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आपराधिक कानून
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 183
02-Mar-2026
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"यह शक्ति कोई नियमित या स्वचालित शक्ति नहीं है, अपितु प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने, न्याय के उद्देश्यों को सुरक्षित करने या गंभीर प्रक्रियात्मक अनियमितताओं को दूर करने के लिये उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय द्वारा प्रयोग की जाती है, जिससे न्याय का उल्लंघन हो सकता है।" न्यायमूर्ति राजीव गुप्ता और न्यायमूर्ति अचल सचदेव |
स्रोत: इलाहाबाद उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
न्यायमूर्ति राजीव गुप्ता और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने कीर्ति वर्मा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2026) के मामले में निर्णय दिया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 183 के अधीन मजिस्ट्रेट के समक्ष कथन को पुन:अभिलिखित करने के निदेश केवल असाधारण परिस्थितियों में ही जारी किये जा सकते हैं। न्यायालय ने सामूहिक बलात्संग की पीड़िता द्वारा दायर उस रिट याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने अपना कथन पुन: अभिलिखित कराने की मांग की थी, क्योंकि न्यायालय को ऐसा अनुतोष प्रदान करने वाली कोई असाधारण परिस्थितियाँ नहीं मिलीं।
कीर्ति वर्मा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2026) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- याचिकाकर्त्ता सामूहिक बलात्कार की पीड़िता थी, जिसका कथन मजिस्ट्रेट के समक्ष धारा 183 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (पूर्ववर्ती धारा 164 दण्ड प्रक्रिया संहिता के समकक्ष) के अधीन अभिलिखित किया गया था।
- उसने अपना कथन पुन:अभिलिखित कराने के निदेश मांगने के लिये इलाहाबाद उच्च न्यायालय में एक रिट याचिका दायर की।
- उसका मुख्य तर्क यह था कि मजिस्ट्रेट द्वारा कथन को सही ढंग से अभिलिखित नहीं किया गया था और इसे अभिलिखित करना धारा 183 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के स्पष्ट उपबंधों का घोर उल्लंघन था।
- उसने आगे अभिकथित किया कि कथन उसे पढ़कर नहीं सुनाया गया और न ही उसे इसकी सत्यता की पुष्टि करने का अवसर दिया गया।
- मुख्य विवाद्यक:
- क्या उच्च न्यायालय, अपनी असाधारण अधिकारिता का प्रयोग करते हुए, धारा 183 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन पीड़िता के कथन को पुन:अभिलिखित करने का निदेश दे सकता है, और यदि हाँ, तो किन परिस्थितियों में?
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 183 का उद्देश्य:
- न्यायालय ने पाया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 183 का प्राथमिक उद्देश्य आपराधिक अन्वेषण के दौरान संस्वीकृति और कथन अभिलिखित करने के लिये एक सुरक्षित, स्वैच्छिक और न्यायिक रूप से पर्यवेक्षित तंत्र प्रदान करना है।
बार-बार अभिलेखन हेतु कोई सांविधिक अनिवार्यता नहीं है:
- न्यायालय ने माना कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 183 में बार-बार अभिलेखन को एक मानक प्रक्रिया के रूप में परिकल्पित या अधिकृत नहीं किया गया है।
