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सांविधानिक विधि
आदेशों की अवज्ञा करने पर गैर-पक्षकार भी अवमान के लिये उत्तरदायी होंगे
03-Mar-2026
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"यह अब कोई नया मामला नहीं है कि यदि कोई पक्षकार इस न्यायालय के किसी आदेश से अवगत हो जाता है या उसे इसकी जानकारी हो जाती है, फिर भी वह जानबूझकर व्यतिक्रम करता है या जानबूझकर उसका पालन नहीं करता है या संबंधित आदेश का उल्लंघन करता है, तो वह अवमान अधिकारिता के पूर्ण प्रकोप का सामना करने के लिये उत्तरदायी हो जाता है।" न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और न्यायमूर्ति आर. महादेवन |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने इसरार अहमद खान बनाम अमरनाथ प्रसाद और अन्य (2026) के मामले में यह निर्णय दिया कि अवमान अधिकारिता मूल निर्णय में नामित पक्षकारों तक ही सीमित नहीं है।
- न्यायालय ने निर्णय दिया कि कोई भी व्यक्ति या प्राधिकरण जो न्यायालय के आदेश से अवगत है और जानबूझकर उसकी अवज्ञा में योगदान देता है, उसके विरुद्ध अवमान के लिये कार्यवाही की जा सकती है।
- छत्तीसगढ़ सरकार के अधिकारियों के संबंध में न्यायालय के 20 मई, 2025 के निर्णय का पालन न करने के आरोप वाली अवमान याचिकाओं की सुनवाई के दौरान ये टिप्पणियां की गईं।
इसरार अहमद खान बनाम अमरनाथ प्रसाद और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी ?
- इससे पहले उच्चतम न्यायालय ने छत्तीसगढ़ सरकार और छत्तीसगढ़ राज्य लघु वन उपज सहकारी संघ के अधिकारियों को गोदाम रक्षक के एक अतिरिक्त पद के सृजन सहित विशिष्ट कदम उठाने का निदेश दिया था।
- इन निदेशों का पालन तीन मास के भीतर किया जाना था।
तथापि:
- अधिकारियों ने निर्धारित समय सीमा के भीतर आदेश को लागू करने में असफल रहे।
- अपर मुख्य सचिव सहित वरिष्ठ अधिकारियों को इस निर्णय की जानकारी थी।
- अनुपालन में विलंब इस आधार पर हुआ कि राज्य सरकार से मार्गदर्शन की प्रतीक्षा की जा रही थी।
- अनुपालन अवधि समाप्त होने के बाद पुनर्विचार याचिका दायर की गई थी और वह दोषपूर्ण थी।
- पुनर्विचार याचिका के परिणाम के आधार पर अनुपालन को सशर्त बनाने का प्रयास किया गया था।
- अतः जानबूझकर अवज्ञा करने का आरोप लगाते हुए अवमान याचिकाएँ दायर की गईं।
- मुख्य विवाद्यक:
- क्या अवमान की अधिकारिता उन व्यक्तियों या अधिकारियों तक विस्तारित हो सकती है जिन्हें मूल रूप से कार्यवाही में पक्षकार नहीं बनाया गया था, किंतु वे आदेश से अवगत थे और उसके कार्यान्वयन में सम्मिलित थे?
