्यर्थी संख्या के रूप में सम्मिलित किये जाने की मांग करते हुए एक हस्तक्षेप आवेदन दायर किया। 
  • अपीलकर्त्ता-पति ने आवेदन का विरोध करते हुए तर्क दिया कि मृतक के भाई को दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 2(बक) के अधीन "पीड़ित" नहीं माना जा सकता। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • न्यायालय ने दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 2(बक) के अंतर्गत "पीड़ित" की परिभाषा को दोहरायाजो इस प्रकार है - "पीड़ित से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जिसे उस कार्य या लोप के कारण कोई हानि या क्षति कारित हुई है जिसके लिये अभियुक्त व्यक्ति पर आरोप लगाया गया है और "पीड़ित" पद के अंतर्गत उसका संरक्षक या विधिक वारिस भी है।" 
  • न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यद्यपि मृतक के भाई को उसका "संरक्षक" नहीं माना जा सकता - क्योंकि विवाहित महिला के मामले मेंपति को सामान्यत: संरक्षक माना जाता है - फिर भी भाईधारा 2(बक) के अर्थ में उसका "विधिक उत्तराधिकारी" है। 
  • हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 के प्रावधानों का हवाला देते हुएजो एक हिंदू महिला की संपत्ति के उत्तराधिकार को नियंत्रित करता हैन्यायालय ने माना कि भाई अधिनियम की धारा 15 की उपधारा (1) के खण्ड (घ) के अधीन विधिक उत्तराधिकारी की श्रेणी में आता है।  
  • न्यायालय ने कहा: "एक विवाहित महिला को अपने पिता की संपत्ति पर अधिकार होता है और हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 15 की उपधारा के खण्ड (घ) के अनुसार एक हिंदू महिला का भाई विधिक उत्तराधिकारी की श्रेणी में आता है। इस स्थिति मेंमृतक विवाहित महिला का भाई आपराधिक मामले/अपील में पैरवी करने के उद्देश्य से मृतक पीड़िता का विधिक उत्तराधिकारी हैऔर इस प्रकारहमारी राय मेंउसे पीड़ित माना जाता है।" 
  • न्यायालय ने तदनुसार हस्तक्षेप आवेदन को मंजूर कर लिया और निदेश दिया कि मृतक के भाई को दाण्डिक अपील में प्रत्यर्थी संख्या के रूप में सम्मिलित किया जाए। 

पीड़ित से संबंधित विधिक उपबंध क्या हैं? 

पीड़ित की परिभाषा: 

  • दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 2(बक)के अधीनपीड़ित को ऐसे व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया गया है जिसे उस कार्य या लोप के कारण कोई हानि या क्षति कारित हुई है जिसके लिये अभियुक्त व्यक्ति पर आरोप लगाया गया है और "पीड़ित" पद के अंतर्गत उसका संरक्षक या विधिक वारिस भी है 
  • दण्ड प्रक्रिया संहिता में "पीड़ित" शब्द को पहली बार दण्ड प्रक्रिया संहिता संशोधन अधिनियम, 2008 द्वारा परिभाषित किया गया था।  
  • जब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता ने दण्ड प्रक्रिया संहिता का स्थान लियातो भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता कीधारा 2(1)(म) के अधीन परिभाषा कोभाषा में एक सूक्ष्म किंतु महत्त्वपूर्ण परिवर्तन के साथ आगे बढ़ाया गया - "जिसके लिये अभियुक्त व्यक्ति पर आरोप लगाया गया है" और "पीड़ित" अभिव्यक्ति को "अभियुक्त व्यक्ति का" से परिवर्तित कर दिया गयाजिससे परिभाषा इस प्रकार हो गई कि "पीड़ित से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जिसे अभियुक्त के कार्य या लोप के कारण कोई हानि या क्षति कारित हुई है और इसके अंतर्गत ऐसे पीड़ित का संरक्षक या विधिक वारिस भी है। 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन पीड़ित अधिकार, 2023: 

