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सांविधानिक विधि

माता-पिता वयस्क पुत्रियों की स्वतंत्र पसंद के विरुद्ध बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट का आह्वान नहीं कर सकते

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 18-Apr-2026

जोजू जॉर्ज और अन्य बनाम केरल राज्य और अन्य 

"ईश्वरीय आह्वान का जवाब देते हुए ब्रह्मचर्य का जीवन चुनने वाली अपनी वयस्क पुत्री के निर्णय से माता-पिता की मात्र असंतुष्टिबंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका जारी करने का आधार नहीं हो सकती।" 

न्यायमूर्ति ए.के. जयशंकरन नांबियार और न्यायमूर्ति जोबिन सेबेस्टियन 

स्रोत: केरल उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों?      

केरल उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति ए.के. जयशंकरन नाम्बियार और न्यायमूर्ति जोबिन सेबेस्टियन की खंडपीठ नेजोजू जॉर्ज और अन्य बनाम केरल राज्य और अन्य (2026)के मामले में तीन पिताओं द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं को खारिज कर दिया। इन पिताओं ने आरोप लगाया था कि उनकी वयस्क पुत्रियों को होली रुआह मठ (MHR) की ननों द्वारा अवैध रूप से निरोध में रखा गया है। न्यायालय ने माना कि किसी धार्मिक समुदाय में ब्रह्मचर्य का जीवन व्यतीत करने के वयस्क पुत्री के निर्णय के प्रति माता-पिता की असहमति बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका जारी करने का वैध आधार नहीं हो सकती।  

जोजू जॉर्ज और अन्य बनाम केरल राज्य और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी 

  • तीनों याचिकाकर्त्ता ऐसे पिता थे जिनकी वयस्क पुत्रियाँ त्रिशूर के आर्चडायोसीस के अंतर्गत आने वाले एक धार्मिक समुदायहोली रुआह मठ (MHR) में शामिल हो गई थीं।  
  • जब आर्चडायोसीज द्वारा होली रुआह मठ (MHR) को विधिवत मान्यता दी गई थीतब पुत्रियाँ इसमें शामिल हुई थीं। 
  • तत्पश्चात्प्रत्यर्थी ननों द्वारा की गई कुछ कार्रवाइयों के मद्देनजरआर्चडायोसीज ने एक डिक्री जारी कर घोषणा की कि होली रुआह मठ (MHR) को अब वे अधिकारविशेषाधिकार और कर्त्तव्य प्राप्त नहीं होंगे जो उसकी अधिकारिता के अंतर्गत आने वाली मंडलियों को दिये जाते हैं। 
  • आर्चडायोसीज ने 2023 में औपचारिक रूप से होली रुआह मठ (MHR) को भंग कर दिया था।  
  • याचिकाकर्त्ताओं ने तर्क दिया कि इस विघटन के बादउनकी पुत्रियों का मंडली के साथ निरंतर जुड़ाव स्वैच्छिक नहीं थाअपितु प्रत्यर्थी ननों द्वारा किये गए प्रपीड़न और असम्यक् असर का परिणाम था। 
  • उन्होंने आगे आरोप लगाया कि पुत्रियों को ऐसे कठोर अनुष्ठानों का शिकार बनाया जा रहा था जो उनके और उनके परिवार के हित के विरुद्ध थे। याचिकाकर्त्ताओं ने पीठ और पूर्ण पीठों के निर्णयों का हवाला देते हुए तर्क दिया कि माता-पिता को अपने व्यस्क बच्चों को भी सहायता और सलाह देने का अधिकार हैऔर व्यस्क बच्चों की सांविधानिक स्वतंत्रताएँ असीमित नहीं हैं। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • न्यायालय ने मामले के विशिष्ट तथ्यों पर विचार करने से पहले बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के दायरे और प्रकृति की जांच की। इसने निम्नलिखित प्रमुख सिद्धांतों को निर्धारित किया: 
  • बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका एक असाधारण उपचार है और इसे तब तक जारी नहीं किया जाना चाहिये जब तक कि सामान्य उपचार पूरी तरह से कारगर साबित न हो जाएं। यह एकविवेकाधीन उपचारहैजिसका अर्थ है कि उच्च न्यायालय तथ्यों के आधार पर अधिकारिता का प्रयोग करने से इंकार कर सकता है। तथापिएक बार जब न्यायालय यह पाता है कि कथित निरोध अवैध हैतो बंदी को यह याचिका अधिकार के रूप में प्राप्त हो जाती है और न्यायालय के विवेक पर इसे रोका नहीं जा सकता। 
  • न्यायालय ने इस बात की पुष्टि की कि व्यक्तिगत स्वायत्तताआत्मनिर्णय की स्वतंत्रता और स्वतंत्र इच्छाशक्ति सांविधानिक ढाँचे में केंद्रीय स्थान रखती हैं। किसी व्यक्ति के निजी क्षेत्र में राज्य का कोई भी हस्तक्षेप सांविधानिक स्वतंत्रताओं के प्रयोग पर प्रतिकूल प्रभाव डालेगा।  
  • पुत्रियों द्वारा किसी धार्मिक संस्था में शामिल होने के विकल्प के विशिष्ट प्रश्न पर न्यायालय ने टिप्पणी की कि ऐसा विकल्प पूरी तरह से व्यक्ति का निजी मामला है। केवल इस तथ्य से कि याचिकाकर्त्ताओं ने अपनी पुत्रियों के त्रिशूर आर्चडायोसीस से आध्यात्मिक रूप से संबद्ध न होने वाली संस्था में शामिल होने का विरोध कियाबंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका जारी करने का औचित्य सिद्ध नहीं हो सकता। 
  • न्यायालय ने कहा कि कथित बंदी शिक्षित वयस्क थेऔर अभिलेख में ऐसा कोई सबूत नहीं था जिससे यह संकेत मिले कि वे अपनी स्वतंत्र इच्छा से कार्य नहीं कर रहे थे। यह भी कहा गया कि जब पुलिस अधिकारियों ने पूछताछ कीतो पुत्रियों ने कथन पर हस्ताक्षर करके पुष्टि की कि वे स्वेच्छा से होली रुआह मठ (MHR) का पालन कर रही हैं।  
  • यह साबित करने के लिये कोई सबूत नहीं मिलने पर कि याचिकाकर्त्ताओं की पुत्रियों को उनकी इच्छा के विरुद्ध रखा जा रहा था या प्रत्यर्थी ननों का उन पर वास्तविक शारीरिक नियंत्रण थान्यायालय ने रिट जारी करने से इंकार कर दिया और याचिका खारिज कर दी। 

