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आपराधिक कानून
गिरफ्तारी ज्ञापन
16-Feb-2026
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शिवम चौरसिया बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, गृह मंत्रालय के प्रधान सचिव, लखनऊ और अन्य "गिरफ्तारी के कारणों को गिरफ्तार व्यक्ति को देना अनिवार्य है। यदि गिरफ्तारी के कारणों का उल्लेख गिरफ्तारी ज्ञापन में नहीं है और उस पर साक्षियों के हस्ताक्षर नहीं हैं, तो पृथक् कागज पर गिरफ्तारी के कारणों की जानकारी अभियुक्त को देना अमान्य है।" न्यायमूर्ति अब्दुल मोइन और न्यायमूर्ति बबीता रानी |
स्रोत: इलाहाबाद उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
न्यायमूर्ति अब्दुल मोइन और न्यायमूर्ति बबीता रानी की पीठ ने शिवम चौरसिया बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, गृह मंत्रालय के प्रधान सचिव, लखनऊ और अन्य (2026) के मामले में यह निर्णय दिया कि गिरफ्तारी के कारणों को पृथक् कागज पर प्रस्तुत करना अमान्य है, जब इसका उल्लेख गिरफ्तारी ज्ञापन में न हो और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 36 के अधीन आवश्यक साक्षियों का अनुप्रमाणन न हो। न्यायालय ने आगे निदेश दिया कि याचिकाकर्त्ता को छोड़े दिया जाए, क्योंकि रिमांड आदेश यांत्रिक रूप से पारित किया गया था।
शिवम चौरसिया बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- याचिकाकर्त्ता और कथित पीड़िता लड़की के बीच आपसी सहमति से संबंध था, जिसका पीड़िता के परिवार ने विरोध किया था।
- पीड़िता के परिवार ने याचिकाकर्त्ता के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 137(2), 87, 64(1), और 351(3) तथा लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम की धारा 3 और 4 के अधीन प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज कराई है, जिसमें अभिकथित किया गया है कि याचिकाकर्त्ता ने लड़की को अंतरंग वीडियो ऑनलाइन जारी करने की धमकी देकर ब्लैकमेल किया।
- याचिकाकर्त्ता को पुलिस चौकी में बुलाया गया, जहाँ उसे गिरफ्तारी ज्ञापन पर हस्ताक्षर करने के लिये विवश किया गया और बाद में उसे गिरफ्तार कर लिया गया।
- उसके भाई को चौकी छोड़ने का निदेश दिया गया था, और याचिकाकर्त्ता की माता को गिरफ्तारी की सूचना केवल टेलीफोन के माध्यम से दी गई थी।
- गिरफ्तारी संबंधी ज्ञापन में गिरफ्तारी के किसी भी आधार का प्रकटन नहीं किया गया था।
- प्रतापगढ़ स्थित लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण (POCSO) न्यायालय के विशेष न्यायाधीश ने साक्ष्यों पर ध्यान नहीं दिया और एक निरर्थक रिमांड आदेश के माध्यम से याचिकाकर्त्ता को 14 दिन की न्यायिक अभिरक्षा में भेज दिया। तत्पश्चात्, इलाहाबाद उच्च न्यायालय में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की गई।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- न्यायालय ने मिहिर राजेश शाह बनाम महाराष्ट्र राज्य (2025) के मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्णय पर विश्वास करते हुए कहा कि किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तारी के आधारों की जानकारी दिये बिना निरोध में नहीं लिया जा सकता है, और ऐसे आधारों को गिरफ्तार व्यक्ति को सूचित करना अनिवार्य है।
- गिरफ्तारी ज्ञापन की परीक्षा करने पर न्यायालय ने पाया कि उसमें केवल उन धाराओं का उल्लेख था जिनके अधीन प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज की गई थी, किंतु गिरफ्तारी के कोई आधार या कारण नहीं बताए गए थे। राज्य के अधिवक्ता ने गिरफ्तारी के कारणों को एक अलग कागज पर प्रस्तुत किया, जिस पर केवल याचिकाकर्त्ता के हस्ताक्षर थे।
- न्यायालय ने इन पृथक् रूप से प्रस्तुत किये गए आधारों पर विश्वास करने से इंकार कर दिया, यह देखते हुए कि वे गिरफ्तारी ज्ञापन का भाग नहीं थे, दिनांक 28.01.2026 के गिरफ्तारी ज्ञापन के कॉलम 12 या कॉलम 13 में, या ज्ञापन के किसी अन्य भाग में, यह संकेत नहीं दिया गया था कि आधार पृथक् रूप से प्रस्तुत किये जा रहे हैं, और उस पृथक् कागज पर किसी साक्षी का अनुप्रमाणन नहीं था। अतः न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि आधार या तो गिरफ्तारी ज्ञापन के साथ ही या उसके पश्चात् तैयार किये गए थे।
गिरफ्तारी ज्ञापन क्या होता है?
