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पारिवारिक कानून
हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24
«30-Apr-2026
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डॉ. गरिमा दुबे और 3 अन्य बनाम डॉ. सौरभ आनंद दुबे "जहाँ कोई योग्य व्यक्ति अपनी विशेषज्ञता का उपयोग करके पर्याप्त से अधिक कमाने में सक्षम है और फिर भी अपने पति पर भार अधिरोपित करने के लिये ऐसा करने से परहेज करती है, ऐसी स्थिति में न्यायालय धारा 24 के अधीन भरण-पोषण देने से इंकार कर सकते हैं।" न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति विवेक सरन |
स्रोत: इलाहाबाद उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति विवेक सरन की खंडपीठ ने डॉ. गरिमा दुबे और 3 अन्य बनाम डॉ. सौरभ आनंद दुबे (2026) के मामले में निर्णय दिया कि न्यायालय हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 24 के अधीन उस योग्य पत्नी को भरण-पोषण देने से इंकार कर सकते हैं, जो अपने पेशेवर कौशल के माध्यम से पर्याप्त आय अर्जित करने में सक्षम होते हुए भी, जानबूझकर ऐसा करने से परहेज करती है, केवल अपने पति पर वित्तीय भार अधिरोपित करने के लिये। न्यायालय ने पत्नी की प्रथम अपील खारिज कर दी और अंतरिम भरण-पोषण की उसकी याचिका को नामंजूर करने वाले कुटुंब न्यायालय के आदेश को बरकरार रखा।
डॉ. गरिमा दुबे और 3 अन्य बनाम डॉ. सौरभ आनंद दुबे (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- पत्नी - जो एक योग्य स्त्री रोग विशेषज्ञ हैं - ने प्रयागराज स्थित कुटुंब न्यायालय में मानव कल्याण अधिनियम की धारा 24 के अधीन अपने पति, जो एक न्यूरोसर्जन हैं, से वादकालीन भरण-पोषण की मांग करते हुए एक आवेदन दायर किया।
- कुटुंब न्यायालय ने आयकर रिकॉर्ड से यह पाते हुए कि उनकी वार्षिक आय 31 लाख रुपए से अधिक है, उनके दावे को खारिज कर दिया। यद्यपि, बच्चों का हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 26 के अधीन दावा मंजूर कर लिया गया और पति को उनके भरण-पोषण के लिये प्रति माह 60,000 रुपए देने का निदेश दिया गया।
- इलाहाबाद उच्च न्यायालय के समक्ष पत्नी ने यह तर्क दिया कि पति द्वारा वैवाहिक कार्यवाही प्रारंभ किये जाने के बाद उसे अस्पताल से निकाल दिया गया था, इसलिये वह अब काम नहीं कर रही थी।
- उसने आगे तर्क दिया कि उसे अपने पति से आर्थिक सहायता प्राप्त करने का अधिकार है जिससे वह पृथक्करण से पहले जिस जीवन स्तर का आनंद ले रही थी उसे बनाए रख सके।
- पति ने यह तर्क दिया कि चूँकि उसकी पत्नी एक प्रशिक्षित स्त्री रोग विशेषज्ञ है, इसलिये वह उत्तर प्रदेश राज्य में उससे अधिक कमाने में पूरी तरह सक्षम है और उसे भरण-पोषण की कोई आवश्यकता नहीं है।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
न्यायालय ने निम्नलिखित प्रमुख टिप्पणियां कीं:
कमाने की क्षमता एक निर्णायक कारक के रूप में:
- न्यायालय ने पत्नी की पेशेवर योग्यता और स्त्री रोग विशेषज्ञ के रूप में उनकी विशेषज्ञता पर विचार करते हुए यह निष्कर्ष निकाला कि वह अपने क्षेत्र में अच्छी कमाई करने में पूरी तरह सक्षम थीं।
- भरण-पोषण प्राप्त करने के उद्देश्य से वृत्तिक योग्यताओं और कमाई की क्षमता का उपयोग करने से स्वेच्छापूर्वक इंकार करना, हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 के अधीन सफल होने की अनुमति नहीं दी जा सकती है।
- जहाँ एक योग्य पति या पत्नी अपनी विशेषज्ञता के माध्यम से पर्याप्त कमाई करने में सक्षम है और फिर भी जानबूझकर ऐसा करने से परहेज करता है जिससे दूसरे पति या पत्नी पर भार अधिरोपित किया जा सके, वहाँ न्यायालय विधिक रूप से वादकालीन भरण-पोषण देने से इंकार कर सकता हैं।
कुटुंब न्यायालय के आदेश को बरकरार रखना:
- न्यायालय ने कुटुंब न्यायालय के विवादित आदेश में कोई कमी नहीं पाई और यह माना कि तथ्यों या विधि के आधार पर इसे गलत नहीं ठहराया जा सकता।
- पत्नी द्वारा दायर की गई प्रथम अपील को तदनुसार खारिज कर दिया गया।
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 24 क्या है?