  • अभियोजन पक्ष की सहायता के लिये एक निजी अधिवक्ता नियुक्त किया जा सकता है (धारा 18(8) भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता), तथापि अधिवक्ता की भूमिका साक्ष्य के बाद लिखित तर्कों तक सीमित हैजब तक कि न्यायालय अधिक की अनुमति न दे। 
  • प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज होने के तुरंत बाद उसकी एक निःशुल्क प्रति प्राप्त करने का अधिकार (धारा 173 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता)। 
  • लैंगिक अपराधों और कुछ अन्य अपराधों के पीड़ितों के कथन एक महिला पुलिस अधिकारी द्वारा अभिलिखित किये जाने चाहिये 
  • दिव्यांग पीड़ितों के कथन उनके निवास स्थान या उनकी पसंद के किसी स्थान परदुभाषिया या विशेष शिक्षक की उपस्थिति में अभिलिखित किये जाने चाहिये 
  • संसूचना इलेक्ट्रॉनिक रूप से दी जा सकती हैजिसे हस्ताक्षर करने के तीन दिनों के भीतर औपचारिक रूप से अभिलिखित किया जाना चाहिये 
  • यदि पुलिस सूचना दर्ज करने से इंकार करती हैतो पीड़ित पुलिस अधीक्षक से संपर्क कर सकता है या सीधे मजिस्ट्रेट से संपर्क कर सकता है। 
  • यदि पुलिस मामले में समापन/अंतिम रिपोर्ट दाखिल करती है तो इसकी सूचना अवश्य दी जानी चाहिये 
  • न्यायालय पीड़ित के अधिवक्ता को अभियोजन चलाने की अनुमति दे सकता है (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 339 अधीन)। 
  • दोषमुक्तिकम गंभीर अपराध के लिये दोषसिद्धिया अपर्याप्त प्रतिकर के विरुद्ध अपील की जा सकती है (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा धारा 413 अधीन)। 
  • न्यायालय दण्ड देते समय अभियुक्त को पीड़ित को प्रतिकर देने का आदेश दे सकता है (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 395 अधीन); ऐसी कोई भी राशि बाद के दीवानी वादों में समायोजित की जाएगी। 
  • विचारण/जांच की कार्यवाही के लिये पीड़ित के यात्रा और उपस्थिति व्यय की प्रतिपूर्ति का आदेश दिया जा सकता है (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 350 अधीन)। 
  • विनिर्दिष्ट लैंगिक अपराधों के लिये विचारण में पीड़िता की पहचान की सुरक्षा के लिये एक महिला न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट द्वारा बंद कमरे में की जानी चाहिये (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 366 अधीन)। 

भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 के अधीन पीड़ित अधिकार: 

  • न्यायालयों के पास पीड़ितों और साक्षियों से पूछे जाने वाले अभद्रअपमानजनक या क्षुब्ध करने वाले प्रश्नों को प्रतिबंधित करने की शक्ति है (भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 154-155 अधीन)।  

संविधान के अंतर्गत पीड़ित के अधिकार: 

  • अनुच्छेद 21 पीड़ितों को अभियुक्त के समान निष्पक्ष अन्वेषण और निष्पक्ष विचारण का अधिकार सुनिश्चित करता है -निर्मल सिंह कहलोन बनाम पंजाब राज्य (2009) के मामले में इसकी पुष्टि की गई। 
  • अनुच्छेद 14, 21 और 39-क सामूहिक रूप से पीड़ितों के लिये न्याय तक नि:शुल्क और निष्पक्ष पहुँच सुनिश्चित करते हैं -मद्रास उच्च न्यायालय द्वारासत्यवानी पोनरानी बनाम सैमुअल राज (2010) के मामले में यह निर्णय लिया गया। 
  • निष्पक्ष विचारण का अधिकार केवल एक सांविधिक अधिकार नहीं अपितु एक मौलिक और मानवाधिकार हैऔर इसे बाधित करने वाली कोई भी प्रक्रिया अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करती है। 

