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सिविल कानून

स्वामित्व विवादित होने पर कब्जे का वाद विफल हो जाता है

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 26-Oct-2026

श्रीमती रानो सिंह और अन्य बनाम श्री गुरबक्स सिंह (मृत) उनके विधिक प्रतिनिधि और अन्य के माध्यम से   

“जब प्रतिवादी संख्या 1 के नाम पर रजिस्ट्रीकृत विक्रय विलेख विद्यमान है, तब केवल कब्जे की मांग संबंधी मूल प्रार्थना पोषणीय नहीं रह सकती…” 

न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने श्रीमती रानो सिंह एवं अन्य बनाम श्री गुरबक्स सिंह (मृत) उनके विधिक प्रतिनिधि और अन्य के माध्यम से (2026) के मामले का निर्णय किया। न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि जहाँ प्रतिवादी रजिस्ट्रीकृत विक्रय विलेख जैसे ठोस साक्ष्य के माध्यम से वादी के स्वत्व को विवादित करता है, वहाँ केवल कब्जे की वसूली की मांग करने वाला वाद पोषणीय नहीं है। वादी को कब्जे की मांग के साथ विक्रय विलेख के निरस्तीकरण अथवा विक्रय के करार के विनिर्दिष्ट पालन के अनुतोष की भी मांग करनी चाहिये। न्यायालय ने विचारण न्यायालय और दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा वाद खारिज किये जाने के निर्णय को बरकरार रखा।। 

श्रीमती रानो सिंह और अन्य बनाम श्री गुरबक्स सिंह (मृत) उनके विधिक प्रतिनिधि और अन्य के माध्यम से (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • 1952 में, एक हाउसिंग सोसाइटी ने विक्रय विलेख के अधीन वादी को एक भूखंड आवंटित किया, जिसमें यह शर्त थी कि तीन वर्ष के भीतर एक घर का निर्माण किया जाएगा। 
  • निर्माण कार्य करने में असमर्थ होने के कारण, वादी ने 4 अक्टूबर 1954 को सोसायटी को पत्र लिखकर अनुरोध किया कि वह भूखंड को उसके भतीजे, प्रतिवादी संख्या 1 को अंतरित कर दे। 
  • सोसाइटी ने अनुरोध स्वीकार कर लिया। प्रतिवादी नंबर 1 ने संपत्ति पर कब्जा कर लिया, सभी बकाया राशि का संदाय किया और 1959 तक एक घर का निर्माण कर लिया। 
  • 1960 में, सोसाइटी ने प्रतिवादी नंबर 1 के पक्ष में एक रजिस्ट्रीकृत विक्रय विलेख निष्पादित किया। वादी के पक्ष में कभी भी कोई विक्रय विलेख निष्पादित नहीं किया गया था। 
  • 1975 में, वादी के विधिक वारिसों ने कपटपूर्ण अंतरण का आरोप लगाते हुए कब्जे के लिये वाद दायर किया। 
  • उन्होंने 1960 के विक्रय विलेख को रद्द करने या 1952 के विक्रय करार के विनिर्दिष्ट पालन की मांग नहीं की। 
  • विचारण न्यायालय और दिल्ली उच्च न्यायालय ने वाद को खारिज कर दिया। 
  • इससे व्यथित होकर विधिक वारिसों ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

कब साधारण कब्जे के लिये मुकदमा पर्याप्त होता है: 

  • यदि वादी के स्वामित्व पर कोई खतरा नहीं है, तो केवल कब्जे के लिये प्रार्थना करना ही पर्याप्त है। 
  • यद्यपि, यदि प्रतिवादी ठोस साक्ष्यों द्वारा वादी के स्वामित्व का खंडन करता है, तो केवल कब्जे के लिये प्रार्थना करना पर्याप्त नहीं होगा। 
  • जिस व्यक्ति के स्वामित्व पर विवाद हो, वह इस प्रकार के वाद के माध्यम से वास्तविक स्वामी के स्वामित्व को चुनौती नहीं दे सकता, क्योंकि तब स्वामित्व न्यायनिर्णय के लिये एक विवादित तथ्यात्मक प्रश्न बन जाता है। 

उचित उपचार के संबंध में: 

  • एक बार जब प्रतिवादी नंबर 1 ने रजिस्ट्रीकृत विक्रय विलेख के आधार पर स्वामित्व का दावा किया, तो वादियों को उस विक्रय विलेख की घोषणा और निरस्तीकरण की मांग करनी पड़ी। 
  • इसके विकल्प के तौर पर, उन्हें अपने पक्ष में हुए विक्रय करार के विनिर्दिष्ट पालन के लिये वाद दायर करना चाहिये था। 

विक्रय के करार के संबंध में: 

