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सांविधानिक विधि

वयस्क पुत्री के स्वैच्छिक निर्णय के विरुद्ध माता-पिता बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का सहारा नहीं ले सकते

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 16-May-2026

जोजू जॉर्ज और अन्य बनाम केरल राज्य और अन्य 

"ईश्वरीय आह्वान का जवाब देते हुए ब्रह्मचर्य का जीवन चुनने वाली अपनी वयस्क पुत्री के निर्णय से माता-पिता की मात्र असंतुष्टिबंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका जारी करने का आधार नहीं हो सकती।" 

न्यायमूर्ति ए.के. जयशंकरन नांबियार और न्यायमूर्ति जोबिन सेबेस्टियन 

स्रोत: केरल उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों 

केरल उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति ए.के. जयशंकरन नांबियार और न्यायमूर्ति जोबिन सेबेस्टियन की खंडपीठ नेजोजू जॉर्ज और अन्य बनाम केरल राज्य और अन्य (2026)के मामले में तीन पिताओं द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं को खारिज कर दिया। इन पिताओं ने आरोप लगाया था कि उनकी वयस्क पुत्रियों को होली रुआह मठ (MHR) की ननों द्वारा अवैध रूप से निरोध में रखा गया है। न्यायालय ने माना कि किसी धार्मिक समुदाय में ब्रह्मचर्य का जीवन व्यतीत करने के वयस्क पुत्री के निर्णय के प्रति माता-पिता की असहमति बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका जारी करने का वैध आधार नहीं हो सकती। 

जोजू जॉर्ज और अन्य बनाम केरल राज्य और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • तीनों याचिकाकर्त्ता ऐसे पिता थे जिनकी वयस्क पुत्रियाँ थ्रिसूर आर्चडायोसीस के अंतर्गत आने वाले एक धार्मिक समुदायहोली रुआह मठ (MHR) में शामिल हो गई थीं। 
  • जब आर्चडायोसीज द्वारा होली रुआह मठ (MHR) को विधिवत मान्यता दी गई थीतब पुत्रियाँ इसमें शामिल हुई थीं।  
  • इसके बादप्रत्यर्थी ननों द्वारा किये गए कुछ कार्यों के परिणामस्वरूपआर्चडायोसीज़ ने एक फरमान जारी किया जिसमें यह घोषणा की गई कि होली रुआह मठ (MHR) को अब उसकी अधिकारिता के अंतर्गत आने वाली मंडलियों को दिये गए अधिकारविशेषाधिकार और कर्त्तव्य प्राप्त नहीं होंगे। 
  • आर्चडायोसीज ने 2023 में औपचारिक रूप से होली रुआह मठ (MHR) को भंग कर दिया था।  
  • याचिकाकर्त्ताओं ने तर्क दिया कि इस विघटन के बादउनकी पुत्रियाँ का मंडली के साथ निरंतर जुड़ाव स्वैच्छिक नहीं थाअपितु प्रत्यर्थी ननों द्वारा किये गए प्रपीड़न और अनुचित प्रभाव का परिणाम था। 
  • उन्होंने आगे आरोप लगाया कि पुत्रियों को ऐसे कठोर अनुष्ठानों का शिकार बनाया जा रहा था जो उनके और उनके परिवार के हित के विरुद्ध थे। याचिकाकर्त्ताओं ने खंडपीठ एवं पूर्णपीठ के निर्णयों का हवाला देते हुए तर्क दिया कि माता-पिता को अपने वयस्क बच्चों को भी सहायता और सलाह देने का अधिकार हैऔर वयस्क बच्चों की सांविधानिक स्वतंत्रताएँ असीमित नहीं हैं।  

