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सांविधानिक विधि
जंतर-मंतर को निर्दिष्ट विरोध स्थल के रूप में निरस्त करना
«15-Oct-2026
स्रोत: द हिंदू
परिचय
गृह मंत्रालय (MHA) की एक समिति की सिफारिशों के बाद दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर को निर्धारित विरोध स्थल के रूप में रद्द कर दिया । समिति ने रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और CBD मैदान (पूर्वी दिल्ली) को विरोध प्रदर्शनों के लिये वैकल्पिक स्थलों के रूप में नामित किया था।
जंतर-मंतर पर हो रहे विरोध प्रदर्शनों की पृष्ठभूमि क्या है?
बोट क्लब से बदलाव (1993):
- 1990 के दशक की शुरुआत तक, इंडिया गेट स्थित बोट क्लब के लॉन प्रमुख सार्वजनिक रैलियों का केंद्र हुआ करते थे, जैसे कि 1988 का किसान विरोध प्रदर्शन।
- वर्ष 1993 में, अति विशिष्ट व्यक्तियों (VVIP) की सुरक्षा तथा यातायात में व्यवधान का हवाला देते हुए, सरकार ने बोट क्लब में रैलियों पर प्रतिबंध लगा दिया और जंतर-मंतर को विरोध-प्रदर्शनों के लिये नए निर्धारित स्थल के रूप में नामित किया।
वक्ताओं के सार्वजनिक मंच" (Speaker’s Corner) के रूप में जंतर-मंतर:
- लगभग तीन दशकों तक, जंतर-मंतर और जंतर-मंतर रोड सार्वजनिक प्रदर्शनों के एक प्रमुख स्थल के रूप में कार्य करते रहे, जो लंदन के हाइड पार्क के समान था।
- संसद और केंद्रीय मंत्रालयों के निकट स्थित होने के कारण, यह अनेक प्रमुख आंदोलनों का स्थल बना, जिनमें शामिल हैं:
- भारत भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन (जन लोकपाल विधेयक), 2011
- निर्भया के लिये न्याय की मांग को लेकर विरोध-प्रदर्शन, 2012
- नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) और अनुच्छेद 370 के विरोध में प्रदर्शन, 2019
- पहलवानों का विरोध प्रदर्शन, 2023
- राष्ट्रीय पात्रता-सह-प्रवेश परीक्षा (NEET-UG) के विरोध में प्रदर्शन, 2026
राष्ट्रीय हरित अधिकरण का प्रतिबंध (2017):
- राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने जंतर-मंतर पर विरोध-प्रदर्शनों पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया।
- अधिकरण ने अभिनिर्धारित किया कि ध्वनि प्रदूषण तथा स्वच्छता संबंधी सुविधाओं का अभाव, अनुच्छेद 21 के अंतर्गत स्थानीय निवासियों के स्वस्थ पर्यावरण के अधिकार का उल्लंघन करते हैं।
उच्चतम न्यायालय द्वारा प्रतिबंध को अपास्त किया जाना (2018):
- मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ (2018) के मामले में, उच्चतम न्यायालय ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण द्वारा लगाए गए व्यापक प्रतिबंध को अपास्त कर दिया।
- न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि संपूर्ण मध्य दिल्ली में विरोध-प्रदर्शनों पर प्रतिबंध लगाना, अनुच्छेद 19(1)(b) के अंतर्गत शांतिपूर्वक और निरायुध सम्मेलन करने के अधिकार का उल्लंघन करता है।
- न्यायालय ने पुलिस को पूर्ण प्रतिबंध लगाने के स्थान पर संतुलित विनियम बनाने का निदेश दिया।
दिल्ली में विरोध-प्रदर्शन स्थलों का विनियमन किस प्रकार किया जाता है?
