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आपराधिक कानून
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 175(4)
28-Jan-2026
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XXX बनाम केरल राज्य और अन्य "भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 175(4) को लागू करने के संबंध में मजिस्ट्रेटों को व्यापक दिशानिर्देश जारी किये गए, जिसमें यह स्पष्ट किया गया कि लोक सेवकों के विरुद्ध अन्वेषण का आदेश देने से पहले वरिष्ठ अधिकारियों की रिपोर्ट कब और कैसे प्राप्त की जानी चाहिये।" न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और मनमोहन |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और मनमोहन की पीठ ने XXX बनाम केरल राज्य और अन्य (2025) के मामले में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 175(4) पर मजिस्ट्रेटों को व्यापक दिशानिर्देश जारी किये, जिसमें यह स्पष्ट किया गया कि लोक सेवकों के विरुद्ध अन्वेषण का आदेश देने से पहले वरिष्ठ अधिकारी की रिपोर्ट कब और कैसे मांगी जाए।
XXX बनाम केरल राज्य और अन्य (2025) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- एक महिला ने अभिकथित किया कि संपत्ति विवाद से संबंधित परिवाद पर कार्रवाई के दौरान पुलिस अधिकारियों ने तीन बार पर उसके साथ लैंगिक उत्पीड़न किया।
- पुलिस द्वारा उसके आरोपों को "असत्य" बताते हुए रिपोर्ट दर्ज करने के बाद, उसने धारा 210 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के साथ धारा 175 के अधीन प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट (JMFC) से संपर्क किया और प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज करने के निदेश मांगे।
- धारा 175(4) का हवाला देते हुए मजिस्ट्रेट ने अभियुक्त पुलिस कर्मियों के वरिष्ठ अधिकारी से रिपोर्ट मंगाई ।
- जब ये कार्यवाही लंबित थी, तब महिला ने रिट याचिका के माध्यम से केरल उच्च न्यायालय का रुख किया।
- एकल न्यायाधीश ने याचिका को स्वीकार करते हुए कहा कि बलात्कार जैसे गंभीर अपराधों से जुड़े मामलों में धारा 175(4) अनिवार्य नहीं है और मजिस्ट्रेट को प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज करने का आदेश देने का निदेश दिया।
- तथापि, उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ ने एकल न्यायाधीश के निर्णय को पलट दिया, यह देखते हुए कि संविधान के अनुच्छेद 226 के अधीन हस्तक्षेप अनुचित था जब मजिस्ट्रेट के समक्ष सांविधिक कार्यवाही पहले से ही लंबित थी।
- इसके परिणामस्वरूप उच्चतम न्यायालय में अपील दायर की गई।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- उच्चतम न्यायालय ने खंडपीठ के आदेश की पुष्टि करते हुए कहा कि एकल न्यायाधीश ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 175(4) के अनुपालन में वरिष्ठ अधिकारी की रिपोर्ट मांगने के मजिस्ट्रेट के निर्णय में हस्तक्षेप करने में त्रुटी की।
- लोक सेवकों के लिये द्विस्तरीय संरक्षण व्यवस्था:
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि धारा 175(4) दोहरा संरक्षण प्रदान करती है:- प्रथम, अन्वेषण के प्रक्रम में, मजिस्ट्रेट को वरिष्ठ अधिकारी से रिपोर्ट मंगानी चाहिये और अभियुक्त लोक सेवक को सुनवाई का अवसर प्रदान करना चाहिये।
- द्वितीय, संज्ञान लेने के प्रक्रम में, धारा 218(1) भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन मंजूरी की सामान्यत: आवश्यकता होगी, कुछ श्रेणियों के अपराधों जैसे लैंगिक अपराधों के लिये सांविधिक अपवादों के अधीन।
