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आपराधिक कानून
केवल समझौते के आधार पर बलात्संग के मामले में कार्यवाही निरस्त नहीं की जा सकती है
«29-Oct-2026
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गोपाल लोधी बनाम मध्य प्रदेश राज्य और अन्य "केवल समझौते के आधार पर गंभीर अपराधों से संबंधित किसी मामले को निरस्त करना, जिसे हम स्वीकार नहीं कर सकते ।" न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने गोपाल लोधी बनाम मध्य प्रदेश राज्य और अन्य (2026) के मामले में निर्णय दिया। न्यायालय ने समझौते के आधार पर बलात्संग के मामले को निरस्त करने वाले मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के आदेश को अपास्त कर दिया तथा विचारण जारी रखने का निदेश दिया। साथ ही, अभियुक्त को कुछ शर्तों के अधीन अग्रिम जमानत प्रदान की।
गोपाल लोधी बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- याचिकाकर्त्ता के विरुद्ध निम्नलिखित आधारों पर मामला दर्ज किया गया:
- भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 64(1), 33(2) और 351(3)।
- अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 (SC/ST Act) की धारा 3(1)(ब)(i), 3(1)(ब)(ii) और 3(2)(v)।
- याचिकाकर्त्ता ने अग्रिम जमानत के लिये उच्चतम न्यायालय का रुख किया।
- कार्यवाही के दौरान, याचिकाकर्त्ता के अधिवक्ता ने न्यायालय को सूचित किया कि:
- दोनों पक्षकारों के बीच मामले में समझौता हो गया था।
- उच्च न्यायालय ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 528 के अधीन दायर एक आवेदन का निपटारा करते हुए अपनी अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग करते हुए समझौते को स्वीकार कर लिया था।
- अपराध की गंभीरता को देखते हुए, उच्चतम न्यायालय ने असुविधा व्यक्त की और उच्च न्यायालय द्वारा उद्धृत निर्णयों की परीक्षा की।
उच्चतम न्यायालय के समक्ष प्रश्न:
- क्या बलात्संग जैसे जघन्य अपराध से जुड़े मामले को उच्च न्यायालय अपनी अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग करते हुए केवल पक्षकारों के बीच हुए समझौते के आधार पर रद्द कर सकता है?
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
उच्च न्यायालय द्वारा जिन पूर्व निर्णयों पर विश्वास किया गया है, उन पर:
- न्यायालय ने कहा कि नरिंदर सिंह बनाम पंजाब राज्य और अनीता मारिया डायस और अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य के मामलों में यह चेतावनी दी गई थी कि मानसिक विकृति दर्शाने वाले जघन्य और गंभीर अपराधों या हत्या, बलात्संग और डकैती जैसे अपराधों में, जिन्हें निजी प्रकृति का नहीं कहा जा सकता, किसी भी प्रकार का अपराध रद्द करने की अंतर्निहित शक्ति का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिये।
- ज्ञान सिंह बनाम पंजाब राज्य के मामले में यह अभिनिर्धारित किया गया कि जब पक्षकार समझौता कर लेते हैं, तो दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 482 (अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 528) के अधीन शक्ति का प्रयोग किया जा सकता है, सिवाय उन मामलों के जहाँ:
- ये अपराध जघन्य और गंभीर हैं, जिनमें मानसिक विकृति शामिल है, जैसे हत्या, बलात्कार या डकैती।
- ये अपराध भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 जैसे विशेष विशेष के अंतर्गत आते हैं।
- शंभू खरवार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के मामले में, आरोप ही यह दर्शाते हुए खारिज कर दिये गए कि संबंध आपसी सहमति से स्थापित थे, न कि केवल किसी समझौते के कारण।
- न्यायालय प्रथम दृष्टया इस बात से संतुष्ट नहीं था कि इन निर्णयों से उच्च न्यायालय को समझौते के आधार पर बलात्संग के आरोप वाले परिवाद को रद्द करने का अधिकार मिलता है, और उसने उच्च न्यायालय से मामले के अभिलेख मंगवाए।
अंतर्निहित अधिकारिता की सीमाओं पर:
- केवल समझौते के आधार पर, विशेषकर किसी अशमनीय अपराध के मामले में, दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के अधीन किसी मामले को निरस्त करना, उक्त धारा के अंतर्गत प्रदत्त अधिकारिता की सीमाओं का अतिक्रमण करना होगा।
