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आपराधिक कानून

महिलाओं का कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न अधिनियम महिलाओं द्वारा किये गए मिथ्या परिवादों को दण्डित करता है, न कि उन व्यक्तियों को जो ऐसा परिवाद करने के लिये उकसाते हैं

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 23-Apr-2026

श्रीनिवास शिंदे बनाम कौशल विकास एवं उद्यमिता निदेशालय 

"विधि में आंतरिक परिवाद समिति (ICC) के समक्ष मिथ्या या विद्वेषपूर्ण परिवाद करने या मिथ्या साक्ष्य देने के लियेकिसी ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध कार्रवाई/दण्ड का उपबंध नहीं है जिसने किसी महिला या परिवादकर्त्ता को उकसाया हो।" 

न्यायमूर्ति डॉ. नीला गोखले 

स्रोत: बॉम्बे उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

श्रीनिवास शिंदे बनाम कौशल विकास एवं उद्यमिता निदेशालय (2026)के मामले मेंगोवा स्थित बॉम्बे उच्च न्यायालय की एकल-न्यायाधीश पीठजिसमें न्यायमूर्ति डॉ. नीला गोखले शामिल थीं, ने निर्णय दिया कि महिलाओं का कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न (निवारणप्रतिषेध और प्रतितोष) अधिनियम, 2013 (POSH Act) की धारा 14 के अधीन दण्डात्मक कार्रवाई केवल उस महिला या व्यक्ति तक सीमित है जो मिथ्या और विद्वेषपूर्ण परिवाद दर्ज करता है - और यह दायित्त्व किसी पर-पक्षकार तक विस्तारित नहीं होता है जिसने उस परिवाद को उकसाया हो। 

  • यद्यपिन्यायालय ने आंतरिक परिवाद समिति (ICC) की रिपोर्ट में संशोधन करने का निदेश दिया जिससे उसमें उकसाने वाले व्यक्ति का नाम स्पष्ट रूप से बताया जा सकेऔर यह माना कि याचिकाकर्त्ता किसी सक्षम मंच के समक्ष उसके विरूद्ध उचित कार्यवाही शुरू करने के लिये स्वतंत्र है। 

श्रीनिवास शिंदे बनाम कौशल विकास एवं उद्यमिता निदेशालय (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी 

  • याचिकाकर्त्ता श्रीनिवास शिंदे (कौशल विकास एवं उद्यमिता निदेशालय में निम्न श्रेणी के क्लर्क) की एक महिला सहकर्मी ने आंतरिक परिवाद समिति (ICC) के समक्ष उनके विरुद्ध लैंगिक उत्पीड़न का परिवाद दर्ज कराया।          
  • आंतरिक परिवाद समिति ने परिवाद को बंद करते हुए पाया कि परिवादकर्त्ता को किसी 'अज्ञात व्यक्तिद्वारा मिथ्या परिवाद दर्ज करने के लिये 'उकसायागया था। 
  • आंतरिक परिवाद समिति के समक्षमहिला सहकर्मी ने स्वयं कहा था कि संस्थान के प्रिंसिपल दत्ताप्रसाद पलनी ने परिवाद का मसौदा तैयार किया था और उसे इस पर हस्ताक्षर करने के लिये विवश किया थाऔर इंकार करने पर भविष्य में उत्पीड़न की धमकी दी थी।   
  • शिंदे ने आंतरिक परिवाद समिति के आदेश को औद्योगिक न्यायालय में चुनौती दी और मिथ्या परिवाद को उकसाने के लिये पलनी के विरुद्ध कार्यवाही शुरू करने की मांग की। 
  • अंततः यह मामला एक रिट याचिका के माध्यम से बॉम्बे उच्च न्यायालय के समक्ष आया। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

न्यायालय ने निम्नलिखित प्रमुख टिप्पणियां कीं: 

धारा 14 का दायरा शिकायतकर्ता तक ही सीमित है: 

  • महिलाओं का कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न अधिनियम की धारा 14 आंतरिक परिवाद समिति कोकेवल महिलाया उस व्यक्ति के विरुद्ध दण्डात्मक कार्रवाई की सिफारिश करने का अधिकार देती है जिसने धारा 9(1) या 9(2) के अधीन परिवाद किया हैजैसा भी मामला हो। 
  • इस संविधि मेंकिसी पर-पक्षकार के लिये कोई दण्ड निर्धारित नहीं हैजो किसी महिला को मिथ्या और विद्वेषपूर्ण परिवाद दर्ज करने के लिये उकसाता हैया जो आंतरिक परिवाद समिति के समक्ष मिथ्या साक्ष्य देता है। 

याचिकाकर्त्ता का उपचार परिवादकर्त्ता के विरुद्ध हैन कि उकसाने वाले के विरुद्ध: 

  • चूँकि महिला सहकर्मी ने परिवाद दर्ज कराया थाइसलिये शिंदे विधिक तौर पर महिलाओं का कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न अधिनियम की धारा 14 के अधीन उसके विरुद्ध दण्डात्मक कार्रवाई की मांग कर सकते थे। 
  • पलनी के विरुद्ध महिलाओं का कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न अधिनियम के अधीन अनुशासनात्मक कार्रवाई का निदेश देने की उनकी प्रार्थना को अनुचित माना गया और तदनुसार खारिज कर दिया गया। 
  • न्यायालय ने कहा कि महिला को धमकियों के दबाव में ऐसा करने के लिये विवश किया गया होगालेकिन विधि में महिलाओं का कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न अधिनियम के अधीन उकसाने वाले के विरुद्ध कार्रवाई करने का कोई तंत्र प्रदान नहीं किया गया है। 

आंतरिक परिवाद समितिA के लोप की आलोचना - रिपोर्ट में संशोधन के निदेश: 

