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आपराधिक कानून

ईरती लक्ष्मण बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (2009)

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 21-Jan-2026

परिचय 

भारत के उच्चतम न्यायालय के इस ऐतिहासिक निर्णय में इस महत्त्वपूर्ण प्रश्न का समाधान किया गया कि किशोर न्याय अधिनियम, 1986 के अधीन किसी अभियुक्त व्यक्ति को किशोर की श्रेणी में रखने के लिये उसकी आयु की संगणना कैसे की जाए। यह मामला आयु संगणना और किशोर स्थिति अवधारित करने की सुसंगत तिथि के संबंध में परस्पर विरोधी निर्वचनों से उत्पन्न हुआ थाऔर अंततः किशोर न्याय मामलों में आयु संगणना के लिये महत्त्वपूर्ण सिद्धांत स्थापित किये गए। 

तथ्य 

घटनाओं का कालक्रम: 

  • मई, 1994 (लगभग दोपहर 1:00 बजे):अपराध की कथित तिथि - ईरती लक्ष्मण पर पिट्टला चंद्रकला पर केरोसिन डालकर और माचिस की तीली से आग लगाकर उनकी हत्या करने का आरोप लगाया गया था। 
  • 25 मई, 1994:अपीलकर्त्ता को विद्वान मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत किया गया। 
  • जन्म तिथि:प्राथमिक विद्यालय के रजिस्टर के अनुसार अभियुक्त की जन्म-तिथि 10 मई 1978 दर्ज थी 

आयु अवधारण का विवाद्यक: 

  • मुख्य प्रश्न यह था कि क्या अपीलकर्त्ता ने मई, 1994 (अपराध की तारीख) को 16 वर्ष की आयु पूरी कर ली थीजबकि उसकी जन्मतिथि 10 मई, 1978 थी। 
  • विचारण न्यायालय ने किशोर होने के दावे को खारिज कर दियायह कहते हुए कि स्कूल रजिस्टरों में दर्ज जन्म तिथि पर विश्वास नहीं किया जा सकता है। 

न्यायिक कार्यवाही: 

  • प्रारंभिक विचारण न्यायालय का निर्णय:विचारण न्यायाधीश ने अर्नित दास बनाम बिहार राज्य (2000) 5 एस.सी.सी. 488 के निर्णय पर विश्वास करते हुए माना कि अपीलकर्त्ता किशोर नहीं था। 
  • पुनर्विचार याचिका:विचारण न्यायालय के निर्णय को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय में दायर की गई। 
  • उच्च न्यायालय का आदेश (26 जुलाई, 2000):मामले को विचारण न्यायालय में वापस भेज दिया गया। उच्च न्यायालय ने विचारण न्यायालय को अर्नित दास बनाम बिहार राज्य के मामले का अनुसरण करने का निदेश दियाजिसमें यह निर्णय दिया गया था कि न्यायालय के समक्ष पेशी की तारीख (25 मई, 1994) सुसंगत तारीख थीन कि अपराध की तारीख। 
  • सेशन न्यायाधीश का निर्णय:उच्च न्यायालय के निर्देशानुसारयह निर्णय दिया गया कि जब अभियुक्त को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया गया था तब वह अवयस्क नहीं था। अपीलकर्त्ता को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 302 के अधीन दोषी ठहराया गया और आजीवन कारावास का दण्ड दिया गया 
  • उच्च न्यायालय में अपील:उच्च न्यायालय ने अपील को खारिज करते हुए कहा कि 10 मई, 1994 तक अभियुक्त अपने जीवन का 17वाँ वर्ष शुरू कर देगाऔर इसलिये 9 मई, 1995 (न कि 1994) कोयदि उसकी जन्मतिथि 10 मई, 1978 थीतो उसे 16 वर्ष पूरे कर लेने वाला माना जाएगा। 

सम्मिलित विवाद्यक  

उच्चतम न्यायालय ने निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण प्रश्नों की परीक्षा की: 

  • विवाद्यक 1:किशोर न्याय अधिनियम के अधीन किसी अभियुक्त की आयु अवधारित करने के लिये उसकी आयु की संगणना करने का सही तरीका क्या है? 
  • विवाद्यक 2:क्या किशोर की स्थिति अवधारित करने के लिये अपराध किये जाने की तिथि या न्यायालय के समक्ष पेश किये जाने की तिथि सुसंगत तिथि है? 
  • विवाद्यक 3:आयु की संगणना करते समय जन्म के दिन को कैसे गिना जाना चाहिये - क्या इसे पूरे दिन के रूप में सम्मिलित किया जाना चाहिये या अपवर्जित किया जाना चाहिये? 

