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अंतर्राष्ट्रीय नियम
अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन से अमेरिका का बाहर निकलना: वैश्विक सौर ऊर्जा और जलवायु कूटनीति पर इसके प्रभाव
« »28-Jan-2026
स्रोत: द हिंदू
परिचय
परिचय (Introduction):
हाल ही में संयुक्त राज्य अमेरिका की सरकार ने यह घोषित किया है कि वह 66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों से अपनी सदस्यता समाप्त कर रही है, यह कहते हुए कि ये संस्थाएँ अब अमेरिकी हितों की पूर्ति नहीं करतीं। इन संगठनों में भारत में मुख्यालय वाला तथा भारत एवं फ्रांस के संयुक्त नेतृत्व में संचालित अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) भी सम्मिलित है। वर्ष 2015 में स्थापित यह गठबंधन जलवायु वित्तपोषण के क्षेत्र में एक महत्त्वपूर्ण बहुपक्षीय मंच के रूप में विकसित हुआ है। यद्यपि गठबंधन के कुल कोष में संयुक्त राज्य अमेरिका का योगदान मात्र 1% था, तथापि उसकी इस वापसी से वैश्विक जलवायु सहयोग एवं बहुपक्षीय प्रतिबद्धताओं की निरंतरता को लेकर गंभीर प्रश्न उत्पन्न होते हैं।
घटनाक्रम
नवंबर 2015: भारत और फ्रांस द्वारा पेरिस COP21 में अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) का शुभारंभ किया गया।
2021: संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) की सदस्यता ग्रहण की गई।
2021-2024: अमेरिका ने द्वारा अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) में लगभग 2.1 मिलियन डॉलर का योगदान दिया।
2025 के अंत तक: भारत की सौर विनिर्माण क्षमता 144 गीगावाट मॉड्यूल तथा 25 गीगावाट सौर सेल तक पहुँची।
8 अक्टूबर, 2025: राष्ट्रपति मुर्मू ने नई दिल्ली में आठवीं अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) सभा को संबोधित किया।
जनवरी 2026 : संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) तथा अन्य 65 अंतरराष्ट्रीय संगठनों से अपनी वापसी की घोषणा।।
अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) क्या है?
बारे में:
- ISA की स्थापना वर्ष 2015 में इस उद्देश्य से की गई थी कि सौर ऊर्जा को विशेष रूप से विकासशील देशों के लिए अधिक सुलभ, किफायती एवं व्यवहार्य बनाया जा सके।
- यद्यपि यह गठबंधन प्रत्यक्ष रूप से सौर ऊर्जा संयंत्रों का निर्माण नहीं करता है, तथापि यह देशों को वित्तपोषण तक पहुँच, निवेशकों के लिये जोखिम कम करने और सौर ऊर्जा को अपनाने में तेजी लाने में सहायता करता है।
- वर्तमान में ISA के अफ्रीका, एशिया एवं द्वीपीय राष्ट्रों सहित 120 से अधिक सदस्य देश हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका ने वर्ष 2021 में सदस्यता ग्रहण की थी तथा तीन वर्षों में लगभग 2.1 मिलियन अमेरिकी डॉलर का योगदान दिया।
विधिक ढाँचा एवं प्रावधान:
अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन का ढाँचागत समझौता (2015):
- अनुच्छेद 2 - उद्देश्य: सौर ऊर्जा के उपयोग के लिये वित्त और प्रौद्योगिकी की लागत को कम करना, सहयोगात्मक अनुसंधान एवं विकास को सुगम बनाना और सौर प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा देना।
- अनुच्छेद 4 - सदस्यता: 2018 में संशोधित किया गया जिससे सभी संयुक्त राष्ट्र सदस्य देशों को सम्मिलित होने की अनुमति मिल सके, जिससे अमेरिका की भागीदारी संभव हो सके।
