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आपराधिक कानून
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 225
« »23-Apr-2026
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राजीव मेहता उर्फ राजीव किशोर कीर्तिलाल मेहता बनाम परम बीर सिंह "यह मजिस्ट्रेट के लिये अनिवार्य है कि वह धारा 225 को लागू करे, यदि वह इस बात से संतुष्ट हो जाता है कि अभियुक्त व्यक्ति उस क्षेत्र से बाहर किसी स्थान पर रह रहा है जिसमें वह अधिकारिता का प्रयोग करता है।" न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
भारत के उच्चतम न्यायालय की न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने राजीव मेहता उर्फ राजीव किशोर कीर्तिलाल मेहता बनाम परमबीर सिंह (2026) के मामले में यह निर्णय दिया कि जहाँ कोई अभियुक्त परिवाद का संज्ञान लेने वाले मजिस्ट्रेट के राज्यक्षेत्रीय अधिकारिता से बाहर रहता है, वहाँ मजिस्ट्रेट प्रक्रिया जारी करने से पहले या तो स्वयं जांच करने या भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 225 के अधीन अन्वेषण का निदेश देने के लिये सांविधिक रूप से बाध्य है।
- न्यायालय ने पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के उस निर्णय को अपास्त कर दिया, जिसमें मजिस्ट्रेट द्वारा धारा 225 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता का अनुपालन किये बिना अभियुक्त के विरुद्ध कार्यवाही करने के निर्णय को बरकरार रखा गया था।
राजीव मेहता बनाम परमबीर सिंह (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- एक मजिस्ट्रेट के समक्ष अपीलकर्त्ता के विरुद्ध आपराधिक परिवाद दर्ज किया गया था, जिसमें कि स्वीकार किया गया था कि वह उस न्यायालय की राज्यक्षेत्रीय अधिकारिता से बाहर रह रहा था।
- अपीलकर्त्ता ने दो मुख्य आधारों पर कार्यवाही को चुनौती दी: पहला, कि मजिस्ट्रेट के पास राज्यक्षेत्रीय अधिकारिताका अभाव था; और दूसरा, कि मजिस्ट्रेट द्वारा धारा 223 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन परिवाद की परीक्षा करने की शक्ति का प्रयोग करने से पहले धारा 225 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन विहित अनिवार्य प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया था।
- अधिकारिता संबंधी आपत्ति पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के समक्ष उठाई गई थी, लेकिन उस पर कोई निर्णय नहीं लिया गया।
- उच्च न्यायालय ने धारा 225 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अनुपालन पर बल दिये बिना कार्यवाही को बरकरार रखा, जिसके कारण अपीलकर्त्ता ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
न्यायालय ने निम्नलिखित प्रमुख टिप्पणियां कीं:
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 225 अनिवार्य है, निर्देशात्मक नहीं:
- जहाँ मजिस्ट्रेट को परिवाद प्राप्त होने पर यह संतुष्टि हो जाती है कि अभुयुक्त उसके राज्यक्षेत्रीय अधिकारिता के बाहर रहता है, तो उसे अनिवार्य रूप से धारा 225 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता लागू करनी होगी।
- मजिस्ट्रेट धारा 225 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन आवश्यक जांच किये बिना या अन्वेषण का निदेश दिये बिना सीधे धारा 223 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन प्रक्रिया जारी नहीं कर सकता या कार्यवाही नहीं कर सकता।
उच्च न्यायालय ने गैर-अनुपालन को बरकरार रखने में त्रुटी की:
- उच्चतम न्यायालय ने माना कि उच्च न्यायालय ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 225 के अनुपालन न करने की अनदेखी करने में त्रुटी की, जबकि यह स्वीकार किया गया था कि अभियुक्त मजिस्ट्रेट के राज्यक्षेत्रीय अधिकारिता से बाहर रह रहा था।
- उच्च न्यायालय के तर्क को स्वीकार करने से धारा 225 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता निरर्थक और अनावश्यक हो जाएगी - जो कि सांविधिक निर्वचन में अस्वीकार्य परिणाम है।
अधिकारिता पर निर्णय हेतु पुनर्विचार हेतु मामला वापस भेजा जाए:
- अपील मंजूर कर ली गई और मामले को उच्च न्यायालय को वापस भेज दिया गया जिससे मजिस्ट्रेट के राज्यक्षेत्रीय अधिकारिता के अनसुलझे मुद्दे पर नए सिरे से निर्णय लिया जा सके।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 225 क्या है?
