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सांविधानिक विधि
लोक धर्मार्थ न्यास की न्यासिता वसीयत द्वारा वसीयत-संपत्ति के रूप में अंतरित नहीं की जा सकती है
« »29-Oct-2026
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जनहित सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट (रजिस्ट्रीकृत) बनाम श्रीमती अशुलिका शर्मा एवं अन्य "लोक धर्मार्थ न्यास का न्यास व्यक्तिगत संपत्ति नहीं है जिसे सामान्य संपत्ति की तरह वसीयत में दिया जा सके।" न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता |
स्रोत: पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता ने जनहित सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट (रजिस्ट्रीकृत) बनाम श्रीमती आशुलिका शर्मा एवं अन्य (2026) के मामले में निर्णय दिया। न्यायालय ने न्यास द्वारा दायर पुनरीक्षण याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार किया तथा मृतक आजीवन न्यासी की पुत्रवधू को वाद के निर्णय होने तक अपनी सास की वसीयत के आधार पर न्यासी के रूप में कार्य करने से प्रतिषिद्ध कर दिया।
जनहित सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट बनाम आशुलिका शर्मा (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- इस न्यास की स्थापना 2 जून 1989 को एक विलेख द्वारा की गई थी, जिसमें शंभू दयाल शास्त्री को "न्यासी" नियुक्त किया गया था। इसके उद्देश्यों में गरीबों की सहायता, शिक्षा और चिकित्सा सहायता शामिल थी, और यह निर्विवाद रूप से एक लोक धर्मार्थ ट्रस्ट था।
- 2004 में, शास्त्री ने अपनी पत्नी अशरफी देवी और अपने दो पुत्रों, प्रहलाद शर्मा और महेंद्र शर्मा को आजीवन न्यासी नियुक्त किया।
- शास्त्री की 2007 में मृत्यु के बाद, न्यासियों ने प्रहलाद शर्मा को प्रधान न्यासी और अध्यक्ष के रूप में चुना।
- महेंद्र शर्मा (प्रतिवादी संख्या 2) को अगस्त 2015 में एक प्रस्ताव द्वारा न्यासी पद से हटा दिया गया था, यह कार्रवाई न्यास के सेवादारों पर कथित हमले के संबंध में दर्ज प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) के बाद की गई थी। उच्च न्यायालय ने 2017 में उनके निष्कासन पर रोक लगाने से इंकार कर दिया था, और उनकी चुनौती एक पृथक् वाद में अभी भी लंबित है।
- अशरफी देवी का निधन 2019 में हुआ, उन्होंने 6 अक्टूबर 2015 की एक रजिस्ट्रीकृत वसीयत छोड़ी, जिसमें निम्नलिखित बातें लिखी थीं:
- उन्होंने अपनी संपत्ति महेंद्र शर्मा को वसीयत में दी और कहा कि तदनुसार वही ट्रस्टों के "प्रमुख" होंगे।
- उन्होंने अपनी पत्नी, आशुलिका शर्मा (प्रतिवादी संख्या 1) को उन ट्रस्टों के लिये "नामित व्यक्ति" बनाया, जिनमें वसीयतकर्त्ता आजीवन न्यासी थीं।
- ट्रस्ट ने निम्नलिखित मांग करते हुए वाद दायर किया:
- यह घोषणा कि वसीयत, जहाँ तक इसमें किसी भी प्रतिवादी को न्यासी नियुक्त किया गया है, शून्य है और न्यास पर बाध्यकारी नहीं है।
- ट्रस्ट के कामकाज में बाधा डालने से प्रतिवादियों को रोकने के लिये व्यादेश।
निचले न्यायालयों के समक्ष कार्यवाही:
- 2019 में, विचारण न्यायालय ने अंतरिम सुरक्षा प्रदान की, यह देखते हुए कि न तो न्यास विलेख और न ही पूरक विलेख किसी न्यासी को वसीयत द्वारा उत्तराधिकारी नियुक्त करने की अनुमति देता है।
