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पारिवारिक कानून
2005 का संशोधन पुत्रियों के पूर्व-स्थापित उत्तराधिकार अधिकारों को सीमित नहीं करता
«19-May-2026
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बी.एस. ललिता और अन्य बनाम भुवनेश और अन्य "हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 6(5) 2004 से पूर्व हुए विभाजनों को नए सहदायिकी अधिकारों के भूतलक्षी प्रभाव से बचाती है। यह धारा 8 के अधीन वर्ग- I के उत्तराधिकारियों के पूर्व-विद्यमान अधिकारों को समाप्त करने का आशय नहीं रखती है, और स्पष्ट भाषा के अनुसार ऐसा कर भी नहीं सकती है, जो 2005 के संशोधन से स्वतंत्र रूप से अर्जित हुए थे।" न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
भारत के उच्चतम न्यायालय की एक खंडपीठ, जिसमें न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह शामिल थे, ने बी.एस. ललिता और अन्य बनाम भुवनेश और अन्य (2026) के मामले में यह माना कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 (HSA) में 2005 में किया गया संशोधन, जिसने पुत्रियों को जन्म से ही सहदायिकी अधिकार प्रदान किये, उनके मृतक पिता की संपत्ति को वर्ग- I के उत्तराधिकारी के रूप में विरासत में पाने के उनके स्वतंत्र अधिकार को छीनता या सीमित नहीं करता है, जब उनकी मृत्यु निर्वसीयत होती है।
- न्यायालय ने स्पष्ट किया कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 6(5) एक व्यावृत्ति खंड है न कि अधिकारिता संबंधी बाधा, और यह कि केवल पुत्रियों के बीच निष्पादित विभाजन विलेख पिता के संपत्ति के अंश में पुत्रियों के उत्तराधिकार अधिकारों को समाप्त नहीं कर सकता है।
बी.एस. ललिता और अन्य बनाम भुवनेश और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- यह विवाद बी.एम. सीनाप्पा की संपत्ति को लेकर उत्पन्न हुआ, जिनकी 6 मार्च, 1985 को निर्वसीयत मृत्यु हो गई थी, और वे अपने पीछे अपनी विधवा, तीन पुत्रियाँ और चार पुत्र छोड़ गए थे।
- उनकी मृत्यु के पश्चात्, पुत्रों ने 1985 में मौखिक रूप से संपत्ति का बंटवारा किया और बाद में 2000 में अपने और अपनी माता के बीच रजिस्ट्रीकृत बंटवारे का दस्तावेज़ निष्पादित किया। पुत्रियों को न तो कोई अंश दिया गया और न ही उन्हें बंटवारे के दस्तावेज़ में पक्षकार बनाया गया।
- 2007 में, पुत्रियों ने बंटवारे की मांग करते हुए और पाँच पारिवारिक संपत्तियों में से प्रत्येक में 1/8 अंश मांगते हुए एक वाद दायर किया, यह तर्क देते हुए कि चूँकि उनके पिता की मृत्यु निर्वसीयत हुई थी, इसलिये वे हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 8 के अधीन वर्ग- I के उत्तराधिकारियों के रूप में समान अंश की हकदार थीं।
- कर्नाटक उच्च न्यायालय ने सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 7 नियम 11(घ) के अधीन प्रारंभिक प्रक्रम में ही मुकदमे को खारिज कर दिया, प्रत्यर्थियों की इस अभिवचन को स्वीकार करते हुए कि वाद हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 6(5) द्वारा वर्जित था, जो 20 दिसंबर, 2004 से पहले किये गए विभाजनों को 2005 के संशोधन के संचालन से बचाता है।
- पुत्रियों ने उच्चतम न्यायालय में एक विशेष अनुमति याचिका दायर कर उच्च न्यायालय के 2024 के आदेश को चुनौती दी।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- धारा 6(5) व्यावृत्ति खंड के रूप में, वर्जन के रूप में नहीं: न्यायालय ने माना कि धारा 6(5) केवल कुछ पूर्व विभाजनों को 2005 के संशोधन द्वारा अमान्य होने से बचाती है। यह कोई ऐसी अधिकारिता संबंधी वर्जन नहीं है जो न्यायालयों को विभाजन संबंधी वादों पर सुनवाई करने से पूरी तरह रोकता हो। व्यावृत्ति खंड गुण-दोष के आधार पर प्रतिरक्षा प्रदान करता है जिसे वाद की सुनवाई के दौरान साबित किया जाना चाहिये, जबकि वर्जन न्यायालय को वाद पर सुनवाई करने से पूरी तरह रोकता है।