- "may" का निर्वचन:
- न्यायालय ने यह प्रतिपादित किया कि यहाँ “may” को “may” के रूप में ही पढ़ा जाना चाहिए, जिसमें विवेकाधिकार निहित है, न कि इसे अनिवार्य (“shall”) के रूप में।
- मजिस्ट्रेटों के लिये दिशानिर्देश:
धारा 175(4) के अधीन किसी लोक सेवक द्वारा आधिकारिक कर्त्तव्यों के निर्वहन के दौरान किये गए अपराध के आरोप में परिवाद प्राप्त होने पर, मजिस्ट्रेट निम्नलिखित में से कोई भी कार्य कर सकता है:- विकल्प 1: यदि न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम दृष्टया संतुष्ट है कि कथित कृत्य जिसके कारण अपराध हुआ है, लोक सेवक द्वारा आधिकारिक कर्त्तव्यों के निर्वहन के दौरान हुआ है, तो ऐसे मजिस्ट्रेट के पास वरिष्ठ अधिकारी और अभियुक्त लोक सेवक से रिपोर्ट मंगवाने के लिये धारा 175(4) के अधीन विहित प्रक्रिया का पालन करने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं होगा।
- विकल्प 2: जहाँ न्यायिक मजिस्ट्रेट को परिस्थितियों के आधार पर प्रथम दृष्टया संदेह होता है कि क्या लोक सेवक द्वारा कथित रूप से किया गया अपराध आधिकारिक कर्त्तव्यों के निर्वहन के दौरान हुआ था, तो ऐसा मजिस्ट्रेट सावधानी बरतते हुए धारा 175(4) में विहित प्रक्रिया का पालन कर सकता है।
- विकल्प 3: जहाँ न्यायिक मजिस्ट्रेट संतुष्ट है कि कथित अपराध आधिकारिक कर्त्तव्यों के निर्वहन में नहीं किया गया था और/या इसका उससे कोई उचित संबंध नहीं है, और यह भी कि धारा 175(4) की कठोरताएँ लागू नहीं होती हैं, तो परिवाद पर धारा 175(3) के अधीन विहित सामान्य प्रक्रिया के अनुसार कार्यवाही की जा सकती है।
- तुच्छ परिवादों को नामंजूर करने का अधिकार:
- न्यायालय ने स्पष्ट किया कि न्यायिक मजिस्ट्रेट के पास किसी लोक सेवक के विरुद्ध धारा 175(3) के अंतर्गत दायर आवेदन को नामंजूर करने का अधिकार बना रहेगा, यदि मजिस्ट्रेट को लगता है कि उसमें लगाए गए आरोप पूरी तरह निराधार, स्पष्ट रूप से बेतुके या इतने असंभावित हैं कोई भी विवेकशील व्यक्ति यह निष्कर्ष नहीं निकाल सकता कि कोई अपराध प्रकट हुआ है। तथापि, नामंजूरी का ऐसा आदेश मनमाने ढंग से या कल्पना मात्र पर आधारित नहीं होना चाहिये, अपितु इसके पीछे वैध कारण होने चाहिये।
- वरिष्ठ अधिकारी की रिपोर्ट प्रस्तुत न करना:
- न्यायालय ने उन परिस्थितियों पर विचार किया जहाँ वरिष्ठ अधिकारी युक्तियुक्त समय सीमा के भीतर रिपोर्ट प्रस्तुत करने में असफल रहता है। ऐसी दुर्लभ परिस्थितियों में, न्यायिक मजिस्ट्रेट अनिश्चित काल तक प्रतीक्षा करने के लिये बाध्य नहीं है और यदि अभियुक्त लोक सेवक का कथन धारा 175(4)(ख) के अंतर्गत अभिलेख में उपलब्ध है, तो उस पर विचार करने के बाद धारा 175(3) के अनुसार आगे की कार्यवाही कर सकता है। 'युक्तियुक्त समय' क्या होगा, यह प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
- अनिवार्य शपथ पत्र की आवश्यकता:
- निर्णय का एक प्रमुख नियम यह है कि धारा 175(4) का आह्वान करने वाले परिवादों को भी एक शपथ पत्र द्वारा समर्थित होना चाहिये। यद्यपि उपधारा (4) का पाठ केवल "परिवाद" को संदर्भित करता है, न्यायालय ने माना कि इस शब्द को प्रासंगिक रूप से समझा जाना चाहिये और धारा 175(3) के साथ सामंजस्य स्थापित किया जाना चाहिये, जो स्पष्ट रूप से एक शपथ पत्र को अनिवार्य करता है।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 175 क्या है?
