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आपराधिक कानून
भारतीय न्याय संहिता की धारा 69 के अधीन ट्रांसजेंडर महिला 'महिला' नहीं है
«17-Oct-2026
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मोहम्मद साकिर उर्फ मोहम्मद साकिर बनाम उत्तर प्रदेश राज्य "भारतीय न्याय संहिता की धारा 69 में उल्लिखित ‘महिला’ शब्द में केवल स्त्रीलिंग मानव व्यक्ति ही सम्मिलित है।" न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल |
स्रोत: इलाहाबाद उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल ने मोहम्मद साकिर उर्फ मोहम्मद साकिर बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2026) के मामले में निर्णय दिया। न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि लिंग-पुनर्निर्धारण शल्यचिकित्सा (Sex-Reassignment Surgery) कराने के पश्चात् भी कोई ट्रांसजेंडर महिला, भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 69 के अंतर्गत ‘महिला’ की वैधानिक परिभाषा के अंतर्गत नहीं आएगी। प्रथमदृष्टया भारतीय न्याय संहिता की धारा 69 के अधीन कोई अपराध गठित नहीं होने का निष्कर्ष देते हुए, न्यायालय ने उस पुरुष अभियुक्त को जमानत प्रदान की, जिस पर विवाह का मिथ्या आश्वासन देकर एक ट्रांसजेंडर महिला के साथ शारीरिक संबंध स्थापित करने का आरोप था।
मोहम्मद साकिर बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- सूचनाकर्ता, जो एक ट्रांसजेंडर महिला है, आवेदक द्वारा उससे विवाह करने के आश्वासन पर डेढ़ वर्ष से अधिक समय से उसके साथ संबंध में थी।
- उसने आरोप लगाया कि उससे 5 लाख रुपए से अधिक लेने के बाद उसने उससे विवाह करने से इंकार कर दिया।
- प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) में आगे आरोप लगाया गया है कि उसने विवाह का मिथ्या वचन करके उसके साथ शारीरिक संबंध स्थापित किये थे।
- आवेदक ने जमानत मांगी। उसके अधिवक्ता ने प्रस्तुत किया कि:
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 180 और 183 के अधीन दिये गए अपने कथनों में, सूचनाकर्ता ने कहा कि जन्म के समय उसे पुरुष के रूप में पहचाना गया था और 11 अप्रैल 2023 को उसकी योनि पुनर्निर्माण सर्जरी हुई थी।
- उसने रिश्ते में आने से पहले ही आवेदक को अपनी ट्रांसजेंडर पहचान के बारे में बता दिया था।
- 19 अगस्त 2026 की एक मेडिकल पैनल रिपोर्ट में उसे महिला नहीं, अपितु जननांगों में परिवर्तन वाला और गर्भाशय रहित पुरुष पाया गया।
- भारतीय न्याय संहिता की धारा 69 के अनुसार पीड़ित महिला होनी चाहिये, और धारा 2(35) भारतीय न्याय संहिता महिला को केवल एक महिला मानव के रूप में परिभाषित करती है।
- राज्य ने जमानत आवेदन का विरोध करते हुए तर्क दिया कि किसी ट्रांसजेंडर महिला को केवल इस आधार पर ‘महिला’ की परिभाषा से अपवर्जित नहीं किया जाना चाहिये कि जन्म के समय उसे पुरुष के रूप में निर्दिष्ट किया गया था और बाद में उसने शल्यचिकित्सा कराई थी।
- विधिक प्रश्न के महत्त्व को देखते हुए, न्यायालय ने अधिवक्ता मयूरी मेहरोत्रा को न्यायालय का न्यायमित्र (Amicus Curiae) नियुक्त किया। उन्होंने प्रस्तुत किया कि:
- आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के विश्वनाथन कृष्णमूर्ति बनाम आंध्र प्रदेश राज्य मामले में दिये गए निर्णय पर विश्वास करते हुए, एक ट्रांसजेंडर महिला को महिला की परिभाषा से अपवर्जित नहीं किया जा सकता है।
- ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2026 के अधीन, सर्जरी के बाद प्रमाण पत्र प्राप्त करने वाली ट्रांसजेंडर महिला को महिला की परिभाषा के अंतर्गत माना जाएगा।
- न्यायालय के समक्ष प्रश्न यह था कि क्या धारा 69 भारतीय न्याय संहिता के प्रयोजन के लिये एक ट्रांसजेंडर महिला को 'महिला' माना जाएगा।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
भारतीय न्याय संहिता के अंतर्गत 'महिला' की परिभाषा पर:
- भारतीय न्याय संहिता की धारा 2(35) 'महिला' को किसी भी आयु की नारी मानव के रूप में परिभाषित करती है।
- भारतीय न्याय संहिता की धारा 2(10) पुरुष, महिला और ट्रांसजेंडर को लिंग के रूप में मान्यता देता है और ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 के अधीन "ट्रांसजेंडर व्यक्ति" की परिभाषा को अपनाता है।
लागू विधि के संबंध में:
- चूँकि कथित घटना 30 मार्च 2026 के संशोधन से पहले हुई थी, इसलिये 2019 अधिनियम की असंशोधित धारा 2(ट) लागू होगी।
- इस परिभाषा में ट्रांस पुरुष और ट्रांस महिलाएं शामिल हैं, चाहे उन्होंने लिंग परिवर्तन सर्जरी या हार्मोन थेरेपी करवाई हो या नहीं।
ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की अलग पहचान पर:
- 2019 के अधिनियम के अधीन एक ट्रांसजेंडर व्यक्ति की एक अलग पहचान होती है।
- जन्म के समय पुरुष के रूप में पहचाना गया व्यक्ति जो लिंग-परिवर्तन सर्जरी के बाद महिला बन जाता है, या जन्म के समय महिला के रूप में पहचाना गया व्यक्ति जो ऐसी सर्जरी के बाद पुरुष बन जाता है, वह एक ट्रांसजेंडर व्यक्ति ही रहता है, न कि पुरुष या महिला मानव।
- भारतीय न्याय संहिता की धारा 69 में 'महिला' शब्द का अर्थ केवल एक महिला नारी से है।
- इसलिये, लिंग परिवर्तन सर्जरी के बाद भी, एक ट्रांसजेंडर महिला धारा 69 भारतीय न्याय संहिता के अधीन 'महिला' की परिभाषा के दायरे में नहीं आती है।
ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को उपलब्ध सुरक्षा के संबंध में:
- न्यायालय ने 2019 अधिनियम की धारा 18(घ) का उल्लेख किया, जो ट्रांसजेंडर व्यक्ति को नुकसान या क्षति कारित करने वाले कृत्यों से संबंधित है, जिसमें शारीरिक और लैंगिक शोषण शामिल है।
विधायी आशय पर:
- गृह मामलों पर संसदीय स्थायी समिति की रिपोर्ट संख्या 246 में एक उपयुक्त संशोधन के माध्यम से ट्रांसजेंडर महिलाओं को भारतीय न्याय संहिता के बलात्संग संबंधी प्रावधानों के दायरे में लाने की सिफारिश की गई थी।
- संसद ने इस सिफारिश को स्वीकार नहीं किया और 'महिला' की परिभाषा अपरिवर्तित रही।
निर्णय के दायरे के संबंध में:
- न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उसकी टिप्पणी धारा 69 भारतीय न्याय संहिता के अधीन 'महिला' की व्याख्या तक ही सीमित है, न कि किसी अन्य अपराध के लिये।
निष्कर्ष:
- न्यायालय ने माना कि प्रथम दृष्टया धारा 69 भारतीय न्याय संहिता के अधीन कोई अपराध नहीं बनता है और आवेदक को शर्तों के अधीन जमानत दे दी।
- न्यायालय ने एमिकस क्यूरी की सहायता की सराहना की और उच्च न्यायालय विधिक सहायता सेवा समिति को उन्हें शुल्क के रूप में ₹10,000 का संदाय करने का निदेश दिया।
भारतीय न्याय संहिता की धारा 69 क्या है?