इसमें कहा गया है: "इसका उद्देश्य एक विश्वसनीय, स्वैच्छिक कथन/संस्वीकृति को एक बार अभिलिखित करना है... धारा 183 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन एक ही व्यक्ति के कथन को कई बार अभिलिखित करने का कोई सांविधिक उपबंध नहीं है। धारा 180 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (पुरानी धारा 161 दण्ड प्रक्रिया संहिता) के अधीन पुलिस कथन अन्वेषण के दौरान आवश्यकता पड़ने पर कई बार अभिलिखित किये जा सकते हैं, परंतु धारा 183 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन मजिस्ट्रेट के कथन अपवाद हैं और इनका उद्देश्य साक्ष्य को उच्च विश्वसनीयता के साथ संरक्षित करना है।"
कब पुनः अभिलेखन का निदेश दिया जा सकता है:
न्यायालय ने उन विशिष्ट असाधारण परिस्थितियों का उल्लेख किया है जिनमें एक नए अभिलेखन का निदेश दिया जा सकता है:
- जहाँ कथित तौर पर पूर्व कथन दबाव में या स्वेच्छया से नहीं दिया गया था।
- जहाँ कथन गलत तरीके से अभिलिखित किया गया था।
- जहाँ निष्पक्षता के लिये नए महत्त्वपूर्ण तथ्यों, पक्षद्रोही साक्षी, या गंभीर प्रक्रियात्मक चूक के कारण पुनः अभिलेखन की आवश्यकता हो।
- जहाँ मूल कथन की सत्यनिष्ठा गंभीर रूप से खतरे में पड़ जाती है, विशेषकर लैंगिक अपराधों या लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण (POCSO) मामलों जैसे संवेदनशील मामलों में।
- जहाँ पीड़िता का दावा है कि कथन उसे पढ़कर नहीं सुनाया गया, वहाँ प्रक्रियात्मक अनुपालन के बारे में गंभीर प्रश्न उठते हैं।
शक्ति का प्रयोग नियमित रूप से नहीं किया जाना चाहिये:
- यद्यपि, न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि इस शक्ति का प्रयोग सामान्य नियम के रूप में नहीं किया जा सकता है।
- इसमें कहा गया है, "उच्च न्यायालय अपनी असाधारण अधिकारिता का प्रयोग करते हुए, यदि अन्याय को दूर करने के लिये उचित हो, तो धारा 183 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन द्वितीय कथन अभिलिखित करने के निदेश जारी कर सकता है, परंतु इसका प्रयोग सामान्य नियम के रूप में नहीं किया जा सकता है जहाँ पीड़िता का आरोप है कि धारा 183 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन अभिलिखित किया गया उसका कथन उसे पढ़कर नहीं सुनाया गया था या उसे इसकी सत्यता की पुष्टि करने का अवसर नहीं दिया गया था।"
तथ्यों पर आधारित निष्कर्ष:
- पीड़िता के पूर्व कथन की जांच करने पर न्यायालय ने पाया कि कथन स्पष्ट रूप से बिना किसी दबाव के दिया गया था, याचिकाकर्त्ता ने स्वयं कथन पढ़ा था और तत्पश्चात् उस पर हस्ताक्षर किये थे। सभी प्रक्रियात्मक पहलुओं का पालन किया गया था।
- कोई असाधारण परिस्थिति न मिलने पर, जिसके कारण पुनः अभिलिखित करने की आवश्यकता हो, न्यायालय ने रिट याचिका खारिज कर दी।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 183 क्या है?
बारे में:
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 183 संस्वीकृतियों और कथनों को अभिलिखित करने से संबंधित है।
- यह धारा दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 164 के अनुरूप है।
कौन अभिलिखित कर सकता है:
- उस जिले का कोई मजिस्ट्रेट, जिसमें किसी अपराध के किये जाने के बारे में इत्तिला रजिस्ट्रीकृत की गई है, चाहे उसे मामले में अधिकारिता हो या न हो।
- तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन जांच के दौरान या जांच/विचारण के प्रारंभ से पूर्व इसे अभिलिखित किया जा सकता है।
- किसी पुलिस अधिकारी द्वारा, जिसे तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन मजिस्ट्रेट की कोई शक्ति प्रदत्त की गई है. कोई संस्वीकृति अभिलिखित नहीं की जाएगी।
अभिलिखित करने की रीति:
- कोई संस्वीकृति या कथन अपराध के अभियुक्त व्यक्ति के अधिवक्ता की उपस्थिति में श्रव्य दृश्य इलैक्ट्रॉनिक साधनों के माध्यम से भी अभिलिखित किया जा सकेगा।
संस्वीकृति अभिलिखित करने से पूर्व बरती जाने वाली सावधानियाँ:
- मजिस्ट्रेट को यह स्पष्ट करना होगा कि व्यक्ति अपराध स्वीकार करने के लिये बाध्य नहीं है।
- यह चेतावनी देना आवश्यक है कि संस्वीकृति को उसके विरुद्ध सबूत के तौर पर प्रयोग किया जा सकता है।
- यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि इकबालिया बयान स्वेच्छा से दिया गया हो।
- यदि व्यक्ति किसी भी समय अपराध संस्वीकृत करने से इंकार करता है, तो मजिस्ट्रेट पुलिस अभिरक्षा को अधिकृत नहीं कर सकता है।
प्रक्रियात्मक आवश्यकताएँ:
- धारा 316 (अभियुक्त की परीक्षा) के अनुसार इसे अभिलिखित किया जाना चाहिये।
- संस्वीकृति करने वाले व्यक्ति द्वारा इस पर हस्ताक्षर किये जाने चाहिये।
- मजिस्ट्रेट को स्वैच्छिकता, उपस्थिति और सत्यता को प्रमाणित करने वाला एक ज्ञापन संलग्न करना होगा।
कथनों को अभिलिखित करना (असंस्वीकृति):
- परिस्थितियों के अनुकूल सर्वोत्तम तरीके से अभिलिखित किया जाता है।
- मजिस्ट्रेट को शपथ दिलाने का अधिकार है।
लैंगिक अपराध पीड़ितों के लिये विशेष उपबंध:
- यह उपबंध भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 64-79 और 124 के अंतर्गत आने वाले अपराधों पर लागू होता है।
- अपराध की सूचना पुलिस को मिलते ही कथन अभिलिखित किया जाना चाहिये।
- इसे अधिमानतः एक महिला मजिस्ट्रेट द्वारा अभिलिखित किया जाना चाहिये; यदि वह उपलब्ध न हो, तो एक पुरुष मजिस्ट्रेट द्वारा एक महिला की उपस्थिति में अभिलिखित किया जाना चाहिये।
- ऐसे अपराध से संबंधित मामले में जो दस वर्ष या उससे अधिक कारावास से या आजीवन या मृत्युदण्ड से दण्डनीय है, मजिस्ट्रेट पुलिस अधिकारी द्वारा उसके समक्ष लाए गए साक्ष्य के कथन को अभिलिखित आवश्यक है।
- यदि कथन करने वाला व्यक्ति अस्थायी या स्थायी रूप से मानसिक या शारीरिक रूप से निःशक्त है, तो मजिस्ट्रेट कथन अभिलिखित करने में किसी द्विभाषिए या विशेष प्रबोधक की सहायता लेगा।
- इस तरह के कथन को मुख्य परीक्षा के रूप में माना जाता है, ऐसा कथन करने वाले की, विचारण के समय उसको अभिलिखित करने की आवश्यकता के बिना, ऐसे कथन पर प्रतिपरीक्षा की जा सकेगी।
अभिलेख को अग्रेषित करना:
- अभिलिखित की गई संस्वीकृति या कथन उस मजिस्ट्रेट को भेजा जाना चाहिये जो मामले की जांच करेगा या विचारण करेगा।
आपराधिक कानून
किसी लड़की को आत्महत्या की धमकी देना व्यपहरण माना जाता है
02-Mar-2026
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"अपीलार्थी ने आत्महत्या करने की धमकी देकर पीड़िता को भावनात्मक दबाव एवं प्रपीड़न के अधीन रखा, जिससे उसकी मानसिक स्थिति प्रभावित हुई और उक्त मानसिक दबाव उसके मन पर इस प्रकार प्रभावी रहा कि उसने घर छोड़ने का निर्णय लिया।" न्यायमूर्ति श्रीराम शिरसात |
स्रोत: बॉम्बे उच्च न्यायालय (गोवा बेंच)
चर्चा में क्यों?