बारे में:
- गिरफ्तारी ज्ञापन एक औपचारिक लिखित दस्तावेज़ है जिसे पुलिस अधिकारी द्वारा गिरफ्तारी के समय तैयार किया जाता है, जिसमें गिरफ्तारी से संबंधित तात्त्विक विवरण दर्ज होते हैं।
- यह गिरफ्तारी की घटना का एक आधिकारिक अभिलेख के रूप में कार्य करता है और मनमानी या विधिविरुद्ध निरोध को रोकने के लिये प्राथमिक जवाबदेही उपकरण के रूप में काम करता है।
- यह प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) से पृथक् है - जबकि प्रथम सूचना रिपोर्ट में अपराध होने का विवरण अभिलिखित होता है, गिरफ्तारी ज्ञापन में गिरफ्तारी के तथ्य और परिस्थितियाँ अभिलिखित होती हैं।
विधिक आधार:
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 36 (धारा 41ख, दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 के स्थान पर) - प्रत्येक पुलिस अधिकारी के लिये गिरफ्तारी करते समय गिरफ्तारी ज्ञापन तैयार करने का सांविधिक दायित्त्व निर्धारित करती है।
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 36 में गिरफ्तारी की प्रक्रिया और गिरफ्तार करने वाले अधिकारी के कर्त्तव्यों का वर्णन किया गया है।
- भारत के संविधान का अनुच्छेद 22(1) राज्य पर एक अनिवार्य अपवाद कर्त्तव्य अधिरोपित करता है कि वह गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के आधार प्रदान करे जिससे वह व्यक्ति अपनी पसंद के विधिक व्यवसायी से परामर्श करके अपनी प्रतिरक्षा कर सके।
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 47 (दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 50 के अनुरूप) के अनुसार, गिरफ्तार करने वाले अधिकारी को गिरफ्तार व्यक्ति को अपराध का पूरा विवरण तुरंत सूचित करना अनिवार्य है।
- के. बसु (1997) द्वारा जारी गिरफ्तारी ज्ञापन संबंधी दिशानिर्देशों को बाद में 2008 के संशोधन अधिनियम के माध्यम से दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 में शामिल किया गया, जो 1 नवंबर 2010 से प्रभावी हुआ, और अब यह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 में परिलक्षित होता है।
गिरफ्तारी ज्ञापन की अनिवार्य सामग्री
धारा 36, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 और डी.के. बसु दिशानिर्देशों के अनुसार, गिरफ्तारी ज्ञापन में निम्नलिखित बातें होनी चाहिये:
- गिरफ्तार करने वाले अधिकारी का नाम और पहचान (यह सटीक, स्पष्ट और दिखाई देने योग्य होना चाहिये)।
- गिरफ्तार व्यक्ति का नाम और विवरण।
- गिरफ्तारी की तिथि और समय।
- गिरफ्तारी का स्थान।
- गिरफ्तारी के आधार या कारण — अर्थात्, वह अपराध या परिस्थितियाँ जिनके लिये गिरफ्तारी की जा रही है।
- वे विधिक धाराएँ जिनके अधीन गिरफ्तारी की गई है।
- गिरफ्तार व्यक्ति के हस्ताक्षर/प्रतिहस्ताक्षर।
- कम से कम एक साक्षी द्वारा अनुप्रमाणन - जो या तो गिरफ्तार व्यक्ति का परिवारजन हो अथवा उस क्षेत्र/स्थानीयता का कोई सम्मानित व्यक्ति हो, जहाँ गिरफ्तारी की गई है।
स्रोत: गिरफ्तारी करने वाला पुलिस अधिकारी गिरफ्तारी के समय गिरफ्तारी का ज्ञापन तैयार करेगा; इस ज्ञापन पर कम से कम एक साक्षी के हस्ताक्षर होने चाहिये, जो गिरफ्तार व्यक्ति के परिवार का सदस्य या उस क्षेत्र/ स्थानीयता का कोई सम्मानित व्यक्ति हो सकता है जहाँ से गिरफ्तारी की गई है। इस पर गिरफ्तार व्यक्ति के भी हस्ताक्षर होने चाहिये और इसमें गिरफ्तारी का समय और तारीख अभिलिखित होनी चाहिये।