सांविधानिक प्रत्याभूति:
- अनुच्छेद 19 वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा शांतिपूर्वक और निरायुध सम्मेलन करने के अधिकार की प्रत्याभूति प्रदान करता है।
युक्तियुक्त निर्बंधन:
- ये अधिकार निरपेक्ष नहीं हैं तथा मुख्यतः लोक व्यवस्था के हित में अनुच्छेद 19(2) और 19(3) के अधीन युक्तियुक्त निर्बंधनों के अधीन हैं।
दिल्ली में अधिकारिता:
- अन्य राज्यों के विपरीत, जहाँ पुलिस राज्य सरकार के नियंत्रण में होती है, दिल्ली की एक विशिष्ट सांविधानिक स्थिति है।
- अनुच्छेद 239कक (3)(क) के अधीन दिल्ली की विधान सभा राज्य सूची की प्रविष्टि 1, 2 और 18 के विषयों पर विधि निर्माण नहीं कर सकती। ये प्रविष्टियाँ क्रमशः लोक व्यवस्था, पुलिस और भूमि से संबंधित हैं।
गृह मंत्रालय की भूमिका:
- परिणामस्वरूप, दिल्ली पुलिस केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन कार्य करती है।
- दिल्ली पुलिस निर्धारित स्थलों पर प्रदर्शनों के लिये आवेदनों का मूल्यांकन करती है, अनुमति प्रदान करती है तथा निर्धारित शर्तों के अनुपालन को विनियमित करती है।
विरोध-प्रदर्शन स्थलों से संबंधित उच्चतम न्यायालय के प्रमुख निर्णय कौन-से हैं?
- हिमत लाल के. शाह बनाम पुलिस आयुक्त (1972): न्यायालय ने अनुच्छेद 19(1)(क) और 19(1)(ख) के अधीन सार्वजनिक सभाएँ आयोजित करने के अधिकार को मान्यता प्रदान की। न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि राज्य सभाओं को विनियमित कर सकता है, किंतु सभी स्थानों पर मनमाने ढंग से उन पर प्रतिबंध नहीं लगा सकता।
- इन री: रामलीला मैदान घटना (2012): न्यायालय ने मनमानी पुलिस कार्रवाई के विरुद्ध शांतिपूर्ण सम्मेलन के अधिकार का संरक्षण किया तथा अभिनिर्धारित किया कि निर्बंधन संबंधित परिस्थितियों और लागू विधि के आधार पर न्यायोचित होने चाहिये।
- मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ (2018): न्यायालय ने प्रदर्शनकारियों के अधिकारों और निवासियों के अधिकारों के मध्य संतुलन स्थापित करने पर बल दिया तथा जंतर-मंतर पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के स्थान पर विनियमित विरोध-प्रदर्शन स्थलों की व्यवस्था को प्राथमिकता दी।
- अमित साहनी बनाम पुलिस आयुक्त (2020): न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि सार्वजनिक सड़कों पर अनिश्चितकाल तक विरोध-प्रदर्शन के लिये कब्जा नहीं किया जा सकता, क्योंकि इससे अन्य नागरिकों के अधिकार प्रभावित होते हैं तथा सार्वजनिक आवागमन बाधित होता है।
जंतर-मंतर के बारे में मुख्य तथ्य क्या हैं?
- ऐतिहासिक उत्पत्ति: इसका निर्माण 1724 में जयपुर के महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय द्वारा करवाया गया था। यह इस प्रकार की पाँच वेधशालाओं में से पहली थी, अन्य तीन जयपुर, उज्जैन, वाराणसी और मथुरा में स्थित हैं।
- नाम का अर्थ: इसका नाम संस्कृत के शब्दों यंत्र (उपकरण) और मंत्र (गणना अथवा सूत्र) से व्युत्पन्न है।
- संरचना: यह नग्न-नेत्र खगोलीय वेधशाला है, जिसमें 13 स्थापत्य-आधारित खगोलीय उपकरण हैं, जिनमें निम्नलिखित प्रमुख हैं:
- सम्राट यंत्र: लगभग 70 फुट ऊँचा त्रिकोणीय सम-घंटा धूपघड़ी (Equal-hour Sundial), जिसका उपयोग दिन के समय का मापन करने के लिये किया जाता है।
- मिश्र यंत्र: यह वर्ष के सबसे छोटे और सबसे बड़े दिनों अर्थात् अयनांत (Solstices) का निर्धारण करता है। ऐसा माना जाता है कि इसे बाद में जय सिंह द्वितीय के पुत्र माधो सिंह द्वारा जोड़ा गया था।
- जय प्रकाश और राम यंत्र: ये अवतल एवं बेलनाकार संरचनाएँ हैं, जिनका उपयोग खगोलीय निर्देशांकों का मानचित्रण करने तथा तारों की ऊँचाई (Altitude) और दिगंश (Azimuth) का पता लगाने के लिये किया जाता है।
- विरासत का दर्जा:
- दिल्ली स्थित वेधशाला भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा राष्ट्रीय महत्त्व के स्मारक के रूप में संरक्षित है।
- जयपुर स्थित जंतर-मंतर को वर्ष 2010 में यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया था। यहाँ विश्व की सबसे बड़ी पत्थर से निर्मित धूपघड़ी, अर्थात् सम्राट यंत्र, स्थित है।
भारत में विरोध प्रदर्शन के तरीकों का विकास किस प्रकार हुआ हैं?