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 225— आदेशिका के जारी किये जाने को मुल्तवी करना :
इस शक्ति का प्रयोग कौन कर सकता है:
- अपराध का संज्ञान लेने के लिये अधिकृत कोई भी मजिस्ट्रेट।
- यह नियम उन मामलों में भी लागू होता है जहाँ धारा 212 के अधीन उनके समक्ष परिवाद दर्ज कराया गया हो।
मूल शक्ति — प्रक्रिया का मुल्तवी करना:
- परिवाद प्राप्त होने पर, मजिस्ट्रेट अभियुक्त के विरुद्ध कार्यवाही शुरू करने को मुल्तवी कर सकता है।
- सामान्य मामलों में मुल्तवी विवेकाधीन होता है।
- यदि अभियुक्त मजिस्ट्रेट के राज्यक्षेत्रीय अधिकारिता से बाहर रहता है तो सुनवाई मुल्तवी करना अनिवार्य है।
मुल्तवी के बाद, मजिस्ट्रेट निम्न में से कोई एक कार्य कर सकता है:
- वह स्वयं मामले की जांच करे, या
- पुलिस अधिकारी या किसी अन्य उपयुक्त व्यक्ति द्वारा अन्वेषण का निदेश दे सकता है।
उद्देश्य: यह तय करना कि अभियुक्त के विरुद्ध कार्यवाही करने के लिये पर्याप्त आधार विद्यमान है या नहीं।
परंतुक — अन्वेषण निर्देशित करने पर रोक:
दो स्थितियों में अन्वेषण निर्देशित नहीं किया जा सकता:
- जहाँ अपराध की सुनवाई केवल सेशन न्यायालय द्वारा ही की जा सकता है।
- जहाँ न्यायालय द्वारा परिवाद नहीं किया जाता है, सिवाय इसके कि:
- परिवादकर्त्ता से धारा 223 के अधीन शपथ पर पूछताछ की गई है, और
- उपस्थित साक्षियों (यदि कोई हों) से भी शपथ पर पूछताछ की गई है।
जांच के दौरान साक्ष्य लेना (उपधारा 2):
- मजिस्ट्रेट साक्षियों के कथन शपथ पर ले सकता है - यह विवेकाधीन है।
- अपवाद (अनिवार्य): यदि अपराध केवल सेशन न्यायालय द्वारा विचारणीय है → मजिस्ट्रेट परिवादकर्त्ता के सभी साक्षियों को बुलाएगा और शपथ पर उनसे पूछताछ करेगा।
गैर-पुलिस अन्वेषणकर्त्ता की शक्तियां (उपधारा 3):
- अन्वेषण करने के लिये निर्देशित एक गैर-पुलिस व्यक्ति को पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी के सभी अधिकार प्राप्त होते हैं।
- एक अपवाद: बिना वारण्ट के गिरफ्तार करने का अधिकार नहीं।
दण्ड प्रक्रिया संहिता के समतुल्य:
- धारा 225 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता = धारा 202 दण्ड प्रकिया संहिता
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता में प्रमुख संशोधन: जब अभियुक्त राज्यक्षेत्रीय अधिकारिता से बाहर हो तो अनिवार्य मुल्तवी को एक स्पष्ट सांविधिक दायित्त्व बना दिया गया है।