साक्षी द्वारा अनुप्रमाणन की आवश्यकता
- गिरफ्तारी ज्ञापन पर कम से कम एक साक्षी द्वारा हस्ताक्षर किये जाने चाहिये — निम्नलिखित में से कोई एक:
- गिरफ्तार व्यक्ति का कोई पारिवारिक सदस्य , या
- जिस क्षेत्र/स्थानीयता में गिरफ्तारी हुई है, वहाँ का एक सम्मानित सदस्य।
- गिरफ्तार व्यक्ति को इस बात की जानकारी दी जानी चाहिये कि उसे अपने द्वारा नामित किसी नातेदार या मित्र को गिरफ्तारी की सूचना देने का अधिकार है, जब तक कि ज्ञापन पर परिवार के किसी सदस्य द्वारा पहले से ही हस्ताक्षर न किये गए हों।
- यदि परिवार का कोई सदस्य उपलब्ध नहीं है, तो अधिकारी को गिरफ्तार व्यक्ति को यह सूचित करना होगा कि उसे अपने किसी भी मित्र, नातेदार या अपनी पसंद के किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तारी की सूचना देने का अधिकार है।
- यदि नातेदार या मित्र किसी दूसरे जिले या शहर में है, तो गिरफ्तारी के 8-12 घंटे के भीतर संबंधित पुलिस थाने को टेलीग्राम द्वारा सूचित किया जाना चाहिये और फिर यह जानकारी नातेदार या मित्र तक पहुँचाई जानी चाहिये।
आपराधिक कानून
परिवीक्षा अवधि समाप्त होने पर नियोजन संबंधी निरर्हता समाप्त हो जाती है
16-Feb-2026
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भारत संघ और अन्य बनाम राजेश "अपराधी परिवीक्षा अधिनियम, 1958 की धारा 12 के अधीन परिवीक्षा पर छोड़े जाने पर दोषसिद्धि से संलग्न निरर्हता को हटा देती है, भले ही दोषसिद्धि स्वयं समाप्त न हो।" मुख्य न्यायाधीश देवेन्द्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया |
स्रोत: दिल्ली उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
दिल्ली उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ, जिसमें मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया शामिल थे, ने यूनियन ऑफ इंडिया और अन्य बनाम राजेश (2026) के मामले में यह निर्णय दिया कि अपराधी परिवीक्षा अधिनियम, 1958 की धारा 12 के अधीन परिवीक्षा पर छोड़े जाने पर लोक नियोजन के प्रयोजनों के लिये दोषसिद्धि से संलग्न निरर्हता को हटा देती है, भले ही दोषसिद्धि स्वयं समाप्त न हो।
यूनियन ऑफ इंडिया और अन्य बनाम राजेश (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- प्रत्यर्थी को उसकी पत्नी द्वारा दायर एक आपराधिक मामले में भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498क और 406 के अधीन दोषसिद्ध ठहराया गया था।
- उसने अपनी दोषसिद्धि के विरुद्ध अपीलीय न्यायालय में अपील दायर की।
- अपील की सुनवाई के दौरान, दोनों पक्षकारों की आपसी सहमति से विवाह भंग कर दिया गया।
- अपीलीय न्यायालय ने दोषसिद्धि को बरकरार रखा लेकिन प्रत्यर्थी को अपराधी परिवीक्षा अधिनियम, 1958 के अधीन सदाचरण पर परिवीक्षा पर छोड़ दिया गया।
- तत्पश्चात्, भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (AAI) ने जूनियर एक्जीक्यूटिव (सामान्य कैडर) के पद पर भर्ती के लिये एक विज्ञापन जारी किया। प्रत्यर्थी ने आवेदन किया और चयन प्रक्रिया में सफल पाया गया।
- चयनित होने के बाद, उम्मीदवार ने आवश्यकतानुसार सत्यापन पत्र में अपने पूर्व दोषसिद्धि और तत्पश्चात् परिवीक्षा पर छोड़े जाने का प्रकटन किया।
- भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (AAI) ने उनकी नियुक्ति इस आधार पर रद्द कर दी कि उन्हें नैतिक अधमता से संलग्न अपराध के लिये दोषसिद्ध ठहराया गया था और इसलिये वे AAI के सेवा विनियमों के विनियमन 6(7)(ख) के अधीन नियुक्ति के लिये अयोग्य था।