- धारा 8 के अधीन पुत्रियों के स्वतंत्र अधिकारों पर: न्यायालय ने माना कि 2005 का संशोधन पिता की निर्वसीयत संपत्ति में पुत्री के पूर्व-स्थापित अधिकारों को समाप्त या रद्द नहीं करता है। ऐसे अधिकार धारा 8 के अधीन उत्तराधिकार के माध्यम से उत्पन्न होते हैं और 2005 के संशोधन के अधीन जन्म से प्रदत्त सहदायिकी अधिकारों से स्वतंत्र हैं।
- पूर्व-न्याय के सिद्धांत पर: न्यायालय ने माना कि वाद को खारिज करने की मांग वाली द्वितीय याचिका पूर्व-न्याय के सिद्धांत के अधीन वर्जित है, क्योंकि ऐसी प्रथम याचिका पहले ही खारिज हो चुकी थी। सिंहई लाल चंद जैन बनाम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (1996) के मामले पर विश्वास करते हुए न्यायालय ने कहा कि जहाँ हित अविभाज्य हों और पक्षकार एक ही अधिकार के अधीन वाद लड़ रहे हों, वहाँ किसी अन्य पक्षकार द्वारा उसी अधिकार के अधीन दायर की गई बाद की याचिका पूर्व-न्याय के सिद्धांत के अधीन वर्जित है।
- उच्च न्यायालय की त्रुटि पर: न्यायालय ने माना कि उच्च न्यायालय ने सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 7 नियम 11 के अधीन वाद को प्रारंभिक प्रक्रम में ही खारिज करने में त्रुटी की, जबकि उसने पहले यह परीक्षा नहीं की कि विवादित तथ्यात्मक प्रश्न विद्यमान थे या नहीं, जिनका अवधारण केवल विचारण के दौरान ही किया जा सकता है। न्यायालय ने आगे माना कि उच्च न्यायालय ने रजिस्ट्रीकृत विभाजन विलेख के अस्तित्व को इस बात का निश्चायक अवधारण मान लेने में त्रुटी की कि विभाजन वैध था और उन सभी व्यक्तियों पर बाध्यकारी था, जिनमें पुत्रियाँ भी शामिल थीं जो विभाजन की पक्षकार नहीं थीं।
हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 6 क्या है?
धारा 6 — सहदायिकी संपत्ति में के हित का न्यागमन:
उपधारा (1) — पुत्रियाँ सहदायिकी के रूप में:
- 2005 के संशोधन के लागू होने के पश्चात् से, मिताक्षरा संयुक्त हिंदू परिवार में किसी सहदायिकी की पुत्री जन्म से ही सहदायिकी बन जाती है, ठीक उसी तरह जैसे कोई पुत्र बनता है।
- पैतृक संपत्ति में उसके वही अधिकार और दायित्त्व हैं जो एक पुत्र के होते हैं।
- यद्यपि, 20 दिसंबर, 2004 से पूर्व हुए किसी भी संपत्ति के विभाजन या अंतरण पर इस उपबंध का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा या यह उपबंध इसे अमान्य नहीं करेगा।
उपधारा (2) — महिला सहदायिकी की संपत्ति की प्रकृति:
- उपधारा (1) के अधीन किसी हिंदू महिला द्वारा अर्जित संपत्ति सहदायिकी स्वामित्व के गुणों के साथ धारित की जाती है और वसीयतनामा व्यवस्था (अर्थात् वसीयत द्वारा) द्वारा निपटाई जा सकती है।
उपधारा (3) — 2005 के पश्चात् मृत्यु होने पर उत्तराधिकार:
- यदि किसी हिंदू की मृत्यु 2005 के संशोधन के पश्चात् होती है, तो मिताक्षरा सहदायिकी संपत्ति में उसका हित वसीयतनामा या बिना वसीयतनामा के उत्तराधिकार द्वारा अंतरित होता है, न कि उत्तरजीविता द्वारा। सहदायिकी संपत्ति का विभाजन हो चुका माना जाता है, जिसमें निम्नलिखित शामिल हैं:
- पुत्री को भी पुत्र के समान अंश मिलता है।
- किसी मृत पुत्र या पुत्री का अंश उसके जीवित बच्चे को मिलेगा।
- किसी मृत पुत्र/पुत्री के मृत संतान का वह अंश जो उस संतान की जीवित संतान को मिलेगा।
उपधारा (4) — धार्मिक दायित्त्व का उन्मूलन:
- 2005 के पश्चात्, कोई भी न्यायालय केवल धार्मिक दायित्त्व के आधार पर किसी पुत्र, पोत्र या प्रपौत्र के विरुद्ध ऋण वसूली की कार्यवाही करने के किसी भी अधिकार को मान्यता नहीं देगा।
- यद्यपि, 2005 से पूर्व लिये गए ऋण और ऐसे ऋणों के संबंध में किये गए अंतरण पुराने धार्मिक दायित्त्व नियम के अधीन लागू करने योग्य बने रहेंगे।
उपधारा (5) — 2004 से पूर्व के विभाजनों के लिये व्यावृत्ति खंड:
- धारा 6, 20 दिसंबर 2004 से पूर्व किये गए किसी भी विभाजन पर लागू नहीं होती है।
- यहाँ "विभाजन" से तात्पर्य रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1908 के अधीन रजिस्ट्रीकृत विलेख द्वारा किये गए विभाजन या न्यायालय के आदेश द्वारा किये गए विभाजन से है।