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 175 - संज्ञेय मामले का अन्वेषण करने की पुलिस अधिकारी की शक्ति:
- पुलिस थाने का भारसाधक अधिकारी मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना किसी ऐसे संज्ञेय अपराध अन्वेषण कर सकता है।
- इस प्रकार का अन्वेषण उन अपराधों के लिये किया जा सकता है जिसकी जांच या विचारण स्थानीय क्षेत्र पर अधिकारिता रखने वाला न्यायालय कर सकता है।
- पुलिस अधीक्षक (SP) अपराध की प्रकृति और गंभीरता को ध्यान में रखते हुए, यह निदेश दे सकते हैं कि अन्वेषण को उप- पुलिस अधीक्षक (DSP) द्वारा संचालित किया जाए।
- अन्वेषण की वैधता संरक्षित:
किसी पुलिस अधिकारी की कार्यवाही पर केवल इस आधार पर प्रश्न नहीं उठाया जाएगा कि अधिकारी को मामले का अन्वेषण करने का अधिकार नहीं था। - भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 210 के अधीन सशक्त मजिस्ट्रेट अन्वेषण का आदेश दे सकता है:
- धारा 173(4) के अधीन शपथपत्र द्वारा समर्थित आवेदन पर विचार करने के पश्चात्, और
- आवश्यक समझे जाने वाले अन्वेषण करने और पुलिस अधिकारी द्वारा दी गई जानकारी पर विचार करने के पश्चात्।
- सरकारी कर्त्तव्यों के निर्वहन के दौरान किसी लोक सेवक के विरुद्ध परिवाद से संबंधित मामलों में, मजिस्ट्रेट केवल निम्नलिखित स्थितियों के पश्चात् ही अन्वेषण का आदेश दे सकता है:
- लोक सेवक के वरिष्ठ अधिकारी से रिपोर्ट प्राप्त करना, और
- घटना के संबंध में लोक सेवक के कथन/स्पष्टीकरण पर विचार करते हुए।
- मुख्य परिवर्तन:
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 175, दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 156 का स्थान लेती है, जिससे विशेष रूप से लोक सेवकों से जुड़े मामलों में अतिरिक्त सुरक्षा उपाय पेश किये जाते हैं।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 175 द्वारा कौन-कौन से सुरक्षा उपाय लागू किये गए हैं?
- विधि की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के उद्देश्य से भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 175 के माध्यम से निम्नलिखित नवीन संरक्षणात्मक प्रावधान अधिनियमित किये गए हैं:
- प्रथम, पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी द्वारा प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज करने से इंकार करने पर पुलिस अधीक्षक को आवेदन करने की आवश्यकता को अनिवार्य कर दिया गया है, और धारा 175(3) के अधीन आवेदन करने वाले आवेदक को धारा 173(4) के अधीन पुलिस अधीक्षक को किये गए आवेदन की एक प्रति शपथपत्र के साथ प्रस्तुत करनी होगी, जबकि धारा 175(3) के अधीन मजिस्ट्रेट को आवेदन करना होगा।
- द्वितीय, मजिस्ट्रेट को प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज करने का आदेश देने से पहले ऐसी जांच करने का अधिकार दिया गया है जिसे वह आवश्यक समझता है।
- तृतीय, मजिस्ट्रेट को धारा 175(3) के अधीन कोई निदेश जारी करने से पहले प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज करने से इंकार करने के संबंध में पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी के प्रस्तुतीकरण पर विचार करना आवश्यक है।
- यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 175 (3) वर्षों से न्यायिक निर्णयों द्वारा निर्धारित विधि का परिणाम है।
- प्रियंका श्रीवास्तव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2015) के मामले में न्यायालय ने निर्णय दिया कि दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 156(3) के अधीन मजिस्ट्रेट को आवेदन करने से पहले, आवेदक को अनिवार्य रूप से धारा 154(1) और 154(3) के अधीन आवेदन करना होगा।
- न्यायालय ने आगे यह भी कहा कि दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 156(3) के अधीन किये गए आवेदनों के साथ आवेदक द्वारा शपथ पत्र प्रस्तुत करना अनिवार्य है।