- उम्मीदवार ने इस रद्द करने को दिल्ली उच्च न्यायालय में चुनौती दी। एकल न्यायाधीश ने उनकी याचिका मंजूर कर ली और AAI को उसे नियुक्त करने का निदेश दिया, यह मानते हुए कि अपराधी परिवीक्षा अधिनियम की धारा 12 के अधीन निरर्हता समाप्त हो गई थी।
- एकल न्यायाधीश के आदेश से असंतुष्ट होकर, AAI ने खंडपीठ के समक्ष लेटर पेटेंट अपील (Letters Patent Appeal) दायर की।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- न्यायालय ने नोट किया कि भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (AAI) के सेवा विनियमों के विनियमन 6(7)(ख) के अनुसार नैतिक अधमता से जुड़े अपराध के लिये दोषसिद्ध ठहराए गए व्यक्ति को नियुक्ति के लिये अयोग्य माना जाता है।
- खंडपीठ ने शंकर दास बनाम भारत संघ (1985) में उच्चतम न्यायालय के निर्णय पर विश्वास किया, जिसमें यह देखा गया कि 1958 अधिनियम की धारा 12 में "निरर्हता" शब्द का प्रयोग उन संविधि के संदर्भ में किया जाता है जो किसी दोषसिद्ध व्यक्ति को कुछ अधिकारों या पदों से वंचित करते हैं, जैसे कि लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम के अधीन विधायी सदस्यता के लिये निरर्हता।
- न्यायालय ने माना कि शास्ति के रूप में विद्यमान नौकरी से बर्खास्तगी धारा 12 के अर्थ में निरर्हता नहीं है, किंतु दोषसिद्धि के परिणामस्वरूप नई नियुक्ति पर रोक वास्तव में इस प्रावधान के अधीन परिकल्पित निरर्हता है।
- खंडपीठ ने माना कि AAI के नियमों के अधीन उम्मीदवार की अपात्रता सीधे तौर पर उसकी दोषसिद्धि से संबंधित थी। चूँकि उसे परिवीक्षा पर छोड़ा गया था, इसलिये 1958 अधिनियम की धारा 12 लागू होती है, और परिणामस्वरूप, उसकी दोषसिद्धि से संलग्न निरर्हता हटा दी गई है।
- न्यायालय ने आगे स्पष्ट किया कि निरर्हता को हटाने का अर्थ यह नहीं है कि दोषसिद्धि ही समाप्त हो जाती है; इसका अर्थ केवल यह है कि लोक नियोजन पर लगा परिणामी प्रतिबंध हटा दिया जाता है।
- खंडपीठ ने इसके अतिरिक्त यह भी कहा कि यह अपराध एक वैवाहिक विवाद से उत्पन्न हुआ था जिसे बाद में सौहार्दपूर्ण ढंग से सुलझा लिया गया था, विवाह आपसी सहमति से भंग कर दिया गया था, और परिवादकर्त्ता पत्नी ने कोई आक्षेप नहीं किया था।
- तदनुसार, खंडपीठ ने एकल न्यायाधीश के उस आदेश को बरकरार रखा जिसमें AAI को उम्मीदवार को जूनियर एक्जीक्यूटिव के पद पर नियुक्त करने का निदेश दिया गया था, और AAI द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया।
अपराधी परिवीक्षा अधिनियम, 1958 क्या है?
अपराधी परिवीक्षा अधिनियम, 1958 का परिचय
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क्रम सं. |
पहलू |
विवरण |
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1. |
शीर्षक |
परिवीक्षा अधिनियम, 1958 |
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2. |
अधिनियम संख्या |
1958 का अधिनियम संख्यांक 20 |
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3. |
अधिनियमन की तिथि |
16 मई, 1958 |
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4. |
प्रवर्तन की तिथि |
किसी राज्य में उस तिथि से, यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जिसे वह राज्य सरकार राजपत्र, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियत करे; और राज्य के विभिन्न भागों के लिये विभिन्न तारीखें नियत की जा सकेगी। |