न्यायालय की टिप्पणियां 

उच्चतम न्यायालय ने अपील स्वीकार करते हुए निम्नलिखित प्रमुख निर्णयों के साथ विवादित निर्णय को अपास्त कर दिया: 

किशोर अवधारण के लिये सुसंगत तिथि पर: 

  • अर्नित दास के निर्णय को पलटना:न्यायालय ने कहा कि अर्नित दास बनाम बिहार राज्य के निर्णय को प्रताप सिंह बनाम झारखंड राज्य (2005) के मामले में संविधान पीठ द्वारा पलट दिया गया था। 
  • अपराध की तिथि सुसंगत तिथि के रूप में:न्यायालय ने प्रताप सिंह मामले में स्थापित सिद्धांत की पुष्टि की कि अपराध किये जाने की तिथिन कि वह तिथि जब अभियुक्त को पहली बार न्यायालय के समक्ष पेश किया गया थाकिशोर स्थिति अवधारित करने के लिये सुसंगत तिथि है। 
  • लाभकारी विधि:न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि किशोर न्याय अधिनियम एक लाभकारी विधि हैयद्यपि इसका यह अर्थ नहीं है कि शाब्दिक निर्वचन के सिद्धांत को लागू नहीं किया जाना चाहिये 

आयु संगणना पर: 

  • भारतीय वयस्कता अधिनियम, 1875:न्यायालय ने भारतीय वयस्कता अधिनियम की धारा की परीक्षा कीजिसमें यह उपबंधित किया गया है कि किसी व्यक्ति की आयु की संगणना करते समयजिस दिन उसका जन्म हुआ थाउसे एक पूरे दिन के रूप में सम्मिलित किया जाएगाऔर उसे उस दिन की अठारहवीं वर्षगांठ की शुरुआत में वयस्क माना जाएगा। 
  • प्रभु दयाल सेस्मा सिद्धांत:न्यायालय ने प्रभु दयाल सेस्मा बनाम राजस्थान राज्य (1986) के मामले पर विश्वास कियाजिसमें यह माना गया था कि किसी स्पष्ट उपबंध के अभाव मेंकिसी व्यक्ति की आयु की संगणना करते समयजन्म के दिन को एक पूर्ण दिन के रूप में गिना जाना चाहिये और विधि में निर्दिष्ट किसी भी आयु की संगणना जन्मदिन की वर्षगांठ से पहले वाले दिन प्राप्त की गई आयु के रूप में की जानी चाहिये 
  • विधिक दिन की परिभाषा:एक विधिक दिन मध्यरात्रि 12 बजे शुरू होता है और अगली रात उसी समय तक जारी रहता हैजैसा कि सालग राम शर्मा बनाम राजस्थान राज्य (2005) में स्थापित किया गया है। 
  • वर्तमान मामले पर लागू होने वाला आवेदन:चूँकि अपीलकर्त्ता का जन्म 10 मई, 1978 को हुआ थाइसलिये उस दिन को पूरा दिन माना जाना चाहिये। अतःउसने पिछले दिन अर्थात् 9 मई, 1978 (वास्तव में 1994) की मध्यरात्रि 12 बजे से पहले 16 वर्ष की आयु प्राप्त नहीं की थी। 

उच्च न्यायालय की त्रुटि का विश्लेषण: 

  • उच्च न्यायालय ने यह गलत निष्कर्ष निकाला था कि अभियुक्त 9 मई, 1994 के बजाय मई, 1995 को ही 16 वर्ष पूरे करेगा। 

निष्कर्ष 

इस निर्णय ने इस सिद्धांत को पुष्ट किया कि आयु की संगणना करते समय जन्म के दिन को एक पूरे दिन के रूप में गिना जाता हैऔर किसी व्यक्ति को जन्म के दिन की वर्षगांठ की शुरुआत में एक निर्दिष्ट आयु प्राप्त करने वाला माना जाता हैन कि स्वयं वर्षगांठ पर। 

इस निर्णय से यह सुनिश्चित हुआ कि किशोर न्याय विधि के लाभकारी प्रावधानों को सही आयु संगणना के माध्यम से ठीक से लागू किया जाएजिससे गलत संगणना विधियों के कारण होने वाले अन्याय को रोका जा सके। इसमें इस बात पर बल दिया गया कि विधिक निश्चितता और विधि के उचित अनुप्रयोग को सुनिश्चित करने के लिये लाभकारी विधियों में भी आयु संबंधी सांविधिक प्रावधानों के शाब्दिक निर्वचन का पालन किया जाना चाहिये