9 मार्च से शुरू हो रहे हमारे ऑल-इन-वन ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स के साथ अपनी ज्यूडिशियरी की तैयारी को मजबूत बनाएं | यह कोर्स अंग्रेज़ी और हिंदी दोनों माध्यमों में उपलब्ध है।   |   आज ही हमारे ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स में एडमिशन लें और अपनी तैयारी को और बेहतर बनाएँ | हिंदी माध्यम बैच: 9 मार्च, सुबह 8 बजे   |   आज ही एडमिशन लें बिहार APO (प्रिलिम्स + मेन्स) कोर्स में और अपने सपनों को दे नई दिशा | ऑफलाइन एवं ऑनलाइन मोड में उपलब्ध | 12 जनवरी 2026  से कक्षाएँ आरंभ   |   ज्यूडिशियरी की तैयारी अब हिंदी माध्यम में! दृष्टि ज्यूडिशियरी का नया बैच 22 जून 2026 से शुरू | आज ही एडमिशन लें | ऑनलाइन व ऑफलाइन दोनों मोड में उपलब्ध |   |   एडमिशन ओपन: UP APO प्रिलिम्स + मेंस कोर्स 2025, बैच 6th October से   |   ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स (प्रयागराज)   |   अपनी सीट आज ही कन्फर्म करें - UP APO प्रिलिम्स कोर्स 2025, बैच 6th October से







होम / करेंट अफेयर्स

आपराधिक कानून

प्राकृत जीवनकाल की शेष अवधि तक बिना किसी परिहार के कारावास

    «    »
 30-Jul-2026

रामाश्री उर्फ फक्कड़ बनाम उत्तर प्रदेश राज्य 

"ऐसा प्रयास विधि की प्रक्रिया का दुरुपयोग हैयदि दुर्व्यवहार नहीं तो।" 

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ नेरामाश्री उर्फ फक्कड़ बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2026) के मामले में, बिना किसी परिहार के किसी दोषी को उसके प्राकृत जीवनकाल की शेष अवधि के लिये कारावास का दण्ड देने की सांविधानिकता को चुनौती देने वाली कई रिट याचिकाओं को खारिज कर दियायह मानते हुए कि यह विवाद्यक पहले ही एक संविधान पीठ द्वारा तय किया जा चुका है और इसे दो न्यायाधीशों की पीठ के समक्ष फिर से उठाना प्रक्रिया का दुरुपयोग है। 

रामाश्री उर्फ फक्कड़ बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • ये याचिकाएं चार समूहों के दोषियों द्वारा दायर की गई थींजिनमें मृत्युदण्ड प्राप्त कैदी भी शामिल थे जिनकी सजा को या तो सांविधानिक अधिकारियों द्वारा लघु कर दिया गया था या न्यायालयों द्वारा उनके शेष प्राकृत जीवनकाल के लिये कारावास में संशोधित कर दिया गया था। 
  • याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि भारतीय दण्ड संहिता की धारा 302 हत्या के लिये  केवल दो ही दण्डों को मान्यता देती है  मृत्युदण्ड और आजीवन कारावास - और इसमें बिना किसी परिहार के शेष प्राकृत जीवनकाल के लिये कारावास के दण्ड का प्रावधान नहीं है। 
  • इसके अलावा यह तर्क दिया गया कि इस प्रकार के दण्ड, दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 432 के अधीन समुचित सरकार को उपलब्ध सांविधिक परिहार की शक्ति को असफल कर देती हैं। 
  • याचिकाकर्ताओं ने तदनुसार अनुच्छेद 32 के अधीन उच्चतम न्यायालय की अधिकारिता का हवाला देते हुएऐसे दण्डों को असांविधानिक घोषित करने की मांग की। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • इस प्रकार के दण्डों की वैधता पर:न्यायालय ने माना कि यह विवाद्यक भारत संघ बनाम वी. श्रीहरन (2016)के मामले में संविधान पीठ के निर्णय द्वारा निश्चायक रूप से सुलझा लिया गया थाजिसनेस्वामी श्रद्धानंद (2) बनाम कर्नाटक राज्य (2008) के मामले में विकसित दण्ड की "विशेष श्रेणी" को मंजूरी दी थी।यह श्रेणी सांविधानिक न्यायालयों को उचित मामलों मेंमृत्युदण्ड के बजाय दोषी के शेष प्राकृत जीवनकाल के लिये कारावास का निदेश देने की अनुमति देती हैजिससे ऐसे दण्ड सामान्य परिहार व्यवस्था से बाहर हो जाती हैं। 
  • एक छोटी पीठ के समक्ष एक सुलझे हुए विवाद्यक को उठाने पर:न्यायालय ने याचिकाओं को प्रक्रिया का दुरुपयोग पायाक्योंकि एक समतुल्य या बड़ी पीठ के विवाद्यक को एक बार संविधान पीठ द्वारा निश्चायक रूप से तय कर दिये जाने के बाद दो-न्यायाधीशों की पीठ के समक्ष दोबारा नहीं उठाया जा सकता था। 
  • धारा 432 दण्ड प्रक्रिया संहिता (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 473) की निरंतर प्रयोज्यता पर:न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जहाँ "बिना परिहार" के विशिष्ट जोड़ के बिना आजीवन कारावास का दण्ड दिया जाता हैवहाँ धारा 432 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन समुचित सरकार की शक्ति अप्रभावित रहती हैऔर उस उपबंध के अधीन परिहार के लिये आवेदन पोषणीय होगा। 
  • अनुच्छेद 32 को शॉर्टकट न मानने पर:न्यायालय ने कहा कि यद्यपि अनुच्छेद 32 संविधान का "मूल आधार" हैफिर भी इसका उपयोग अनुच्छेद 72 और 161 के अंतर्गत उपलब्ध परिहार और क्षमा के सांविधानिक उपचारों को दरकिनार करने के लिये नहीं किया जा सकता। चूँकि कुछ याचिकाकर्ताओं ने इन उपचारों का पूरी तरह से उपयोग नहीं किया थाइसलिये सीधे उच्चतम न्यायालय की असाधारण अधिकारिता का आह्वान करना अनुचित था। 
  • क्षमादान शक्तियों पर न्यायिक पुनर्विलोकन के दायरे के संबंध में:न्यायालय ने पाया कि अनुच्छेद 72 और 161 के अधीन राष्ट्रपति और राज्यपाल की कार्यपालिका शक्तियां अन्य सांविधानिक प्रावधानों से अप्रतिबंधित हैंऔर याचिकाकर्ताओं के तर्क को स्वीकार करने के लिये न्यायालय को कार्यपालिका शक्ति के प्रयोग पर न्यायिक पुनर्विलोकन के बजाय अपील में बैठना होगाजो कि अग्राह्य है। 
  • अनुतोष दिये जाने पर:न्यायालय ने याचिकाओं के समूह को खारिज कर दिया और बिना किसी परिहार के शेष प्राकृत जीवनकाल के लिये कारावास के दण्ड को सांविधानिक रूप से वैध माना। 