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5. |
स्थानीय विस्तार |
संपूर्ण भारत में प्रवर्तनीय (2019 के संशोधन के पश्चात् जम्मू एवं कश्मीर सहित)। |
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6. |
उद्देश्य |
अपराधियों को परिवीक्षा पर या सम्यक् भर्त्सना के पश्चात् छोड़ दिये जाने के लिये और इससे संबद्ध बातों के लिये उपबंध करने के लिये अधिनियम। |
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7. |
संरचना |
कुल धाराएँ: 19 |
अधिनियम के बारे में:
- अपराधियों को परिवीक्षा पर या सम्यक् भर्त्सना के पश्चात् छोड़ दिये जाने और उससे संबंधित मामलों के लिये एक अधिनियम।
- इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य अपराधियों को कठोर अपराधी बनने से रोकने के लिये उन्हें स्वयं को सुधारने का अवसर देना है।
- यह अधिनियम अपराधियों को परिवीक्षा पर या सम्यक् भर्त्सना के पश्चात् छोड़े जाने का उपबंध करता है।
- यह अधिनियम अपराधियों को सदाचार के आधार पर परिवीक्षा पर छोड़े जाने की अनुमति देता है, बशर्ते कि उनके द्वारा किये गए कथित अपराध के लिये आजीवन कारावास या मृत्युदण्ड का दण्ड न हो।
- यह अधिनियम दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) (अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) के उपबंधों के अधीन दोषसिद्ध ठहराए गए लोगों के साथ-साथ उन लोगों को भी सम्यक् भर्त्सना के पश्चात् छोड़ जाने की अनुमति देता है, जिन्हें 2 वर्ष का दण्ड या जुर्माना या दोनों का दण्ड दिया गया है।
अधिनियम की धारा 12:
धारा 12 – दोषसिद्धि से संलग्न निरर्हता का हटाया जाना
- यह किसी अन्य संविधि में निहित किसी भी उपबंध के होते हुए भी प्रवर्तनीय है — अर्थात् अन्य अधिनियमों के परस्पर विरोधी उपबंधों पर अधिभावी प्रभाव रखता है।
- यह उन व्यक्तियों पर लागू होता है जिन्हें किसी अपराध का दोषसिद्ध पाया गया हो और जिनके साथ धारा 3 (भर्त्सना के पश्चात् छोड़ देना) या धारा 4 (सदाचरण की परिवीक्षा पर छोड़े देना) के अधीन कार्यवाही की गई हो।
- ऐसे व्यक्तियों को किसी भी प्रकार की निरर्हता का सामना नहीं करना पड़ेगा जो सामान्यतः किसी विधि के अधीन दोषसिद्धि से संलग्न होते है (उदाहरण के लिये, लोक नियोजन पर प्रतिबंध, विधायी सदस्यता पर प्रतिबंध आदि)।
- दोषसिद्धि स्वयं निरस्त नहीं होती — केवल परिणामी निरर्हता को हटाया जाता हैं।
- परंतुक (अपवाद): धारा 12 के अधीन संरक्षण लागू नहीं होगा यदि व्यक्ति को धारा 4 के अधीन परिवीक्षा पर छोड़े जाने के पश्चात् मूल अपराध के लिये दण्ड सुनाया जाता है (अर्थात्, यदि परिवीक्षा रद्द कर दी जाती है और मूल दण्ड अधिरोपित किया जाता है)।
अंतर्राष्ट्रीय नियम
भारत-अमेरिका व्यापार समझौता 2026
16-Feb-2026
स्रोत: द हिंदू
चर्चा में क्यों?
अमेरिका ने भारतीय वस्तुओं पर प्रभावी शुल्क को घटाकर 18% कर दिया है, जो पहले 50% के चौंका देने वाले स्तर पर था (जिसमें दण्डात्मक शुल्क भी शामिल थे)। यह समझौता व्यापार तनाव को कम करने की दिशा में एक रणनीतिक कदम है और भारत को अमेरिका के प्रमुख सहयोगी और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के महत्त्वपूर्ण प्रतिसंतुलन के रूप में स्थापित करता है।
भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की प्रमुख विशेषताएं क्या हैं?
