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सिविल कानून
प्रवर्तक— परिभाषा और महत्त्व
«08-Apr-2026
परिचय
कई कंपनी संबंधी मामलों में "प्रवर्तक" शब्द का प्रयोग बार-बार होता है। कंपनी अधिनियम में भी दायित्त्व निर्धारित करने के उद्देश्य से कई स्थानों पर इस शब्द का प्रयोग किया गया है। फिर भी, न्यायिक या विधायी रूप से इस शब्द को कभी स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया गया है। इसे परिभाषित करने में आने वाली कठिनाइयों के कारण न्यायाधीशों ने कहा है कि "प्रवर्तक" न तो कोई तकनीकी शब्द है और न ही विधिक, अपितु यह कारबार से संबंधित शब्द है।
बोवेन एलजे ने इस शब्द का वर्णन करते हुए इसके वाणिज्यिक सार को स्पष्ट किया कि यह "वाणिज्यिक जगत में परिचित कई वाणिज्यिक कार्यों को एक ही शब्द में समेटता है, जिनके द्वारा सामान्यत: एक कंपनी अस्तित्व में आती है।"
कोई व्यक्ति प्रवर्तक के रूप में योग्य है या नहीं, यह प्रत्येक मामले में एक तथ्यात्मक प्रश्न है, जो काफी हद तक कारबार के प्रचार में निभाई गई भूमिका की प्रकृति पर निर्भर करता है।
सांविधिक परिभाषा — धारा 2(69)
- कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 2(69) में "प्रवर्तक" (Promoter) की सांविधिक परिभाषा कार्यात्मक श्रेणियों में दी गई है। प्रवर्तक से तात्पर्य ऐसे व्यक्ति से है जो:
(क) किसी प्रॉस्पेक्टस में इस प्रकार नामित किया गया हो या कंपनी द्वारा धारा 92 के अंतर्गत वार्षिक रिटर्न में पहचाना गया हो।
(ख) कंपनी के मामलों पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से, चाहे अंशधारक, निदेशक या किसी अन्य रूप में नियंत्रण रखता हो; या
(ग) जिसके परामर्श, निर्देशों या आदेशों के अनुसार निदेशक मंडल कार्य करने का आदी है। - इस परिभाषा के परंतुक में स्पष्ट रूप से पेशेवर क्षमता में कार्य करने वाले व्यक्तियों को शामिल नहीं किया गया है। इस प्रकार, निगमन दस्तावेज़ तैयार करने वाला अधिवक्ता, या पेशेवर क्षमता में सहायता करने वाला लेखाकार या मूल्यांकनकर्ता, प्रमोटर नहीं है।
- तथापि, ऐसा कोई भी व्यक्ति प्रमोटर बन सकता है यदि वह अपने पेशेवर कर्त्तव्य के दायरे से बाहर के कार्य करता है - जैसे कि अंशों के लिये खरीदारों को प्राप्त करने में सहायता करना या कंपनी के लिये कर्मियों की भर्ती में सहायता करना।
न्यासी पद
- कंपनी के संबंध में प्रमोटरों की स्थिति को लॉर्ड केर्न्स ने एरलैंगर बनाम न्यू सोमब्रेरो फॉस्फेट (1878) के मामले में आधिकारिक रूप से स्पष्ट किया था।
- प्रमोटर निस्संदेह एक न्यासी की स्थिति में होते हैं - कंपनी के निर्माण और उसे आकार देने का उत्तरदायित्त्व उनके हाथों में होता है और वे यह परिभाषित करने की शक्ति रखते हैं कि यह कैसे और कब अस्तित्व में आएगी।
- इसलिये न्यायालयों ने प्रमोटरों को एक न्यासी एजेंट का उत्तरदायित्त्व सौंपा है, और उन्हें कंपनी के ट्रस्टी के समान माना है।
- किसी भी प्रमोटर का सर्वोपरि कर्त्तव्य पूर्ण और निष्ठापूर्ण जानकारी का प्रकटन करना है।
- यदि कोई प्रमोटर अपनी निजी संपत्ति कंपनी को बेचना चाहता है और अंशधारकों के कोष से संदाय प्राप्त करना चाहता है, तो उसे संपत्ति, अपने व्यक्तिगत हित और अर्जित लाभ से संबंधित सभी महत्त्वपूर्ण तथ्यों का प्रकटन करना होगा। तथ्यों को छिपाने पर कंपनी को संव्यवहार रद्द करने या क्षतिपूर्ति का दावा करने का अधिकार है।
निष्कर्ष
प्रमोटरों (प्रवर्तकों) से संबंधित विधि निगमन प्रक्रिया को सुगम बनाने और प्रवर्तक की विशेषाधिकार प्राप्त स्थिति के दुरुपयोग से कंपनी और उसके अंशधारकों की रक्षा करने के बीच सावधानीपूर्वक संतुलन दर्शाता है। धारा 2(69) के अंतर्गत सांविधिक परिभाषा, इक्विटी द्वारा लगाए गए न्यासी दायित्त्वों के साथ मिलकर, जवाबदेही का एक मजबूत ढाँचा स्थापित करती है।