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आपराधिक कानून

अधीनस्थ कर्मचारियों के माध्यम से रिश्वत की मांग कराने पर भी लोक सेवक उत्तरदायी होगा

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 03-Jun-2026

लोकायुक्त पुलिस बनाम श्री के. रंगय्या और अन्य 

"प्रत्यर्थी संख्या द्वारा परिवादकर्त्ता को अपने अधीनस्थ पुलिस अधिकारियों को अवैध रिश्वत देने का अप्रत्यक्ष लेकिन स्पष्ट निदेशभ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा के स्पष्टीकरण 2(i) के अनुसारकिसी अन्य व्यक्ति के लिये अनुचित लाभ प्राप्त करने के प्रयास के दायरे में आता है।" 

न्यायमूर्ति संजय करोल और एन. कोटिस्वर सिंह 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ नेलोकायुक्त पुलिस बनाम श्री के. रंगय्या और अन्य (2026)के मामले में यह निर्णय दिया कि लोक सेवक को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा के अधीन दायित्त्व के लिये व्यक्तिगत रूप से रिश्वत की मांग करना या प्राप्त करना आवश्यक नहीं है। न्यायालय ने कर्नाटक उच्च न्यायालय के उस निर्णय को अपास्त कर दिया जिसमें अधीनस्थ अधिकारियों के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप से रिश्वत मांगने के अभियुक्त एक पुलिस सब-इंस्पेक्टर के विरुद्ध दर्ज प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) को निरस्त कर दिया गया थाऔर FIR और अभियुक्त के विरुद्ध सभी परिणामी कार्यवाही को बहाल कर दिया। 

लोकायुक्त पुलिस बनाम श्री के. रंगय्या और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी ? 

  • यह मामला कर्नाटक के सिरुगुप्पा पुलिस स्टेशन में तैनात सब-इंस्पेक्टर रंगय्या के विरुद्ध दायर एक परिवाद से उत्पन्न हुआ हैजिसने अन्य पुलिस अधिकारियों के साथ मिलकर परिवादकर्त्ता को कथित तौर पर अवैध रूप से राशन चावल बेचने के आरोप में धमकायाउसका वाहन जब्त कर लिया और उसके विरुद्ध मामला दर्ज कर लिया। 
  • तत्पश्चात्सब-इंस्पेक्टर के निदेश पर काम कर रहे एक पर-व्यक्ति के माध्यम से परिवादकर्त्ता से 50,000 रुपए की रिश्वत मांगी गई। आरोप है कि सब-इंस्पेक्टर ने परिवादकर्त्ता से कहा कि वह "अन्य पुलिस अधिकारियों के लिये कुछ करे" या "उन लड़कों को खुश करे"।  
  • परिवाद के आधार परकर्नाटक लोकायुक्त पुलिस ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 7(क) के अधीन एक सब-इंस्पेक्टरएक कांस्टेबल और एक निजी व्यक्ति के विरुद्ध प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज की। यद्यपिकर्नाटक उच्च न्यायालय ने इस आधार पर FIR को रद्द कर दिया कि सब-इंस्पेक्टर द्वारा न तो प्रत्यक्ष रूप से पैसे की मांग की गई थी और न ही पैसे स्वीकार किये गए थे। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • धारा के दायरे पर, जिसे स्पष्टीकरण के साथ पढ़ा जाए:न्यायालय ने माना कि उच्च न्यायालय भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 7(क) और स्पष्टीकरण की सही निर्वचन करने में असफल रहा। स्पष्टीकरण में स्पष्ट रूप से उन स्थितियों को शामिल किया गया है जहाँ कोई लोक सेवक किसी अन्य व्यक्ति के माध्यम सेजिसमें अधीनस्थ लोक सेवक भी शामिल हैरिश्वत मांगता है या स्वीकार करता हैजिससे अप्रत्यक्ष भ्रष्टाचार भी समान रूप से दण्डनीय हो जाता है। 
  • "अप्रत्यक्ष मांग" को पर्याप्त मानने पर:न्यायालय ने माना कि परिवादकर्त्ता को अपने अधीनस्थ अधिकारियों को अवैध रिश्वत देने का उप-निरीक्षक का निदेश अनुचित लाभ की "अप्रत्यक्ष मांग" थीजो धारा 7(क) के अंतर्गत "प्राप्त करने का प्रयास" के दायरे में आती है। रिश्वत का वास्तविक आदान-प्रदान भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के अधीन अभियोजन के लिये आवश्यक शर्त नहीं है। 
  • उच्च न्यायालय के संकीर्ण निर्वचन को अस्वीकार करते हुए:न्यायालय ने माना कि उच्च न्यायालय ने लोक सेवक द्वारा स्वयं प्रत्यक्षव्यक्तिगत और स्पष्ट मांग की आवश्यकता को गलत तरीके से शामिल किया है - एक ऐसा मानक जो धारा और स्पष्टीकरण के व्यापक सांविधिक भाषा द्वारा समर्थित नहीं है। भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम दायित्त्व को अधिकारी द्वारा व्यक्तिगत रूप से की गई मांग और स्वीकृति के कृत्यों तक सीमित नहीं करता है। 
  • स्पष्टीकरण के उद्देश्य पर:न्यायालय ने टिप्पणी की कि यदि उच्च न्यायालय के संकीर्ण निर्वचन को बरकरार रखा जाता हैतो इससे भ्रष्टाचार-विरोधी विधि में एक खतरनाक खामी पैदा हो जाएगीजिससे वरिष्ठ लोक अधिकारियों को अपने अधीनस्थों के माध्यम से रिश्वत वसूली करने और व्यक्तिगत रूप से इससे इंकार करने की छूट मिल जाएगी। इस प्रकार के निर्वचन से स्पष्टीकरण निरर्थक हो जाएगा और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम का स्पष्ट उद्देश्य ही असफल हो जाएगा। 
  • व्यक्तिगत लाभ की अप्रासंगिकता पर:न्यायालय ने माना कि यह तथ्य कि उप-निरीक्षक ने रिश्वत का कोई भाग व्यक्तिगत रूप से प्राप्त नहीं किया हो या प्राप्त करने का आशय नहीं किया होधारा के स्पष्टीकरण की स्पष्ट सांविधिक भाषा के कारण प्रथम दृष्टया जांच के प्रक्रम में पूरी तरह से अप्रासंगिक है। 
  • तदनुसारन्यायालय ने अभियुक्त के विरुद्ध प्रथम सूचना रिपोर्ट और उससे संबंधित सभी कार्यवाही को बहाल कर दियाऔर दोष या निर्दोषता के सभी प्रश्नों को विचारण के दौरान निर्धारित करने के लिये छोड़ दिया। 

भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 क्या है? 

बारे में: 

  • भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम भारत में भ्रष्टाचार निवारण और उससे संबंधित विधियों को समेकित और संशोधित करने के लिये बनाया गया एक अधिनियम है 

महत्त्वपूर्ण धाराएँ: 

  • धारा 3: "विशेष न्यायाधीशों की नियुक्ति का अधिकार" 
    • यह केंद्रीय/राज्य सरकार को भ्रष्टाचार के मामलों के विचारण के लिये विशेष न्यायाधीशों की नियुक्ति करने की अनुमति देता है। 
  • धारा 7: "लोक सेवक को रिश्वत देने से संबंधित अपराध" 
    • यह विधेयक लोक सेवकों द्वारा लोक कर्त्तव्यों को प्रभावित करने के लिये अनुचित लाभ प्राप्त करने से संबंधित है। 
    • दण्ड: 3-7 वर्ष का कारावास और जुर्माना। 
  • धारा 8: "लोक सेवक को रिश्वत देने से संबंधित अपराध" 
    • इसमें लोक सेवकों को अनुचित लाभ पहुँचाना शामिल है। 
    • दण्ड: अधिकतम वर्ष का कारावास या जुर्माना या दोनों। 
  • धारा 9: "व्यावसायिक संगठन द्वारा लोक सेवक को रिश्वत देने से संबंधित अपराध" 
    • यह व्यावसायिक संगठनों से जुड़े भ्रष्टाचार को संबोधित करता है। 
    • इसमें कॉर्पोरेट दायित्त्व के प्रावधान शामिल हैं। 
  • धारा 13: "लोक सेवक द्वारा आपराधिक दुराचार" 
    • यह लोक सेवकों द्वारा किये गए आपराधिक कदाचार को परिभाषित करता है। 
    • इसमें धन का दुरुपयोग और अवैध रूप से धन अर्जित करना शामिल है। 
    • दण्ड: 4-10 वर्ष का कारावास और जुर्माना। 
  • धारा 17: "अन्वेषण करने के लिये अधिकृत व्यक्ति" 
    • अन्वेषण करने के लिये अधिकृत पुलिस अधिकारियों के न्यूनतम पद का उल्लेख करता है। 
    • इसके लिये निर्दिष्ट अधिकारियों से अनुमोदन आवश्यक है। 
  • धारा 19: "अभियोजन के लिये पूर्व स्वीकृति आवश्यक" 
    • लोक सेवकों पर अभियोजन चलाने के लिये पूर्व स्वीकृति अनिवार्य बनाता है। 
    • स्वीकृति प्रदान करने के लिये सक्षम अधिकारियों का विवरण। 
  • धारा 20: "जहाँ लोक सेवक अनुचित लाभ स्वीकार करता हैवहाँ उपधारणा" 
    • अनुचित लाभ साबित होने पर भ्रष्टाचार की विधिक उपधारणा उत्पन्न होती है। 
  • धारा 23: "धारा 13(1)(क) के अधीन अपराध के संबंध में आरोप में विवरण" 
    • भ्रष्टाचार के मामलों में आरोप विरचित करने के लिये आवश्यक शर्तें विनिर्दिष्ट करता है।