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सिविल कानून

भागीदार फर्म बनाम कंपनी

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 16-Apr-2026

परिचय 

भारत में व्यापारिक संगठनों का ढाँचा कई रूपों में हो सकता हैजिनमें भागीदारी फर्म और कंपनी सबसे अधिक प्रचलित हैं। भारतीय भागीदारी अधिनियम, 1932 की धारा के अधीन भागीदारी को ऐसे व्यक्तियों के बीच संबंध के रूप में परिभाषित किया गया हैजिन्होंने अपने सभी या किसी एक व्यक्ति द्वारा चलाए जा रहे कारबार के लाभ को साझा करने पर सहमति व्यक्त की है। इसके विपरीतकंपनी एक संविधि संस्था है - कंपनी अधिनियम, 2013 के अधीन निगमित - और निगमन के बाद अपने सदस्यों से पूर्णतः भिन्न विधिक व्यक्तित्व प्राप्त कर लेती है।  

भागीदारी फर्म बनाम कंपनी 

मापदंड 

भागीदारी फर्म  

कंपनी 

शासकीय विधि 

भारतीय भागीदारी अधिनियम, 1932 

कंपनी अधिनियम, 2013 

रजिस्ट्रीकरण 

वैकल्पिकअरजिस्ट्रीकृत फर्म पर- पक्षकार के विरुद्ध वाद दायर नहीं कर सकती  

कंपनियों के रजिस्ट्रार के समक्ष रजिस्ट्रीकरण अनिवार्य 

सृजन का तरीका 

भागीदारों के बीच संविदा द्वारा निर्मित 

विधि द्वारा निर्मितनिगमण प्रमाणपत्र मिलने पर ही अस्तित्व 

विधिक व्यक्तित्व 

पृथक् विधिक इकाई नहींफर्म एवं भागीदार एक ही माने जाते हैं 

अपने सदस्यों से पृथक् एक स्वतंत्र विधिक इकाई — सैलोमन बनाम सैलोमन एंड कंपनी लिमिटेड (1897) 

सदस्यों का दायित्त्व 

असीमितसंयुक्त एवं पृथक्व्यक्तिगत संपत्ति तक विस्तृत 

सीमितशेयरों पर अवशिष्ट राशि या योगदान की स्वीकृत राशि तक  

शाश्वत उत्तराधिकार 

कोई चिरस्थायी उत्तराधिकार नहींभागीदार की मृत्युदिवालियापन या सेवानिवृत्ति पर विघटन 

शाश्वतसदस्यों की मृत्यु/दिवालियापन से अप्रभावित  

चार्टर दस्तावेज़ 

भागीदारी विलेख 

मेमोरेंडम ऑफ एसोसिएशन (MOA) एवं आर्टिकल्सऑफएसोसिएशन  (AoA) 

सदस्यों की संख्या 

न्यूनतम 2, अधिकतम 20 

निजी कंपनी: 2–50; सार्वजनिक कंपनी: न्यूनतम 7, अधिकतम सीमा नहीं  

संपत्ति का स्वामित्व 

सभी भागीदारों का संयुक्त स्वामित्व 

कंपनी के पास ही संपत्ति का स्वामित्व हैजो उसके सदस्यों से स्वतंत्र है  

हित का अंतरण 

स्वतंत्र रूप से अंतरणीय नहींअन्य भागीदारों की सहमति आवश्यक 

AoA में उल्लिखित प्रतिबंधों के अधीन शेयर स्वतंत्र रूप से अंतरणीय हैं  

प्रबंधन 

भागीदार स्वयं व्यवसाय का संचालन करते हैं  

शेयरधारकों की ओर से निदेशक मंडल प्रबंधन करता है 

मालिक–अभिकर्त्ता संबंध 

प्रत्येक भागीदार फर्म एवं अन्य भागीदारों का अभिकर्त्ता 

निदेशक कंपनी के अभिकर्त्तान कि व्यक्तिगत सदस्यों के 

सामान्य मुहर 

 सामान्य मुहर की कोई अवधारणा नहीं 

यह कंपनी के हस्ताक्षर को दर्शाता हैप्रत्येक कंपनी की अपनी एक सामान्य मुहर होती है। 

