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सिविल कानून

प्रतिरक्षा का समुचित अवसर प्रदान किये बिना दिया गया विदेशी निर्णय भारत में प्रवर्तनीय नहीं है

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 22-Apr-2026

मेसर ग्रिशेम जी.एम.बी.एच. बनाम गोयल गैसेज प्राइवेट लिमिटेड 

"विचारणीय विवाद्यकों की उपस्थिति में दावे का संक्षिप्त निपटारा उचित नहीं ठहराया जा सकता हैहम यह अभिमत व्यक्त करने के लिए बाध्य हैं कि उक्त विदेशी निर्णय सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 13(ख) की अपेक्षाओं के प्रतिकूल है।" 

न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक आराधे 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

भारत के उच्चतम न्यायालय की न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ नेमेसर ग्रीशाइम जी.एम.बी.एच. बनाम गोयल गैसेस प्राइवेट लिमिटेड (2026)के मामले में निर्णय दिया कि संक्षिप्त कार्यवाही में पारित विदेशी निर्णय - प्रतिवादी को प्रतिरक्षा का वास्तविक अवसर प्रदान किये बिना - सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 की धारा 13(ख) के अधीन भारत में लागू करने योग्य नहीं है। 

  • न्यायालय ने मेसर ग्रीशाइम जी.एम.बी.एच. (अब एयर लिक्विड डॉयचलैंड जी.एम.बी.एच.) द्वारा दायर सिविल अपील को खारिज कर दिया और गोयल गैसेस प्राइवेट लिमिटेड के विरुद्ध एक अंग्रेजी न्यायालय द्वारा पारित डिक्री को लागू करने से दिल्ली उच्च न्यायालय के इंकार को बरकरार रखा। 

मेसर ग्रीशाइम जी.एम.बी.एच. बनाम गोयल एम.जी. गैसेस प्राइवेट लिमिटेड (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • औद्योगिक गैसों के निर्माण और व्यवसाय में एक संयुक्त उद्यम स्थापित करने के लिये विदेशी अपीलकर्त्ता और भारतीय प्रत्यर्थी के बीच 1995 में एक शेयर खरीद और सहयोग करार किया गया था। 
  • पश्चात्वर्ती प्रत्यर्थी ने अपीलकर्त्ता द्वारा प्रत्याभूत सिटीबैंक UK से एक बाहरी वाणिज्यिक उधार सुविधा का लाभ उठाया। 
  • प्रत्यर्थी द्वारा ऋण चुकाने में व्यतिक्रम होने परऋणदाता ने प्रत्याभूति का सहारा लियाऔर अपीलकर्त्ता ने लगभग 4.78 मिलियन अमेरिकी डॉलर की बकाया देनदारी का संदाय कर दिया। 
  • इसके बाद अपीलकर्त्ता ने अपने प्रतिस्थापन अधिकारों का हवाला देते हुए प्रत्यर्थी से प्रतिपूर्ति की मांग की और एक अंग्रेजी न्यायालय के समक्ष कार्यवाही शुरू की। 
  • अंग्रेजी न्यायालय ने शुरू में व्यतिकारी निर्णय पारित कियाजिसे बाद में अपास्त कर दिया गयापश्चात्वर्तीएक संक्षिप्त निर्णय जारी किया गया जिसमें प्रत्यर्थी को ब्याज और लागत के साथ दावा की गई राशि का संदाय करने का निदेश दिया गया। 
  • अपीलकर्त्ता ने भारत में विदेशी डिक्री को लागू कराने के लिये सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 44क के अधीन दिल्ली उच्च न्यायालय में निष्पादन कार्यवाही दायर की। 
  • दिल्ली उच्च न्यायालय ने प्रवर्तन से इंकार कर दियाजिसके विरुद्ध वर्तमान अपील उच्चतम न्यायालय में दायर की गई थी। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

न्यायालय ने निम्नलिखित प्रमुख टिप्पणियां कीं: 

प्रतिरक्षा का अवसर दिये बिना संक्षिप्त निर्णय देना प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन है: 

  • जहाँ किसी विवाद में ऐसे तथ्य शामिल हों जिन पर गहन जांच की आवश्यकता होवहाँ संक्षिप्त अधिकारिता के माध्यम से मामले का निपटारा करने से समय से पहले निर्णय हो जाता है और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन होता है। 
  • जब दावों को समकालीन दस्तावेज़ों द्वारा समर्थित किया जाता है और दोनों पक्षकारों द्वारा मौखिक और दस्तावेज़ी साक्ष्य प्रस्तुत किये जाने की संभावना होती हैतो न्यायालय को संक्षिप्त निर्णय की कार्यवाही से बचना चाहिये 

विचारणीय विवाद्यक प्रश्नों के कारण पूर्ण विचारण अनिवार्य था: 