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
पर-पक्षकार अवमान का अपराध कर सकते हैं:
- न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अवमान केवल उस व्यक्ति तक सीमित नहीं है जो प्रत्यक्षत आदेश से बाध्य है।
- कोई पर-पक्षकार जो जानबूझकर अवज्ञा में सहायता करता है या उसे सक्षम बनाता है, उसे भी दण्डित किया जा सकता है, क्योंकि ऐसा आचरण न्याय प्रशासन में बाधा डालता है।
- किसी गैर-पक्षकार की जवाबदेही स्वतंत्र रूप से उत्पन्न होती है – इसलिये नहीं कि उन्होंने तकनीकी रूप से आदेश का उल्लंघन किया, अपितु इसलिये कि उनके कार्यों ने इसके प्रवर्तन में बाधा उत्पन्न की।
गैर-पक्षकार दायित्त्व के लिये शर्तें:
यदि कोई गैर-पक्षकार है, तो उसे निम्नलिखित स्थितियों में उत्तरदायी ठहराया जा सकता है:
- उस व्यक्ति या प्राधिकरण को न्यायालय के आदेश की जानकारी थी।
- उन्होंने जानबूझकर अवज्ञा या गैर-अनुपालन में सहायता की।
- उनके आचरण ने आदेश के कार्यान्वयन में बाधा उत्पन्न की या उसे असफल कर दिया।
- न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि दायित्त्व का स्रोत न्यायिक अधिकार को कमजोर करने वाला आचरण है, न कि औपचारिक पक्षकार का दर्जा।
कार्यान्वयन श्रृंखला में अधिकारियों का कर्त्तव्य:
- पीठ ने निर्णय दिया कि एक बार जब अधिकारियों को न्यायालय के आदेश की जानकारी हो जाती है, तो वे अनुपालन सुनिश्चित करने के लिये कर्तव्यबद्ध होते हैं।
- कार्यान्वयन श्रृंखला का भाग बनने वाला कोई प्राधिकरण यह दावा करके उत्तरदायित्त्व से बच नहीं सकता कि उसे मूल रूप से मामले में पक्षकार नहीं बनाया गया था।
- यदि अनुपालन के लिये उच्च अधिकारियों द्वारा कार्रवाई की आवश्यकता थी या यह उनकी क्षमता से परे था, तो उन्हें स्पष्टीकरण या निदेशों के लिये न्यायालय से संपर्क करना चाहिये था।
- ऐसा न करने को अवमान की कार्यवाही में प्रतिरक्षा के रूप में प्रयोग नहीं किया जा सकता है।
अवमान की अधिकारिता का विस्तार:
- न्यायालय ने दोहराया कि अवमान अधिकारिता का प्रयोग करते समय, न्यायालय केवल यह परीक्षा करता है कि मूल आदेश का अनुपालन किया गया है या नहीं।
इससे संबंधित विवाद्यक:
- मूल निर्णय की शुद्धता
- अनुपालन की व्यवहार्यता
- प्रशासनिक कठिनाइयाँ
- निदेश की वैधता
अवमान की कार्यवाही में यह मुद्दा नहीं उठाया जा सकता।
- यदि किसी पक्षकार को कोई आदेश अव्यवहारिक या त्रुटिपूर्ण लगता है, तो उचित उपचार स्पष्टीकरण, संशोधन की मांग करना या परिसीमा के भीतर अपील दायर करना है।
तथ्यों पर आधारित निष्कर्ष:
न्यायालय ने पाया कि:
- राज्य के वरिष्ठ अधिकारियों को 20 मई, 2025 के निर्णय की जानकारी थी।
- वे समय पर अनुपालन सुनिश्चित करने में असफल रहे।
- विलंब का कोई औचित्य नहीं था।
- अनुपालन अवधि के बाद दोषपूर्ण पुनर्विचार याचिका दाखिल करने से गैर-अनुपालन को क्षमा नहीं किया जा सकता।
- न्यायालय ने माना कि अवमान का प्रथम दृष्टया मामला बनता है, जिसमें वे अधिकारी भी सम्मिलित हैं जो मूल रूप से पक्षकार नहीं थे किंतु आदेश से अवगत थे और इसके कार्यान्वयन में सम्मिलित थे।
- अनुपालन करने के लिये अंतिम अवसर दिया गया था, ऐसा न करने पर आरोप विरचित किये जाएंगे।
न्यायालय का अवमान क्या है और इससे संबंधित विधिक उपबंध क्या हैं?