- यद्यपि, मार्च 2026 में, विचारण न्यायालय ने व्यादेश आवेदन को खारिज कर दिया, और फरीदाबाद के अपर जिला न्यायाधीश ने उस आदेश की पुष्टि करते हुए कहा कि:
- रजिस्ट्रीकृत वसीयत को प्रामाणिक होने की उपधारणा प्राप्त होती है।
- न्यास विलेख के खंड 6(b) ने वसीयतकर्त्ता को एक न्यासी नामित करने का अधिकार दिया।
- व्यादेश जारी करना अंतिम अनुतोष प्रदान करने के समान होगा।
- अन्य वादों में संबंधित प्रश्न लंबित थे।
- इससे व्यथित होकर न्यास ने उच्च न्यायालय में पुनरीक्षण याचिका दायर की।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
अनुच्छेद 227 के अधीन हस्तक्षेप के संबंध में :
- वांडर लिमिटेड बनाम एंटॉक्स इंडिया के मामले का हवाला देते हुए, न्यायालय ने स्वीकार किया कि वह विवेकाधीन अंतरिम आदेशों पर अपील की सुनवाई नहीं करता है।
- यद्यपि, शालिनी श्याम शेट्टी बनाम राजेंद्र शंकर पाटिल और राधे श्याम बनाम छबी नाथ के मामलों पर विश्वास करते हुए, इसने माना कि मूल दस्तावेज की गलत व्याख्या, महत्त्वपूर्ण साक्ष्यों पर विचार न करने या गलत विधिक आधार पर आधारित विवेकाधिकार उचित नहीं है और इसे सुधारा जा सकता है।
- न्यायालय ने यह माना कि दो न्यायालयों की सहमति उस आदेश को संरक्षण नहीं देती जिसका आधार किसी दस्तावेज़ की गलत व्याख्या हो।
न्यास विलेख के निर्माण के संबंध में:
- इस दस्तावेज में "न्यासी" को संस्थापक और उनके "पद पर आसीन उत्तराधिकारियों" के रूप में परिभाषित किया गया था, और इसमें पूरे दस्तावेज में एकवचन भाषा का प्रयोग किया गया था।
- धारा 6(b) ने "न्यासी" को पद के उत्तराधिकारियों को नामित करने की अनुमति दी और जहाँ एक से अधिक व्यक्ति नामित किय गए थे, वहाँ उनकी बैठकों के लिये नियम बनाने की अनुमति दी।
- समग्र रूप से पढ़ने पर, धारा 6(b) के अंतर्गत शक्ति एकमात्र संस्थापक-न्यासी के पास थी, जिससे उसके बाद पद के लिये प्रावधान किया जा सके।
- इसमें प्रथम दृष्टया उत्तराधिकारी न्यासियों के समूह के प्रत्येक सदस्य को वसीयत के माध्यम से एक व्यक्तिगत पद निर्धारित करने और उसे स्थायी बनाने की अनुमति नहीं दी गई थी।
- यदि ऐसा होता है, तो प्रत्येक आजीवन न्यासी अपनी पसंद के व्यक्ति को एक सीट सौंप सकता है, जिससे लोक न्यास का प्रबंधन पारिवारिक अधिकार में बदल जाएगा, जो विलेख के खंड 9 और 10 के विपरीत होगा जो न्यास की संपत्ति को लोक धर्मार्थ उद्देश्यों के लिये अपरिवर्तनीय रूप से समर्पित करता है।
भारतीय न्यास अधिनियम, 1882 की प्रयोज्यता पर:
- न्यायालय ने स्वीकार किया कि अधिनियम की धारा 1 लोक धर्मार्थ ट्रस्टों को इसके दायरे से अपवर्जित करती है।
- फिर भी, अधिनियम की धारा 47, 73 और 75 में निहित सामान्य न्यायसंगत सिद्धांत लागू होते हैं। इन सिद्धांतों के अधीन:
- एक न्यासी अपने पद का किसी और को अधिकार नहीं सौंप सकता।
- नए न्यासियों की नियुक्ति उस व्यक्ति द्वारा की जाती है जिसे वसीयतनामा द्वारा अधिकार दिया गया हो, या यदि ऐसा व्यक्ति नियुक्त नहीं किया जाता है, तो मौजूदा न्यासियों या न्यायालय द्वारा की जाती है, न कि किसी मृत सह-न्यासी की वसीयत द्वारा।
वसीयतकर्त्ता की क्षमता के संबंध में:
- ऐसा दर्शाने के लिए कोई साक्ष्य नहीं था कि अशरफी देवी कभी संस्थापक की पद पर एकमात्र उत्तराधिकारी रही थीं अथवा किसी नियम के अधीन किसी व्यक्तिगत आजीवन न्यासी को अपना उत्तराधिकारी नामित करने का अधिकार प्राप्त था ।