बॉम्बे उच्च न्यायालय की गोवा खंडपीठ के न्यायमूर्ति श्रीराम शिरसात ने शोभित कुमार बनाम स्टेट (2026) के मामले में निर्णय दिया कि किसी अवयस्क लड़की के साथ न जाने पर आत्महत्या करने की धमकी देना भारतीय दण्ड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 363 के अधीन "प्रलोभन" माना जाता है।
- न्यायालय ने भारतीय दण्ड संहिता की धारा 363 (व्यपहरण), धारा 376 (बलात्संग) और और लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम के संबंधित प्रावधानों के अधीन उनकी दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए, फास्ट ट्रैक कोर्ट द्वारा दिये गए 10 वर्ष के कारावास के दण्ड की पुष्टि की।
शोभित कुमार बनाम राज्य (2026) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- पीड़िता गोवा के पणजी में रहने वाली 16 वर्षीय लड़की थी।
- 32 वर्षीय अभियुक्त ने उसे 11 दिसंबर, 2021 को पणजी बस स्टैंड पर मिलने के लिये कहा था।
- उसने धमकी दी कि यदि वह नहीं आई तो वह आत्महत्या कर लेगा।
- पीड़िता को भय था कि वह स्वयं को नुकसान पहुँचा सकता है, इसलिये उसने अपने संरक्षक की जानकारी या सम्मति के बिना अपना घर छोड़ दिया।
- तत्पश्चात् अभियुक्त उसे अहमदाबाद ले गया, जहाँ उसके लिये एक किराए का कमरा बुक किया गया था।
- 3 जनवरी, 2022 को पीड़िता ने अपनी माता को फोन किया और बताया कि अभियुक्त ने कई बार उसके साथ मैथुन किया और वह घर लौटना चाहती है।
- पुलिस ने अभियुक्त को गिरफ्तार कर लिया और एक फास्ट ट्रैक कोर्ट ने उसे जुर्माने सहित 10 वर्ष के कारावास का दण्ड दिया।
- अभियुक्त ने बॉम्बे उच्च न्यायालय में अपनी दोषसिद्धि को चुनौती दी।
- मुख्य विवाद्यक:
- क्या किसी अवयस्क लड़की को आत्महत्या की धमकी देकर उसे उसके संरक्षक की अभिरक्षा छोड़ने के लिये विवश करना भारतीय दण्ड संहिता की धारा 363 के अधीन "प्रलोभन" माना जाता है, जिससे व्यपहरण के अपराध का गठन होता है?
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
प्रलोभन के रूप में आत्महत्या की धमकी:
- न्यायमूर्ति शिरसात ने माना कि अभियुक्त द्वारा पीड़िता को अपने साथ न ले जाने पर आत्महत्या करने की धमकी देना जानबूझकर उकसाने और बहकाने का कृत्य था। पीड़िता अपनी मर्जी से घर से नहीं निकली, अपितु अभियुक्त द्वारा उसके मन में उत्पन्न किये गए प्रपीड़न के कारण निकली थी।
- न्यायालय ने टिप्पणी की कि अभियोजन पक्ष के लिये यह साबित करना आवश्यक नहीं था कि अभियुक्त ने पीड़िता को जबरदस्ती हटाया था - यह साबित करना ही पर्याप्त था कि उस पर डाले गए प्रभाव के कारण उसे जाने के लिये विवश किया गया था।
व्यपहरण के लिये पर्याप्त भावनात्मक दबाव:
- न्यायालय ने माना कि प्रलोभन देने के लिये शारीरिक बल का प्रयोग आवश्यक नहीं है। भावनात्मक छलयोजना—जिसमें भय उत्पन्न करने या कार्रवाई के लिये विवश करने वाली धमकियाँ सम्मिलित हैं—धारा 363 भारतीय दण्ड संहिता के अधीन प्रलोभन साबित करने के लिये पर्याप्त है।
पीड़ित का परिसाक्ष्य विश्वसनीय पाया गया:
- न्यायमूर्ति शिरसात ने पीड़िता के परिसाक्ष्य को विश्वसनीय और भरोसेमंद पाया। उसके कथन से स्पष्ट रूप से यह साबित हुआ कि उसने अपनी माता की अभिरक्षा केवल इसलिये छोड़ी थी क्योंकि उसे भय था कि अभियुक्त स्वयं को नुकसान कारित कर सकता है।
दोषसिद्धि बरकरार:
- न्यायालय ने निर्णय दिया कि अभियोजन पक्ष ने अपने मामले को संदेह से परे साबित कर दिया है और भारतीय दण्ड संहिता की धारा 363, भारतीय दण्ड संहिता की धारा 376 और लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम के अधीन दोषसिद्धि को बरकरार रखा है।
भारतीय न्याय संहिता, 2023 के अंतर्गत व्यपहरण क्या है?