सिविल कानून

बीमाकर्त्ता नियोजक द्वारा अधिरोपित विलंबित शास्ति के लिये उत्तरदायी नहीं

 24-Feb-2026

न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम रेखा चौधरी और अन्य 

"किसी नियोजक द्वारा अपने कर्मचारी को प्रतिकर के संदाय में विलंब के लिये शास्ति का दायित्त्व बीमा कंपनी पर नहीं थोपा जा सकता है।" 

न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और प्रसन्ना बी. वराले 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और प्रसन्ना बी. वराले की पीठ नेन्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम रेखा चौधरी और अन्य (2026)के मामले में यह निर्णय दिया कि विलंबित प्रतिकर के संदाय के लिये कर्मचारी प्रतिकर अधिनियम, 1923 की धारा 4 (3) (ख) के अधीन शास्ति का दायित्त्व नियोजक का व्यक्तिगत दायित्त्व है और इसेबीमाकर्त्ता पर नहीं थोपा जा सकता है। 

न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम रेखा चौधरी और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • यह मामला एक वाणिज्यिक चालक की मृत्यु से जुड़ा हैजो अपने नियोजक के वाहन को चलाते समय गिर पड़ा था। 
  • मृतक ड्राइवर के विधिक वारिसों ने प्रतिकर की मांग करते हुए कर्मचारी प्रतिकर अधिनियम, 1923 के अधीन आयुक्त से संपर्क किया। 
  • आयुक्त ने 7.36 लाख रुपए का प्रतिकर 12% ब्याज सहित देने का आदेश दिया और संदाय में विलंब के लिये नियोजक को कारण बताओ नोटिस भी जारी किया। 
  • नियोजक द्वारा कारण बताओ नोटिस का जवाब न देने के कारणकर्मचारी प्रतिकर अधिनियम, 1923 की धारा 4(3)(ख) के अधीन नियोजक पर 35% की शास्ति अधिरोपित की 
  • नियोजक का वाहन अपीलकर्त्ता - न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड के पास बीमित था। 
  • यद्यपि बीमा कंपनी ने प्रतिकर की राशि और ब्याज के लिये दायित्त्व स्वीकार कर लियापरंतु उसने शास्ति के रूप राशि का संदाय करने के अपने दायित्त्व का विरोध किया। 
  • तथापिदिल्ली उच्च न्यायालय ने बीमा कंपनी को न केवल प्रतिकर और ब्याज अपितु नियोजक के विलंब के लिये अधिरोपित किये गए शास्ति के रूप राशि का संदाय करने करने का निदेश दियाजिसके बाद न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड ने उच्चतम न्यायालय में अपील की। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • न्यायमूर्ति अरविंद कुमार द्वारा लिखित एक निर्णय मेंपीठ ने यह माना किनियोजक की व्यक्तिगत त्रुटी या उपेक्षा के लिये बीमाकर्त्ता को उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता है। 
  • न्यायालय ने वेद प्रकाश गर्ग बनाम प्रेमी देवी (1997) 8 एससीसी 1 में स्थापित पूर्व निर्णय पर विश्वास कियाजिसमें यह स्थापित किया गया था कि कर्मचारी प्रतिकर अधिनियम, 1923 की धारा 4 (3) (ख) के अधीन अधिरोपित की गई शास्ति का भार केवल नियोजक द्वारा वहन किया जाना चाहिये और इसे बीमा कंपनी पर नहीं डाला जा सकता है। 
  • न्यायालय ने टिप्पणी की कि "जब संविधि ने स्वयं नियोक्ता को एक मास के भीतर संदाय करने के लिये बाध्य किया हैतो ऐसे दायित्त्व को किसी संविदात्मक दायित्त्व के अधीन या सांविधिक दायित्त्व को दरकिनार करने के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता हैक्योंकि यह उक्त उपबंध के अधीन परिकल्पित विधायी आशय की अवहेलना के समान होगा।" 
  • न्यायालय ने आगे कहा कि जब अधिनियम विलंबित संदाय के लिये नियोजक पर सांविधिक दायित्त्व अधिरोपित करता हैतो वह दायित्त्व केवल संविदात्मक बीमा करार के कारण बीमाकर्त्ता को अंतरित नहीं किया जा सकता है। 
  • उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली उच्च न्यायालय के उस आदेश के उस भाग को अपास्त कर दिया जिसमें अपीलकर्त्ता-बीमाकर्त्ता पर शास्ति के रूप में राशि का दायित्त्व तय किया गया थाऔर नियोजक (प्रत्यर्थी संख्या 4) को आदेश की तारीख से आठ सप्ताह के भीतर शास्ति राशि का संदाय करने का निदेश दिया। 
  • तदनुसारन्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड के पक्ष में अपील मंजूर कर ली गई। 