- संस्थापक की मृत्यु के पश्चात् सामूहिक रूप से अध्यक्ष का चयन किया जाना व्यक्तिगत उत्तराधिकार के बजाय सामूहिक उत्तराधिकार की ओर संकेत करता था।
- न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि यदि वसीयत वास्तविक तथा विधिपूर्वक निष्पादित भी थी, तब भी उसके माध्यम से ऐसा अधिकार प्रदान नहीं किया जा सकता था, जिसे हस्तांतरित करने की क्षमता स्वयं वसीयतकर्त्री में नहीं थी।
अधीनस्थ न्यायालयों की त्रुटियों के संबंध में:
- अधीनस्थ न्यायालयों ने खंड 6(b) को पृथक् रूप से पढ़ा, जबकि यह प्रथमदृष्टया मामले के आधार से ही संबंधित था। यह केवल दो युक्तियुक्त व्याख्याओं में से किसी एक को चुनने का मामला नहीं था।
- विचारण न्यायालय ने कोई कारण बताए बिना वर्ष 2019 में अपने ही द्वारा व्यक्त प्रथमदृष्टया दृष्टिकोण से विचलन किया।
- अपीलीय न्यायालय ने जनवरी 2016 में वसीयतकर्त्री की सत्संग में उपस्थिति को उनकी मानसिक अक्षमता संबंधी अभिवचन का उत्तर मान लिया। उच्च न्यायालय ने इसे साक्ष्य का समयपूर्व मूल्यांकन बताया। न्यायालय ने उनकी मानसिक क्षमता के संबंध में कोई मत व्यक्त नहीं किया, क्योंकि मामला न्यास विलेख के अधीन उनकी अधिकारिता पर निर्भर था।
- प्रतिवादियों का यह दावा कि वसीयत को चुनौती नहीं दी गई थी, तथ्यात्मक रूप से गलत था, क्योंकि वाद में प्रथम अनुतोष वसीयत को शून्य घोषित किये जाने की मांग से संबंधित था।
अंतरिम अनुतोष के अंतिम अनुतोष के समान होने के संबंध में:
- देओराज बनाम महाराष्ट्र राज्य के मामले में प्रतिपादित यह सिद्धांत कि अंतरिम अनुतोष अंतिम अनुतोष के समान नहीं होना चाहिए, वर्तमान मामले में लागू नहीं होता था।
- प्रतिवादियों को केवल प्रतिषिद्ध करने से वसीयतकर्त्ता के जीवनकाल में विद्यमान स्थिति यथावत् बनी रहती।
वाद की पोषणीयता संबंधी आपत्तियों के संबंध में:
- न्यासी के वाद संस्थित करने के प्राधिकार तथा सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 92 और आदेश 31 के अधीन उठाई गई आपत्तियों को वर्ष 2024 में आदेश 7 नियम 11 के अधीन खारिज कर दिया गया था तथा उस आदेश को कभी चुनौती नहीं दी गई ।
- विद्याोदय ट्रस्ट बनाम मोहन प्रसाद आर. पर विश्वास करते हुए, न्यायालय ने उल्लेख किया कि किसी लोक न्यास द्वारा उसके प्रबंधन पर दावा करने वाले व्यक्तियों के विरुद्ध संस्थित वाद आवश्यक रूप से सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 92 के अंतर्गत नहीं आता।
- चूँकि पूर्ववर्ती वाद-कार्यवाही का प्रकटीकरण वादपत्र में किया गया था, अतः जानबूझकर तथ्यों को छिपाया जाना सिद्ध नहीं हुआ।
सुविधा के संतुलन के संबंध में:
- न्यास सार्वजनिक दानराशि का प्रबंधन करता है तथा ऐसे व्यक्ति को, जिसके पदाधिकार का प्रथमदृष्टया संदेहास्पद होना प्रतीत होता है, प्रबंधन में भाग लेने की अनुमति देने से न्यास के निर्णयों और लेखाओं को चुनौती दिये जाने की आशंका उत्पन्न हो सकती थी।
- वसीयतकर्त्ता के जीवनकाल के दौरान आशुलिका शर्मा ने ट्रस्ट में कोई पद धारण नहीं किया था, और उन्हें अंतरिम अनुतोष देने से इंकार करने से उन्हें कोई अपूरणीय क्षति नहीं होगी।
महेंद्र शर्मा की स्थिति के संबंध में:
- वसीयत के अधीन उनका दावा भी उनकी पत्नी के दावे के समान ही असमर्थनीय था।
- तथापि, न्यासी पद पर उनका स्वतंत्र दावा वर्ष 2015 में उन्हें पद से हटाए जाने की वैधता पर निर्भर करता है, जो किसी अन्य वाद में विचाराधीन है।
