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पारिवारिक कानून

निर्वाह व्यय का उद्देश्य पत्नी के भविष्य को आर्थिक रूप से सुरक्षित करना है; इसकी राशि का निर्धारण किसी निश्चित सूत्र द्वारा नहीं किया जा सकता

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 29-Jul-2026

लालमुनि देवी बनाम नरेश ओरांव 

"पत्नी को स्थायी निर्वाह व्यय देने के लिये कोई गणितीय सूत्र नहीं अपनाया जा सकता। यद्यपिदोनों पक्षकारों की स्थितिउनकी सामाजिक आवश्यकताएंपति की वित्तीय क्षमता और अन्य दायित्वों को ध्यान में रखना आवश्यक है।" 

न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद 

स्रोत: झारखंड उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायमूर्ति संजय प्रसाद की खंडपीठ नेलालमुनि देवी बनाम नरेश ओरांव (2026)के मामले में तलाकशुदा पत्नी को देय स्थायी निर्वाह व्यय बढ़ाकर 30 लाख रुपए कर दियायह मानते हुए कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 25 के अधीन स्थायी निर्वाह व्यय का अवधारण को कोई गणितीय सूत्र नियंत्रित नहीं कर सकता हैअपितु न्यायालयों को पक्षकारों की स्थितिपति की वित्तीय क्षमतापत्नी की भविष्य की आवश्यकताओंमुद्रास्फीति और विवाह के दौरान प्राप्त जीवन स्तर को ध्यान में रखना चाहिये 

लालमुनि देवी बनाम नरेश ओरांव (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • लातेहार स्थित कुटुंब न्यायालय ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1)( i-a) और (i-b) के अधीन क्रूरता और परित्याग के आधार पर पक्षकारों के बीच विवाह भंग करने की डिक्री दी थी 
  • पति ने निर्णय के विरुद्ध अपील दायर की और अपील लंबित रहने के दौरान उसने द्वितीय विवाह कर लिया 
  • चूँकि पक्षकारों के बीच पुनर्मिलन अब संभव नहीं थाइसलिये उच्च न्यायालय ने कार्यवाही को हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 25 के अधीन स्थायी निर्वाह व्यय की मात्रा निर्धारित करने तक सीमित कर दिया और दोनों पक्षकारों को रजनेश बनाम नेहा के मामले में उच्चतम न्यायालय के दिशानिर्देशों के अनुसार अपनी संपत्ति और देनदारियों का प्रकटन करते हुए शपथपत्र दाखिल करने का निदेश दिया। 
  • पत्नी ने प्रकटन किया कि वह बेरोजगार है और सड़क किनारे सब्जी की दुकान पर अपनी माता की सहायता करती हैजिससे उसे प्रतिदिन लगभग 200-300 रुपए की कमाई होती है। 
  • कांस्टेबल के पद पर कार्यरत पति ने बताया कि गृह ऋणबीमाभविष्य निधि और भरण-पोषण के लिये कटौती के बाद उनका सकल मासिक वेतन ₹66,097 और शुद्ध वेतन ₹40,354 था। 
  • पति ने एक बड़ी रकम का भुगतान करने में आर्थिक अक्षमता का हवाला दियाजबकि पत्नी इस शर्त पर विवाह विच्छेद के लिये सहमत थी कि उसे पूर्ण और अंतिम निपटान के रूप में पर्याप्त स्थायी निर्वाह व्यय मिले। 
  • न्यायालय के समक्ष दोनों पक्षकारों के बीच कोई समझौता नहीं हो सका। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 25 के उद्देश्य पर:पीठ ने टिप्पणी की कि यह उपबंध ऐसे पति/पत्नी की कठिनाई को कम करने के लिये मौजूद है जिसके पास अपना भरण-पोषण करने या मुकदमेबाजी के खर्चों को वहन करने के लिये पर्याप्त स्वतंत्र आय नहीं हैयह देखते हुए कि इसका मूल उद्देश्य पर्याप्त आय स्रोत के अभाव में पति या पत्नी के जीवन को बनाए रखना है। 
  • एक निश्चित सूत्र के अभाव में:यू. श्री बनाम यू. श्रीनिवास के मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्णय पर विश्वास करते हुएन्यायालय ने दोहराया कि स्थायी निर्वाह व्यय अवधारित करने के लिये कोई गणितीय सूत्र लागू नहीं किया जा सकता हैऔर इसमें पक्षकारों की स्थितिउनकी संबंधित सामाजिक आवश्यकताएंपति की वित्तीय क्षमता और उसके अन्य दायित्वों को ध्यान में रखा जाना चाहिये 
  • पत्नी की भविष्य की सुरक्षा के संबंध में:यह देखते हुए कि पत्नी की आयु केवल 28 वर्ष थीन्यायालय ने माना कि उसकी भविष्य की वित्तीय सुरक्षा को राशि तय करते समय ध्यान में रखा जाना चाहियेविशेष रूप से इसलिये कि उसे मुख्य रूप से निर्वाह व्यय राशि से प्राप्त ब्याज पर निर्भर रहना होगासाथ ही भविष्य में होने वाली मुद्रास्फीति के प्रभाव को भी ध्यान में रखना आवश्यक है। 
  • न्यायसंगतता का आकलन करते हुए:पति की आय और दायित्वों को पत्नी की उचित आवश्यकताओं के विरुद्ध तौलते हुएन्यायालय ने माना कि ₹30,00,000 की एकमुश्त राशि स्थायी निर्वाह व्यय के रूप में न्यायसंगतउचित और तर्कसंगत होगीजो कुटुंब न्यायालय द्वारा पहले दिये गए ₹10,000 प्रति माह के भरण-पोषण से अधिक है। 
  • जारी निदेश पर:न्यायालय ने पति को निदेश दिया कि वह बढ़ी हुई राशि 30 लाख रुपए का भुगतान बारह महीने की अवधि के भीतर चार समान किस्तों में करे। 

निर्वाह व्यय क्या है? 

