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आपराधिक कानून

अपीलीय न्यायालय दोषसिद्धि को रद्द या संशोधित कर सकता है

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 24-Apr-2026

असम राज्य बनाम मोइनुल हक उर्फ ​​मोनू 

"अपीलीय न्यायालय को निचले न्यायालय द्वारा दिये गए निष्कर्षों और दण्ड की सत्यता की जांच करने और न्याय के हित में आवश्यकतानुसार उन्हें पलटनेपरिवर्तित करने या पुष्टि करने का अधिकार प्राप्त है।" 

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

भारत के उच्चतम न्यायालय की न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने असम राज्य बनाम मोइनुल हक उर्फ मोनू (2026)के मामले में यह निर्णय दिया कि अपीलीय न्यायालय किसी दोषसिद्धि को चुनौती देने वाले अभियुक्त द्वारा दायर अपील के अभाव में भी दोषसिद्धि को पलटने या संशोधित करने के लिये सशक्त है। 

  • न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अभियुक्त की अपील न होने से निचले न्यायालय द्वारा दिये गए निष्कर्षों और दण्ड की सत्यता की परीक्ष करने और न्याय के हित में आवश्यक कार्रवाई करने के लिएये अपीलीय न्यायालय की अधिकारिता में कोई कमी नहीं आती है। 

असम राज्य बनाम मोइनुल हक उर्फ ​​मोनू (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • असम राज्य ने हत्या-बलात्संग के मामले में प्रत्यर्थी-अभियुक्त को दोषमुक्त करने के उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देते हुए सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर की। 
  • उच्च न्यायालय ने अभियुक्त को हत्या और बलात्संग के अपराधों से दोषमुक्त कर दिया थाजिसमें उसके विरुद्ध दोषी ठहराने वाली सामग्री की पहचान में गंभीर चूक का हवाला दिया गया था। 
  • यद्यपिप्रमुख अपराधों से दोषमुक्त करते हुएउच्च न्यायालय ने साथ ही साथ उन्हें भारतीय दण्ड संहिता की धारा 201 के अधीन अपराध (अपराध के साक्ष्य को मिटाना या अपराधी को बचाने के लिये मिथ्या जानकारी देना) के लिये दोषसिद्ध ठहराया था। 
  • गौरतलब है कि अभियुक्त ने भारतीय दण्ड संहिता की धारा 201 के अधीन इस दोषसिद्धि को चुनौती देते हुए कोई अपील दायर नहीं की थी। 
  • इस तरह की चुनौती न होते हुए भीउच्च न्यायालय ने अभियुक्त को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 201 के अधीन भी दोषी नहीं ठहराया। 
  • असम राज्य ने उच्चतम न्यायालय में दोषमुक्त किये जाने को चुनौती दीजिससे यह प्रश्न उठा कि क्या उच्च न्यायालय उस दोषसिद्धि में हस्तक्षेप कर सकता था जिसे अभियुक्त ने कभी चुनौती नहीं दी थी। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

न्यायालय ने निम्नलिखित प्रमुख टिप्पणियां कीं: 

अभियुक्त की अपील के अभाव से अपीलीय न्यायालय की शक्ति सीमित नहीं होती: 

  • अभियुक्त-प्रत्यर्थी द्वारा अपील न करने से अपीलीय न्यायालय स्वयं में दण्ड सुनाने वाले न्यायालय द्वारा अभिलिखित किये गए निष्कर्षों की सत्यता की परीक्षा करने के अपने अपीलीय अधिकारिता से वंचित नहीं हो जाता है। 
  • अपीलीय न्यायालय को अधीनस्थ न्यायालय द्वारा दिये गए निष्कर्षों और दण्ड की सत्यता की परीक्षा करने और न्याय के हित में आवश्यक होने पर उन्हें पलटनेपरिवर्तित या पुष्टि करने का अधिकार प्राप्त है। 

सांविधिक आधार — दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 386/धारा 427 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता: 

  • दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 386 (अबभारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 427 ) के अधीनअपीलीय न्यायालय को अधीनस्थ न्यायालय द्वारा अभिलिखित किये गए निष्कर्षों और दण्ड की सत्यता की परीक्षा करने और न्याय के हित में आवश्यक होने पर उन्हें उलटनेपरिवर्तित या पुष्टि करने का स्पष्ट अधिकार दिया गया है। 
  • यह शक्ति इस बात से स्वतंत्र रूप से कार्य करती है कि क्या अभियुक्त ने अपनी दोषसिद्धि के विरुद्ध अपील करने का विकल्प चुना है या नहीं। 

उच्च न्यायालय की त्रुटि और उच्चतम न्यायालय का हस्तक्षेप: 

  • न्यायालय ने माना कि उच्च न्यायालय ने भारतीय दण्ड संहिता की धारा 201 के अधीन दण्डनीय अपराध के लिये अभियुक्त-प्रत्यर्थी की दोषसिद्धि की पुष्टि करने में स्पष्ट रूप से गलती की है। 
  • अपनी अपीलीय शक्तियों का प्रयोग करते हुएउच्चतम न्यायालय ने भारतीय दण्ड संहिता की धारा 201 के अधीन अभियुक्त-प्रत्यर्थी की दोषसिद्धि और दण्ड में हस्तक्षेप करना उचित समझा। 
  • अंततः उच्चतम न्यायालय ने हत्या और बलात्संग के अपराधों के लिये अभियुक्तों को उच्च न्यायालय द्वारा दोषमुक्त किये जाने के निर्णय को बरकरार रखा और साथ हीदोषी ठहराने वाली सामग्री की पहचान में गंभीर चूक को देखते हुएभारतीय दण्ड संहिता की धारा 201 के अधीन दोषसिद्धि को भी रद्द कर दिया। 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 के अधीन आपराधिक अपीलें क्या हैं? 

