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सिविल कानून

लोक अदालत की अधिकारिता: कोई आर्थिक सीमा नहीं, केवल क्षेत्रीय सीमाएँ लागू होती हैं

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 20-Apr-2026

प्रशांत पी. ​​कुमार और अन्य बनाम केरल राज्य और अन्य 

"चूँकि धारा 19(5) में किसी 'आर्थिक अधिकारिताके बारे में बात नहीं की गई है और केवल 'क्षेत्रीय अधिकारिताके बारे में बात की गई हैइसलिये याचिकाकर्त्ता सफल होने के हकदार नहीं हैं।" 

न्यायमूर्ति हरिशंकर वी. मेनन 

स्रोत: केरल उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

केरल उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति हरिशंकर वी. मेनन की पीठ नेप्रशांत पी. ​​कुमार और अन्य बनाम केरल राज्य और अन्य (2026)के मामले में निर्णय दिया कि लोक अदालत अपने क्षेत्रीय अधिकारिता में आने वाले किसी भी मौद्रिक मूल्य के विवादों का निपटारा कर सकती हैक्योंकि विधि सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 की धारा 19(5) लोक अदालतों पर कोई आर्थिक प्रतिबंध नहीं लगाती है। 

  • न्यायालय ने कपट और अधिकारिता की कमी के आधार पर अदूर तालुक विधिक सेवा समिति द्वारा पारित एक पंचाट को चुनौती देने वाली रिट याचिका को खारिज कर दिया। 

प्रशांत पी. ​​कुमार और अन्य बनाम केरल राज्य और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • याचिकाकर्त्ताओं और प्रत्यर्थी पक्ष के बीच विक्रय का एक करार हुआ थाजिसके अधीन प्रत्यर्थी ने 98 लाख रुपए से अधिक की अग्रिम राशि का संदाय किया था। 
  • यह सौदा पूरा नहीं हो सका और याचिकाकर्त्ता अग्रिम राशि वापस करने में विफल रहेजिसके कारण प्रत्यर्थी को तालुक विधिक सेवा प्राधिकरण के समक्ष परिवाद दर्ज करना पड़ा 
  • याचिकाकर्त्ताओं को टेलीफोन के माध्यम से उपस्थित होने का निदेश दिया गया और वे एक अधिवक्ता के साथ उपस्थित हुए। तत्पश्चात्विवादित पंचाट पारित किया गयाजिसमें याचिकाकर्त्ताओं द्वारा अग्रिम राशि वापस करने का वचन अभिलिखित किया गयाऔर प्रत्यर्थी को पोस्ट-डेटेड चेक सौंप दिये गए। 
  • पश्चात्वर्ती चेक अनादरण हो गयाऔर प्रत्यर्थी ने पंचाट को लागू कराने के लिये एक निष्पादन याचिका दायर की। 
  • याचिकाकर्त्ताओं ने निष्पादन याचिका पर आपत्ति जताई और कपट और अधिकारिता की कमी के आधार पर पंचाट को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय का रुख किया। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

कपट के आरोप पर: 

  • न्यायालय ने कपट के आरोप को नामंजूर कर दियायह देखते हुए कि याचिकाकर्त्ताओं ने स्वयं स्वीकार किया था कि उनकी उपस्थिति के लिये कोई प्रपीड़न नहीं था।  
  • याचिकाकर्त्ता लोक अदालत के समक्ष एक अधिवक्ता के साथ पेश हुए थेजिससे असम्यक् दबाव या दुर्व्यपदेशन के किसी भी दावे का खंडन होता है। 
  • मात्र कम समय के नोटिस पर उपस्थित होने का निदेश देना और उसके बाद समझौते में भाग लेना कपट नहीं माना जा सकता। 

लोक अदालतों की आर्थिक अधिकारिता पर: 