शुल्क में कमी:
- अमेरिका ने भारतीय आयात पर पारस्परिक शुल्क को 25% से घटाकर 18% कर दिया है।
- महत्त्वपूर्ण बात यह है कि अतिरिक्त 25% दण्डात्मक टैरिफ (जो भारत द्वारा रूसी तेल की खरीद के कारण अगस्त 2025 में अधिरोपित किया गया था) को प्रभावी रूप से हटा दिया गया है, जिससे कुल प्रभावी टैरिफ लगभग 50% से घटकर 18% हो गया है।
भारत की प्रतिबद्धताएँ:
- ऊर्जा में परिवर्तन: भारत ने रूसी कच्चे तेल की खरीद को रोकने/उल्लेखनीय रूप से कम करने पर सहमति व्यक्त की है।
- भारत अपनी ऊर्जा खरीद को अमेरिका तथा संभावित रूप से वेनेजुएला की ओर पुनर्निर्देशित करेगा।
- बाजार पहुँच: भारत से अपेक्षा की जा रही है कि वह अमेरिकी वस्तुओं पर लगाए गए अपने शुल्क (टैरिफ) तथा गैर-शुल्क बाधाओं को घटाकर “शून्य” स्तर तक ले आए।
- अमेरिका को यह अपेक्षा है कि भारत के विशाल उपभोक्ता बाजार में कृषि उत्पादों (मेवे, कपास और सोयाबीन तेल) के निर्यात में भारी वृद्धि होगी।
- "बाय अमेरिकन" नीति: भारत ने सरकारी और बड़े पैमाने पर औद्योगिक खरीद के लिये "बाय अमेरिकन" के मजबूत रुख के प्रति प्रतिबद्धता जताई है।
- भारत अमेरिका से 500 अरब अमेरिकी डॉलर मूल्य की ऊर्जा, कोयला, प्रौद्योगिकी, कृषि और अन्य उत्पाद खरीद सकता है।
भारत-अमेरिका टैरिफ के विकास की पृष्ठभूमि
18% टैरिफ तक पहुँचने का रास्ता आक्रामक "संव्यवहार संबंधी कूटनीति" से भरा हुआ था:
- "टैरिफ किंग" कथानक: अमेरिका ने ऐतिहासिक रूप से भारत के उच्च आयात शुल्कों की आलोचना की है। 2025 के मध्य में, अमेरिका ने भारत की औसत दरों के समान 25% का पारस्परिक टैरिफ अधिरोपित किया।
- रूसी तेल विवाद: यूक्रेन संघर्ष के दौरान भारत द्वारा रूसी कच्चे तेल की निरंतर खरीद के बाद, अमेरिका ने अगस्त 2025 में 25% का दण्डात्मक "अतिरिक्त शुल्क" जोड़ दिया, जिससे कुल टैरिफ 50% हो गया।
- ऑपरेशन सिंदूर और क्षेत्रीय प्रभाव: खबरों के अनुसार, भारत द्वारा पाकिस्तान में आतंकवादी ठिकानों के विरुद्ध चलाए गए ऑपरेशन सिंदूर (मई 2025) के बाद अमेरिका ने क्षेत्रीय स्थिरता के लिये एक रणनीतिक उपकरण के रूप में टैरिफ दबाव का प्रयोग किया, और बाद में दावा किया कि व्यापारिक प्रभाव ने युद्धविराम (ceasefire) को आगे बढ़ाने में सहायता की।
- समझौते से पहले भारत के कदम: संबंधों में नरमी लाने के लिये, भारत ने अपने केंद्रीय बजट में भारी मोटरसाइकिलों और बोरबन व्हिस्की जैसी वस्तुओं पर शुल्क में पहले ही कटौती कर दी थी और परमाणु ऊर्जा क्षेत्र को खोलने के लिये शांति अधिनियम, 2025 पारित किया था।
भारत-अमेरिका व्यापार संबंध
- वित्त वर्ष 2025 में भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय व्यापार रिकॉर्ड 132 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गया, जबकि वित्त वर्ष 2024 में यह 119.71 अरब अमेरिकी डॉलर था। वित्त वर्ष 2025 में भारत का अमेरिका के साथ व्यापार अधिशेष 40.82 अरब अमेरिकी डॉलर रहा।
- भारत द्वारा अमेरिका से आयात की जाने वाली वस्तुओं में मुख्य रूप से खनिज ईंधन और तेल, कीमती और अर्ध-कीमती पत्थर और धातुएँ, परमाणु रिएक्टर और मशीनरी, और विद्युत उपकरण शामिल थे।
- भारत से अमेरिका को होने वाले निर्यात में विद्युत मशीनरी, बहुमूल्य और अर्ध-बहुमूल्य पत्थर और धातुएँ, औषधीय उत्पाद, मशीनरी और यांत्रिक उपकरण, खनिज ईंधन और लोहा और इस्पात की वस्तुएँ प्रमुख थीं।
- अमेरिका भारत में तीसरा सबसे बड़ा निवेशक है, जिसने 2000 से 2025 तक कुल 70.65 बिलियन अमेरिकी डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश किया है।
- अमेरिका-भारत समझौता (COMPACT) 2025 में शुरू किया गया था। इस ढाँचे के अधीन, द्विपक्षीय व्यापार को 2030 तक 500 अरब अमेरिकी डॉलर तक बढ़ाने के लिये 'मिशन 500' पहल शुरू की गई थी, जिसे द्विपक्षीय व्यापार समझौते (BTA) के लिये बातचीत द्वारा समर्थित किया गया था।
भारत-अमेरिका टैरिफ युक्तिकरण का क्या महत्व है?