1. दोषसिद्धि के विरुद्ध अपील (धारा 411 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता): 

  • अभियुक्त ने दोष सिद्ध होने के निर्णय को चुनौती दी हैयह दावा करते हुए कि दोष सिद्ध होना विधि या तथ्यों के आधार पर गलत है। 
  • कौन अपील दायर कर सकता है:दोषी ठहराया गया अभियुक्तयदि जेल में हैतो धारा 413 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन जेल अधीक्षक के माध्यम से अपील दायर की जा सकती है। 
  • आधार:साक्ष्यों का गलत मूल्यांकनभारतीय न्याय संहिता का गलत प्रयोगप्रक्रियात्मक अनियमितताअत्यधिक दण्ड 
  • अपील कहाँ की जा सकती है: 
    • न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा दोषसिद्धि  सेशन न्यायालय 
    • सेशन न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि  उच्च न्यायालय 
    • उच्च न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि  उच्चतम न्यायालय (अनुच्छेद 136 – SLP) 

2. दोषमुक्ति के विरुद्ध अपील (धारा 417 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता): 

  • राज्य या पीड़ित व्यक्ति दोषमुक्त किये जाने के आदेश को चुनौती देता हैयह आरोप लगाते हुए कि अभियुक्त को गलत तरीके से छोड़ दिया गया था। 
  • कौन मुकदमा दायर कर सकता है:लोक अभियोजक के माध्यम से राज्य सरकारपीड़ित (उच्च न्यायालय की अनुमति आवश्यक है)। 
  • आधार:विचारण न्यायालय ने महत्त्वपूर्ण साक्ष्यों की अनदेखी कीनिर्णय अनुचित या पक्षपातपूर्ण थासाक्षियों की विश्वसनीयता का गलत आकलन किया गया। 
  • अपील कहाँ की जा सकती है:उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय। 

3. केवल दण्ड के विरुद्ध अपील (धारा 415 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता): 

  • अभियुक्त अपना अपराध स्वीकार करता है लेकिन उसे दिये गई दण्ड में कमी या संशोधन की मांग करता है।              
  • कौन याचिका दायर कर सकता है:एक दोषी व्यक्ति जो अपना अपराध स्वीकार करता है लेकिन दण्ड कम करवाना चाहता है।         
  • दोषसिद्धि को चुनौती नहीं दी जा सकती - केवल दण्ड की मात्रा पर प्रश्न है।  

4. पीड़ित का अपील करने का अधिकार (धारा 428 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता का परंतुक):   

  • यह धारा 372 दण्ड प्रक्रिया संहिता के परंतुक का स्थान लेता है।  
  • पीड़ित अपर्याप्त दण्डकम दोषसिद्धि या दोषमुक्त होने के निर्णय को चुनौती देता है।  
  • पीड़ित निम्नलिखित के विरुद्ध अपील कर सकता है:अभियुक्त का दोषमुक्त होनाकम गंभीर अपराध के लिये दोषसिद्धिअपर्याप्त प्रतिकर या दण्ड 
  • अपील कहाँ की जा सकती है:उस न्यायालय के समक्ष जिसमें मामला सामान्यतः अपील के लिये जाता है — सेशन न्यायालय या उच्च न्यायालय। 

5. आपराधिक मामलों में उच्चतम न्यायालय में अपील (अनुच्छेद 134 और 136): 

  • उच्च न्यायालय के अंतिम निर्णय के बाद राज्य या अभियुक्त द्वारा दायर की जाती है 
  • अनुच्छेद 134 — कुछ आपराधिक मामलों में उच्चतम न्यायालय में अपील। 
  • अनुच्छेद 136 — विशेष अनुमति याचिका (SLP)); विवेकाधीन अपील। 
  • किसी गंभीर अन्याय या महत्त्वपूर्ण विधिक त्रुटि को सुधारने के लिये इसका प्रयोग किया जाता है। 

त्वरित तुलना तालिका — भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन दाण्डिक अपीलें, 2023 

अपील का प्रकार 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के उपबंध 

कौन दायर करता है 

मंच 

कब लागू होता है 

दोषसिद्धि के विरुद्ध अपील 

धारा 411 

अभियुक्त 

सेशन न्यायालय / उच्च न्यायालय /उच्चतम न्यायालय 

दोषसिद्धि को विधि या तथ्यों के आधार पर त्रुटिपूर्ण बताया गया है।  

केवल दण्ड के विरुद्ध अपील 

धारा  415 

अभियुक्त 

वही अपीलीय न्यायालय 

जब अपराध स्वीकार किया गया होकेवल दंड की मात्रा विवादित हो।  

दोषमुक्ति के विरुद्ध अपील 

धारा  417 

राज्य (लोक अभियोजक के माध्यम से) / पीड़ित (उच्च न्यायालय की अनुमति से) 

उच्च न्यायालय /उच्चतम न्यायालय 

जब दोषमुक्ति अनुचित या विकृत मानी जाए 

पीड़ित की अपील 

धारा  428 का परंतुक 

पीड़ित / विधिक उत्तराधिकारी 

सेशन न्यायालय / उच्च न्यायालय 

जब अभियुक्त दोषमुक्त होकम गंभीर अपराध में दोषसिद्ध होया अपर्याप्त प्रतिकर दिया गया हो।  

उच्चतम न्यायालय में अपील 

अनुच्छेद 134 और 136 

अभियुक्त / राज्य 

उच्चतम न्यायालय  

जब उच्च न्यायालय के निर्णय से गंभीर अन्याय या लोकमहत्त्व का प्रश्न उत्पन्न हो।