बंदी प्रत्यक्षीकरण क्या है 

अर्थ और प्रकृति: 

  • हेबियस कॉर्पस एक लैटिन शब्द है जिसका अर्थ है "आप व्यक्ति (शरीर) को प्रस्तुत करें।”  
  • यह एक विधिक प्रक्रिया है जो अवैध रूप से निरुद्ध व्यक्तियों के लिए एक उपचारात्मक उपाय के रूप में कार्य करती है 
  • इसका मूल उद्देश्य किसी व्यक्ति को अवैध निरोध या कारावास से मुक्त कराना है।  
  • यह न्यायालय द्वारा जारी किया जाने वाला एक आदेश हैजिसके माध्यम से निरुद्ध व्यक्ति को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करने का निदेश दिया जाता हैजिससे यह परीक्षण किया जा सके कि गिरफ्तारी विधिसम्मत है या नहीं 
  • यह रिट किसी व्यक्ति के स्वतंत्रता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का अवधारण करती है। 

सांविधानिक उपबंध: 

  • अनुच्छेद 32 के अधीन उच्चतम न्यायालय और अनुच्छेद 226 के अधीन उच्च न्यायालयों को रिट जारी करने का अधिकार है। 
  • अनुच्छेद 32के अधीनउच्चतम न्यायालय मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के लिये रिट जारी करता है। 
  • अनुच्छेद 226के अधीनउच्च न्यायालयों के पास विधिक और मौलिक अधिकारों के उल्लंघन दोनों के लिये रिट जारी करने की व्यापक अधिकारिता है। 
  • भारत की राज्यक्षेत्रों की सीमा के भीतर और बाहर स्थित सभी प्राधिकारियों पर उच्चतम न्यायालय को अधिकारिता है। 
  • उच्च न्यायालय उन मामलों से निपटते हैं जब उस अधिकार पर उनका नियंत्रण होता है और वाद-हेतुक उनकी अधिकारिता के भीतर उत्पन्न होता है। 

कौन आवेदन कर सकता है: 

  • वह व्यक्ति जिसे अवैध रूप से कैद या निरुद्ध किया गया हो। 
  • कोई भी व्यक्ति जो इस मामले के लाभ से अवगत हो। 
  • मामले के तथ्यों और परिस्थितियों से परिचित कोई भी व्यक्ति जो स्वेच्छा से अनुच्छेद 32 या 226 के अधीन आवेदन दाखिल करता है। 
  • जैसा कि शीला बारसे बनाम महाराष्ट्र राज्य (1983)में निर्णय दिया गया है, यदि कोई निरोध में लिया गया व्यक्ति आवेदन दाखिल नहीं कर सकता हैतो कोई अन्य व्यक्ति उसकी ओर से आवेदन दाखिल कर सकता है। 

कब याचिका खारिज हो जाती है: 

  • जब न्यायालय के पास बेदखली के मामले पर राज्यक्षेत्रीय अधिकारिता का अभाव हो। 
  • जब निरोध किसी सक्षम न्यायालय के आदेश से संबंधित हो। 
  • जब निरोध में लिया गया व्यक्ति पहले ही छोड़ा जा चुका हो। 
  • जब दोषों को दूर करके परिरोध को वैध ठहराया गया हो। 
  • जब कोई सक्षम न्यायालय ुण-दोष के आधार पर याचिका खारिज कर देता है।  

प्रकृति और दायरा: 

  • यह एक प्रक्रियात्मक रिट हैन कि एक सारभूत रिटजैसा किकानू सान्याल बनाम जिला मजिस्ट्रेट दार्जिलिंग (1974) के मामले में कहा गया है। 
  • इस पद्धति में केवल शरीर को न्यायालय के समक्ष पेश करने के बजाय तथ्यों और परिस्थितियों की परीक्षा करके निरोध की वैधता पर ध्यान केंद्रित किया जाता है। 
  • यह रिट याचिका न केवल सदोष परिरोध में रखने के लिये अपितु निरोध में लेने वाले अधिकारियों द्वारा दुर्व्यवहार और भेदभाव से सुरक्षा के लिये भी दायर की जा सकती हैजैसा किसुनील बत्रा बनाम दिल्ली प्रशासन (1980) के मामले में कहा गया है। 
  • पूर्व-न्याय का सिद्धांत अवैध कारावास के मामलों पर लागू नहीं होतानए आधारों के साथ क्रमिक याचिकाएँ दायर की जा सकती हैं। 

सबूत का भार: 

  • निरोध में लेने वाले व्यक्ति या प्राधिकारी पर यह साबित करने का भार होता है कि निरोध विधिक आधार पर था 
  • यदि निरुद्ध व्यक्ति प्राधिकारी की अधिकारिता से बाहर विद्वेषपूर्ण परिरोध का आरोप लगाता हैतो सबूत का भार निरुद्ध व्यक्ति पर स्थानांतरित हो जाता है