- न्यायालय ने मारपीट के मामले में उनकी दोषसिद्धि के संबंध में प्रस्तुत तर्क पर विचार नहीं किया, क्योंकि निर्णय अभिलेख पर उपलब्ध नहीं था तथा उनकी अपील लंबित है।
जारी किये गए निर्देश:
- वाद का निर्णय होने तक अशुलिका शर्मा को वसीयत के आधार पर न्यासी के रूप में कार्य करने, स्वयं को न्यासी के रूप में प्रस्तुत करने अथवा न्यास के कार्यकरण, प्रबंधन, लेखाओं या संपत्ति में बाधा डालने से प्रतिषिद्ध किया जाता है।
- महेंद्र शर्मा वसीयत के आधार पर स्वयं को न्यासी अथवा न्यास का प्रमुख होने का दावा नहीं करेंगे और न ही इस रूप में कार्य करेंगे। उनका स्वतंत्र दावा वर्ष 2017 के आदेश तथा लंबित वादों के अधीन रहेगा।
- प्रबंध न्यासी न्यास विलेख के खंड 7 के अनुसार, दान-पेटियों से प्राप्त संग्रह सहित समुचित लेखे संधारित करेंगे तथा प्रत्येक छह माह में विचारण न्यायालय के समक्ष विवरण प्रस्तुत करेंगे, जिसकी प्रतियाँ प्रतिवादियों को भी दी जाएँगी।
- यह स्पष्ट किया गया कि सभी टिप्पणियां केवल प्रथमदृष्टया हैं तथा वे गुण-दोष के आधार पर विचारण अथवा अन्य लंबित वादों को प्रभावित नहीं करेंगी।
न्यासियों की नियुक्ति को नियंत्रित करने वाले विधिक सिद्धांत क्या हैं?
बारे में:
- लोक धर्मार्थ न्यास वह न्यास है, जिसकी स्थापना आम जनता अथवा उसके किसी वर्ग के लाभार्थ निर्धन व्यक्तियों को सहायता प्रदान करने, शिक्षा अथवा चिकित्सा सहायता जैसे उद्देश्यों के लिये की जाती है।
- भारतीय न्यास अधिनियम, 1882 की धारा 1 के अधीन, यह अधिनियम सार्वजनिक या निजी धार्मिक अथवा धर्मार्थ समर्पणों पर लागू नहीं होता है। तथापि, न्यायालयों ने ऐसे न्यासों पर इस अधिनियम में निहित साम्यापूर्ण सिद्धांतों (Equitable Principles) को लागू किया है।
धारा 47 – न्यासी अपने कर्त्तव्यों का प्रत्यायोजन नहीं कर सकता:
- कोई न्यासी अपने पद अथवा अपने किसी कर्त्तव्य का प्रत्यायोजन किसी सह-न्यासी या किसी बाहरी व्यक्ति को नहीं कर सकता।
- इसके अपवाद वहाँ लागू होते हैं, जहाँ न्यास विलेख में ऐसा उपबंध किया गया हो, प्रत्यायोजन व्यवसाय के सामान्य अनुक्रम में किया गया हो, ऐसा करना आवश्यक हो अथवा संविदा करने के लिए सक्षम हिताधिकारी अपनी सहमति प्रदान करे।
धारा 73 – नए न्यासियों की नियुक्ति:
- किसी न्यासी की मृत्यु हो जाने, उसके भारत से अनुपस्थित रहने, दिवालिया घोषित किये जाने, पद से मुक्त किये जाने की इच्छा व्यक्त करने, कार्य करने से इंकार करने अथवा कार्य करने के लिये अयोग्य या व्यक्तिगत रूप से असमर्थ हो जाने पर नए न्यासी की नियुक्ति की जा सकती है।
- नियुक्ति न्यास विलेख में इस प्रयोजन के लिये नामित व्यक्ति द्वारा की जाती है; ऐसे व्यक्ति के अभाव में, न्यास के रचयिता अथवा जीवित या पद पर बने रहने वाले न्यासियों द्वारा नियुक्ति की जाती है।
धारा 75 – नए न्यासियों में न्यास संपत्ति का निहित होना:
- नव नियुक्त न्यासी के पास वही शक्तियां, अधिकार और विवेकाधिकार होते हैं, और वह हर प्रकार से उसी तरह कार्य करता है जैसे कि उसे मूल रूप से न्यासी के रूप में नामित किया गया हो।
प्रमुख विशेषताएँ:
- न्यासी का पद व्यक्तिगत विश्वास का पद है, न कि वंशानुगत संपत्ति का अधिकार।
- न्यासी पद पर उत्तराधिकार न्यास विलेख, पद पर बने रहने वाले न्यासियों अथवा न्यायालय द्वारा निर्धारित होता है, न कि वसीयती व्ययन द्वारा।