बारे में:
- भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 69 प्रवंचनापूर्ण साधनों, आदि का प्रयोग करके मैथुन से संबंधित है।
- यह एक नवीन उपबंध है, जिसका भारतीय दण्ड संहिता, 1860 में कोई प्रत्यक्ष समतुल्य उपबंध नहीं था। भारतीय दण्ड संहिता के अंतर्गत, ऐसे मामलों का सामान्यतः धारा 375 को धारा 90 (तथ्य की भ्रांति के अधीन दी गई सहमति) के साथ पढ़ते हुए निपटारा किया जाता था।
उपबंध:
- जो कोई प्रवंचनापूर्ण साधनों द्वारा या किसी महिला को विवाह करने का वचन देकर, उसे पूरा करने के किसी आशय के बिना, उसके साथ मैथुन करता है, ऐसा मैथुन बलात्संग के अपराध की कोटि में नहीं आता है, तो वह दोनों में से किसी भांति के ऐसी अवधि के कारावास से दण्डनीय होगा, जो दस वर्ष तक की हो सकेगी, और जुर्माने के लिये भी दायी होगा।
- स्पष्टीकरण: "प्रवंचनापूर्ण साधनों" में, नियोजन या प्रोन्नति, या पहचान छिपाकर विवाह करने के लिये, उत्प्रेरण या उनका मिथ्या वचन, सम्मिलित है।
आवश्यक सामग्रियां:
- पीड़ित को धारा 2(35) भारतीय न्याय संहिता के अधीन परिभाषित 'महिला' होना चाहिये।
- मैथुन प्रवंचनापूर्ण साधनों या विवाह का वचन करके प्राप्त किया जाना चाहिये, जबकि उस वचन को पूरा करने का कोई आशय न हो।
- यह कृत्य बलात्संग का अपराध नहीं होना चाहिये।
संबंधित उपबंध
भारतीय न्याय संहिता की धारा 2(35)– महिला:
- "महिला" से तात्पर्य किसी भी आयु की स्त्री से है।
भारतीय न्याय संहिता की धारा 2(10)– लिंग:
- सर्वनाम “वह” तथा उसके व्युत्पन्न रूपों का प्रयोग किसी भी व्यक्ति के लिए किया जाता है, चाहे वह पुरुष, महिला या ट्रांसजेंडर हो।
- “ट्रांसजेंडर” का वही अर्थ है जो ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 की धारा 2(ट) के अंतर्गत दिया गया है।
ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 (संशोधित नहीं) की धारा 2(ट) – ट्रांसजेंडर व्यक्ति:
- एक ऐसा व्यक्ति जिसका लिंग जन्म के समय निर्धारित लिंग से मेल नहीं खाता।
- इसमें ट्रांस पुरुष और ट्रांस महिलाएं (चाहे उन्होंने लिंग परिवर्तन सर्जरी, हार्मोन थेरेपी, लेजर थेरेपी या कोई अन्य थेरेपी करवाई हो या नहीं), इंटरसेक्स भिन्नता वाले व्यक्ति, जेंडरक्वीर व्यक्ति और किन्नर, हिजड़ा, अरावनी और जोगता जैसी सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान वाले व्यक्ति सम्मिलित हैं।
ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 की धारा 18(घ):
- यह विधि किसी ट्रांसजेंडर व्यक्ति के जीवन, सुरक्षा, स्वास्थ्य या कल्याण (मानसिक या शारीरिक) को नुकसान पहुँचाने, क्षति कारित करने या खतरे में डालने को दण्डित करती है, जिसमें शारीरिक, लैंगिक, मौखिक, भावनात्मक और आर्थिक दुर्व्यवहार सम्मिलित है।
- दण्ड: कम-से-कम छह माह का कारावास, जिसे दो वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है, तथा जुर्माना।