निर्वाह व्यय वह राशि है जो एक पति या पत्नी दूसरे को अलगाव या विवाह-विच्छेद के बाद अपने भरण-पोषण और रखरखाव के लिये भुगतान करता हैजिससे आर्थिक रूप से कमजोर पति या पत्नी अपने जीवन यापन के साधनों से वंचित न रह जाए। 

  • उद्देश्य:इसका उद्देश्य ऐसे पति/पत्नी (सामान्यत: पत्नीयद्यपि विधि की शब्दावली लिंग-तटस्थ है) को होने वाली कठिनाई को रोकना हैजिसके पास अपना भरण-पोषण करने या मुकदमेबाजी के खर्चों को पूरा करने के लिये पर्याप्त स्वतंत्र आय नहीं है। 
  • प्रकार: 
    • अंतरिम/वादकालीन निर्वाह व्यय – विवाह-विच्छेद की कार्यवाही लंबित रहने के दौरान संदाय किया जाता है (उदाहरण के लियेहिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 के अधीन)। 
    • स्थायी निर्वाह व्यय - विवाह-विच्छेद के निर्णय के समय या उसके बादएकमुश्त राशि के रूप में या आवधिक (मासिक/वार्षिक) संदाय के रूप मेंपति या पत्नी के भविष्य के लिये प्रदान किया जाता है (उदाहरण के लियेहिंदू विवाह अधिनियम की धारा 25 के अधीनजो कि झारखंड उच्च न्यायालय के उपरोक्त लेख में चर्चा किया गया उपबंध था)। 
  • राशि का अवधारण कैसे होता है:न्यायालय किसी निश्चित सूत्र का प्रयोग नहीं करते। वे निम्नलिखित कारकों पर विचार करते हैं: 
    • संदाय करने वाले पति या पत्नी की आय और वित्तीय क्षमता 
    • प्राप्तकर्ता पति या पत्नी की आवश्यकताएँ और आय (यदि कोई हो) 
    • विवाह के दौरान प्राप्त जीवन स्तर  
    • पक्षकारों की स्थिति और सामाजिक प्रतिष्ठा 
    • भविष्य की आवश्यकताएंजिनमें मुद्रास्फीति का प्रभाव भी शामिल है 
    • पक्षकारों का आचरण 
  • संदाय का स्वरूप:यह एकमुश्त राशि या आवधिक संदाय हो सकता है। 

हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 25 क्या है? 

हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 25 – स्थायी निर्वाह व्यय और भरण-पोषण 

  • कौन आवेदन कर सकता है:पति या पत्नी में से कोई भी भरण-पोषण और सहायता के लिये न्यायालय में आवेदन कर सकता है। 
  • आवेदन कब किया जा सकता है: डिक्री पारित होने के समयया डिक्री पारित होने के बाद किसी भी समय। 
  • संदाय का स्वरूप:न्यायालय प्रत्यर्थी को आवेदक को निम्न में से किसी एक तरीके से संदाय करने का आदेश दे सकता है: 
    • एकमुश्त (कुल) राशिया 
    • आवेदक के जीवनकाल से अधिक अवधि के लिये मासिक या आवधिक राशि। 
  • न्यायालय द्वारा विचार किये गए कारक: 
    • प्रत्यर्थी की स्वयं की आय और संपत्ति 
    • आवेदक की आय और संपत्ति 
    • पक्षकारों का आचरण 
    • मामले की अन्य परिस्थितियाँ 
    • कुल मिलाकरपरीक्षण यह है कि अदालत को क्या "न्यायसंगत" लगता है। 
  • भुगतान की सुरक्षा:यदि आवश्यक होतो आदेशित राशि को प्रत्यर्थी की अचल संपत्ति पर भार लगाकर सुरक्षित किया जा सकता है।  
  • परिस्थितियों में परिवर्तन पर भिन्नता [उपधारा (2)]:यदि आदेश पारित होने के बाद किसी भी पक्षकार की परिस्थितियाँ बदल जाती हैंतो न्यायालय किसी भी पक्षकार द्वारा आवेदन परआदेश को उचित समझे तो उसमें परिवर्तनसंशोधन या निरस्त कर सकता है। 
  • पश्चातव्रती आचरण पर परिवर्तन [उपधारा (3)]:न्यायालय इसी प्रकार आदेश को बदल सकता हैसंशोधित कर सकता है या रद्द कर सकता है यदि वह संतुष्ट है कि लाभ प्राप्त करने वाला पक्ष: 
    • पुनर्विवाह कर लिया हैया 
    • पत्नी होते हुए भी वह पवित्र नहीं रहीया 
    • पति होने के नातेउसने विवाह से बाहर किसी महिला के साथ लैंगिक संबंध बनाए हैं।