- ऐसा निरस्तीकरण दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 320 के अधीन अपराधों के शमन की योजना का भी उल्लंघन होगा।
दबावपूर्वक कराए गए समझौतों तथा मिथ्या शिकायतों के संबंध में:
- न्यायालय ने न केवल अभियुक्त द्वारा दबाव डालकर कराए जा सकने वाले समझौतों, अपितु भविष्य में आर्थिक समझौता हो जाने के प्रलोभन में अनेक मिथ्या परिवाद किये जाने की संभावना पर भी चिंता व्यक्त की।
पीड़िता के साथ संवाद के संबंध में:
- पीठ ने जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के कार्यालय के माध्यम से तथा उसके सचिव की उपस्थिति में पीड़िता से संवाद किया।
- पीड़िता ने बताया कि उस पर समझौता करने के लिये दबाव डाला गया था, वह समझौते के लिये तैयार नहीं थी तथा समझौते के लिये उसे धनराशि की आवश्यकता थी।
- उसने स्पष्ट रूप से कहा कि उसने परिवाद दायर किया था और उसमें सत्य कथन किया था।
- न्यायालय ने स्पष्ट किया कि आरोपों की सत्यता की परीक्षा विचारण के दौरान की जाएगी और इस पर कोई राय व्यक्त नहीं की।
निर्देश जारी किये गए:
- मामले को निरस्त करने वाले उच्च न्यायालय के आदेश को अपास्त कर दिया गया तथा विचारण जारी रखने का निर्देश दिया गया।
- याचिकाकर्त्ता को कुछ शर्तों के अधीन अग्रिम जमानत प्रदान की गई।
- न्यायालय ने उच्च न्यायालय के विद्वान एकल न्यायाधीश द्वारा जिन निर्णयों पर विश्वास किया गया था, उन्हें वर्तमान मामले से भिन्न माना।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 528 क्या है?
बारे में:
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 528 उच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्तियों को संरक्षित करती है। यह दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 482 के अनुरूप है।
- इसमें उपबंधित है कि संहिता की कोई भी बात उच्च न्यायालय की उन अंतर्निहित शक्तियों को सीमित या प्रभावित नहीं करेगी, जिनके अधीन उच्च न्यायालय निम्नलिखित प्रयोजनों के लिये आवश्यक आदेश पारित कर सकता है।
- संहिता के अधीन पारित किसी आदेश को प्रभावी करना,
- किसी न्यायालय की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकना; या
- अन्यथा न्याय के उद्देश्यों की पूर्ति सुनिश्चित करना।
प्रमुख विशेषताएँ:
- यह उपबंध कोई नई शक्ति प्रदान नहीं करता, बल्कि उच्च न्यायालय में अंतर्निहित शक्तियों को मान्यता प्रदान करता है तथा उन्हें संरक्षित करता है।
- इस शक्ति का प्रयोग संयमपूर्वक, सावधानी के साथ तथा केवल असाधारण मामलों में किया जाना चाहिये।
- इसका उपयोग संहिता के स्पष्ट उपबंधों को निष्प्रभावी करने के लिये नहीं किया जा सकता।
समझौते के आधार पर मामले को निरस्त करना:
- समझौते के आधार पर आपराधिक कार्यवाहियों को निरस्त करने की शक्ति, अपराधों के शमन की शक्ति से भिन्न है।
- ज्ञान सिंह बनाम पंजाब राज्य के मामले में प्रतिपादित सिद्धांत के अनुसार, मुख्यतः सिविल, वाणिज्यिक, वैवाहिक अथवा निजी प्रकृति के अपराधों से संबंधित कार्यवाहियों को समझौते के आधार पर निरस्त किया जा सकता है, जहाँ कार्यवाहियों को जारी रखना निरर्थक होगा।
- हत्या, बलात्संग और डकैती जैसे जघन्य और गंभीर अपराध, जो बड़े पैमाने पर समाज को प्रभावित करते हैं, सामान्यतः केवल पक्षकारों के बीच समझौता हो जाने के आधार पर निरस्त नहीं किये जाने चाहिये।
अपराधों का शमन — भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 359:
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 359 (जो दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 320 के अनुरूप है) उन अपराधों को सूचीबद्ध करती है, जिनका शमन न्यायालय की अनुमति के बिना अथवा न्यायालय की अनुमति से किया जा सकता है।
- इस उपबंध में विनिर्दिष्ट नहीं किये गए अपराध अशमनीय होते हैं तथा उनका शमन नहीं किया जा सकता।
- भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 64 के अधीन बलात्संग का अपराध अशमनीय अपराध है।