बारे में:
- संविधान अनुच्छेद 129 और 215 के माध्यम से उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों को अवमान के लिये दण्डित करने का अधिकार प्रदान करता है, जिसकी परिचालन प्रक्रियाएँ न्यायालयों अवमान अधिनियम, 1971 (1971 का अधिनियम) में उल्लिखित हैं।
न्यायालय का अवमान:
- न्यायालय की अवमान एक विधिक अवधारणा है जिसका उद्देश्य न्यायिक प्रणाली की गरिमा और अधिकार की रक्षा करना है।
- भारत में, न्यायालय की अवमान से संबंधित मामले 1971 के अधिनियम के अधीन निपटाए जाते हैं, जो अवमानपूर्ण कार्यों को परिभाषित करता है और उनके लिये दण्ड विहित करता है।
- इसका प्राथमिक उद्देश्य न्यायिक प्रक्रिया की पवित्रता को बनाए रखना है , यह सुनिश्चित करना कि न्यायपालिका के अधिकार का सम्मान और उसे बरकरार रखा जाए।
- तथापि, अवमान विधियों के निर्वचन और उनका प्रयोग अक्सर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर संभावित उल्लंघन के बारे में चिंताएँ उत्पन्न करता है, जिससे एक नाजुक संतुलन बना रहता है जिसे बनाए रखना आवश्यक है।
न्यायालय के अवमान के प्रकार:
- भारत में न्यायालय के अवमान को सामान्यत: दो प्रकारों में वर्गीकृत किया जा सकता है: सिविल अवमान और आपराधिक अवमान।
- 1971 के अधिनियम की धारा 2(ख) के अधीन, किसी न्यायालय के किसी निर्णय, डिक्री, निदेश, आदेश, रिट या अन्य आदेशिका की जानबूझकर अवज्ञा करना अथवा न्यायालय से किये गए किसी वचनबंध को जानबूझकर भंग करना, अभिप्रेत है, जबकि आपराधिक अवमान में ऐसे कार्य शामिल होते हैं जो किसी न्यायालय के अधिकार को कलंकित करते हैं या कलंकित करने की प्रवृत्ति रखते हैं, या कम करते हैं या कम करने की प्रवृत्ति रखते हैं।
- 1971 के अधिनियम की धारा 2(ग) के अंतर्गत “आपराधिक अवमान” से किसी भी ऐसी बात का चाहे बोले गए या लिखे गए शब्दों द्वारा, या संकेतों द्वारा, या रूपणों द्वारा, या अन्यथा प्रकाशन अथवा किसी भी अन्य ऐसे कार्य का करना अभिप्रेत है—
(i) जो किसी न्यायालय को कलंकित करता है या जिसकी प्रवृत्ति उसे कलंकित करने की है अथवा जो उसके प्राधिकार को अवनत करता है या जिसकी प्रवृत्ति उसे अवनत करने की है; अथवा
(ii) जो किसी न्यायिक कार्यवाही के सम्यक् अनुक्रम पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है, या उसमें हस्तक्षेप करता है या जिसकी प्रवृत्ति उसमें हस्तक्षेप करने की है; अथवा
(iii) जो न्याय प्रशासन में किसी अन्य रीति से हस्तक्षेप करता है या जिसकी प्रवृत्ति उसमें हस्तक्षेप करने की है अथवा जो उसमें बाधा डालता है या जिसकी प्रवृत्ति उसमें बाधा डालने की है।
न्यायालय अवमान अधिनियम, 1971 के अंतर्गत उपलब्ध प्रतिरक्षा:
- निर्दोष प्रकाशन: धारा 3 के अधीन यदि प्रकाशन करने वाले व्यक्तियों के पास प्रकाशन के समय यह मानने का कोई उचित आधार नहीं था कि कार्यवाही लंबित थी, तो प्रकाशन को "निर्दोष" कहा जाता है।
- न्यायिक कार्यवाही की निष्पक्ष और सही रिपोर्ट: धारा 4 के अधीन कोई व्यक्ति न्यायिक कार्यवाही या उसके किसी भी प्रक्रम की निष्पक्ष और सही रिपोर्ट प्रकाशित करने के लिये न्यायालय अवमान का दोषी नहीं होगा।
- निष्पक्ष आलोचना: धारा 5 के अधीन भारतीय नागरिक को यह विशेषाधिकार प्राप्त अधिकार है कि वह जो सत्य मानता है उस पर विश्वास करे और अपने मन की बात खुलकर कहे।
- पीठासीन अधिकारी के विरुद्ध परिवाद: धारा 6 के अधीन कोई व्यक्ति किसी अधीनस्थ न्यायालय के पीठासीन अधिकारी के संबंध में सद्भावनापूर्वक दिये गए किसी भी कथन के लिये न्यायालय अवमान का दोषी नहीं होगा।
- सत्य को प्रतिरक्षा के रूप में: धारा 13 न्यायालय को किसी भी अवमान कार्यवाही में सत्य द्वारा औचित्य को वैध प्रतिरक्षा के रूप में अनुमति देने में सक्षम बनाती है यदि यह लोक हित में हो या सद्भावनापूर्ण हो।
- क्षमा याचना: धारा 12(1) के परंतुक में कहा गया है कि न्यायालय की संतुष्टि के अनुसार क्षमा याचना किये जाने पर अभियुक्त को उन्मुक्त किया जा सकता है या दी दिये गए दण्ड को क्षमा किया जा सकता है।
सिविल कानून
सिविल प्रक्रिया संहिता का आदेश 11 नियम 1(5)
03-Mar-2026
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"आदेश 11 नियम 1 के अधीन प्रक्रियात्मक समयसीमा का उद्देश्य वाणिज्यिक मुकदमेबाजी में अनुशासन सुनिश्चित करना है, किंतु इसे इतनी कठोरता से लागू नहीं किया जा सकता है कि यह वास्तविक न्याय को ही विफल कर दे।" न्यायमूर्ति अनिरुद्ध रॉय स्रोत: कलकत्ता उच्च न्यायालय |
चर्चा में क्यों?
कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति अनिरुद्ध रॉय ने उषा मार्टिन लिमिटेड बनाम बालुरघाट टेक्नोलॉजीज लिमिटेड (2026) के मामले में एक वाणिज्यिक वाद में अंतिम तर्क-वितर्क के प्रक्रम में अतिरिक्त दस्तावेज़ों को अभिलेख पर रखने की अनुमति मांगने वाले एक अंतरिम आवेदन को मंजूर कर लिया।
- न्यायालय ने निर्णय दिया कि सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 11 नियम 1(5) स्वयं दर्शाता है कि विधायिका का आशय विलंबित प्रकटीकरण पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का नहीं था, और वास्तविक न्याय सुनिश्चित करने के लिये न्यायिक विवेक उपलब्ध है।
उषा मार्टिन लिमिटेड बनाम बालुरघाट टेक्नोलॉजीज लिमिटेड (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- यह विवाद उषा मार्टिन लिमिटेड और बालुरघाट टेक्नोलॉजीज लिमिटेड के बीच एक वाणिज्यिक वाद में उत्पन्न हुआ।
यह वाद अप्रतिवादित वाद के चल रहा था क्योंकि:
- प्रतिवादी ने लिखित कथन दाखिल करने का अपना अधिकार खो दिया था।
- प्रतिवादी ने वादी के साक्षी से प्रतिपरीक्षा न करने का विकल्प चुना।
- अंतिम बहस के प्रक्रम में, न्यायालय ने निम्नलिखित के संबंध में कुछ प्रश्न उठाए:
- निरोध के आरोप
- तुलनात्मक शिपमेंट लागत
इन प्रश्नों का उत्तर देने और अपने मौद्रिक दावों को प्रमाणित करने के लिये, वादी ने निम्नलिखित की अनुमति मांगी:
- बुकिंग संबंधी नोट्स, ईमेल और संविदात्मक संबंधी दस्तावेज़ों सहित अतिरिक्त दस्तावेज़ों को अभिलेख में रखें।
- केवल उन्हीं दस्तावेज़ों तक सीमित रहकर दूसरे साक्षी की परीक्षा करें।
विलंब का कारण:
वादी ने यह तर्क दिया कि:
- कुछ दस्तावेज़ रांची स्थित उसके संयंत्र में मिले थे।
- कुछ ईमेल अभिलेखीय डेटाबेस में संग्रहीत किये गए थे।
- अन्य दस्तावेज़ उसके सिंगापुर स्थित सहयोगी कंपनी के पास थे।
- वादी के अनुसार, न्यायालय की पूछताछ के बाद गहन खोजबीन शुरू करने पर ही इन सामग्रियों का पता चला।
- इसमें तर्क दिया गया कि यह लोप न तो जानबूझकर किया गया था और न ही दुर्भावनापूर्ण था और इससे प्रतिवादी को कोई नुकसान नहीं होगा।
- मुख्य विवाद्यक:
- क्या कोई न्यायालय, वाणिज्यिक वाद में, आदेश 11 नियम 1 सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन विहित समय सीमा से परे अतिरिक्त दस्तावेज़ों के प्रस्तुतिकरण की अनुमति दे सकता है, और किस प्रक्रम में इस प्रकार के विवेक का प्रयोग किया जा सकता है।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 11 नियम 1(5) के अधीन कोई पूर्ण प्रतिबंध नहीं है:
- न्यायालय ने टिप्पणी की कि सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 11 नियम 1(5) में स्पष्ट रूप से न्यायालयों को वादपत्र के साथ प्रकट नहीं किये गए दस्तावेज़ों पर विश्वास करने की अनुमति देने का अधिकार दिया गया है, बशर्ते युक्तियुक्त कारण बताया जाए।
- इससे यह संकेत मिलता है कि विधायिका ने देर से जानकारी देने पर कोई कठोर प्रतिबंध नहीं लगाया था।
