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सिविल कानून

आदेश 7 नियम 11 के अधीन वादपत्र को नामंजूर नहीं किया जा सकता क्योंकि यह आदेश 2 नियम 2 सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन वर्जित है

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 18-Apr-2026

वल्लिअम्मई और अन्य बनाम एस. रामनाथन और अन्य 

"आदेश नियम का आवेदन संहिता के आदेश नियम 11(के अधीन वादपत्र को नामंजूर करने का आधार नहीं माना जा सकता है।" 

न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान की पीठ नेएस. वल्लियामई एवं अन्य बनाम एस. रामनाथन एवं अन्य (2026)के मामले में यह निर्णय दिया कि वादपत्र सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश नियम 11(के अधीन इस आधार पर नामंजूर नहीं किया जा सकता कि वाद सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश नियम के अधीन वर्जित है। न्यायालय ने मद्रास उच्च न्यायालय के वादपत्र नामंजूर करने के आदेश को अपास्त कर दिया और विचारण न्यायालय के वाद को आगे बढ़ाने के निर्णय को बहाल कर दिया। 

एस. वल्लियामई और अन्य बनाम एस. रामनाथन और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • यह विवाद कई संपत्तियों से जुड़े एक पारिवारिक मामले से उत्पन्न हुआ था। मूल स्वामीस्वर्गीय एम. सोक्कलिंगम ने अपनी पत्नी के साथ मिलकर प्रारंभ में अपने पुत्र के विरुद्ध व्यादेश की मांग करते हुए वाद दायर किया था। 
  • उनकी मृत्यु के बादविधवा और पुत्रियों ने कपटप्रपीड़न और असम्यक् असर के आधार परकिसी पर-पक्षकार के पक्ष में निष्पादित पावर ऑफ अटॉर्नी को शून्य घोषित करने की मांग करते हुए द्वितीय वाद दायर किया। 
  • प्रतिवादियों ने आदेश नियम 11 सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन द्वितीय वादपत्र को नामंजूर करने की मांग कीयह तर्क देते हुए कि आदेश 2 नियम सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन वाद वर्जित था क्योंकि अनुतोष पहले ही वाद में मांगा जाना चाहिये था 
  • विचारण न्यायालय ने इस अभिवचन को नामंजूर कर दिया और वाद को आगे बढ़ने की अनुमति दी। यद्यपिमद्रास उच्च न्यायालय ने पुनरीक्षण याचिका में हस्तक्षेप करते हुए दोनों वादों में दिये गए अभिवचनों की विस्तृत तुलना करने के बाद वादपत्र को नामंजूर कर दिया। इस आदेश को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी गई। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • न्यायालय ने आदेश नियम के संचालन और आदेश नियम 11(सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन वादपत्र को नामंजूर करने के आधारों के बीच एक महत्त्वपूर्ण अंतर स्पष्ट किया। 
  • न्यायालय ने निम्नलिखित प्रमुख सिद्धांतों पर बल दिया: 
    • वादपत्र नामंजूर करने के आवेदन पर निर्णय लेते समयजांच को कठोरता से वादपत्र में किये गए कथनों तक ही सीमित रखा जाना चाहिये। न्यायालय प्रारंभिक स्तर परपूर्ववर्ती वाद और पश्चात्वर्ती वाद के अभिवचनों की विस्तृत तुलना नहीं कर सकते। 
    • सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश नियम के अधीन वाद दायर करने को वर्जित नहीं करता है। यह केवल उन अनुतोषों या दावों को सीमित करता है जिन्हें पूर्ववर्ती वाद में शामिल किया जाना चाहिये था। क्या इसकी शर्तें लागू होती हैंयह केवल विचारणके दौरान प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर ही अवधारित किया जा सकता है। 
    • सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश नियम 11(के अंतर्गत वह स्थिति लागू होती है जब वाद दाखिल करने पर अभिव्यक्त या विवक्षित विधिक वर्जन हो। ऐसा वर्जन केवल वादपत्र को ध्यानपूर्वक पढ़ने मात्र से ही स्पष्ट हो जाना चाहियेसाक्ष्य का सहारा लिये बिना—कुछ सीमित मामलों के सिवायजैसे कि परिसीमा काल या पूर्व-निर्णय। 
  • द्वितीय वाद में दिये गए कथनों का साक्ष्य मानकर उनका विश्लेषण करने और उनकी तुलना प्रथम वाद में दिये गए कथनों से करने का उच्च न्यायालय का दृष्टिकोण पूरी तरह से अग्राह्य माना गया। 
  • तदनुसारअपील मंजूर कर ली गई और विचारण न्यायालय का आदेश बहाल कर दिया गया। 

सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश नियम 11 में वादपत्र का नामंजूर किया जाना क्या है? 

  • सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के आदेश नियम 11 में उसके अंतर्गत सूचीबद्ध विनिर्दिष्ट परिस्थितियों में वादपत्र को नामंजूर करने का उपबंध है। 
    • खंड (क) के अनुसारयदि वाद-हेतुक प्रकट नहीं किया गया है तो वादपत्र को नामंजूर कर दिया जाएगा। 
    • खंड (ख) में जहाँ दावाकृत अनुतोष का मूल्यांकन कम किया गया है और वादी मूल्यांकन को ठीक करने के लिये न्यायालय द्वारा अपेक्षित किये जाने पर उस समय के भीतर जो न्यायालय ने नियत किया हैऐसा करने में असफल रहता है, वहाँ वादपत्र को नामंजूर कर दिया जाएगा 
    • खंड (गजहाँ दाषाकृत अनुतोष का मूल्यांकन ठीक है किंतु वादपत्र अपर्याप्त स्टाम्प-पत्र पर लिखा गया है और वादी अपेक्षित स्टाम्प पत्र के देने के लिये न्यायालय द्वारा अपेक्षित किये जाने पर उस समय के भीतरजो न्यायालय ने नियत किया हैऐसा करने में असफल रहता है, वहाँ वादपत्र को नामंजूर कर दिया जाएगा 
    • खंड (घ) के अनुसारजहाँ वादपत्र में के कथन से यह प्रतीत होता है कि बाद किसी विधि द्वारा वर्जित है, वहाँ वादपत्र को नामंजूर कर दिया जाएगा 
    • खंड (ङ) में यह उपबंध है कि यदि वादपत्र दो प्रतियों में दाखिल नहीं किया गया है वहाँ वादपत्र को नामंजूर कर दिया जाएगा।   
    • खंड (च) में नामंजूरी का उपबंध है जहाँ वादी नियम के उपबंधों का अनुपालन करने में असफल रहता है। 
  • इसके परंतुक में यह कहा गया है कि मूल्यांकन में सुधार करने या स्टांप-पेपर उपलब्ध कराने के लिये समय सीमा तब तक नहीं बढ़ाई जाएगी जब तक कि न्यायालय संतुष्ट न हो जाए कि वादी असाधारण कारणों से ऐसा करने में असमर्थ था और इंकार करने से गंभीर अन्याय होगा। 
  • आदेश नियम 11 के अधीन वादपत्र को नामंजूर करने की शक्ति एक असाधारण शक्ति है और इसका प्रयोग अत्यंत सावधानी और विवेक के साथ किया जाना चाहिये 
  • खंड (घ) के अधीनन्यायालय को स्वयं वादपत्र में दिये गए कथनों से यह निर्धारित करना होगा कि क्या वाद किसी विधि द्वाराजिसमें परिसीमा विधि भी शामिल हैवर्जित है। 
  • आदेश नियम 11(के अधीन जांच का दायरा वादपत्र और उससे संलग्न या उसमें संदर्भित दस्तावेज़ों तक सीमित है। 
  • सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश VII नियम 11 के तहत आवेदन पर निर्णय लेते समय प्रतिवादी द्वारा प्रस्तुत बचाव पर विचार नहीं किया जा सकता है। 
  • इस शक्ति का प्रयोग केवल स्पष्ट और प्रत्यक्ष मामलों में ही किया जाना चाहिये जहाँ वादपत्र प्रथम दृष्टया वर्जित हो। 
  • जहाँ परिसीमा का अवधारण साक्ष्य की परीक्षा या विधि और तथ्य के मिश्रित प्रश्नों पर विचार करने की आवश्यकता होती हैवहाँ खंड (घ) के अधीन वादपत्र को नामंजूर नहीं किया जा सकता है। 
  • आदेश नियम 11 के अधीन नामंजूरी के लिये आवेदन पर विचार करते समय न्यायालय वादपत्र के दायरे से बाहर नहीं जा सकता है। 
  • जहाँ कई अनुतोषों की मांग की जाती है और यहाँ तक ​​कि एक अनुतोष भी परिसीमा के भीतर हैवहाँ वादपत्र को विधि द्वारा वर्जित होने के कारण पूरी तरह से नामंजूर नहीं किया जा सकता है। 
  • इस उपबंध का प्रयोग केवल तकनीकी आधार परबिना पूर्ण रूप से मामले की सुनवाई कियेवास्तविक दावों को खारिज करने के लिये नहीं किया जाना चाहिये 

सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश नियम क्या है? 

सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश II नियम 2 — वाद के अंतर्गत संपूर्ण दावा होगा  

  • इस नियम के अनुसारवादी कोएक ही वाद-हेतुक से उत्पन्न सभी दावों कोएक ही वाद में शामिल करना अनिवार्य है। वह अपने दावे को विभाजित नहीं कर सकता और उसी वाद-हेतुक पर कई वाद दायर नहीं कर सकता 
  • अपवाद:वादी किसी विशेष न्यायालय के आर्थिक अधिकारिता के अंतर्गत वाद लाने के लिये स्वेच्छया से अपने दावे के एक भाग को त्याग सकता है – किंतु एक बार त्याग किये दिए जाने के बादउस भाग पर बाद में दावा नहीं किया जा सकता है। 
  • उद्देश्य:मुकदमेबाजी की बहुलता और प्रतिवादी के उत्पीड़न को रोकना। 
  • विभाजन का परिणाम:यदि कोई वादी अपने दावे के किसी भाग को त्याग किये बिना छोड़ देता हैतो उसे पश्चात्वर्ती वाद में उस लोप किये गए भाग पर वाद करने से वर्जित किया दिया जाता है (नियम 2(3))।