  • रजिस्ट्रीकृत विक्रय विलेख के अभाव में विक्रय करार स्वामित्व प्रदान नहीं करता है। 
  • वादी ने 1954 के अपने पत्र के माध्यम से भूखंड में अपने अधिकारों का त्याग कर दिया था। 

वर्तमान वाद के संबंध पर: 

  • अपीलकर्त्ताओं के स्वामित्व पर गंभीर विवाद था, क्योंकि वादी के पक्ष में कभी भी कोई विक्रय विलेख निष्पादित नहीं किया गया था। 
  • अत: कब्जे के लिये दायर किया गया वाद उचित रूप से पोषणीय नहीं माना गया। 

निष्कर्ष: 

न्यायालय ने अपील खारिज कर दी और वाद को खारिज करने के निर्णय को बरकरार रखा। 

विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 की धारा 34 क्या है? 

बारे में: 

  • धारा 34 प्रास्थिति की या अधिकार की घोषणा के बारे में न्यायालय का विवेकाधिकार से संबंधित है। 

उपबंध: 

  • कोई भी व्यक्ति, जो किसी विधिक हैसियत या किसी संपत्ति के संबंध में किसी अधिकार का हकदार है, ऐसे किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध वाद संस्थित कर सकता है, जो ऐसी हैसियत या अधिकार का प्रत्याख्यान करता है अथवा उसके प्रत्याख्यान में हितबद्ध है। 
  • न्यायालय अपने विवेकानुसार यह घोषणा कर सकता है कि ऐसा व्यक्ति उक्त हैसियत या अधिकार का हकदार है। 
  • परंतुक: कोई भी न्यायालय ऐसी घोषणा नहीं करेगा, जहाँ वादी, मात्र स्वत्व की घोषणा से अतिरिक्त अनुतोष प्राप्त करने में सक्षम होते हुए भी, ऐसे अनुतोष की मांग करने से विरत रहता है। 

विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 की धारा 31 क्या है?  

 बारे में: 

  • धारा 31 लिखतों के रद्दकरण से संबंधित है । 

उपबंध: 

  • धारा 31(1): कोई भी व्यक्ति, जिसके विरुद्ध कोई लिखित लिखत शून्य या शून्यकरणीय है तथा जिसे यह युक्तियुक्त आशंका है कि यदि ऐसी लिखत को प्रभावी बने रहने दिया गया, तो उससे उसे गंभीर क्षति हो सकती है, ऐसी लिखत को शून्य या शून्यकरणीय घोषित कराने के लिये वाद संस्थित कर सकता है। 
  • न्यायालय अपने विवेकानुसार ऐसी लिखत को शून्य या शून्यकरणीय घोषित कर सकता है तथा उसे प्रस्तुत किये जाने और निरस्त किये जाने का आदेश दे सकता है। 
  • धारा 31(2): यदि ऐसी लिखत, रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1908 के अधीन रजिस्ट्रीकृत है, तो न्यायालय अपने डिक्री की एक प्रति संबंधित रजिस्ट्रीकरण अधिकारी को भेजेगा, जो अपने अभिलेखों में उक्त रद्दकरण की टिप्पणी दर्ज करेगा। 

विक्रय का करार स्वामित्व प्रदान नहीं करता है  

  • संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 की धारा 54 के अधीन, अचल संपत्ति के विक्रय की संविदा अपने आप में ऐसी संपत्ति में कोई हित या भार सृजित नहीं करती है। 
  • जहाँ संपत्ति का मूल्य एक सौ रुपए या उससे अधिक है, वहाँ स्वत्व का अंतरण केवल रजिस्ट्रीकृत विक्रय विलेख के माध्यम से होता है।  
  • विक्रय का करार धारण करने वाले व्यक्ति के लिये उपलब्ध उपचार विनिर्दिष्ट पालन का वाद है, न कि स्वामित्व का दावा। 

कब्जे की वसूली के लिये वाद: घोषणा कब आवश्यक है? 

  • अनथुला सुधाकर बनाम पी. बुची रेड्डी (2008) के मामले में उच्चतम न्यायालय ने निम्नलिखित सिद्धांत प्रतिपादित किये:  
    • जहाँ वादी के स्वामित्व पर कोई विवाद नहीं है और वह कब्जे में है, वहाँ केवल व्यादेश का वाद पर्याप्त है। 
    • जहाँ वादी कब्जे से बाहर है, वहाँ उसे व्यादेश सहित या उसके बिना कब्जे की वसूली की मांग करनी होगी। 
    • जहाँ प्रतिवादी वादी के स्वत्व के संबंध में वास्तविक विवाद उत्पन्न करता है अथवा उसके स्वत्व पर संदेह का आवरण उत्पन्न करता है, वहाँ वादी को परिणामी अनुतोष सहित स्वत्व की घोषणा के लिये वाद संस्थित करना होगा।