बारे में:
- हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 वादकालीन भरण-पोषण और कार्यवाही के व्यय का उपबंध करती है। भरण-पोषण एक मानवीय और विधिक अधिकार है।
- यह धारा वादकालीन मुकदमे के दौरान पति-पत्नी को अस्थायी भरण-पोषण सुनिश्चित करती है।
भरण-पोषण का अर्थ:
- आश्रितों के खर्चों और आवश्यक वस्तुओं के लिये पिता द्वारा संतान को या पति द्वारा पत्नियों को दी जाने वाली वित्तीय सहायता।
- निर्वाह-व्यय के नाम से भी जाना जाने वाला यह भत्ता जीवन-यापन के खर्चों की बात र करता है। भरण-पोषण भत्ता इस बात पर निर्भर नहीं करता कि पति-पत्नी साथ रहते हैं या हिंदू विधि के अधीन विवाह-विच्छेद कर लिया है।
वाद के दौरान भरण-पोषण (Pendente Lite) का अर्थ:
- "पेंडेंटे लाइट" का अर्थ है "मुकदमे के लंबित रहने के दौरान" या "मामले की सुनवाई के दौरान"।
- यह हिंदू विवाह अधिनियम (HMA) के अधीन कार्यवाही के दौरान आजीविका सहायता और आवश्यक व्यय के लिये वादकालीन भरण-पोषण को नियंत्रित करता है, जब स्वतंत्र आय अपर्याप्त हो या बिल्कुल न हो।
वादकालीन भरण-पोषण (Maintenance Pendente Lite) का अर्थ:
- वाद के दौरान पत्नी और संतान के रहने-सहने के खर्च और वित्तीय सहायता प्रदान करना।
- यह उपबंध लिंग-तटस्थ अधिकार प्रदान करता है, जिससे पति और पत्नी दोनों इस उपचार के लिये आवेदन कर सकते हैं।
हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 के उपबंध:
- जब किसी पति या पत्नी के पास मुकदमे की कार्यवाही के लिये पर्याप्त स्वतंत्र आय न हो, तो न्यायालय प्रत्यर्थियों को याचिकाकर्त्ता के मुकदमे के खर्च और भरण-पोषण का भुगतान करने का आदेश दे सकता है, जिसमें प्रत्यर्थी की आय को ध्यान में रखा जाएगा।
- आवेदन का निपटारा नोटिस मिलने की तारीख से 60 दिनों के भीतर किया जाना चाहिये।
हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 के मूल सिद्धांत:
- विधिक कार्यवाही के व्यय: इसमें लंबित हिंदू विवाह अधिनियम (HMA) की कार्यवाही के दौरान होने वाले व्यय शामिल हैं, जैसे अधिवक्ता की फीस, न्यायालय फीस, स्टांप ड्यूटी, यात्रा व्यय और संबंधित व्यय। यह सुनिश्चित करता है कि आर्थिक रूप से कमजोर पति या पत्नी बिना किसी अतिरिक्त लागत के विधिक प्रक्रियाओं में प्रभावी ढंग से भाग ले सकें।
- न्यायालय का विवेकाधिकार: न्यायालयों के पास वादकालीन भरण-पोषण और व्यय प्रदान करने का विवेकाधिकार होता है। इससे भरण-पोषण राशि के उचित अवधारण के लिये प्रत्येक मामले की परिस्थितियों पर विचार किया जा सकता है। न्यायालय दोनों पक्षकारों की आय, संपत्ति और आवश्यकताओं का आकलन करते हैं।
- अस्थायी प्रकृति: धारा 24 के अंतर्गत दिया जाने वाला भरण-पोषण अस्थायी होता है और केवल लंबित विधिक कार्यवाही के दौरान ही वित्तीय सहायता प्रदान करता है। न्यायालयों को मुकदमों के निपटारे के समय अंतिम भरण-पोषण राशि तय करने का विवेकाधिकार प्राप्त है।