- औपनिवेशिक युग (1947 से पूर्व): सविनय अवज्ञा, स्वदेशी बहिष्कार, शांतिपूर्ण विधि-उल्लंघन (दांडी मार्च) तथा असहयोग आंदोलन के माध्यम से गांधीवादी सत्याग्रह और अहिंसा का अनुसरण किया गया।
- स्वतंत्रता के बाद (1950-1980 के दशक): श्रमिक संघों की हड़तालों तथा घेराव और रास्ता रोको जैसे तरीकों के माध्यम से कृषक लामबंदी हुई। इस अवधि में बोट क्लब पर विशाल जनसभाएँ आयोजित की गईं तथा वर्ष 1974 में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में संपूर्ण क्रांति आंदोलन हुआ।
- 1990-2010 के दशक: लोकहित याचिकाओं (PILs), जन सुनवाइयों (जिनसे सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ), मोमबत्ती जुलूसों तथा टेलीविजन पर प्रसारित अनशन के माध्यम से विशिष्ट मुद्दों पर आधारित सक्रियता विकसित हुई, जिसका प्रमुख केंद्र जंतर-मंतर रहा।
- समकालीन युग (2010 का दशक-वर्तमान): विकेंद्रीकृत तथा प्रायः नेतृत्वविहीन आंदोलनों का विकास हुआ, जिनमें सड़कों पर अनिश्चितकालीन धरने (शाहीन बाग, 2019–2020), सीमावर्ती क्षेत्रों में शिविर स्थापित करना (किसान आंदोलन, 2020–2021) तथा हैशटैग और टूलकिट के माध्यम से डिजिटल लामबंदी शामिल हैं।
संविधान का अनुच्छेद 19(1)(ख) क्या है?
बारे में:
- भारत के संविधान का अनुच्छेद 19(1)(b) सभी नागरिकों को शांतिपूर्वक और निरायुध सम्मेलन करने का अधिकार देता है ।
- विरोध करने का अधिकार अनुच्छेद 19(1)(क) और 19(1)(ख) से प्राप्त होता है।
उपबंध:
- अनुच्छेद 19(1)(ख): सभी नागरिकों को शांतिपूर्वक और निरायुध सम्मेलन करने का अधिकार होगा।
- अनुच्छेद 19(3): राज्य निम्नलिखित हितों में इस अधिकार पर युक्तियुक्त निर्बंधन अधिरोपित कर सकता है:
- भारत की संप्रभुता और अखंडता, या
- लोक व्यवस्था।
- अनुच्छेद 19(2) (तुलनात्मक संदर्भ): अनुच्छेद 19(1)(क) के अंतर्गत वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर भारत की संप्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध, लोक व्यवस्था, शिष्टाचार या सदाचार के हित में अथवा न्यायालय की अवमानना, मानहानि या किसी अपराध के लिये उद्दीपन के संबंध में निर्बंधन अधिरोपित किये जा सकते हैं।
निष्कर्ष
असहमति किसी क्रियाशील लोकतंत्र का अनिवार्य अंग है। राज्य का दायित्व है कि वह निष्पक्ष विनियमन तथा निर्धारित स्थलों की व्यवस्था के माध्यम से शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन को संभव बनाते हुए यातायात के निर्बाध आवागमन और निवासियों के अधिकारों का संरक्षण सुनिश्चित करे। यह संविधान के अनुच्छेद 19 के अंतर्गत प्रत्याभूत सांविधानिक अधिकारों के अनुरूप होना चाहिये।