कर्मचारी प्रतिकर अधिनियम, 1923 क्या है? 

बारे में: 

  • कर्मचारी प्रतिकर अधिनियम, 1923 (जिसे पहले कामगार प्रतिकर अधिनियम, 1923 के नाम से जाना जाता था) एक सामाजिक सुरक्षा विधान है जिसे नियोजन के दौरान और उससे उत्पन्न होने वाली दुर्घटनाओं की स्थिति में कर्मचारियों और उनके आश्रितों को प्रतिकर प्रदान करने के लिये बनाया गया है। 
  • यह अधिनियम कार्य संबंधी क्षतियोंविकलांगताओं या मृत्यु की स्थिति में श्रमिकों और उनके परिवारों को वित्तीय संरक्षण प्रदान करने के लिये अधिनियमित किया गया था। 
  • इस अधिनियम में 'आश्रितकी परिभाषा में मृतक कर्मचारी के कुछ ऐसे रिश्तेदारों को सम्मिलित किया गया है जो मृत्यु के समय कर्मचारी की कमाई पर पूर्णतः या भागत: आश्रित थे। 

धारा 4 — शोध्य हो जाने पर प्रतिकर का दिया जाना और व्यतिक्रम के लिये शास्ति: 

मूल नियम (उपधारा 1): 

  • प्रतिकर नियत तारीख पर यथाशीघ्र दिया जाना चाहिये—इसमें कोई विलंब अनुमेय नहीं है। 

विवादित दायित्त्व (उपधारा 2): 

  • यदि नियोजक पूरे दावे पर विवाद करता हैतो भी उसे स्वीकार किये गए अंश के लिये अस्थायी संदाय करना होगा। 
  • यह अस्थायी संदाय आयुक्त को या प्रत्यक्षत: कर्मचारी को किया जाता है। 
  • अस्थायी संदाय करने से कर्मचारी को शेष राशि का दावा करने से रोका नहीं जा सकता। 

व्यतिक्रम एवं परिणाम (उपधारा 3): 

  • यदि नियोजक नियत तिथि से एक मास के भीतर संदाय करने में विफल रहता हैतो आयुक्त निम्नलिखित कार्रवाई करेगा: 
  • (क) ब्याज — नियोजक को निदेश दें कि वह बकाया राशि पर 12% साधारण ब्याज प्रति वर्ष (या केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित किसी भी अनुसूचित बैंक की अधिकतम उधार दर तक) का संदाय करे। 
  • (ख) शास्ति — यदि विलंब का कोई औचित्य नहीं हैतो नियोजक को बकाया राशि के 50% तक का अतिरिक्त शास्ति अधिरोपित करने का निदेश दे सकता है 

किसी भी शास्ति आदेश को पारित करने से पहले नियोजक को कारण बताने का उचित अवसर दिया जाना चाहिये 

ब्याज एवं शास्ति का लाभार्थी (उपधारा 3): 

  • ब्याज और शास्ति दोनों की राशि कर्मचारी या उनके आश्रित को देय हैन कि राज्य को। 

मुख्य निष्कर्ष 

  • व्यतिक्रम होने पर दो स्तरीय परिणाम होते हैं — अनिवार्य ब्याज + विवेकाधीन शास्ति — और इन दोनों का भार व्यक्तिगत रूप से नियोजक पर पड़ता हैन कि किसी बीमाकर्त्ता पर।