- अनुच्छेद 8 - सदस्यता रद्द करना: कोई भी सदस्य लिखित सूचना द्वारा सदस्यता रद्द कर सकता है। सदस्यता रद्द करने की सूचना प्राप्त होने के एक वर्ष बाद प्रभावी होगी।
- अनुच्छेद 10 - वित्तीय योगदान: योगदान स्वैच्छिक हैं और विधिक रूप से बाध्यकारी नहीं हैं, जो अमेरिका के बाहर निकलने के न्यूनतम वित्तीय प्रभाव को स्पष्ट करते हैं।
भारत का घरेलू विधिक ढाँचा:
- राष्ट्रीय सौर मिशन (2010): इसका लक्ष्य 2022 तक 100 गीगावाट सौर ऊर्जा क्षमता हासिल करना है, जिसे 2030 तक बढ़ाकर 500 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा तक पहुँचाना है।
- विद्युत अधिनियम, 2003: धारा 86(1)(ङ) नवीकरणीय ऊर्जा खरीद दायित्त्वों को अनिवार्य करती है, जिससे गारंटीकृत मांग उत्पन्न होती है।
- ऊर्जा संरक्षण अधिनियम, 2001 (संशोधित 2022): कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना को सक्षम बनाता है और ऊर्जा दक्षता मानकों को अनिवार्य करता है।
अंतर्राष्ट्रीय जलवायु प्रतिबद्धताएं:
- पेरिस समझौता (2015): भारत ने 2030 तक गैर-जीवाश्म ईंधन से 40% बिजली प्राप्त करने और उत्सर्जन की तीव्रता को 33-35% तक कम करने की प्रतिबद्धता जताई।
- ग्लासगो जलवायु समझौता (2021): भारत ने 2070 तक नेट-जीरो और 2030 तक नवीकरणीय स्रोतों से 50% ऊर्जा प्राप्त करने की घोषणा की।
अमेरिका के बाहर निकलने से अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
वित्तीय प्रभाव:
- अमेरिका के बाहर निकलने से गठबंधन को आर्थिक रूप से अधिक नुकसान नहीं होगा। अमेरिका का योगदान कुल निधि का केवल 1% था। भारतीय अधिकारियों ने पुष्टि की है कि चल रहे कार्यक्रम जारी रहेंगे। यद्यपि, प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की भागीदारी में कमी विकासशील बाजारों में निवेशकों के विश्वास को प्रभावित कर सकती है।
भारत के सौर उद्योग पर प्रभाव:
- भारत सौर ऊर्जा उपकरणों के लिये अमेरिका पर निर्भर नहीं है। 2025 के अंत तक, भारत की सौर मॉड्यूल क्षमता 144 गीगावाट तक पहुँच गई थी, जिसमें सेल निर्माण क्षमता 25 गीगावाट थी। चीन वैश्विक सौर सेल उत्पादन का 70% हिस्सा उत्पादित करता है; भारत ने वित्त वर्ष 2025 में चीन से 1.7 अरब डॉलर के सौर ऊर्जा मॉड्यूल आयात किये (MNRE के आंकड़े)। अमेरिका के हटने से भारतीय परियोजनाओं की लागत या बिजली दरों पर कोई असर नहीं पड़ता है।
निष्कर्ष
अमेरिका का अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) से अलग होना अमेरिकी जलवायु नीति में एक परिवर्तन को दर्शाता है, लेकिन इससे अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन की दिशा या भारत के सौर क्षेत्र में कोई मौलिक परिवर्तन नहीं होता है। वित्तीय प्रभाव नगण्य है, घरेलू परियोजनाएं सुरक्षित हैं और भारत की विनिर्माण क्षमता में निरंतर वृद्धि हो रही है।
यद्यपि, जलवायु कूटनीति में इसके व्यापक निहितार्थ निहित हैं। एक प्रमुख अर्थव्यवस्था के पीछे हटने से अफ्रीका और विकासशील क्षेत्रों में अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन के कार्यों को चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। भारत के लिये, यह चुनौतियाँ और अवसर दोनों प्रस्तुत करता है - अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन के नेतृत्व की अधिक जिम्मेदारी, निर्माताओं के लिये संभावित बाजार के द्वार खुलना और वैश्विक दक्षिण के जलवायु नेतृत्व में अधिक प्रमुख भूमिका निभाना।
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