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आपराधिक कानून

विभिन्न अभियुक्तों द्वारा संयुक्त कथन

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 30-Apr-2026

आनंद जक्कप्पा पुजारी उर्फ गद्दादर बनाम कर्नाटक राज्य 

"यदि कोई तथ्य पहले ही खोजा जा चुका हैतो उसके संबंध में बाद में दी गई कोई भी जानकारी उस तथ्य की खोज का कारण नहीं मानी जा सकती। उसकी पुनः खोज संभव नहीं है।" 

न्यायमूर्ति जे.बी. परदीवाला और न्यायमूर्ति के.वीविश्वनाथन 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों?   

उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति जे.बी. परदीवाला और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन की पीठ नेआनंद जक्कप्पा पुजारी उर्फ ​​गद्दादर बनाम कर्नाटक राज्य (2026) के मामलेमें यह निर्णय दिया कि विभिन्न अभियुक्तों द्वारा दिये गए संयुक्त या एक साथ दिये गए कथन भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 27 के अधीन तभी ग्राह्य हैंजब प्रत्येक कथन अपराध से संबंधित एक विशिष्ट और सुसंगत तथ्य की खोज की ओर ले जाता हो। न्यायालय ने आगे कहा कि एक बार खोजे गए तथ्य को किसी अन्य अभियुक्त के विरुद्ध पुनः नहीं खोजा जा सकता हैऔर केवल अंतिम बार देखे जाने की परिस्थितिबिना संपुष्टि केदोषसिद्धि का आधार नहीं बन सकती। अंततः अपीलकर्त्ताओं को दोषमुक्त कर दिया गया। 

आनंद जक्कप्पा पुजारी उर्फ ​​गद्दादर बनाम कर्नाटक राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी 

  • 23 मार्च 2013 को कर्नाटक से एक महिला लापता हो गई थीचार दिन बाद जंगल क्षेत्र में उसके जले हुए कंकाल के अवशेष मिले थे। 
  • अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया कि उसके भाई ने उससे बड़ी मात्रा में धन और सोना उधार लिया था और तीन अन्य अभियुक्तों के साथ मिलकर भुगतान से बचने की षड्यंत्र किया था 
  • आरोप यह था कि अभियुक्तों ने पीड़िता का अपहरण कर उसकी हत्या कर दी और फिर साक्ष्य मिटाने के लिये उसके शव को जला दिया। 
  • अभियोजन पक्ष ने चारों अभियुक्तों द्वारा दिये गए संयुक्त कथन पर विश्वास कियाजिन्हें एक पुलिस वाहन में एक साथ ले जाया गया और एक-एक करके वह स्थान दिखाया गया जहाँ कथित तौर पर पीड़िता की हत्या की गई थी और उसके शरीर को जलाया गया था। 
  • विचारण न्यायालय ने चारों अभियुक्तों को दोषी पायाउच्च न्यायालय ने इस निर्णय को बरकरार रखा। 
  • अभियुक्तों में से दो ने संयुक्त प्रकटीकरण कथनों की साक्ष्य वैधता और अंतिम बार देखे जाने के साक्ष्य की पर्याप्तता को चुनौती देते हुए उच्चतम न्यायालय में दाण्डिक अपीलें दायर कीं। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • संयुक्त कथन स्वतः अग्राह्य नहीं हैं: 
    • स्टेट एन.सी.टी. ऑफ दिल्ली बनाम नवजोत संधू (2005) का हवाला देते हुए न्यायालय ने निर्णय दिया कि संयुक्त या एक साथ किये गए प्रकटीकरण साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 के अधीन स्वतः अग्राह्य नहीं हैं। 
    • न्यायालय ने इस बात को स्वीकार किया कि ऐसे संयुक्त कथनों में वास्तव में किसने क्या कहायह पता लगाना व्यावहारिक रूप से कठिन हैऔर नागम्मा उर्फ नागरत्ना बनाम कर्नाटक राज्य (2025) से दोहराया कि संयुक्त प्रकटीकरण का मूल्यांकन करते समय अधिक सावधानी बरतनी चाहिये 
  • विशिष्टता और भिन्नता की आवश्यकता: 
    • इस मामले में पंच साक्षी ने प्रत्येक अभियुक्त द्वारा दिये गए विशिष्ट कथन के बारे में साक्ष्य नहीं दिया थाऔर ऐसा कुछ भी नहीं था जिससे यह संकेत मिले कि अपीलकर्त्ताओं के कहने पर कोई विशिष्ट तथ्य सामने आया था। 
    • न्यायालय ने माना कि प्रत्येक अभियुक्त द्वारा दी गई जानकारी का खोजी गई घटना से प्रत्यक्षत और स्पष्ट संबंध होना चाहियेकिसी तथ्य की "खोज" केवल एक बार ही की जा सकती है और उसी खोज के आधार पर कई अभियुक्तों के विरुद्ध बार-बार उसका प्रयोग नहीं किया जा सकता है। 
  • पुनः खोज अनुमेय नहीं: 
    • जहाँ कोई तथ्य पहले ही खोजा जा चुका हैउस संबंध में दी गई कोई भी पश्चात्वर्ती जानकारी किसी नई खोज की ओर नहीं ले जाती है और इसलिये धारा 27 के अधीन अग्राह्य है। 
    • जहाँ सूचना पहले से ही पुलिस के पास विद्यमान हैवहाँ किसी अन्य अभियुक्त द्वारा उसकी पुनरावृत्ति को नई खोज नहीं माना जाता है। 
  • अपवाद — विभिन्न स्थानों से प्राप्त भिन्न तथ्य: 
    • जहाँ कई अभियुक्त त्वरित क्रम में कथन देते हैं और प्रत्येक कथन विभिन्न स्थानों से अलग-अलग तथ्यों की खोज की ओर ले जाता हैतो कथनों को "संयुक्त" माना जा सकता हैफिर भी जो चीज़ें बरामद होती हैंवे भिन्न और सबूत के तौर पर मान्य रहती हैं- जैसा कि लछमन सिंह बनाम राज्य (1952) 1 एससीसी 362 और राज्य बनाम छोटेलाल मोहनलाल एआईआर 1955 नाग 71 में मान्यता दी गई है।  
    • धारा 27 के अधीन स्वैच्छिकता और सत्यता की गारंटी तभी संतुष्ट होती है जब प्रत्येक अभियुक्त के कथन से एक विशिष्ट तथ्य का पता चलता है। 
  • वर्तमान मामला — एक ही तथ्य की संयुक्त खोज: 
    • इस मामले मेंसाक्ष्यों से पता चला कि चारों अभियुक्तों ने एक ही मानसिक तथ्य की संयुक्त रूप से एक साथ खोज की थीजिससे किसी विशेष अभियुक्त को कोई अलग खोज सौंपना असंभव हो गया। 
    • इसलियेमृतक की हत्या के स्थान और शव को जलाने के स्थानदोनों स्थानों से प्राप्त साक्ष्यों का उपयोग अपीलकर्त्ताओं के विरुद्ध नहीं किया जा सकता था। 
  • अंतिम बार देखे जाने के साक्ष्य मात्र अपर्याप्त हैं: 
    • अभियोजन पक्ष द्वारा मुख्य रूप से इस बात पर बल दिया गया कि अभियुक्त मृतक के लापता होने से पहले आखिरी बार उसके साथ देखे गए थे। 
    • न्यायालय ने माना कि अतिरिक्त साक्ष्यों के अभाव मेंजो अपीलकर्त्ताओं को अपराध से जोड़ते होंकेवल अंतिम बार देखे जाने के साक्ष्य के आधार पर दोषसिद्धि को बरकरार रखना "बहुत जोखिम भरा" होगा। 
  • परिणाम: 
    • उच्चतम न्यायालय ने दाण्डिक अपीलों को मंजूर करते हुए दोनों अपीलकर्त्ताओं की दोषसिद्धि को अपास्त कर दियायह मानते हुए कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की श्रृंखला अपूर्ण थी और न तो संयुक्त प्रकटीकरण कथन और न ही अंतिम बार देखे जाने के साक्ष्यअकेलेयुक्तियुक्त संदेह से परे अपराध साबित करने के लिये पर्याप्त थे। 

भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 27 क्या है? 

बारे में: 

  • भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 ने इस नियम में एकसीमित अपवादबनाया कि पुलिस के समक्ष की गई संस्वीकृति अग्राह्य हैं। 
  • इसमेंअभियुक्त के कथन केकेवल उसी भाग कोसाबित करने की अनुमति दी गई थी जो स्पष्ट रूप से दी गई जानकारी के परिणामस्वरूपपता चले तथ्य से संबंधित हो। 

भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 के प्रमुख उपबंध: 

  • यह केवल तभी लागू होता है जब अभियुक्तपुलिस अभिरक्षा मेंहो। 
  • यह केवल उस जानकारी के भाग कोसाबित करने की अनुमति देता हैजो सीधे तौर पर किसी सुसंगत तथ्य (जैसेआयुधचोरी की संपत्ति) की खोज की ओर ले जाती है। 
  • इसके पीछे तर्क यह है कि खोज सेकथन के उस भाग कोविश्वसनीयता मिलती है। 

भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 को लागू करने के लिये आवश्यक शर्तें: 

  • यह बात पेरुमल राजा उर्फ ​​पेरुमल बनाम राज्यपुलिस निरीक्षक द्वारा प्रतिनिधित्व (2023)के मामले में निर्धारित की गई थी, जहाँ न्यायालय ने निम्नलिखित निर्णय दिया: 
    • सबसे पहलेतथ्यों की खोज होनी चाहिये। ये तथ्य अभियुक्त व्यक्ति से प्राप्त जानकारी के परिणामस्वरूप सुसंगत होने चाहिये 
    • दूसरेइस तरह के तथ्य की खोज का साक्षी रूप में कथन करना आवश्यक है। इसका अर्थ यह है कि यह तथ्य पहले से ही पुलिस को ज्ञात नहीं होना चाहिये 
    • तीसराजानकारी प्राप्त होने के समयअभियुक्त पुलिस की अभिरक्षा में होना चाहिये 
    • अंत मेंकेवल उतनी ही जानकारी ग्राह्य है जो इस प्रकार खोजे गए तथ्य से स्पष्ट रूप से संबंधित हो। 
    • इस खोजे गए तथ्य में निम्नलिखित बातें शामिल होंगी:  
      • वह "स्थान" जहाँ से वस्तु बरामद की जाती है। 
      • इस संबंध में अभियुक्त का ज्ञान। 

भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA), 2023 में उपबंध: 

  • भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 की विषय-वस्तु को अब भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 23 (पुलिस के समक्ष संस्वीकृति) के परंतुक के रूप में समाविष्ट किया गया है। 
  • यह परंतुक उसी नियम को बरकरार रखता है: 
    अभियुक्त के कथन का केवल वही भाग ग्राह्य है जो प्रत्यक्षत साक्ष्य प्राप्ति की ओर ले जाता है।