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सांविधानिक विधि
इंटरनेट तक पहुँच और उसका उपयोग करने का अधिकार एक मौलिक अधिकार है
« »17-Oct-2026
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जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन एलायंस और अन्य बनाम एस. हरीश और अन्य “हमारे बालकों की सुरक्षा और उनकी स्वतंत्रता एक दूसरे के विरोधी नहीं हैं। हमारे बालकों को दोनों का अधिकार है।” न्यायमूर्ति जे.बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन अलायंस और अन्य बनाम एस. हरीश और अन्य (2026) के मामले में निर्णय दिया। न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि इंटरनेट तक पहुँच और उसका उपयोग करने का अधिकार भारत के संविधान, 1950 के अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 19(1)(क) के अधीन प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार है और बालक, चाहे उनकी आयु कुछ भी हो, इस अधिकार का आनंद लेते हैं। न्यायालय ने ये टिप्पणियां सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और अन्य ऑनलाइन सेवाओं से बाल लैंगिक शोषण और दुर्व्यवहार सामग्री (CSEAM) का पता लगाने और उसे हटाने के तंत्र को मजबूत करने के निदेश जारी करते हुए कीं।
जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन एलायंस और अन्य बनाम एस. हरीश और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- यह मामला आपराधिक अपील संख्या 2161-2162 वर्ष 2024 में दायर विविध आवेदन संख्या 2553-2554 वर्ष 2026 के माध्यम से सामने आया।
- जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन एलायंस बनाम एस. हरीश के मामले में 2024 की आपराधिक अपीलों में बाल लैंगिक शोषण सामग्री से संबंधित अपराधों पर विचार किया गया, जहाँ उच्चतम न्यायालय ने "बाल लैंगिक शोषण और दुर्व्यवहार सामग्री" (CSEAM) शब्द के उपयोग की सिफारिश की थी।
- वर्तमान कार्यवाही में, न्यायालय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और ऑनलाइन सेवाओं पर "बाल लैंगिक शोषण और दुर्व्यवहार सामग्री" (CSEAM) का पता लगाने और उसे हटाने के लिये निर्देशों पर विचार किया।
- इस संदर्भ में, न्यायालय ने इस बात की परीक्षा की कि क्या बालकों को उनकी अपनी सुरक्षा के लिये इंटरनेट और सोशल मीडिया से पूरी तरह से दूर रखा जाना चाहिये।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
इंटरनेट तक पहुँच और उसके उपयोग के अधिकार पर:
- संविधान के अनुच्छेद 21 के साथ अनुच्छेद 19(1)(क) के अधीन इंटरनेट तक पहुँच और उपयोग का अधिकार प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार है।
- बालकों को, उनकी आयु चाहे जो भी हो, समान अधिकार प्राप्त हैं। उनसे इस अधिकार को पूरी तरह छीन लेना उतना ही बेतुका होगा जितना यह कहना कि एक निश्चित आयु से कम आयु के बालकों में रक्षा करने योग्य कोई विवेक या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं होती।
- बालकों की सुरक्षा और उनकी स्वतंत्रता एक दूसरे के विरोधी नहीं हैं। बालकों को दोनों का अधिकार है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के एक भाग के रूप में इंटरनेट पर:
- अनुच्छेद 19(1)(क) के अधीन भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में जानने और सूचना और विचारों को प्राप्त करने और प्रदान करने का अधिकार शामिल है।