बारे में:
- भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 137 अपहरण के अपराध से संबंधित है। इसमें कहा गया है कि-
(1) व्यपहरण दो किस्म का होता है: भारत में से व्यपहरण और विधिपूर्ण संरक्षकता में से व्यपहरण––
(क) जो कोई किसी व्यक्ति का उस व्यक्ति की, या उस व्यक्ति की ओर से सम्मति देने के लिये वैध रूप से प्राधिकृत किसी व्यक्ति की सम्मति के बिना, भारत की सीमाओं से परे प्रवहण कर देता है, वह भारत में से उस व्यक्ति का व्यपहरण करता है, यह कहा जाता है।
(ख) जो कोई किसी बालक को या किसी विकृत चित्त व्यक्ति को, ऐसे बालक या विकृत चित्त व्यक्ति के विधिपूर्ण संरक्षक की संरक्षकता में से ऐसे संरक्षक की सम्मति के बिना ले जाता है या बहका ले जाता है, वह ऐसे बालक या ऐसे व्यक्ति का विधिपूर्ण संरक्षकता में से व्यपहरण करता है, यह कहा जाता है।
स्पष्टीकरण - इस खण्ड में "विधिपूर्ण सरंक्षक शब्दों के अंतर्गत ऐसा व्यक्ति आता है, जिस पर ऐसे बालक या अन्य व्यक्ति की देखरेख या अभिरक्षा का भार विधिपूर्वक न्यस्त किया गया है।
अपवाद — इस खण्ड का विस्तार किसी ऐसे व्यक्ति के कार्य पर नहीं है, जिसे सद्भावपूर्वक यह विश्वास है कि वह किसी अधर्मज बालक का पिता है, या जिसे सद्भावपूर्वक यह विश्वास है कि वह ऐसे बालक की विधिपूर्ण अभिरक्षा का हकदार है, जब तक कि ऐसा कार्य दुराचारिक या विधिविरुद्ध प्रयोजन के लिये न किया जाए।
(2) जो कोई भारत में से या विधिपूर्ण संरक्षकता में से किसी व्यक्ति का व्यपहरण करेगा, वह दोनों में से किसी भाँति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने का भी दायी होगा।
भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 64 क्या है?
- भारतीय न्याय संहिता की धारा 64 बलात्संग के लिये दण्ड का उपबंध करती है।
- इससे पूर्व इस मामले को भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 376 के अधीन निपटाया जाता था।
- धारा 64(1) बलात्संग के लिये साधारण दण्ड के रूप में कम से कम दस वर्ष के कठोर कारावास की अवधि निर्धारित करती है, जिसे जुर्माने के साथ आजीवन कारावास तक बढ़ाया जा सकता है।
- धारा 64(2) बलात्संग के उग्र या गुरुतर रूपों के लिये अधिक गंभीर दण्ड का उपबंध करती है।
- धारा 64(2)(ज) विशेष रूप से ऐसी स्थिति से संबंधित है जहाँ कोई व्यक्ति "किसी महिला से यह जानते हुए कि वह गर्भवती है, बलात्संग करेगा।"
- धारा 64(2)(ज) के अधीन अपराधों के लिये विहित दण्ड कम से कम दस वर्ष का कठोर कारावास है, जिसे आजीवन कारावास (अर्थात् व्यक्ति के शेष प्राकृत जीवनकाल) तक बढ़ाया जा सकता है, साथ ही जुर्माना का भी दायी होगा।
- यह उपबंध गर्भवती महिला के साथ बलात्संग को लैंगिक उत्पीड़न का एक गुरुतर रूप है, जो गर्भवती पीड़ितों की अतिरिक्त भेद्यता और महिला और उसके अजन्मे बच्चे दोनों को होने वाले संभावित नुकसान को मान्यता देता है।
- धारा 64(2)(ज) धारा 64(2) में सूचीबद्ध कई परिस्थितियों में से एक है जहाँ विधि अपराध को विशेष रूप से जघन्य प्रकृति के कारण अधिक गंभीर दण्ड अधिरोपित करती है।
- यह धारा इस बात को स्वीकार करती है कि पीड़िता के गर्भवती होने की जानकारी के साथ बलात्संग करना गंभीर अपराध है जिसके लिये कठोर दण्ड दिया जाना चाहिये।
- इस अपराध का वर्गीकरण धारा 64(1) के बजाय धारा 64(2) के अधीन करना विधायिका के ऐसे मामलों से अधिक गंभीरता से निपटने के आशय को दर्शाता है।
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