  • न्यायालय ने आंतरिक परिवाद समिति की इस बात के लिये आलोचना की कि उसने उकसाने वाले व्यक्ति को 'अज्ञात व्यक्तिके रूप में दर्ज कियाजबकि पालनी का नाम परिवादकर्त्ता के अपने खंडन पत्र में भी था। 
  • आंतरिक परिवाद समिति पर चयनात्मक मौन साधने का आरोप लगाया गयाजिसे न्यायालय ने अस्वीकार्य पाया। 
  • तदनुसारआंतरिक परिवाद समिति की रिपोर्ट में संशोधन करने का निदेश दिया गया जिससे यह दर्ज किया जा सके कि पलनी ने परिवादकर्त्ता को याचिकाकर्त्ता के विरुद्ध लैंगिक उत्पीड़न का मिथ्या मामला दर्ज करने के लिये उकसाया था। 

अन्य उपायों को अपनाने की स्वतंत्रता: 

  • न्यायालय ने स्पष्ट किया कि शिंदे को विधि के अधीन अनुमति होने परपालनी के विरुद्ध किसी सक्षम मंच के समक्ष उचित कार्यवाही शुरू करने की स्वतंत्रता हैबशर्ते पालनी को सुनवाई का अवसर दिया जाए। 

महिलाओं का कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न अधिनियम, 2013 क्या है? 

 बारे में: 

  • महिलाओं का कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न अधिनियम भारतीय सरकार द्वारा 2013 मेंकार्यस्थल पर महिलाओं का लैंगिक उत्पीड़न से निपटने के लिये बनाया गया एक विधान है।  
  • इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है किकार्यस्थल महिलाओं के लिये सुरक्षित हों औरउन्हें लैंगिक उत्पीड़न से बचाया जा सके। 
  • इस अधिनियम के अनुसारलैंगिक उत्पीड़न मेंअवांछित शारीरिक संपर्क या लैंगिक संबंध बनाने की कोशिशलैंगिक अनुग्रह मांगनाअनुचित लैंगिक टिप्पणी करनाअश्लील सामग्री दिखानाया लैंगिक प्रकृति का कोई भी अन्य अवांछित व्यवहार शामिल हो सकता हैचाहे वह मौखिक होलिखित हो या यहाँ तक ​​कि संकेत के माध्यम से हो। 
  • महिलाओं का कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न से निपटने के लिये विधायी अधिनियम - कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न (निवारणप्रतिषेध और प्रतितोष) अधिनियम 2013 (POSH ACT) का उपबंध है। 
  • जहाँ लैंगिक अपराध की पीड़िता अवयस्क होती हैवहाँ लागू होने वाला विधान लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO) है। 
  • इस अधिनियम में नियोक्ता के लिये दायित्त्व निर्धारित किये गए हैंजिसमें सेवा नियमों के अधीन लैंगिक उत्पीड़न को "दुराचार" के रूप में मान्यता देना और 10 या अधिक कर्मचारियों वाले कार्यस्थलों में एक आंतरिक परिवाद समिति (ICC) का गठन करना शामिल है। 

अधिनियम की पृष्ठभूमि: 

  • उच्चतम न्यायालय नेविशाखा एवं अन्य बनाम राजस्थान राज्य मामले (1997) में एक ऐतिहासिक निर्णय में 'विशाखा दिशानिर्देशजारी किये।  
  • ये दिशानिर्देश कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न (निवारणप्रतिषेध और प्रतितोष) अधिनियम, 2013 काआधार बने। 
  • उच्चतम न्यायालय को संविधान के कई प्रावधानों से भी शक्ति प्राप्त होती हैजिनमें अनुच्छेद 15 (केवल धर्ममूलवंश, जातिलिंग या जन्म स्थान के आधार पर विभेद का प्रतिषेध के विरुद्ध) शामिल हैसाथ ही यह प्रासंगिक अंतर्राष्ट्रीय अभिसमय और मानदंडों जैसे कि महिलाओं के विरुद्ध सभी प्रकार के विभेद के उन्मूलन पर कन्वेंशन (CEDAW) की सामान्य सिफारिशों से भी प्रेरणा लेता हैजिसकी भारत ने 1993 में पुष्टि की थी। 

अधिनियम की धारा 14: 

धारा 14: मिथ्या और विद्वेषपूर्ण परिवाद के लिये दण्ड: 

  • विद्वेषपूर्ण परिवादों के विरुद्ध कार्रवाई: 
    • धारा 14(1) मिथ्या या विद्वेषपूर्ण परिवादों के गंभीर विवाद्यक को संबोधित करती हैसाथ ही महत्त्वर्ण सुरक्षा उपायों को भी शामिल करती है: 
      • इसमें विद्वेषपूर्ण आशय का अवधारण करने के लिये मानदंड स्थापित किये गए हैंजिनमें साशय मिथ्या परिवाद और कूटरचित दस्तावेज़ शामिल हैं। 
      • इसमें यह उपबंधित है कि परिवाद को साबित करने में मात्र असमर्थता के आधार पर दण्ड नहीं दिया जाएगा 
      • कार्रवाई की सिफारिश करने से पहले उचित जांच प्रक्रियाओं के माध्यम से विद्वेषपूर्ण आशय को स्थापित करना आवश्यक है। 
  • मिथ्या साक्ष्यों के विरुद्ध कार्रवाई: 
    • धारा 14(2) समितियों को जांच प्रक्रिया की अखंडता बनाए रखते हुएमिथ्या साक्ष्य प्रदान करने वाले या भ्रामक दस्तावेज़ प्रस्तुत करने वाले साक्षियों के विरुद्ध कार्रवाई की सिफारिश करने का अधिकार देती है।