- इंटरनेट विचारों, रचनात्मक अभिव्यक्ति और सूचनाओं का एक बाज़ार है। इसका महत्त्व केवल इसमें मौजूद सूचनाओं में ही नहीं, अपितु वयस्कों और बालकों दोनों को समान रूप से मिलने वाली पहुँच में भी निहित है।
- कई बालकों के लिये, विशेषत: दूरदराज के इलाकों में, इंटरनेट प्राय सीखने और जानकारी का एकमात्र स्रोत होता है।
- विशेष आवश्यकताओं वाले बालकों के लिये, यह प्राय एकमात्र ऐसी जगह होती है जहाँ उन्हें अपने जैसे अन्य लोगों के साथ मेलजोल मिलता है।
पूर्व निर्णयों के आधार पर:
- अनुराधा भासिन बनाम भारत संघ (2020) के मामले में न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि इंटरनेट के माध्यम से वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा व्यापार या व्यवसाय करने की स्वतंत्रता को संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) एवं 19(1)(छ) के अंतर्गत संरक्षण प्राप्त है। तथापि, न्यायालय ने इस प्रश्न पर कोई मत व्यक्त नहीं किया कि क्या स्वयं इंटरनेट तक पहुँचने का अधिकार एक मौलिक अधिकार है।
- प्रज्ञा प्रसून और अन्य बनाम भारत संघ (2025) के मामले में, न्यायालय ने अनुच्छेद 21 के अधीन डिजिटल पहुँच के अधिकार को एक मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी।
- इन पूर्व निर्णयों के आधार पर, न्यायालय ने इंटरनेट के उपयोग के अधिकार को एक मौलिक अधिकार घोषित किया जिसे बच्चों से छीना नहीं जा सकता।
बच्चों के इंटरनेट उपयोग पर व्यापक प्रतिबंधों के संबंध में:
- वर्तमान स्वरूप में इंटरनेट बच्चों के लिए पूर्णतः सुरक्षित नहीं है।
- तथापि, मध्यस्थों द्वारा हानिकारक सामग्री का पता लगाने और उसे हटाने में विफल रहने के कारण बच्चों को इंटरनेट से दूर रखना, समस्या के लिये पीड़ित को ही उत्तरदायी ठहराने के समान होगा।
- विधि द्वारा इंटरनेट पर प्रतिबंध लगाने मात्र से बच्चे इसका उपयोग करना बंद नहीं कर देते। वे अनियंत्रित और संभावित रूप से अधिक असुरक्षित प्लेटफार्मों की ओर रुख कर सकते हैं।
- प्रतिबंधों के कारण, ऑनलाइन माध्यम से बहकावे या धमकी का सामना कर रहे बच्चे, डांट-फटकार के भय से, माता-पिता, संरक्षकों या विश्वसनीय वयस्कों को ऐसी घटनाओं की रिपोर्ट करने में हिचकिचा सकते हैं।
- व्यापक प्रतिबंध "असंतुलन के नासाबित अप्रमाणित उपाय" हैं, और अभी तक किसी भी क्षेत्र ने यह नहीं दिखाया है कि इनसे बच्चे अधिक सुरक्षित हैं।
- आयु-आधारित प्रतिबंधों के लिये प्रत्येक उपयोगकर्ता की आयु की पहचान और सत्यापन की आवश्यकता होगी, जिसमें संवेदनशील डेटा का निरंतर संग्रह और निगरानी शामिल होगी, जिससे दुरुपयोग और निगरानी का अत्यधिक जोखिम उत्पन्न होता है।
बालकों के लिये आनुपातिक सुरक्षा उपायों पर:
- व्यापक प्रतिबंधों को अस्वीकार करने का अर्थ यह नहीं है कि आयु-आधारित सुरक्षा उपाय नहीं होने चाहिये।
- बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा सुनिश्चित करने और उनके लिये उपलब्ध सामग्री को विनियमित करने के लिये कुछ सुरक्षा उपाय आवश्यक हैं।
- यह प्रणाली बच्चों के सोशल मीडिया तक पहुँच पर माता-पिता की सहमति, मार्गदर्शन और निगरानी पर अधिक बाल दे सकती है, साथ ही उनके खातों के लिये एक समर्पित "चाइल्ड मोड" भी प्रदान कर सकती है।
- ऐसे सुरक्षा उपायों में निम्नलिखित शामिल हो सकते हैं:
- बच्चों के खातों को डिफ़ॉल्ट रूप से निजी बनाना।
- अज्ञात वयस्कों से संपर्क और संदेशों को प्रतिबंधित करना।
- बच्चों के लिये सुलभ विज्ञापनों और सामग्री को नियंत्रित करना।
- इन उपायों को किशोरों से पहले की आयु के बालकों के लिये लागू किया जा सकता है, जिसमें माता-पिता की सहमति को सत्यापित करने के लिये उचित और समानुपातिक साधन उपलब्ध कराए जाएंगे। इसकी प्रक्रिया केंद्र सरकार पर छोड़ दी गई है।
- केंद्र सरकार को बालकों की उन विशिष्ट श्रेणियों की सामग्री या सेवाओं तक पहुँच को प्रतिबंधित करने से नहीं रोका गया है जो उनके लिये स्वाभाविक रूप से हानिकारक हैं, जैसे कि वयस्क सामग्री वाली वेबसाइटें।
निष्कर्ष:
- न्यायालय ने बच्चों सहित प्रत्येक व्यक्ति के इंटरनेट तक पहुँचने एवं उसका उपयोग करने के अधिकार को मौलिक अधिकार घोषित किया।
- न्यायालय ने बाल लैंगिक शोषण एवं दुर्व्यवहार संबंधी सामग्री (CSEAM) का पता लगाने तथा उसे हटाने के लिये निर्देशों की एक श्रृंखला भी जारी की। इनमें एक व्यापक राष्ट्रीय डेटाबेस का निर्माण सम्मिलित है, जिससे सोशल मीडिया मंचों पर ऐसी सामग्री की पहचान एवं उसे हटाना संभव हो सके।
संविधान के अधीन इंटरनेट तक पहुँच का अधिकार क्या है?
बारे में:
- इंटरनेट तक पहुँचने और उसका उपयोग करने का अधिकार अब भारत के संविधान, 1950 के अनुच्छेद 21 के साथ अनुच्छेद 19(1)(क) के अधीन प्राप्त एक मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता प्राप्त है।
- इसका स्पष्ट रूप से संविधान में उल्लेख नहीं है, लेकिन न्यायिक निर्वचन के माध्यम से इसे मौजूदा मौलिक अधिकारों में सम्मिलित कर लिया गया है।
अनुच्छेद 19(1)(क) – वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता:
- सभी नागरिकों को वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार सुनिश्चित करता है।
- इसमें जानने का अधिकार, और सूचना एवं विचारों को प्राप्त करने और साझा करने का अधिकार सम्मिलित है।
- इंटरनेट एक ऐसा माध्यम है जिसके जरिए इस स्वतंत्रता का प्रयोग किया जाता है।
अनुच्छेद 19(2) – युक्तियुक्त निर्बंधन:
- भारत की संप्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध, लोक व्यवस्था, शिष्टाचार या सदाचार के हित में, या न्यायालय का अवमान, मानहानि या अपराध-उद्दीपन के संबंध में, राज्य अनुच्छेद 19(1)(क) के अधीन स्वतंत्रता पर युक्तियुक्त निर्बंधन लगा सकता है।
- इस प्रकार के किसी भी निर्बंधन को आनुपातिकता की कसौटी पर खरा उतरना चाहिये।
अनुच्छेद 21 – प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण:
- किसी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा, अन्यथा नहीं।
- उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 21 के व्यापक निर्वचन करते हुए इसमें निजता का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, स्वास्थ्य का अधिकार और अब डिजिटल पहुँच का अधिकार तथा इंटरनेट का उपयोग करने का अधिकार जैसे अधिकारों को शामिल किया है।
अनुच्छेद 19(1)(छ) – व्यापार और व्यवसाय की स्वतंत्रता:
- यह किसी भी वृत्ति का अभ्यास करने अथवा कोई भी उपजीविका, व्यापार या व्यवसाय करने के अधिकार की प्रत्याभूति देता है।
- अनुराधा भासिन के मामले में, न्यायालय ने निर्णय दिया कि इंटरनेट के माध्यम से प्रयोग की जाने वाली यह स्वतंत्रता सांविधानिक रूप से संरक्षित है।