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सिविल कानून
कंपनी अधिनियम, 2013 के अंतर्गत विशेष न्यायालय
«20-May-2026
परिचय
कंपनी अधिनियम, 2013 के अंतर्गत विशेष न्यायालयों के माध्यम से एक समर्पित न्यायनिर्णय तंत्र स्थापित किया गया है जिससे अधिनियम के अधीन किये गए अपराधों का त्वरित और प्रभावी ढंग से निपटारा सुनिश्चित किया जा सके। अध्याय 28 — जिसमें धारा 435 से 440 शामिल हैं — केंद्र सरकार को विशेष न्यायालयों की स्थापना या उन्हें नामित करने का अधिकार देता है, उनकी संरचना निर्धारित करता है, उनके द्वारा विचारणीय अपराधों को परिभाषित करता है और उनके कामकाज को नियंत्रित करने वाले प्रक्रियात्मक ढाँचे को निर्धारित करता है।
ये उपबंध सामान्य आपराधिक न्यायालयों में निहित विलंब से कॉरपोरेट अभियोजन को बचाने के विधायी आशय को दर्शाते हैं, जबकि लागू होने की सीमा तक दण्ड प्रक्रिया संहिता की प्रक्रियात्मक सुरक्षा को भी संरक्षित करते हैं।
कंपनी अधिनियम, 2013 के अंतर्गत विशेष न्यायालयों की प्रमुख विशेषताएँ
- केंद्र सरकार द्वारा स्थापना (धारा 435): केंद्र सरकार को अधिसूचना द्वारा, अधिनियम के तहत अपराधों (धारा 452 को छोड़कर) के त्वरित विचारण के लिए आवश्यक संख्या में विशेष न्यायालय स्थापित करने या नामित करने का अधिकार है।
- विशेष न्यायालयों की संरचना: इनकी संरचना अपराध की गंभीरता पर निर्भर करती है:
- दो वर्ष या उससे अधिक कारावास के दण्ड वाले वाले अपराधों के लिये — सेशन न्यायाधीश या अपर सेशन न्यायाधीश।
- अन्य अपराधों के लिये – महानगर मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग के न्यायिक मजिस्ट्रेट।
- सभी नियुक्तियां केंद्र सरकार द्वारा संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की सहमति से की जाती हैं।
- अनन्य अधिकारिता (धारा 436): सभी निर्दिष्ट अपराध केवल उस क्षेत्र के लिये स्थापित विशेष न्यायालय द्वारा विचारणीय हैं जिसमें संबंधित कंपनी रजिस्ट्रीकृत कार्यालय स्थित है।
- संज्ञान लेने की शक्ति: एक विशेष न्यायालय पुलिस रिपोर्ट या परिवाद के आधार पर किसी अपराध का संज्ञान ले सकता है, बिना अभियुक्त को विचारण के लिये उसके समक्ष प्रस्तुत किये - यह सामान्य प्रस्तुत करने की प्रक्रिया से एक महत्त्वपूर्ण विचलन है।
- निरोध में रखने की शक्तियां: जहाँ किसी अभियुक्त को मजिस्ट्रेट के पास भेजा जाता है, वहां 15 दिनों (न्यायिक मजिस्ट्रेट) या 7 दिनों (कार्यपालक मजिस्ट्रेट) तक निरोध में रखने की अनुमति दी जा सकती है, जिसके बाद अभियुक्त को विशेष न्यायालय में भेजा जाना चाहिये।
- संबंधित अपराधों का विचारण: एक विशेष न्यायालय किसी अन्य अपराध का भी विचारण कर सकता है जिसके लिये अभियुक्त पर दण्ड प्रक्रिया संहिता (अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) के अधीन एक ही विचारण में आरोप लगाया जा सकता है।
- संक्षिप्त विचारण का अधिकार: एक विशेष न्यायालय तीन वर्ष से अधिक कारावास के दण्ड वाले किसी भी अपराध का संक्षिप्त विचारण कर सकता है, बशर्ते कि एक वर्ष से अधिक का दण्ड न दिया जाए। यदि वर्धित दण्ड उचित प्रतीत होता है, तो न्यायालय को नियमित विचारण प्रक्रिया का पालन करना होगा।
