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सांविधानिक विधि
निर्वाचन याचिका याचिकाकर्त्ता द्वारा स्वयं प्रस्तुत की जानी चाहिये
«08-Oct-2026
|
वी. पोन. पनीरसेल्वम बनाम एस. रेगूपथी और अन्य "धारा 81 के अधीन प्रस्तुति की आवश्यकता को महज एक प्रक्रियात्मक औपचारिकता के रूप में नहीं देखा जा सकता है।" न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर की पीठ ने वी. पोन. पनीरसेल्वम बनाम एस. रेगुपथी एवं अन्य (2026) के मामले में निर्णय दिया। इसमें कहा गया कि लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (RP Act) के अधीन निर्वाचन याचिका स्वयं निर्वाचन याचिकाकर्त्ता द्वारा प्रस्तुत की जानी चाहिये। केवल अधिवक्ता द्वारा प्रस्तुत याचिका धारा 81 की शर्तों को पूरा नहीं करती और धारा 86 के अधीन खारिज कर दी जानी चाहिये। न्यायालय ने मद्रास उच्च न्यायालय द्वारा निर्वाचन याचिका खारिज करने के निर्णय को बरकरार रखा।
वी. पोन. पनीरसेल्वम बनाम एस. रेगूपथी और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- याचिकाकर्त्ता वी. पोन. पनीरसेल्वम ने 2026 के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में थिरुमयम विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा था।
- DMK के उम्मीदवार एस. रेगूपथी इस निर्वाचन क्षेत्र से निर्वाचित हुए।
- याचिकाकर्त्ता ने मद्रास उच्च न्यायालय में चुनाव को चुनौती देते हुए एक निर्वाचन याचिका दायर की। उन्होंने अन्य बातों के अलावा निम्नलिखित आरोप लगाए:
- अनुचित प्रभाव का भ्रष्ट आचरण।
- सांविधिक प्रपत्र 26 के शपथपत्र में चयनित उम्मीदवार के पति/पत्नी की संपत्ति और आय को छुपाना और गलत तरीके से घोषित करना।
- मद्रास उच्च न्यायालय ने निर्वाचन याचिका खारिज कर दी। न्यायालय ने पाया कि याचिका याचिकाकर्त्ता के अधिवक्ता द्वारा प्रस्तुत की गई थी, न कि स्वयं याचिकाकर्त्ता द्वारा।
- याचिकाकर्त्ता ने विशेष अनुमति याचिका के माध्यम से उच्चतम न्यायालय में बर्खास्तगी को चुनौती दी।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
निर्वाचन याचिका की प्रकृति पर:
- वी. श्रीरामा रेड्डी बनाम रिटर्निंग ऑफिसर (2009) पर विश्वास करते हुए, न्यायालय ने कहा कि निर्वाचन याचिका एक गंभीर कार्यवाही है जो चुनावी प्रक्रिया को दूषित कर सकती है।
- अत: निर्वाचन संबंधी विधि द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का कठोरता से पालन किया जाना चाहिये।
- यह अनिवार्यता कि याचिका याचिकाकर्त्ता द्वारा ही प्रस्तुत की जाए, उच्च न्यायालय को प्रस्तुति के चरण में ही प्रारंभिक सत्यापन करने की अनुमति देती है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि कार्यवाही निरर्थक या अनावश्यक न हो।
लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 81(1) की आवश्यकताओं पर:
- न्यायालय ने कहा कि धारा 81(1) में पाँच विशिष्ट आवश्यकताएँ शामिल हैं:
- याचिकाकर्त्ता उम्मीदवार या मतदाता होना चाहिये।
- याचिका याचिकाकर्त्ता द्वारा ही प्रस्तुत की जानी चाहिये।
- यह संविधि में निर्दिष्ट आधारों पर आधारित होना चाहिये।
- इसे उच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाना चाहिये।
- इसे निर्धारित 45 दिनों की अवधि के भीतर दाखिल करना होगा।