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • न्यायालय ने मामले के विशिष्ट तथ्यों पर विचार करने से पहले बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के दायरे और प्रकृति की जांच की। इसने निम्नलिखित प्रमुख सिद्धांतों को निर्धारित किया: 
  • बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका एक असाधारण उपचार है और इसे तब तक जारी नहीं किया जाना चाहिये जब तक कि सामान्य उपचार पूरी तरह से कारगर साबित न हो जाएं। यह एकविवेकाधीन उपचारहै जिसका अर्थ है कि उच्च न्यायालय तथ्यों के आधार पर अधिकारिता का प्रयोग करने से इंकार कर सकता है। तथापिएक बार जब न्यायालय यह पाता है कि कथित निरोध अवैध हैतो बंदी को यह याचिका अधिकार के रूप में प्राप्त हो जाती है और न्यायालय के विवेक पर इसे रोका नहीं जा सकता। 
  • न्यायालय ने इस बात की पुष्टि की कि व्यक्तिगत स्वायत्तताआत्मनिर्णय की स्वतंत्रता और स्वतंत्र इच्छाशक्ति सांविधानिक ढाँचे में मुख्य स्थान रखती हैं। किसी व्यक्ति के निजी क्षेत्र में राज्य का कोई भी हस्तक्षेप सांविधानिक स्वतंत्रताओं के प्रयोग पर प्रतिकूल प्रभाव डालेगा। 
  • पुत्रियों द्वारा किसी धार्मिक संस्था में शामिल होने के विकल्प के विशिष्ट प्रश्न पर न्यायालय ने टिप्पणी की कि ऐसा विकल्प पूरी तरह से व्यक्ति का निजी मामला है। केवल इस तथ्य से कि याचिकाकर्त्ताओं ने अपनी पुत्रियों के त्रिशूर आर्चडायोसीस से आध्यात्मिक रूप से संबद्ध न होने वाली संस्था में शामिल होने का विरोध कियाबंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका जारी करने का औचित्य सिद्ध नहीं हो सकता। 
  • न्यायालय ने कहा कि कथित बंदी शिक्षित वयस्क थेऔर अभिलेख में ऐसा कोई सबूत नहीं था जिससे यह संकेत मिले कि वे अपनी स्वतंत्र इच्छा से कार्य नहीं कर रहे थे। यह भी कहा गया कि जब पुलिस अधिकारियों ने पूछताछ कीतो पुत्रियों ने कथन पर हस्ताक्षर करके पुष्टि की कि वे स्वेच्छया से होली रुआह मठ (MHR) का पालन कर रही हैं। 
  • यह साबित करने के लिये कोई सबूत नहीं मिलने पर कि याचिकाकर्त्ताओं की पुत्रियाँ को उनकी इच्छा के विरुद्ध रखा जा रहा था या प्रत्यर्थी ननों का उन पर वास्तविक शारीरिक नियंत्रण थान्यायालय ने रिट जारी करने से इंकार कर दिया और याचिका खारिज कर दी। 

बंदी प्रत्यक्षीकरण क्या है? 

अर्थ और प्रकृति: 

  • हेबियस कॉर्पस (Habeas Corpus) एक लैटिन शब्द है जिसका अर्थ है "आप शरीर को प्रस्तुत करें"। 
  • यह एक विधिक प्रक्रिया हैजो अवैध रूप से निरुद्ध व्यक्तियों के लिये उपचारात्मक उपाय के रूप में कार्य करती है 
  • इसका मूल उद्देश्य किसी व्यक्ति को अवैध निरोध अथवा अवैध कारावास से मुक्त कराना है 
  • यह न्यायालय द्वारा जारी किया जाने वाला ऐसा आदेश हैजिसके माध्यम से निरुद्ध व्यक्ति को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है तथा यह परीक्षण किया जाता है कि उसकी गिरफ्तारी अथवा निरोध विधिसम्मत है या नहीं 
  • यह रिट किसी व्यक्ति के स्वतंत्रता एवं व्यक्तिगत आज़ादी के अधिकार का संरक्षण सुनिश्चित करती है 

सांविधानिक उपबंध: 