विशेष न्यायालयों का महत्व
- विशेष न्यायालय कॉर्पोरेट अपराधों के शीघ्र निपटान, वरिष्ठ न्यायिक अधिकारियों द्वारा विशेष न्यायनिर्णय और दण्ड प्रक्रिया संहिता प्रावधानों (अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) के अनुप्रयोग के माध्यम से निर्बाध प्रक्रियात्मक निरंतरता सुनिश्चित करते हैं।
- वे संक्रमणकालीन सुरक्षा उपायों के माध्यम से अधिकारिता संबंधी शून्यता को रोकते हैं, साथ ही उच्च न्यायालय की निगरानी को भी बनाए रखते हैं।
सांविधिक प्रावधानों का संक्षिप्त विवरण
- धारा 435 - स्थापना: केंद्र सरकार अधिसूचना द्वारा विशेष न्यायालयों की स्थापना कर सकती है; संरचना अपराध की गंभीरता के अनुसार भिन्न होती है; नियुक्तियों के लिये संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की सहमति आवश्यक है।
- धारा 436 — अधिकारिता और शक्तियां: निर्दिष्ट अपराध कंपनी के रजिस्ट्रीकृत कार्यालय क्षेत्र के विशेष न्यायालय द्वारा ही विचारणीय होंगे; बिना निरोध में लिये संज्ञान लेने की अनुमति होगी; अग्रेषित करने से पहले 15/7 दिनों तक निरोध; तीन वर्ष तक के अपराधों के लिये संक्षिप्त विचारण (दण्ड एक वर्ष तक सीमित)।
- धारा 438 – दण्ड प्रक्रिया संहिता का अनुप्रयोग: दण्ड प्रक्रिया संहिता के प्रावधान सभी विशेष न्यायालय की कार्यवाही पर लागू होते हैं; विशेष न्यायालय को सेशन न्यायालय या प्रथम वर्ग के महानगर मजिस्ट्रेट/न्यायिक मजिस्ट्रेट का न्यायालय माना जाएगा, जैसा भी लागू हो।
- धारा 440 — संक्रमणकालीन प्रावधान: जब तक विशेष न्यायालय की स्थापना नहीं की जाती, तब तक अपराधों का विचारण उस अधिकारिता वाले सेशन न्यायालय अथवा महानगरीय मजिस्ट्रेट/प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट के न्यायालय द्वारा किया जाएगा; साथ ही, दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 407 के अधीन मामलों के अंतरण संबंधी उच्च न्यायालय की शक्तियां स्पष्ट रूप से सुरक्षित रखी गई हैं।
निष्कर्ष
कंपनी अधिनियम, 2013 के अध्याय 28 के अंतर्गत विशेष न्यायालयों का ढाँचा कॉर्पोरेट अपराधों के लिये एक आत्मनिर्भर, फिर भी दण्ड प्रक्रिया संहिता से एकीकृत न्यायिक संरचना का निर्माण करता है। न्यायालयों की संरचना को परिभाषित करके, अनन्य अधिकारिता प्रदान करके, संक्षिप्त विचारण को सक्षम बनाकर और संक्रमणकालीन सुरक्षा उपायों का प्रावधान करके, यह अधिनियम सुनिश्चित करता है कि कॉर्पोरेट अपराधों का निपटारा शीघ्रता और कुशलता से हो। न्यायिक परीक्षा की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों के लिये धारा 435 से 440 तक पढ़ना अनिवार्य है, क्योंकि ये कंपनी विधि और आपराधिक प्रक्रिया के अंतर्संबंध पर आधारित हैं - जो उत्तर प्रदेश सहायक अभियोजन अधिकारी (UP APO), बिहार सहायक अभियोजन अधिकारी (Bihar APO), बिहार न्यायिक सेवा तथा अन्य समकक्ष परीक्षाओं में बार-बार पूछे जाने वाले विषयों में सम्मिलित हैं।