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सिविल कानून

जानबूझकर किराया न चुकाने का साबित किये बिना प्रतिरक्षा को खारिज नहीं किया जा सकता

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 19-May-2026

धर्मेंद्र कालरा और अन्य बनाम कुलविंदर सिंह भाटिया 

"आदेश 15 नियम सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन प्रतिरक्षा को खारिज करने की शक्तितथापि अनिवार्य शब्दों में व्यक्त की गई हैयांत्रिक रूप से प्रयोग नहीं की जानी चाहिये। न्यायालय को यह विचार करना होगा कि क्या पर्याप्त अनुपालन हुआ है और क्या व्यतिक्रम जानबूझकर या अवज्ञापूर्ण है।" 

न्यायमूर्ति एस.वी.एन. भट्टी और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

भारत के उच्चतम न्यायालय की एक खंडपीठजिसमें न्यायमूर्ति एस.वी.एन. भट्टी और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले शामिल थेनेधर्मेंद्र कालरा और अन्य बनाम कुलविंदर सिंह भाटिया (2026) के मामले मेंयह माना कि सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) के आदेश 15 नियम के अधीन किसी किराएदार की प्रतिरक्षा को प्रारंभिक प्रक्रम में ही खारिज करना अनुचित हैजब तक कि पहले "प्रथम सुनवाई की तारीख" अवधारित न कर ली जाएकिराएदार पर समन की उचित तामील सुनिश्चित न कर ली जाए और यह परीक्षा न कर ली जाए कि किराया जमा करने में व्यतिक्रम जानबूझकर किया गया था या सद्भावनापूर्ण था 

  • न्यायालय ने विचारण न्यायालय और उच्च न्यायालय दोनों के आदेशों को अपास्त कर दिया और मामले को नए सिरे से विचार के लिये वापस भेज दियायह मानते हुए कि प्रतिरक्षा को खारिज करना एक गंभीर मामला है और इसका सहारा तब तक नहीं लिया जाना चाहिये जब तक कि किराएदार की ओर से जानबूझकर व्यतिक्रम या अवज्ञापूर्ण आचरण का स्पष्ट मामला न हो। 

धर्मेंद्र कालरा और अन्य बनाम कुलविंदर सिंह भाटिया (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • यह विवाद दो हॉलों से संबंधित किराएदारी को लेकर उत्पन्न हुआजहाँ प्रत्यर्थी-किराएदार "ज्ञान वैष्णव होटल" का संचालन कर रहा था। 
  • भू-स्वामियों ने तर्क दिया कि सितंबर 2020 में मासिक किराया बढ़ाकर 25,000 रुपए कर दिया गया थाऔर किराएदार ने नवंबर 2020 से भुगतान में व्यतिक्रम किया था 
  • संपत्ति अंतरण अधिनियम की धारा 106 के अधीन किराएदारी समाप्त करने का नोटिस जारी करने के बादभू-स्वामियों ने बेदखली और किराए के बकाया की वसूली की मांग करते हुए लघु वाद न्यायालय में वाद संस्थित किया। 
  • कार्यवाही के लंबित रहने के दौरानभू-स्वामियों ने किराए का भुगतान न करने के आधार पर किराएदार की प्रतिरक्षा को खारिज करने की मांग करते हुए आदेश 15 नियम सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन एक आवेदन दायर किया। 
  • विचारण न्यायालय ने अगस्त, 2023 को आवेदन मंजूर कर लिया और प्रतिरक्षा की दलील को खारिज कर दिया। 
  • किराएदार ने इस आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती दीजिसने आंशिक रूप से पुनरीक्षण याचिका मंजूर करते हुए किराएदार को 25,000 रुपए के बजाय 1,500 रुपए प्रति माह की दर से किराया जमा करने का निदेश दिया और चेतावनी दी कि किराया जमा न करने पर प्रतिरक्षा की याचिका खारिज कर दी जाएगी। बाद मेंकिराएदार द्वारा किराया जमा न करते हुए भीउच्च न्यायालय ने स्थानीय अधिवक्ता के विदेश चले जाने के आधार पर समय सीमा में और विस्तार दिया। 
  • इससे व्यथित होकर भू-स्वामियों ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 15 नियम के अधीन शक्ति की प्रकृति पर:न्यायालय ने माना कि सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश15 नियम के अधीन प्रतिरक्षा को खारिज करने की शक्तियद्यपि अनिवार्य शब्दों में व्यक्त की गई हैयांत्रिक रूप से प्रयोग नहीं की जानी चाहिये। न्यायालय को यह विचार करना चाहिये कि क्या पर्याप्त अनुपालन हुआ है और क्या व्यतिक्रम जानबूझकर या अवज्ञापूर्ण है। प्रतिरक्षा को खारिज करना एक गंभीर मामला है और इसका सहारा तब तक नहीं लिया जाना चाहिये जब तक कि किराएदार की ओर से जानबूझकर व्यतिक्रम या अवज्ञापूर्ण आचरण का स्पष्ट मामला न हो। 
  • प्रथम सुनवाई की तारीख के संबंध में:न्यायालय ने कहा कि प्रथम सुनवाई की तारीख—जिसे वाद में विवाद पर विचार करने की तारीख के रूप में परिभाषित किया गया है—को आदेश 15 नियम सिविल प्रक्रिया संहिता लागू करने से पहले अवधारित किया जाना चाहिये। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि प्रतिरक्षा की दलीलों को खारिज करने के लिये दायर आवेदन पर केवल प्रक्रियात्मक अनुपालन के लिये अवधारित किसी भी तारीख पर विचार नहीं किया जा सकता है। ऐसी तारीख के स्पष्ट अवधारण के अभाव मेंआदेश 15 नियम सिविल प्रक्रिया संहिता लागू करने का आधार ही अनिश्चित हो जाता है। 
  • विचारण न्यायालय की त्रुटि पर:न्यायालय ने पाया कि विचारण न्यायालय ने प्रारंभिक सुनवाई की तारीख अवधारित किये बिना और यह परीक्षा किये बिना कि किराएदार का व्यतिक्रम सद्भावनापूर्ण था या जानबूझकरआदेश 15 नियम सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन आवेदन को स्वीकार करने में गलती की थी। नोटिस की उचित तामील और सुनवाई का अवसर जैसे मूलभूत पहलुओं को न तो निश्चायक रूप से निर्धारित किया गया था और न ही पर्याप्त रूप से जांचा गया था। 
  • उच्च न्यायालय के दृष्टिकोण पर:न्यायालय ने उच्च न्यायालय के दृष्टिकोण में भी कमी पाईयह मानते हुए कि यद्यपि उसने प्रारंभ में एक निर्धारित अवधि के भीतर जमा राशि जमा करने का सशर्त आदेश पारित किया थालेकिन बाद में उसने किराएदार को दिखाई गई बाद की रियायत के साथ पूर्व के सशर्त निदेश का पर्याप्त रूप से सामंजस्य स्थापित किये बिना समय विस्तार प्रदान किया। 

सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के आदेश 15 नियम क्या है? 

सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 15 नियम 5 — गृहीत भाटक निक्षेप करने की असफलता के लिये प्रतिरक्षा को अमान्य करना: 

उप-नियम (1) — प्रतिवादी-किराएदार पर मूल दायित्त्व: 

  • पट्टे की समाप्ति के बाद बेदखली और उपयोग एवं कब्जे के लिये किराए/प्रतिकर की वसूली के लिये पट्टाकर्त्ता द्वारा दायर वाद मेंप्रतिवादी को प्रथम सुनवाई के समय या उससे पूर्व उसके द्वारा देय स्वीकार की गई पूरी राशि, 9% प्रति वर्ष की दर से ब्याज सहितनिक्षेप करना होगा 
  • चाहे कोई राशि देय मानी जाए या न मानी जाएवाद की पूरी अवधि के दौरान प्रतिवादी को देय राशि का भुगतान उसके उत्पन्न होने की तिथि से एक सप्ताह के भीतर करना होगा। 
  • यदि इनमें से कोई भी निक्षेप राशि जमा नहीं की जाती हैतो न्यायालय प्रतिवादी की प्रतिरक्षा को खारिज कर सकता है (उप-नियम के अधीन)। 

स्पष्टीकरण 1 — "प्रथम सुनवाई": 

  • इसका अर्थ है समन में उल्लिखित लिखित कथन दाखिल करने या सुनवाई की तिथि। 
  • जहाँ एक से अधिक तिथियों का उल्लेख किया गया हैवहाँ इसका तात्पर्य उन तिथियों में से अंतिम तिथि से है। 

स्पष्टीकरण 2 — "उसके द्वारा देय मानी गई पूरी राशि": 

  • इसका अर्थ है कुल सकल राशि (किराया या उपयोग और कब्जे के लिये प्रतिकर) जो बकाया अवधि के लिये स्वीकृत किराया दर पर गणना की गई हो। 
  • केवल निम्नलिखित कटौतियों की अनुमति है: पट्टाकर्त्ता के खाते पर स्थानीय प्राधिकरण को भुगतान किये गए करपट्टेदार को भुगतान की गई और पट्टाकर्त्ता द्वारा लिखित रूप में स्वीकार की गई राशिऔर उत्तर प्रदेश शहरी भवन (किरायाकिराया और बेदखली का विनियमन) अधिनियम, 1972 की धारा 30 के अधीन न्यायालय में जमा की गई राशि। 
  • अन्य कोई कटौती स्वीकार्य नहीं है। 

स्पष्टीकरण 3 — "मासिक देय राशि": 

  • इसका अर्थ है कि स्वीकृत किराया दर पर प्रत्येक माह देय राशि (किराया या उपयोग और कब्जे के लिये प्रतिकर के रूप में)। 
  • भवन के संबंध में पट्टाकर्त्ता के खाते पर स्थानीय प्राधिकरण को भुगतान किये गए करों (यदि कोई हो) की ही कटौती की अनुमति है। 

उप-नियम (2) — प्रतिरक्षा को हटाने से पूर्व अवसर: 

  • प्रतिरक्षा की दलील को खारिज करने का आदेश पारित करने से पहलेन्यायालय प्रतिवादी द्वारा दिये गए किसी भी कथन पर विचार कर सकता है। 
  • ऐसा निवेदन प्रथम सुनवाई के 10 दिनों के भीतर या मासिक जमा के लिये एक सप्ताह की अवधि समाप्त होने के 10 दिनों के भीतर किया जाना चाहियेजैसा भी मामला हो। 

उप-नियम (3) — वादी द्वारा निक्षेप राशि की निकासी: 

  • इस नियम के अधीन निक्षेप की गई राशि को वादी किसी भी समय निकाल सकता है। 
  • इस प्रकार की निकासी से निक्षेप राशि की सत्यता पर विवाद करने वाले वादी के किसी भी दावे पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता है। 
  • यदि जमा राशि में निक्षेपकर्त्ता द्वारा कटौती योग्य बताई गई राशियाँ शामिल हैंतो न्यायालय निकासी की अनुमति देने से पहले वादी को ऐसी राशियों के लिये प्रतिभूति प्रदान करने की आवश्यकता कर सकता है।