- न्यायालय द्वारा इस प्रकार की आवश्यकता को लागू करने का कारण यह बताया गया कि दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 156(3) के अधीन आवेदन नियमित रूप से किये जा रहे थे और कई मामलों में केवल प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज करके अभियुक्त को परेशान करने के उद्देश्य से किये जा रहे थे।
पारिवारिक कानून
विवाह रजिस्ट्रीकरण और आपसी विवाह-विच्छेद
28-Jan-2026
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एक्स बनाम वाई "विवाह का रजिस्ट्रीकरण मात्र एक सांविधिक आदेश है, और अपने आप में यह न तो वैवाहिक सौहार्द, न सहवास का आशय, और न ही वैवाहिक संबंध की व्यवहार्यता का निर्णायक कारक हो सकता है।" न्यायमूर्ति विवेक चौधरी और रेनू भटनागर |
स्रोत: दिल्ली उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
एक्स बनाम वाई (2025) के मामले में न्यायमूर्ति विवेक चौधरी और रेणु भटनागर की खंडपीठ ने यह निर्णय दिया कि दो व्यक्तियों के बीच विवाह का मात्र रजिस्ट्रीकरण वैवाहिक सामंजस्य या उनके साथ सहवास करने के आशय को निर्धारित नहीं कर सकता है, और विवाह की तारीख से एक वर्ष पूरा होने से पहले आपसी सहमती विवाह-विच्छेद की अनुमति दी।
एक्स बनाम वाई (2025) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- पत्नी ने कुटुंब न्यायालय के उस आदेश को चुनौती देते हुए एक याचिका दायर की, जिसमें विवाह की तारीख से एक वर्ष की समाप्ति से पहले आपसी सहमति से विवाह-विच्छेद के लिये संयुक्त याचिका प्रस्तुत करने की अनुमति मांगने वाले उसके आवेदन को नामंजूर कर दिया गया था।
- विवाह के बाद दोनों पक्षकार कभी एक दिन भी साथ नहीं रहे।
- दोनों पक्षकारों के बीच कभी भी शारीरिक संबंध स्थापित नहीं हो पाए।
- विवाह की रस्म पूरी होने के तुरंत पश्चात्, दोनों पक्षकार अपने-अपने माता-पिता के घरों में पृथक् रहने लगे।
- आपसी सहमति से विवाह-विच्छेद के लिये संयुक्त याचिका विवाह के सात महीने के भीतर प्रस्तुत की गई थी।
- कुटुंब न्यायालय ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (HMA) की धारा 14 के अधीन अनुमति देने से इंकार कर दिया।
- कुटुंब न्यायालय ने माना कि पक्षकार सांविधिक प्रतिबंध में छूट देने के लिये "असाधारण कठिनाई" का मामला स्थापित करने में असफल रहे।
- कुटुंब न्यायालय ने यह भी माना कि पक्षकारों ने विवाह को संरक्षित और सुरक्षित रखने के लिये पर्याप्त या ईमानदारीपूर्ण प्रयास नहीं किये थे।
- कुटुंब न्यायालय ने पाया कि विवाह संपन्न होने के तुरंत बाद उसका रजिस्ट्रीकरण कराना असाधारण कठिनाई के उनके दावे के विरुद्ध था और उसे कमजोर करता था।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- न्यायालय ने पाया कि यह एक स्वीकृत तथ्य है कि दोनों पक्षकार कभी साथ नहीं रहे, विवाह कभी संपन्न नहीं हुआ और वे विवाह की शुरुआत से ही पृथक् रह रहे थे।
- न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि विवाह का रजिस्ट्रीकरण मात्र एक सांविधिक आदेश है, और यह अपने आप में वैवाहिक सामंजस्य, सहवास के आशय या वैवाहिक संबंध की व्यवहार्यता का निर्णायक कारक नहीं हो सकता है।
- न्यायालय ने माना कि ये तथ्य एक विद्यमान वैवाहिक संबंध की बुनियाद पर ही प्रहार करते हैं।
- न्यायालय ने कहा कि "ऐसे विवाह को जारी रखने पर बल देना जो केवल विधि में विद्यमान है, न कि सार में, पक्षकारों को किसी भी वैवाहिक आधार से रहित संबंध को सहन करने के लिये विवश करने के समान होगा, जिससे विधि के उद्देश्य को आगे बढ़ाने के बजाय अनावश्यक कठिनाई उत्पन्न होगी।"
- न्यायालय ने माना कि यह मामला हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 14 के अधीन निर्धारित अपवाद के दायरे में आता है।
- न्यायालय ने कुटुंब न्यायालय के विवादित आदेश को अपास्त कर दिया।
- न्यायालय ने दंपति के आवेदन को मंजूर कर लिया और उन्हें आपसी सहमति से विवाह-विच्छेद के लिये संयुक्त याचिका प्रस्तुत करने की अनुमति दे दी।
- न्यायालय ने मामले को संबंधित कुटुंब न्यायालय को वापस भेज दिया जिससे वह धारा 13-ख हिंदू विवाह अधिनियम के अधीन याचिका पर विधि के अनुसार शीघ्रता से कार्यवाही कर सके।
विवाह रजिस्ट्रीकरण के संबंध में क्या उपबंध हैं?