कार्यवाही के प्रक्रम पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं है:
- न्यायालय ने स्पष्ट किया कि इस प्रकार के विवेक का प्रयोग तब भी किया जा सकता है जब मामला तर्क-वितर्क के प्रक्रम तक पहुँच चुका हो।
- वाणिज्यिक मुकदमेबाजी में प्रक्रियात्मक अनुशासन महत्त्वपूर्ण है, लेकिन यह वास्तविक न्याय करने के उद्देश्य को दरकिनार नहीं कर सकता।
अनुमति प्रदान करने के प्रक्रम में सीमित दायरा:
- अतिरिक्त दस्तावेज़ प्रस्तुत करने की अनुमति देने के प्रक्रम में, न्यायालय को निम्नलिखित का आकलन करने की आवश्यकता नहीं है:
- दस्तावेज़ों की प्रामाणिकता।
- उनका साक्ष्यिक महत्त्व।
- उनकी अंतिम प्रमाणिक योग्यता।
- प्रश्न सिर्फ इस बात का है कि पहले जानकारी छिपाने का कोई युक्तियुक्त कारण था या नहीं। साक्ष्य की ग्राह्यता और महत्त्व से जुड़े विवाद्यक विचारण के दौरान तय किये जाएंगे।
मुकदमेबाज को अपने मामले को पूर्ण रूप से प्रस्तुत करने का अधिकार:
- न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि किसी मुकदमे में वादी को अपना पक्ष पूरी तरह से प्रस्तुत करने का अधिकार एक मूल्यवान अधिकार है।
- केवल तकनीकी आधार पर अनुमति देने से इंकार करना - विशेषकर तब जब दस्तावेज़ न्यायालय के स्वयं के प्रश्नों का उत्तर देने के लिये आवश्यक थे - अन्याय का परिणाम होगा।
तथ्यों पर आधारित निष्कर्ष:
न्यायालय ने वादी के स्पष्टीकरण को इस प्रकार पाया:
- न्यायोचित (Just)
- युक्तिसंगत एवं तर्कसंगत (Cogent)
- उचित (Reasonable)
तदनुसार, आवेदन मंजूर कर लिया गया।
सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के आदेश 11 नियम 1(5) क्या है?
बारे में:
- सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 11 में उच्च न्यायालय के वाणिज्यिक प्रभाग या वाणिज्यिक न्यायालय के समक्ष वादों में दस्तावेज़ों के प्रकटीकरण, खोज और निरीक्षण से संबंधित उपबंध हैं।
- नियम 1 दस्तावेज़ों के प्रकटीकरण और खोज से संबंधित है।
आदेश 11 नियम 1(5):
- वादी को अपने अधिकार, कब्जे, नियंत्रण या अभिरक्षा में मौजूद सभी दस्तावेज़ों को वादपत्र के साथ (या अनुमत विस्तारित समय के भीतर) प्रकट करना होगा।
- यदि ऐसे दस्तावेज़ उस समय सीमा के भीतर प्रकट नहीं किये जाते हैं , तो वादी बाद में उन पर अधिकार के रूप में विश्वास नहीं कर सकता है ।
- वादी न्यायालय की अनुमति (न्यायालय की अनुमति) से ही अप्रकाशित दस्तावेज़ों पर विश्वास कर सकता है ।
- न्यायालय ऐसी अनुमति तभी प्रदान करेगा जब वादी दस्तावेज़ों को पहले प्रकट न करने के लिये "उचित कारण" साबित कर दे।
उद्देश्य:
- प्रक्रियात्मक अनुशासन सुनिश्चित करने और अप्रत्याशित परिस्थितियों से बचने के लिये।
- वाणिज्यिक मुकदमेबाजी को सुव्यवस्थित करने के लिये।
- फिर भी, न्याय के उल्लंघन को रोकने के लिये न्यायिक विवेक को संरक्षित रखना आवश्यक है।
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