भारत के लिये:
- भारतीय निर्यात को प्रोत्साहन: 18% की कटौती से भारतीय निर्यातकों की प्रतिस्पर्धात्मकता बहाल हुई है। कपड़ा, परिधान और फार्मास्यूटिकल्स जैसे क्षेत्रों में ऑर्डर में तत्काल वृद्धि होने की उम्मीद है।
- प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त: 18% की दर के साथ, भारत अब वियतनाम (20%), बांग्लादेश (20%) और चीन (30-35%) जैसे क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धियों की तुलना में अधिक अनुकूल दर का सामना कर रहा है।
- आर्थिक स्थिरता: यह समझौता व्यापार युद्ध की अनिश्चितता को दूर करता है, जिससे रुपए में स्थिरता आने की संभावना है और भारतीय विनिर्माण क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) को प्रोत्साहन मिलेगा।
अमेरिका के लिये:
- परमाणु एवं प्रौद्योगिकी निर्यात: यह समझौता अमेरिकी कंपनियों के लिये भारत के परमाणु ऊर्जा क्षेत्र (शांति अधिनियम, 2025 द्वारा सक्षम) और रक्षा विनिर्माण में प्रवेश करने का मार्ग प्रशस्त करता है, जिससे "महत्त्वपूर्ण और उभरती प्रौद्योगिकी पर अमेरिका-भारत पहल (iCET)" को और मजबूती मिलती है।
- डेटा सेंटर का दबदबा: भारत में डेटा सेंटर स्थापित करने वाली विदेशी कंपनियों को दी जाने वाली कर छूट से गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और अमेज़ॅन जैसी अमेरिकी तकनीकी दिग्गज कंपनियों को सीधा लाभ मिलता है।
- ऊर्जा निर्यात: भारत के रूस से दूर हटने के साथ, अमेरिकी ऊर्जा क्षेत्र (तेल, LNG, कोयला) को एक विशाल, दीर्घकालिक ग्राहक प्राप्त होता है, जिससे अमेरिकी शेल तेल उत्पादकों और LNG निर्यातकों को सीधा लाभ होता है।
भारत-अमेरिका व्यापार समझौते 2026 की चुनौतियाँ क्या हैं?
- सामरिक स्वायत्तता: रूसी तेल आपूर्ति पर रोक लगाने से भारत के सबसे बड़े रक्षा आपूर्तिकर्ता के साथ संबंध तनावपूर्ण हो गए हैं; यह भारत की बहुआयामी विदेश नीति को चुनौती देता है।
- संव्यवहार संबंधी कूटनीति: प्रत्येक रणनीतिक रियायत के बदले में भारी आर्थिक या राजनीतिक "प्रतिफल" की मांग हो सकती है - यह एक खतरनाक पूर्व निर्णय है।
- चीन की जवाबी कार्रवाई: दुर्लभ धातुओं और अन्य कार्बनिक पदार्थों पर भारत की निर्भरता इसे जवाबी व्यापार बाधाओं के प्रति संवेदनशील बनाती है।
- क्षेत्रीय समानता का अंतर: बांग्लादेश और वियतनाम ने GSP में लगभग 5% की बढ़त बरकरार रखी है, जो भारत ने 2019 में खो दी थी - प्रतिस्पर्धा का मैदान पूरी तरह से समतल नहीं है।
- आर्थिक जोखिम: शून्य टैरिफ वाले अमेरिकी कृषि आयात ग्रामीण आजीविका को खतरे में डालते हैं; रियायती रूसी तेल से हटकर अन्य स्रोतों पर जाने से चालू खाता घाटा (CAD) बढ़ता है।
- तकनीकी बाधाएँ: अमेरिकी SPS मानक भारतीय खाद्य और फार्मा निर्यात के लिये छिपी हुई बाधाएँ बने हुए हैं; IPR संरेखण से स्वास्थ्य देखरेख लागत बढ़ सकती है।
- डिजिटल व्यापार: "मुक्त डेटा प्रवाह" के लिये अमेरिका की मांग डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम (DPDP Act), 2023 और भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा ढाँचे के साथ संघर्ष उत्पन्न करती है।
भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के संदर्भ में विधिक उपबंध क्या हैं?