हिंदू विधि:
- हिंदू विधि की धारा 8(1) राज्य सरकारों को विवाह रजिस्ट्रीकरण के प्रयोजन से नियम बनाने में सक्षम बनाती है
- धारा 8(2) में उल्लेख है कि उपधारा (1) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, राज्य सरकार, यदि वह आवश्यक या उचित समझे, तो पूरे राज्य या विशिष्ट क्षेत्रों में उपधारा (1) में उल्लिखित विवरण प्रस्तुत करना अनिवार्य कर सकती है, चाहे सार्वभौमिक रूप से हो या विशिष्ट मामलों के लिये।
- ऐसे मामलों में जहाँ इस प्रकार के निदेश जारी किये जाते हैं, इस संबंध में स्थापित किसी भी नियम का उल्लंघन करने वाले किसी भी व्यक्ति पर पच्चीस रुपए तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।
मुस्लिम विधि:
- मुसलमानों में विवाह का रजिस्ट्रीकरण अनिवार्य है, क्योंकि मुस्लिम विवाह को एक सिविल संविदा माना जाता है।
- इस अधिनियम के लागू होने के पश्चात् मुसलमानों के बीच हुए प्रत्येक विवाह को निकाह समारोह के समापन के तीस दिनों के भीतर, जैसा कि आगे उपबंध किया गया है, रजिस्ट्रीकृत कराया जाएगा।
- निकाहनामा मुस्लिम विवाहों में एक प्रकार का विधिक दस्तावेज़ है जिसमें विवाह की आवश्यक शर्तें/विवरण सम्मिलित होते हैं।
क्रिश्चियन (ईसाई) विधि:
- धारा 27-37 भारतीय क्रिश्चियन विवाह अधिनियम, 1872 के भाग 4 का निर्माण करती हैं, जो विशेष रूप से भारतीय क्रिश्चियनों के बीच इस अधिनियम के अधीन अनुष्ठित विवाहों के रजिस्ट्रीकरण की प्रक्रिया को संबोधित करती हैं।
- विवाहों को विहित नियमों का पालन करना चाहिये, और सामान्यत: इनका संचालन चर्च ऑफ इंग्लैंड से संबद्ध पादरियों द्वारा किया जाता है।
विवाह का रजिस्ट्रीकरण न कराने के क्या परिणाम होते हैं?
- भारत में विवाह का रजिस्ट्रीकरण न कराने के परिणाम परिस्थिति और विधिक आवश्यकताओं के आधार पर भिन्न-भिन्न हो सकते हैं। यहाँ कुछ सामान्य परिणाम दिये गए हैं:
- विधिक मान्यता : अधिकतर मामलों में विवाह की वैधता के लिये रजिस्ट्रीकरण अनिवार्य नहीं है, परंतु यह विवाह संपन्न होने का पुख्ता सबूत होता है। रजिस्ट्रीकृत विवाह प्रमाण पत्र के बिना, विवाह के अस्तित्व को साबित करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है, विशेषकर विधिक कार्यवाही में।
- अधिकार एवं लाभ : सरकार द्वारा प्रदत्त विभिन्न अधिकारों एवं लाभों, जैसे कि उत्तराधिकार अधिकार, पति-पत्नी से संबंधित लाभ और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ उठाने के लिये प्राय रजिस्ट्रीकृत विवाह प्रमाण पत्र आवश्यक होता है। रजिस्ट्रीकरण न कराने पर इन लाभों से वंचित होना पड़ सकता है।
- विधिक कार्यवाही : वैवाहिक स्थिति, संपत्ति के अधिकार या विवाह-विच्छेद से संबंधित विवादों के मामले में, रजिस्ट्रीकृत विवाह प्रमाण पत्र विवाह के स्पष्ट दस्तावेजीकरण प्रदान करके विधिक कार्यवाही को सरल बना सकता है। रजिस्ट्रीकरण न होने से ऐसे मामले जटिल हो सकते हैं और विधिक प्रक्रिया लंबी खिंच सकती है।
- वीज़ा और आव्रजन : कुछ मामलों में, वीज़ा आवेदन और आव्रजन उद्देश्यों के लिये रजिस्ट्रीकृत विवाह प्रमाण पत्र की आवश्यकता हो सकती है, विशेष रूप से उन पति-पत्नी के लिये जो दूसरे देश में अपने पति/पत्नी के साथ रहने का आशय रखते हैं। रजिस्ट्रीकरण न होने से ऐसी प्रक्रियाओं में बाधा आ सकती है।
विवाह रजिस्ट्रीकरण के लिये महत्त्वपूर्ण मामले कौन से हैं?
- सीमा बनाम अश्वनी कुमार (2007) :
- इस मामले में, उच्चतम न्यायालय ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के अधीन, विवाहों का रजिस्ट्रीकरण पक्षकारों के विवेक पर छोड़ दिया गया है; वे या तो उप-पंजीयक के समक्ष विवाह संपन्न करा सकते हैं या पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार विवाह संस्कार संपन्न करने के बाद इसे रजिस्ट्रीकृत करा सकते हैं।
- अब्दुल कादिर बनाम सलीमा और अन्य (1886):
- न्यायमूर्ति महमूद ने मुस्लिम विवाह की प्रकृति को एक संस्कार के बजाय विशुद्ध रूप से एक सिविल संविदा के रूप में देखा।