- ये आवश्यकताएँ महज प्रक्रियात्मक नहीं हैं।
धारा 86(1) के अधीन अनुपालन न करने के परिणाम पर:
- धारा 86(1) के अधीन यह अनिवार्य है कि उच्च न्यायालय उस निर्वाचन याचिका को खारिज कर देगा जो धारा 81 का अनुपालन नहीं करती है।
- अत: प्रस्तुति संबंधी आवश्यकता का अनुपालन निर्वाचन याचिका की वैधता से सीधा रूप से जुड़ा हुआ है।
- प्रस्तुति में किसी भी प्रकार की खामी का निवारण नहीं किया जा सकता।
धारा 81 के विधायी इतिहास पर:
- मूल धारा 81(2) में स्पष्ट रूप से यह उपबंध था कि निर्वाचन याचिका याचिकाकर्त्ता द्वारा या उसके द्वारा लिखित रूप से अधिकृत व्यक्ति द्वारा प्रस्तुत की जा सकती है। इसमें पंजीकृत डाक के माध्यम से प्रस्तुति की भी अनुमति थी।
- लोक प्रतिनिधित्व (संशोधन) अधिनियम, 1966 द्वारा इस उपबंध को हटा दिया गया था।
- वर्तमान उपबंध के अनुसार, किसी अधिकृत व्यक्ति के माध्यम से या पंजीकृत डाक द्वारा प्रस्तुति को मान्यता नहीं दी जाती है।
शेओ सदन सिंह बनाम मोहन लाल गौतम (1969) में अंतर बताने पर:
- शेओ सदन सिंह के मामले में, एक अधिवक्ता के क्लर्क द्वारा की गई प्रस्तुति को पर्याप्त अनुपालन माना गया, क्योंकि प्रस्तुति के समय याचिकाकर्त्ता स्वयं क्लर्क के साथ उपस्थित था।
- वर्तमान मामले में, याचिकाकर्त्ता ने यह दावा नहीं किया कि याचिका प्रस्तुत करते समय वह अपने अधिवक्ता के साथ उपस्थित था।
- इसलिये उस निर्णय से याचिकाकर्त्ता को कोई सहायता नहीं मिली।
निष्कर्ष
- विधिक स्थिति: लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम के अधीन निर्वाचन याचिका स्वयं याचिकाकर्त्ता द्वारा प्रस्तुत की जानी चाहिये। केवल अधिवक्ता द्वारा प्रस्तुत करने से धारा 81 की शर्त पूरी नहीं होती और यह दोष दूर नहीं किया जा सकता।
- परिणाम: धारा 81 के अधीन अनिवार्य आवश्यकता पूरी नहीं हुई, इसलिये उच्चतम न्यायालय ने मद्रास उच्च न्यायालय के निष्कर्षों में हस्तक्षेप करने से इंकार कर दिया और याचिका खारिज कर दी।
लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 81 क्या है?
- धारा 81 निर्वाचन याचिकाओं की प्रस्तुति से संबंधित है।
- धारा 81(1) के अधीन, किसी भी चुनाव पर प्रश्न उठाने वाली निर्वाचन याचिका ऐसे निर्वाचन में किसी भी उम्मीदवार या किसी भी मतदाता द्वारा उच्च न्यायालय में प्रस्तुत की जा सकती है।
- यह अधिनियम की धारा 100(1) और धारा 101 में निर्दिष्ट एक या अधिक आधारों पर आधारित होना चाहिये।
- इसे निर्वाचित उम्मीदवार के निर्वाचन की तारीख से 45 दिनों के भीतर प्रस्तुत किया जाना चाहिये। यदि दो या अधिक निर्वाचित उम्मीदवार अलग-अलग तारीखों पर चुने जाते हैं, तो यह अवधि उन तारीखों में से बाद वाली तारीख से गिनी जाएगी।
- प्रत्येक निर्वाचन याचिका के साथ उतनी ही प्रतियां संलग्न होनी चाहिये जितने प्रत्यर्थियों का उल्लेख याचिका में किया गया है।
लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 86 क्या है?
- धारा 86 निर्वाचन याचिकाओं के विचारण से संबंधित है।
- धारा 86(1) के अधीन, उच्च न्यायालय निर्वाचन याचिका को खारिज कर देगा जो अधिनियम की धारा 81, धारा 82 या धारा 117 के प्रावधानों का अनुपालन नहीं करती है।
- धारा 86(1) के अधीन बर्खास्तगी का आदेश अधिनियम की धारा 98(क) के अधीनक दिया गया आदेश माना जाएगा।