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सांविधानिक विधि
इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन बनाम केरल राज्य (2018)
«13-Apr-2026
परिचय
यह मामला सबरीमाला मंदिर की सदियों पुरानी उस प्रथा की सांविधानिक वैधता से संबंधित है, जिसके अधीन 'मासिक धर्म की आयु’ (10 से 50 वर्ष की आयु) की महिलाओं को मंदिर परिसर में प्रवेश करने से प्रतिबंधित किया गया है।
- याचिकाकर्त्ता ओं ने इस बहिष्कार को भारत के संविधान, 1950 के अनुच्छेद 14, 15, 17 और 25 का उल्लंघन बताते हुए चुनौती दी।
तथ्य
- केरल के पथानामथिट्टा जिले में पेरियार टाइगर रिजर्व में स्थित सबरीमाला मंदिर भगवान अयप्पा को समर्पित है, जिन्हें ब्रह्मचारी देवता माना जाता है। भक्त मंदिर दर्शन से पहले 41 दिनों की तपस्या करते हैं।
- प्रथागत रूप से 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश करने से मना किया जाता था, क्योंकि ऐसा माना जाता था कि उनकी उपस्थिति देवता के ब्रह्मचर्य को भंग कर देगी।
- इस बहिष्कार को सर्वप्रथम केरल उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई थी। एस. महेंद्रन बनाम सचिव, त्रावणकोर (1991) के मामले में, उच्च न्यायालय ने इस बहिष्कार को एक दीर्घकालिक प्रथा मानते हुए बरकरार रखा, जिससे महिलाओं के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं होता था।
- 2006 में, इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन ने उच्चतम न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की, जिसमें यह तर्क दिया गया कि यह प्रथा महिलाओं की गरिमा के लिये अपमानजनक है और उनके सांविधानिक अधिकारों का उल्लंघन करती है।
- मंदिर का प्रबंधन करने वाले त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड ने इस बहिष्कार की प्रतिरक्षा करते हुए इसे अनुच्छेद 26 के अधीन संरक्षित एक आवश्यक धार्मिक प्रथा बताया। उसने केरल हिंदू सार्वजनिक पूजा स्थल (प्रवेश प्राधिकरण) नियम, 1965 के नियम 3(ख) का हवाला दिया, जो रीति-रिवाज और परंपरा के आधार पर महिलाओं को पूजा स्थलों से बाहर रखने की अनुमति देता है।
- तीन न्यायाधीशों की पीठ ने अक्टूबर 2017 में इस मामले को पाँच न्यायाधीशों की संविधान पीठ के पास भेज दिया था।
सम्मिलित विवाद्यक
- क्या महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध अनुच्छेद 14 और 15 के अधीन समता के अधिकार और अनुच्छेद 17 के अधीन अस्पृश्यता के उन्मूलन का उल्लंघन करता है?
- क्या भगवान अय्यप्पा के भक्त अनुच्छेद 26 के अधीन संरक्षण के हकदार एक अलग धार्मिक संप्रदाय का गठन करते हैं?
- क्या अनुच्छेद 25 के अधीन महिलाओं का बहिष्कार एक 'आवश्यक धार्मिक प्रथा' है?
- क्या केरल हिंदू सार्वजनिक पूजा स्थल नियम, 1965 का नियम 3(ख) किसी धार्मिक संप्रदाय को 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाने की अनुमति देता है?
- क्या सार्वजनिक पूजा नियमों का नियम 3(ख) मूल अधिनियम के विरुद्ध है, जो विभेदकारी प्रथाओं को प्रतिबंधित करता है?
न्यायालय की टिप्पणियां
- बहुमत (4:1) ने माना कि सबरीमाला मंदिर से 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं को अपवर्जित करना असांविधानिक है, क्योंकि यह संविधान के अनुच्छेद 25 और 17 का उल्लंघन है।
- न्यायालय ने यह माना कि भगवान अय्यप्पा के भक्त अनुच्छेद 26 के अर्थ में एक अलग धार्मिक संप्रदाय नहीं बनाते हैं, और इसलिये महिलाओं को छोड़कर धार्मिक मामलों के प्रबंधन के लिये एक स्वतंत्र अधिकार का दावा नहीं कर सकते हैं।
- न्यायमूर्ति मिश्रा, खानविलकर और चंद्रचूड़ ने माना कि महिलाओं का बहिष्कार सबरीमाला मंदिर की 'आवश्यक धार्मिक प्रथा' नहीं है, और इसलिये इसे अनुच्छेद 25 के अधीन संरक्षित नहीं किया जा सकता है।
- न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने आगे टिप्पणी की कि अनुच्छेद 17 के अधीन अस्पृश्यता की अवधारणा केवल जाति-आधारित बहिष्कार तक ही सीमित नहीं है, अपितु पवित्रता और अपवित्रता की धारणाओं पर आधारित किसी भी सामाजिक बहिष्कार तक विस्तारित है - जिसमें मासिक धर्म के आधार पर महिलाओं का बहिष्कार भी सम्मिलित है।
- न्यायालय ने केरल हिंदू सार्वजनिक पूजा स्थल (प्रवेश प्राधिकरण) नियम, 1965 के नियम 3(ख) को निरस्त कर दिया, यह मानते हुए कि यह मूल अधिनियम की धारा 4 के विरुद्ध है, जो किसी भी हिंदू के साथ वर्ग या जाति के आधार पर विभेद को प्रतिबंधित करता है।
- अपने असहमति वाले मत में न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा ने कहा कि एक धर्मनिरपेक्ष शासन व्यवस्था में, न्यायालयों को धार्मिक रीति-रिवाजों और प्रथाओं में तब तक हस्तक्षेप नहीं करना चाहिये जब तक कि वे हानिकारक, दमनकारी या सामाजिक बुराई न हों। उन्होंने यह भी कहा कि धार्मिक समुदायों को अपने मामलों का प्रबंधन करने के अधिकार का सम्मान किया जाना चाहिये।
निष्कर्ष
- उच्चतम न्यायालय ने 4:1 के बहुमत से सबरीमाला मंदिर की 10 से 50 वर्ष की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश से वंचित रखने की प्रथा को असांविधानिक घोषित किया, यह मानते हुए कि भक्ति को शारीरिक स्थितियों के अधीन नहीं किया जा सकता है।
- न्यायालय ने इस बात की पुष्टि की कि सांविधानिक नैतिकता को सामाजिक या लोकप्रिय नैतिकता पर प्राथमिकता मिलनी चाहिये, और पूजा का अधिकार लिंग की परवाह किये बिना सभी व्यक्तियों के लिये समान रूप से उपलब्ध है।
- तत्पश्चात्, 50 से अधिक पुनर्विचार याचिकाएँ दायर की गईं। नवंबर 2019 में, 3:2 के बहुमत से पुनर्विचार याचिकाओं को लंबित रखा गया और धार्मिक स्वतंत्रता और लैंगिक समता से संबंधित व्यापक सांविधानिक प्रश्नों को नौ न्यायाधीशों की पीठ के पास भेजा गया, साथ ही यह पुष्टि की गई कि 2018 का निर्णय अंतरिम रूप से लागू रहेगा।