सांविधिक बैठकें 

औपचारिक बैठकें आयोजित करने का कोई प्रावधान नहीं 

निर्धारित अंतरालों पर बोर्ड बैठकें और आम बैठकें अनिवार्य है 

कार्यवृत्त का रखरखाव 

कोई अवधारणा नहीं 

बोर्ड और आम बैठकों की कार्यवाही को कार्यवृत्त में दर्ज किया जाना चाहिये 

वार्षिक फाइलिंग 

फर्मों के रजिस्ट्रार के पास कोई रिटर्न दाखिल करने की आवश्यकता नहीं है 

वार्षिक वित्तीय विवरण और वार्षिक रिटर्न कंपनी रजिस्ट्रार के पास दाखिल करना अनिवार्य है  

खातों का लेखापरीक्षा 

आयकर अधिनियम के अधीन (यदि लागू हो)  

कंपनी अधिनियम, 2013 के अधीन अनिवार्य वार्षिक लेखा परीक्षण  

विधिक कार्यवाही 

केवल रजिस्ट्रीकृत फर्म ही पर-पक्षकारों पर वाद कर सकती हैं 

कंपनी अपने नाम से वाद कर सकती है और उस पर वाद भी किया जा सकता है 

कर देयता 

इस पर 30% की एकसमान दर से कर लगाया जाता हैसाथ ही शिक्षा उपकर भी लगता है 

इस पर 30% की एक समान दर से कर लगाया जाएगासाथ ही लागू होने पर अधिभार भी लगेगा  

भागीदार/निदेशक के साथ संविदा  

भागीदार किसी भी संविदा में प्रवेश करने के लिये स्वतंत्र हैं 

कुछ विशिष्ट संविदाओं में निदेशकों का हित होने पर बोर्ड पर प्रतिबंध 

मृत्यु पर अंतरण/विरासत 

विधिक वारिस पूँजी योगदान की वापसी और संचित लाभ में भागीदारी के हकदार होते हैंवे भागीदार नहीं बनते 

अंश विधिक वारिसों को अंतरित किये जाते हैं 

क्रेडिट योग्यता 

व्यक्तिगत भागीदारों की साख पर निर्भर 

उच्च साखकठोर अनुपालनों के कारण  

समझौता/विलय/एकत्रीकरण 

अन्य फर्मों के साथ विलय नहीं कर सकते या लेनदारों के साथ समझौता नहीं कर सकते  

समझौताव्यवस्थाविलय और समामेलन कर सकते हैं  

उत्पीड़न एवं कुप्रबंधन के विरुद्ध उपचार  

भागीदारी अधिनियम के अंतर्गत कोई सांविधिक उपचार उपलब्ध नहीं है 

कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 241–244 के अधीन NCLT के समक्ष उपलब्ध सांविधिक उपचार 

विघटन  

करारआपसी सम्मतिदिवालियापनआकस्मिकता या न्यायालय के आदेश द्वारा 

स्वैच्छिक रूप से या राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण के आदेशानुसार 

 निष्कर्ष 

उपरोक्त तालिका से स्पष्ट होता है कि भागीदारी और कंपनी के बीच का अंतर केवल औपचारिक नहीं अपितु वास्तविक भी है। कंपनी की स्वतंत्र विधिक पहचानसीमित दायित्त्वशाश्वत उत्तराधिकार और सुदृढ़ सांविधिक ढाँचा इसे भागीदारी से मौलिक रूप से भिन्न इकाई बनाते हैंजबकि भागीदारी मूलतः व्यक्तियों के बीच एक संविदात्मक व्यवस्था ही रहती है।