  • उच्चतम न्यायालय को अनुच्छेद 32 तथा उच्च न्यायालयों को अनुच्छेद 226 के अंतर्गत रिट जारी करने की शक्ति प्राप्त है 
  • अनुच्छेद 32 के अधीन उच्चतम न्यायालय मौलिक अधिकारों के उल्लंघन की स्थिति में रिट जारी करता है 
  • अनुच्छेद 226 के अधीन उच्च न्यायालयों को अधिक व्यापक अधिकारिता प्राप्त हैजिसके अधीन वे विधिक अधिकारों तथा मौलिक अधिकारों— दोनों के उल्लंघन की स्थिति में रिट जारी कर सकते हैं 
  • भारत की क्षेत्रीय सीमा के भीतर और बाहर स्थित सभी प्राधिकरणों पर उच्चतम न्यायालय की अधिकारिता है। 
  • उच्च न्यायालय उन मामलों का विचार करते हैंजहाँ संबंधित प्राधिकरण उनके नियंत्रणाधीन हो तथा वाद-हेतुक उनकी अधिकारिता के भीतर उत्पन्न हुआ हो 

कौन आवेदन कर सकता है: 

  • वह व्यक्तिजिसे अवैध रूप से निरुद्ध अथवा बंदी बनाया गया हो 
  • कोई भी व्यक्तिजिसे मामले के हित अथवा उद्देश्य की जानकारी हो 
  • मामले के तथ्यों और परिस्थितियों से परिचित कोई भी व्यक्ति जो स्वेच्छया से अनुच्छेद 32 या 226 के अधीन आवेदन दाखिल करता है। 
  • जैसा कि शीला बारसे बनाम महाराष्ट्र राज्य (1983)के मामले में अभिधारित किया गया है, यदि निरुद्ध व्यक्ति स्वयं आवेदन प्रस्तुत करने में असमर्थ होतो कोई अन्य व्यक्ति उसकी ओर से आवेदन प्रस्तुत कर सकता है 

किन परिस्थितियों में रिट अस्वीकार की जाती है 

  • जब न्यायालय को निरोधकर्ता पर क्षेत्रीय अधिकारिता का अभाव हो। 
  • जब निरोध किसी सक्षम न्यायालय के आदेश से संबंधित हो। 
  • जब निरुद्ध व्यक्ति को पूर्व में ही मुक्त किया जा चुका हो 
  • जब निरोध में विद्यमान त्रुटियों को दूर कर उसे वैध बना दिया गया हो 
  • जब सक्षम न्यायालय गुण-दोष के आधार पर याचिका निरस्त कर दे 

प्रकृति और दायरा: 

  • यह एक प्रक्रियात्मक रिट हैन कि एक सारभूत रिटजैसा किकानू सान्याल बनाम जिला मजिस्ट्रेट दार्जिलिंग (1974) में कहा गया है। 
  • इसका मुख्य उद्देश्य केवल बंदी को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कराना नहींअपितु तथ्यों एवं परिस्थितियों के परीक्षा द्वारा निरोध की वैधता का निर्धारण करना है 
  • सुनील बत्रा बनाम दिल्ली प्रशासन (1980) में यह अभिधारित किया गया कि यह रिट न केवल अवैध निरोध के विरुद्धअपितु निरोधकारी प्राधिकारी द्वारा किये गए दुर्व्यवहार एवं विभेद से संरक्षण हेतु भी प्रस्तुत की जा सकती है 
  • पूर्व-न्याय का सिद्धांत अवैध कारावास के मामलों पर लागू नहीं होतानए आधारों के साथ क्रमिक याचिकाएँ दायर की जा सकती हैं। 

सबूत का भार: 

  • निरोध में लेने वाले व्यक्ति या प्राधिकरण पर यह साबित करने का भार होता है कि निरोध विधिक आधार पर किया गया था।  
  • यदि निरुद्ध व्यक्ति यह आरोप लगाए कि प्राधिकारी ने दुर्भावनापूर्ण तरीके से अपने क्षेत्राधिकार से बाहर निरोध किया हैतो दायित्त्व का भार बंदी पर आ जाता है।