- विश्व व्यापार संगठन (WTO) - सर्वोपरि राष्ट्र (MFN) सिद्धांत (GATT का अनुच्छेद 1):
- यदि भारत अमेरिकी वस्तुओं पर शुल्क घटाकर "शून्य" कर देता है, तो उसे सभी विश्व व्यापार संगठन (WTO) सदस्यों के साथ समान व्यवहार करना होगा - जब तक कि यह समझौता संधि के अनुच्छेद 24 के अधीन मुक्त व्यापार क्षेत्र या सीमा शुल्क संघ के रूप में योग्य न हो। भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि यह समझौता अनुच्छेद 24 की आवश्यकताओं (लगभग सभी व्यापार को शामिल करना; उचित समय के भीतर शुल्क समाप्त करना) को पूरा करता है जिससे तीसरे देशों द्वारा विश्व व्यापार संगठन (WTO) में किसी भी चुनौती से बचा जा सके।
- विश्व व्यापार संगठन (WTO) कृषि समझौता (AoA):
- यह समझौता कृषि उत्पादों के लिये घरेलू समर्थन, निर्यात सब्सिडी और बाजार पहुँच पर बाध्यकारी नियम लागू करता है। कृषि व्यापार समझौते के अधीन किसी भी कृषि बाजार को खोलने की प्रक्रिया में भारत की समग्र समर्थन उपाय (AMS) प्रतिबद्धताओं और विशेष सुरक्षा प्रावधानों को संरक्षित रखा जाना चाहिये।
- TRIPS करार:
- बौद्धिक संपदा संरक्षण के लिये न्यूनतम मानक निर्धारित करता है। BTA को संसदीय अनुमोदन के बिना भारत की बहुपक्षीय प्रतिबद्धताओं से अधिक TRIPS-प्लस दायित्त्वों को लागू नहीं करना चाहिये, विशेष रूप से दवा पेटेंट और डेटा विशिष्टता के संबंध में।
- विश्व व्यापार संगठन (WTO) द्वारा स्वच्छता और पौध स्वच्छता उपायों पर समझौता (SPS करार):
- यह खाद्य सुरक्षा तथा पौध/पशु स्वास्थ्य से संबंधित उपायों को विनियमित करता है। अमेरिकी SPS मानक भारतीय खाद्य निर्यात के लिये गैर-शुल्क बाधाओं के रूप में कार्य करते हैं; अतः BTA में पारस्परिक मान्यता अथवा सामंजस्य संबंधी प्रावधान सम्मिलित किये जाने चाहिये, जिससे केवल टैरिफ कटौती से आगे बढ़कर भारतीय निर्यातकों को वास्तविक बाजार पहुँच प्राप्त हो सके।
विकसित भारत के लिये 'भारत-अमेरिका व्यापार धुरी' का लाभ कैसे उठाया जाए?
- वित्तीय फिसलन के बिना ऊर्जा सुरक्षा के लिये ग्रीन हाइड्रोजन मिशन और SMRs को गति प्रदान करें।
- खाड़ी देशों और पूर्वी एशिया के साथ मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) को तेजी से आगे बढ़ाएँ जिससे अमेरिकी खरीदारों पर अत्यधिक निर्भरता कम हो सके।
- "शून्य टैरिफ" का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन करें; प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिये सामंजस्यपूर्ण नियामक मानकों के साथ BTA को अंतिम रूप दें।
- 18% टैरिफ छूट का उपयोग असेंबली से डीप मैन्युफैक्चरिंग की ओर बढ़ने के लिये करें — "मेक इन इंडिया" के अधीन चीन से बाहर निकल रही आपूर्ति श्रृंखलाओं को आकर्षित करें।
- कृषि उत्पादों के लिये विशिष्ट सुरक्षा उपाय अपनाएं; कच्चे माल की तुलना में मूल्यवर्धित कृषि निर्यात को बढ़ावा दें।
- AI, अंतरिक्ष और सेमीकंडक्टर सहयोग के लिये iCET का लाभ उठाएं; फार्मा क्षेत्र में जनहित में बौद्धिक संपदा अधिकार छूट को बरकरार रखें।
निष्कर्ष
18% टैरिफ एक "रणनीतिक अवसर" है। भारत की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह अमेरिकी समर्थन के इस दौर का लाभ उठाकर आत्मनिर्भर विनिर्माण आधार (आत्मनिर्भर भारत) का निर्माण कर सके, जो भू-राजनीतिक परिस्थितियों में परिवर्तन आने पर भी वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम हो। इस समझौते के आधारभूत विधिक ढाँचे - संविधान के अनुच्छेद 73 और अनुच्छेद 253 से लेकर सीमा शुल्क टैरिफ अधिनियम, GATT के अनुच्छेद 24 और डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम (DPDP Act) अधिनियम तक - का सुदृढ़ उपयोग किया जाना चाहिये जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि भारत की प्रतिबद्धताओं को विधायी जवाबदेही, लोकतांत्रिक निगरानी और सांविधानिक अधिकारों के पूर्ण संरक्षण के साथ लागू किया जाए।
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