  • याचिकाकर्त्ताओं ने तर्क दिया कि अदूर तालुक विधिक सेवा समिति के पास अधिकारिता नहीं थी क्योंकि अदूर तालुक में कोई उप-न्यायालय नहीं थाऔर इसलिये प्रासंगिक आर्थिक मूल्य का कोई भी वाद वहाँ संस्थित नहीं किया जा सकता था। 
  • न्यायालय ने इस तर्क को नामंजूर करते हुए कहा कि विधि सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 की धारा 19(5) लोक अदालतों के लिये केवलक्षेत्रीय अधिकारिता निर्धारित करती है औरआर्थिक अधिकारिताका कोई संदर्भ नहीं देती है । 
  • इसलियेलोक अदालत किसी भी आर्थिक मूल्य के विवादों का निपटारा कर सकती हैबशर्ते मामला उसकी क्षेत्रीय सीमाओं के भीतर आता हो। 
  • न्यायालय ने आंध्र प्रदेश और केरल उच्च न्यायालयों द्वारा पूर्व के निर्णयों में निर्धारित विधि की समान स्थितियों का भी उल्लेख किया। 

लोक अदालतें क्या हैं? 

परिचय 

  • लोक अदालत” का अभिप्राय “जनता का न्यायालय” है। 
  • यह गांधीवादी सिद्धांतों पर आधारित है। 
  • उच्चतम न्यायालय के अनुसारयह प्राचीन भारत में प्रचलित न्याय प्रणाली का एक पुराना रूप है। 
  • यह वैकल्पिक विवाद निवारण (ADR) प्रणाली का एक महत्त्वपूर्ण घटक है। 
  • यह सामान्य जन को अनौपचारिकसस्ता एवं त्वरित न्याय प्रदान करता है।  

 प्रथम लोक अदालत 

 

    • प्रथम लोक अदालत शिविर 1982 में गुजरात में एक स्वैच्छिक और सुलहकारी संस्था के रूप में आयोजित किया गया थाजिसे कोई सांविधिक समर्थन प्राप्त नहीं था। 

    सांविधिक मान्यता 

    • इसे विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के अधीन सांविधिक दर्जा दिया गया था। 
    • उक्त अधिनियम में लोक अदालतों के संगठन एवं कार्यप्रणाली से संबंधित प्रावधान निहित हैं।  

    संगठन 

    • राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) अन्य विधिक सेवा संस्थानों के साथ मिलकर लोक अदालतों के आयोजन का कार्य करता है।   
    • राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) की स्थापना विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के अंतर्गत की गईजो नवम्बर 1995 से प्रभावी हुआ। 

    संरचना 

    • सामान्यतःलोक अदालत में एक न्यायिक अधिकारी अध्यक्ष के रूप में तथा एक अधिवक्ता एवं एक समाजसेवी सदस्य के रूप में सम्मिलित होते हैं। 

    अधिकारिता 

    • लोक अदालत को निम्नलिखित मामलों में विवादों का निपटारा करने एवं पक्षकारों के मध्य समझौता कराने का अधिकारिता प्राप्त होती है: 
    • किसी भी न्यायालय में लंबित वाद। 
    • ऐसे मामले जो किसी न्यायालय के अधिकारिता में आते हैंपरंतु वहाँ प्रस्तुत नहीं किये गए हैं। 
    • न्यायालय में लंबित किसी भी वाद कोयदि पक्षकार सहमत होंतो निपटारे हेतु लोक अदालत को संदर्भित किया जा सकता है। 

    कार्यवाही 

    • लोक अदालत के समक्ष होने वाली सभी कार्यवाहियों को 'भारतीय न्याय संहिता, 2023' (BNS) के अर्थ के भीतर न्यायिक कार्यवाही माना जाएगाऔर सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908' (CPC) के प्रयोजन के लिये प्रत्येक लोक अदालत को एक सिविल न्यायालय माना जाएगा। 

    पंचाट 

    • लोक अदालत द्वारा दिया गया पंचाट संबंधित पक्षकारों पर बाध्यकारी होता है और इसे एक सिविल न्यायालय की डिक्री का दर्जा प्राप्त होता हैसाथ हीइसके विरुद्ध अपील नहीं की जा सकतीजिससे विवादों के अंतिम निपटारे में किसी प्रकार की देरी नहीं होती। 

    लाभ 

    • कोई न्यायालय फीस नहीं है और यदि न्यायालय फीस पहले ही संदाय कर दी गई हैतो विवाद लोक अदालत में सुलझने पर राशि वापस कर दी जाएगी।    
    • विवादों के निपटारे में प्रक्रियात्मक लचीलापन और त्वरित विचारण की सुविधा उपलब्ध है।