"विशेष श्रेणी" के अंतर्गत शेष प्राकृत जीवनकाल के लिये कारावास का दण्ड क्या है? 

बारे में: 

  • यह दण्ड का एक विकल्प हैजो आजीवन कारावास के सामान्य दण्ड से अलग हैजिसके अधीन दोषी को अपने के शेष प्राकृत जीवनकाल के लिये कारावास भुगतने का निदेश दिया जाता हैकुछ मामलों में परिहार या पैरोल का लाभ भी नहीं मिलता है। 
  • इसे न्यायिक रूप से इसलिये विकसित किया गया था जिससे उन मामलों में मृत्युदण्ड  और सामान्य आजीवन कारावास के बीच के अंतर को पाटा जा सके जहाँ मृत्युदण्ड को अत्यधिक माना जाता है लेकिन सामान्य आजीवन कारावास (परिहार के अधीन) को अपर्याप्त माना जाता है। 

उत्पत्ति और सांविधानिक आधार: 

  • इस श्रेणी की उत्पत्तिस्वामी श्रद्धानंद (2) बनाम कर्नाटक राज्य (2008)से हुई हैजहाँ उच्चतम न्यायालय ने माना कि सांविधानिक न्यायालय मृत्युदण्ड के स्थान पर 14 वर्ष से अधिक की निश्चित अवधि के लिये या के शेष प्राकृत जीवनकाल की अवधि के लिये दण्ड अधिरोपित कर सकती हैं। 
  • इसकी सांविधानिक वैधता कोभारत संघ बनाम वी. श्रीहरन (2016) मामले में एक संविधान पीठ द्वारा पुष्टि की गई थी, जिसमें यह माना गया था कि इस प्रकार के दण्ड अनुच्छेद 20 या भारतीय दण्ड संहिता के अधीन दण्ड योजना का उल्लंघन नहीं करती हैं। 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 473 के साथ परस्पर क्रिया: 

  • यह धारा समुचित सरकार को किसी दण्ड को संपूर्ण या उसके किसी भाग को निलंबित करने या परिहार करने का अधिकार देती है। 
  • जहाँ कोई न्यायालय विशेष रूप से यह निदेश देता है कि दण्ड "बिना परिहार के" भुगता  जाएवहाँ इस धारा के अधीन सामान्य परिहार की शक्ति उस दण्ड के लिये लागू नहीं होती है। 
  • जहाँ इस प्रकार की कोई विशिष्ट रोक नहीं लगाई गई हैवहाँ शेष प्राकृत जीवनकाल की अवधि के लिये कारावास के दण्ड पर भी धारा 432 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन सरकार की शक्ति लागू रहती है। 

अनुच्छेद 72 और 161 के साथ परस्पर क्रिया: 

  • अनुच्छेद 72 और 161 क्रमशः राष्ट्रपति और राज्यपाल को क्षमादानदण्ड में परिहारदण्ड-स्थगन या दण्ड में लघुकरण प्रदान करने की सांविधानिक शक्ति प्रदान करते हैं 
  • ये शक्तियां दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 432 के अधीन सांविधिक परिहार से स्वतंत्र रूप से काम करती हैं और सांविधिक परिहार को प्रतिबंधित करने वाले न्यायालय के निदेश द्वारा सीमित नहीं होती हैं।