- बुक्स एवं मैगज़ीन्स
- लॉग इन
- भाषा: Eng हिंदी
होम / करेंट अफेयर्स
पारिवारिक कानून
विवाह-विच्छेद की याचिका दायर करने के लिये विवाह रजिस्ट्रीकरण अनिवार्य नहीं है
« »29-Apr-2026
|
श्रीमती रत्ना पी. बनाम श्री चिक्कमंचैया एस.एम. "विशेष विवाह अधिनियम, 1954 में ऐसा कोई विशिष्ट प्रावधान नहीं है जो यह परिकल्पना करता हो कि विवाह-विच्छेद की डिग्री के लिये याचिका तब तक पोषणीय नहीं है जब तक कि विवाह अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत न हो।" न्यायमूर्ति के. मनमधा राव |
स्रोत: कर्नाटक उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
कर्नाटक उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति के. मनमधा राव की अध्यक्षता वाली एकल पीठ ने श्रीमती रत्ना पी. बनाम श्री चिक्कमनचैया एस.एम. (2026) के मामले में यह निर्णय दिया कि विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के अधीन विवाह का रजिस्ट्रीकरण अधिनियम की धारा 27 के अंतर्गत विवाह-विच्छेद की याचिका दायर करने के लिये अनिवार्य शर्त नहीं है। न्यायालय ने कनकपुरा कुटुंब न्यायालय के उस आदेश को बरकरार रखा जिसमें रजिस्ट्रीकरण न होने के आधार पर पति की विवाह-विच्छेद की याचिका को खारिज करने से इंकार कर दिया गया था, और पत्नी की इस आदेश को चुनौती देने वाली रिट याचिका को खारिज कर दिया।
श्रीमती रत्ना पी बनाम श्री चिक्कमनचैया एस.एम. (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- अनुसूचित जनजाति 'मेडा' से संबंधित दोनों पक्षकारों ने अप्रैल 2006 में सामुदायिक और पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार अपना विवाह संपन्न किया।
- यह विवाह विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के अधीन कभी रजिस्ट्रीकृत नहीं हुआ था।
- विवाह से एक बच्चा हुआ था, और दोनों पक्ष 2009 से पृथक् रह रहे हैं।
- 'मेडा' अनुसूचित जनजाति के सदस्य होने के नाते, उन्हें हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 2(2) के दायरे से अपवर्जित रखा गया था।
- पति ने प्रारंभ में कनकपुरा कुटंब न्यायालय के समक्ष हिंदू विवाह अधिनियम के अधीन विअव्ह-विच्छेद की याचिका दायर की, जिसे अधिकारिता के अभाव में खारिज कर दिया गया।
- इसके बाद उन्होंने क्रूरता और परित्याग का हवाला देते हुए विशेष विवाह अधिनियम, 1954 की धारा 27(ख) के अधीन विवाह विच्छेद याचिका दायर की।
- पत्नी ने जून 2025 में कुटुंब न्यायालय के समक्ष एक अंतरिम आवेदन दायर किया, जिसमें यह तर्क दिया गया कि धारा 27 के अधीन विवाह-विच्छेद की याचिका को पोषणीय बनाने के लिये विशेष विवाह अधिनियम के अधीन विवाह का रजिस्ट्रीकरण अनिवार्य है।
- कुटुंब न्यायालय ने पत्नी की अंतरिम याचिका खारिज कर दी।
- इससे व्यथित होकर पत्नी ने कर्नाटक उच्च न्यायालय का रुख किया और कुटुंब न्यायालय द्वारा धारा 15 के निर्वचन को अनिवार्य के बजाय निदेशात्मक मानने को चुनौती दी।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
न्यायालय ने निम्नलिखित प्रमुख टिप्पणियां कीं:
धारा 15 — निदेशात्मक, अनिवार्य नहीं:
- न्यायालय ने यह माना कि विशेष विवाह अधिनियम की धारा 15, जो अन्य रूपों में अनुष्ठित विवाहों के रजिस्ट्रीकरण के लिये शर्तें निर्धारित करती है, रजिस्ट्रीकरण को अनिवार्य घोषित नहीं करती है।
- अधिनियम में ऐसा कोई विनिर्दिष्ट प्रावधान नहीं है जिसमें यह कहा गया हो कि धारा 27 के अधीन विवाह-विच्छेद की याचिका तब तक पोषणीय नहीं है जब तक कि विवाह रजिस्ट्रीकृत न हो।
- इस अधिनियम के अधीन विवाह का रजिस्ट्रीकरण केवल निदेशात्मक प्रकृति का है।
रजिस्ट्रीकरण का प्रभाव — लाभ, पूर्व शर्त नहीं:
- न्यायालय ने कहा कि यदि विवाह अधिनियम के अंतर्गत रजिस्ट्रीकृत है, तो धारा 18 पक्षकारों को कुछ लाभ प्रदान करती है।
- यद्यपि, इन लाभों के अलावा, अधिनियम के अधीन अनिवार्य रजिस्ट्रीकरण की कोई आवश्यकता नहीं है।
- न्यायालय ने धारा 27क का विशेष रूप से उल्लेख किया, जो विवाह-विच्छेद की कार्यवाही में वैकल्पिक अनुतोष प्रदान करती है, और रजिस्ट्रीकरण के निदेशात्मक स्वरूप का समर्थन करती है।
विधिक मामलों में अंतर करना:
- पत्नी ने अमितवा भट्टाचार्य बनाम श्रीमती अपर्णा भट्टाचार्य (2009) के मामले का हवाला दिया था।
- न्यायालय ने माना कि उक्त निर्णय में विवाह के समय वधू की अवयस्क आयु के कारण विवाह को अप्रभावी घोषित किया गया था, और धारा 27 के अधीन विवाह-विच्छेद की याचिका दायर करने के लिये धारा 15 के अधीन रजिस्ट्रीकरण की अनिवार्य प्रकृति के संबंध में कोई विधि निर्धारित नहीं की गई थी।
- इसलिये, पत्नी द्वारा जिस पूर्व निर्णय का हवाला दिया गया था, वह तथ्यों के आधार पर भिन्न था और वर्तमान मामले पर लागू नहीं होता था।
परिणाम:
- कर्नाटक उच्च न्यायालय ने पत्नी की रिट याचिका खारिज कर दी और कनकपुरा कुटुंब न्यायालय के उस आदेश को बरकरार रखा जिसमें यह पुष्टि की गई थी कि विवाह के रजिस्ट्रीकरण के अभाव के होते हुए भी विशेष विवाह अधिनियम, 1954 की धारा 27 के अधीन पति की विवाह-विच्छेद याचिका पोषणीय है।
विशेष विवाह अधिनियम की धारा 15 क्या है?
विशेष विवाह अधिनियम, 1954:
- विशेष विवाह अधिनियम (SMA), 1954 एक भारतीय विधि है जो विभिन्न धर्मों या जातियों के व्यक्तियों के बीच विवाह के लिये एक विधिक ढाँचा प्रदान करती है।
- यह उन सिविल विवाहों को नियंत्रित करता है जहाँ राज्य, न कि कोई धार्मिक प्राधिकरण, विवाह को मान्यता देता है।
- सिविल और धार्मिक दोनों प्रकार के विवाहों को मान्यता देने की भारतीय प्रणाली ब्रिटेन के विवाह अधिनियम, 1949 के समान है।
- यह अधिनियम पंथनिरपेक्ष दृष्टिकोण अपनाता है, जिससे दंपतियों को अपनी व्यक्तिगत धार्मिक पहचान बनाए रखते हुए धार्मिक संबद्धता की परवाह किये बिना विवाह करने की अनुमति मिलती है।
अधिनियम के मूल प्रावधान:
प्रयोज्यता:
- यह अधिनियम भारत भर में सभी धर्मों - हिंदुओं, मुसलमानों, सिखों, ईसाइयों, जैनियों और बौद्धों - के लोगों पर लागू होता है।
- यह विवाह संपन्न कराने के लिये एक समान ढाँचा प्रदान करता है, चाहे दोनों पक्षकारों की धार्मिक पृष्ठभूमि कुछ भी हो।
- दंपत्ति धार्मिक समारोह के स्थान पर राज्य अधिकारियों द्वारा आयोजित सिविल विवाह समारोह का विकल्प चुन सकते हैं।
विवाह की मान्यता और विधिक स्थिति:
- यह अधिनियम विवाहों के रजिस्ट्रीकरण, विधिक मान्यता प्रदान करने और विरासत के अधिकार, उत्तराधिकार के अधिकार और सामाजिक सुरक्षा लाभ जैसे संबंधित लाभों का प्रावधान करता है।
- यह बहुविवाह को प्रतिबंधित करता है और यदि विवाह के समय दोनों पक्षकारों में से किसी का भी जीवित पति या पत्नी हो तो विवाह को शून्य और अकृत घोषित करता है।
- यदि दोनों में से कोई भी पक्षकार चित्तविकृति के कारण वैध सम्मति देने में असमर्थ हो तो विवाह शून्य हो जाता है।
- इस अधिनियम के अधीन संपन्न विवाहों को व्यक्तिगत विधियों के अधीन अनुष्ठित विवाहों के समान ही विधिक मान्यता प्राप्त है।
लिखित सूचना की आवश्यकता:
- अधिनियम की धारा 5 के अनुसार दोनों पक्षकारों को जिले के विवाह अधिकारी को लिखित सूचना देनी होगी।
- नोटिस की तारीख से ठीक पहले कम से कम 30 दिनों तक दोनों पक्षकारों में से कम से कम एक पक्षकार उस जिले में निवास कर रहा होना चाहिये।
- धारा 7 किसी भी व्यक्ति को नोटिस के प्रकाशन के 30 दिनों के भीतर प्रस्तावित विवाह पर आक्षेप करने की अनुमति देती है।
- तथापि इस प्रावधान का उद्देश्य कपटपूर्ण या अवैध विवाहों को रोकना था, लेकिन यह विवाद और दुरुपयोग का स्रोत रहा है।
आयु सीमा:
- विशेष विवाह अधिनियम के अधीन विवाह योग्य न्यूनतम आयु पुरुषों के लिये 21 वर्ष और महिलाओं के लिये 18 वर्ष है।
- अधिनियम के अधीन वैध विवाह के लिये ये आवश्यकताएँ अनिवार्य हैं।
धारा 15 – अन्य रूपों में अनुष्ठित विवाहों का रजिस्ट्रीकरण:
दायरा:
यह धारा उन विवाहों के रजिस्ट्रीकरण की अनुमति देता है जो विशेष विवाह अधिनियम, 1954 या विशेष विवाह अधिनियम, 1872 के अधीन संपन्न नहीं हुए थे - इसमें विवाह प्रारंभ होने से पूर्व और पश्चात् के दोनों प्रकार के विवाह सम्मिलित हैं।
रजिस्ट्रीकरण की शर्तें:
(क) विवाह संस्कार विधिपूर्वक संपन्न किया गया था तथा पक्षकार तब से निरंतर पति एवं पत्नी के रूप में साथ-साथ निवास कर रहे हैं।
(ख) रजिस्ट्रीकरण के समय किसी भी पक्षकार के एक से अधिक जीवित पति या पत्नी नहीं होने चाहिये।
(ग) कोई पक्षकार रजिस्ट्रीकरण के समय जड़ या पागल नहीं है।
(घ) रजिस्ट्रीकरण के समय दोनों पक्षकार की आयु 21 वर्ष पूरी हो चुकी है।
(ङ) पक्षकार प्रतिषिद्ध कोटि की नातेदारी के अंतर्गत नहीं आते हैं (नीचे दिये गए परंतुक के अधीन) ।
(च) दोनों पक्षकार आवेदन की तिथि से कम से कम 30 दिन पहले से विवाह अधिकारी के जिले में रह रहे हों।
शर्त (ङ) का परंतुक:
इस अधिनियम के प्रारंभ से पूर्व संपन्न विवाहों के संबंध में, प्रतिषिद्ध नातेदारी की शर्त पक्षकारों पर लागू होने वाली किसी भी विधि, रीति-रिवाज या प्रथा के अधीन है - अर्थात्, यदि उनकी व्यक्तिगत विधि/रीति-रिवाज ऐसे विवाह की अनुमति देती है, तो इस आधार पर रजिस्ट्रीकरण से इंकार नहीं किया जाएगा।
मुख्य निष्कर्ष:
धारा 15 प्रथागत, धार्मिक या अन्य प्रकार के विवाहों के लिये एक सत्यापन और रजिस्ट्रीकरण तंत्र के रूप में कार्य करती है, जिससे उन्हें नए सिरे से विवाह अनुष्ठित कराने की आवश्यकता के बिना विधिक दायरे में लाया जा सकता है, बशर्ते कि उपरोक्त छह शर्तें पूरी हों।