  • प्रत्यर्थी ने बैलेंस शीट और बोर्ड बैठकों के कार्यवृत्त जैसे समकालीन दस्तावेज़ों द्वारा समर्थित प्रतिरक्षा प्रस्तुत की थीजिनका सांविधिक महत्त्व था। 
  • इन दस्तावेज़ों से पता चलता है कि अपीलकर्त्ता द्वारा किये गए संदाय को वसूली योग्य दायित्त्व के बजाय दावों के विरुद्ध समायोजन के रूप में माना गया था - जिससे विचारणीय विवाद्यक सामने आए जिनके लिये पूर्ण विचारण की आवश्यकता है। 
  • साक्ष्य के रूप में संभावित महत्त्व वाली दस्तावेज़ी सामग्री की मौजूदगी यह इंगित करने के लिये पर्याप्त थी कि मामले का संक्षिप्त निपटारा नहीं किया जा सकता था। 

धारा 13(ख) सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन विदेशी निर्णय अप्रवर्तनीय: 

  • मुकदमे के लिये विचारणीय विवाद्यकों की मौजूदगी में दावे का संक्षिप्त निपटारा करने से प्रत्यर्थी को अपना मामला साबित करने का सार्थक अवसर प्रभावी रूप से नहीं मिल पाया। 
  • अंग्रेजी न्यायालय द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया को भारत और ब्रिटेन दोनों में लागू होनी  वाली विधि के सुस्थापित सिद्धांतों के साथ असंगत माना गया। 
  • तदनुसारविदेशी निर्णय को सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 13(ख) का उल्लंघन माना गया और इसे भारत में अप्रवर्तनीय घोषित कर दिया गया। 

विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम (FERA) के अधीन भारतीय रिज़र्व बैंक की अनुमति पर स्पष्टीकरण: 

  • यद्यपि विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम (FERA) के अंतर्गत पूर्व अनुमति के बिना विधिक कार्यवाही प्रारंभ करने पर कोई निषेध नहीं हैतथापि विदेशी डिक्री के प्रवर्तन हेतु कोई भी कदम उठाने से पूर्व केंद्रीय सरकार अथवा भारतीय रिज़र्व बैंक की अनुमति प्राप्त करना आवश्यक है 
  • इस निर्वचन को न्याय तक पहुँच और विदेशी मुद्रा संव्यवहार पर नियामक नियंत्रण के मूल्यों के बीच संतुलन बनाने के लिये अपनाया गया था। 

सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 की धारा 13 क्या है? 

  • सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 13 में कहा गया है कि विदेशी निर्णय उसके द्वारा उन्हीं पक्षकारों के बीच या उसी हक के अधीन मुकदमा करने वाले ऐसे पक्षकारों के बीचजिनसे व्युत्पन्न अधिकार के अधीन वे या उनमें से कोई दावा करते हैं. प्रत्यक्षतः न्यायनिर्णीत किसी विषय के बारे में वहाँ के सिवाय निश्चायक होगा, सिवाय 
    • (क) जहाँ वह सक्षम अधिकारिता वाले न्यायालय द्वारा नहीं सुनाया गया है; 
    • (ख) जहाँ वह मामले के गुणागुण के आधार पर नहीं दिया गया है 
    • (ग) जहाँ कार्यवाहियों के सकृत दर्शने स्पष्ट है कि वह अन्तर्राष्ट्रीय विधि के अशुद्ध बोध पर या भारत की विधि को उन मामलों में जिनको वह लागू हैमान्यता देने से इन्कार करने पर आधारित है; 
    • (घ) जहाँ वे कार्यवाहियांजिनमें वह निर्णय अभिप्राप्त किया गया थानैसर्गिक न्याय के विरुद्ध हैं; 
    • (ङ) जहाँ वह कपट द्वारा अभिप्राप्त किया गया है; 
    • (जहाँ वह भारत में प्रवृत्त किसी विधि के भंग पर आधारित दावे को ठीक ठहराता है 
  • इस धारा में यह उपबंधित किया गया है कि उपर्युक्त छह खंडों को छोड़कर, कोई विदेशी निर्णय पूर्व-न्याय के रूप में कार्य कर सकता है। 
  • (क) सक्षम न्यायालय द्वारा नहीं दिया गया विदेशी निर्णय: 
    • किसी विदेशी न्यायालय का निर्णय पक्षकारों के बीच अंतिम रूप से निश्चायक होने के लियेसक्षम अधिकारिता वाले न्यायालय द्वारा न्यायनिर्णीत होना आवश्यक है। 
    • एक सक्षम न्यायालय से तात्पर्य ऐसे न्यायालय से है जिसके पास पक्षकारों और विषय वस्तु पर अधिकारिता हो। 
    • निम्नलिखित मामलों में विदेशी देश के न्यायालय को अधिकारिता प्राप्त है: 
      • जहाँ मुकदमे की शुरुआत के समय प्रतिवादी उस देश में निवासी या उपस्थित थाजिससे उसे विधि का लाभ मिल सके और वह विधियों के संरक्षण में रहे। 
      • जहाँ प्रतिवादी वाद के निर्णय के समय उस देश का नागरिक या प्रजा हो। 
      • जहाँ किसी देश की न्यायालयों की अधिकारिता पर आपत्ति करने वाले पक्षकार ने अपने आचरण से ऐसे अधिकारिता को स्वीकार कर लिया हो, 
        • मुकदमे में वादी के रूप में पेश होना या प्रतिदावा करनाया 
        • ऐसे मुकदमे में स्वेच्छया से प्रतिवादी के रूप में उपस्थित होनाया 
        • स्पष्ट या अप्रत्यक्ष रूप से ऐसे न्यायालयों की अधिकारिता को स्वीकार करने की संविदा की गई हो। 
    • भारत निधि लिमिटेड बनाम मेघ राज महाजन (1964)के मामले में यह निर्णय दिया गया था कि किसी विदेशी निर्णय कोभारतीय न्यायालय में पूर्व-न्यायके रूप में लागू होने के लिये केवल सक्षम अधिकारिता वाले विदेशी न्यायालय द्वारा ही पारित किया जाना चाहिये  
  • (ख) विदेशी निर्णय जो गुण-दोष पर आधारित न हो:: 
    • विदेशी निर्णय को निश्चायक होने के लिये मामले की गुण-दोष पर आधारित होना चाहियेअर्थात् इसमें मामले की सत्यता या असत्यता का पता लगाने के लिये न्यायालय द्वारा गहन विचार-विमर्श शामिल होना चाहिये 
    • यह तय करने के लिये कि निर्णय गुण-दोष के आधार पर दिया गया है या नहींवास्तविक कसौटी यह देखना है कि क्या यह केवल एक सामान्य प्रक्रिया के रूप में पारित किया गया थाया प्रतिवादी के किसी आचरण के दण्ड के रूप में पारित किया गया थाया वादी के दावे की सत्यता या असत्यता पर विचार के आधार पर पारित किया गया था।  
  • (ग) भारतीय या अंतर्राष्ट्रीय विधि के विरुद्ध विदेशी निर्णय: 
    • अंतर्राष्ट्रीय विधि की गलत निर्वचन के आधार पर दिया गया निर्णय या जहाँ भारत की विधि लागू होती है वहाँ उसके विधि को मान्यता देने से इंकार करना अंतिम नहीं होता है। 
    • कार्यवाही के दौरान त्रुटी स्पष्ट रूप से दिखाई देनी चाहिये 
  • (घ) प्राकृतिक न्याय के विरुद्ध विदेशी निर्णय: 
    • निर्णय में प्राकृतिक न्याय की न्यूनतम आवश्यकताओं का पालन किया जाना चाहियेअर्थात् विवाद के पक्षकारों को उचित सूचना दी जानी चाहिये और प्रत्येक पक्षकार को अपना पक्ष प्रस्तुत करने का पर्याप्त अवसर प्रदान किया जाना चाहिये 
    • यह ध्यान देने योग्य है कि केवल इस तथ्य से कि विदेशी न्यायालय ने भारतीय न्यायालय की प्रक्रिया का पालन नहीं कियाविदेशी निर्णय को इस आधार पर अमान्य नहीं किया जा सकता कि कार्यवाही प्राकृतिक न्याय के विरुद्ध है। 
    • शंकरन बनाम लक्ष्मी (1974)के मामले मेंउच्चतम न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि प्राकृतिक न्याय अभिव्यक्ति मामले के गुण-दोषों के बजाय प्रक्रिया में अनियमितताओं से संबंधित है। 
  • (कपट द्वारा प्राप्त विदेशी निर्णय: 
    • निजी अंतर्राष्ट्रीय विधि का यह एक सुस्थापित सिद्धांत है कि यदि विदेशी निर्णय कपट से प्राप्त किये जाते हैंतो वे पूर्व-न्याय के रूप में कार्य नहीं करेंगे। 
      • न्यायिक मामलों से संबंधित किसी भी प्रकार का कपटन्यायिक कार्यवाही को अमान्य कर देता है। 
      • यह कपट या तो उस पक्षकार के साथ किया जा सकता है जो किसी विदेशी निर्णय को अमान्य घोषित कर रहा है जिसके पक्ष में निर्णय सुनाया गया हैया फिर उस न्यायालय के साथ किया जा सकता है जिसने निर्णय दिया है। 
    • सत्य बनाम तेजा सिंह (1975)के मामले में, उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि वादी ने विदेशी न्यायालय को इस संबंध में गुमराह किया था कि उसके पास मामले की अधिकारिता हैयद्यपि उसके पास अधिकारिता नहीं हो सकती थीनिर्णय और डिक्री कपट से प्राप्त की गई थी और इसलिये अनिश्चायक है। 
  • (भारतीय विधि के उल्लंघन पर आधारित विदेशी निर्णय: 
    • धारा 13(च) केअधीन यह आवश्यक नहीं है कि विदेशी न्यायालय की प्रक्रिया भारत में न्यायालयों की प्रक्रिया के समान या समरूप हो। 
  • यद्यपिजब कोई विदेशी निर्णय भारत में लागू किसी विधि के उल्लंघन पर आधारित होती हैतोउसे भारत में लागू नहीं किया जाएगा।