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सांविधानिक विधि
विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) 2002–04 और 2025–26 का तुलनात्मक अध्ययन
«13-Oct-2026
स्रोत: द हिंदू
परिचय
निर्वाचक नामावलियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के विरुद्ध देशभर में पुनः विरोध-प्रदर्शन हुए हैं। पूर्व निर्वाचन आयुक्तों तथा उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों ने वर्तमान स्वरूप में इस प्रक्रिया पर प्रश्न उठाए हैं, जबकि कुछ पूर्व न्यायाधीशों एवं नौकरशाहों ने इसका समर्थन किया है। वर्तमान विशेष गहन पुनरीक्षण के तीन चरणों के दौरान लगभग 13.3 करोड़ मतदाताओं के नाम निर्वाचक नामावलियों से विलोपित किये गए हैं। पूर्ववर्ती पुनरीक्षणों के विपरीत, जिनमें यह सुनिश्चित करने के लिये विस्तृत सुरक्षा उपाय किये गए थे कि किसी भी पात्र निर्वाचक का नाम नामावली से न हटाया जाए, वर्तमान प्रक्रिया को त्रुटिपूर्ण प्रक्रिया का अनुसरण करने वाला बताया जा रहा है।
विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) क्या है?
- लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 (RP Act) की धारा 21(3) भारत निर्वाचन आयोग (ECI) को किसी निर्वाचन क्षेत्र या उसके किसी भाग की निर्वाचक नामावली का विशेष पुनरीक्षण ऐसी रीति से कराने का अधिकार प्रदान करती है, जिसे आयोग उचित समझे।
- जून 2025 में, भारत निर्वाचन आयोग ने देशभर में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) कराने का निर्णय लिया, जिसका प्रथम चरण बिहार से प्रारंभ हुआ।
- द्वितीय चरण (अक्टूबर 2025 से फरवरी 2026) में नौ राज्य और तीन केंद्र शासित प्रदेश शामिल थे।
- तृतीय चरण की शुरुआत मई 2026 में हुई थी और इसमें 16 राज्य और तीन केंद्र शासित प्रदेश शामिल थे।
- मई 2026 में, उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि भारत निर्वाचन आयोग किसी राज्य के अनेक या सभी निर्वाचन क्षेत्रों में विशेष गहन पुनरीक्षण कराने के लिये अपने संवैधानिक अधिदेश के अंतर्गत पूर्णतः सक्षम है।
पूर्ववर्ती विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) किस प्रकार संचालित किया गया था?
विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) पूर्व में आठ बार संचालित किया जा चुका है, जिसमें अंतिम पुनरीक्षण वर्ष 2002 से 2004 के बीच किया गया था। मई 2002 के दिशा-निर्देशों की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
- घर-घर जाकर सत्यापन: गणनाकारों ने विद्यमान निर्वाचक नामावली के आधार पर तैयार की गई प्रारंभिक सूची का उपयोग करते हुए व्यक्तिगत रूप से घर-घर जाकर परिवारों का सत्यापन किया। निर्वाचित पंचायत सदस्य स्वेच्छा से इस प्रक्रिया में सहायता कर सकते थे।
- विस्तृत पर्यवेक्षण: पर्यवेक्षकों के लिए यह अनिवार्य था कि वे गणनाकारों द्वारा आच्छादित कम-से-कम 25% परिवारों का यादृच्छिक सत्यापन करें तथा उन मामलों में व्यक्तिगत रूप से सत्यापन करें, जिनमें बार-बार भ्रमण किये जाने के बावजूद किसी मकान पर ताला लगा होने की सूचना दी गई हो। सहायक निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों (AEROs), निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों (EROs) तथा जिला निर्वाचन अधिकारियों को क्रमशः कम-से-कम 12%, 5% और 2% परिवारों का सत्यापन करना आवश्यक था।
- नागरिकता: पहली बार निर्वाचक नामावली में नाम सम्मिलित कराने के लिए आवेदन करने वाले व्यक्तियों पर अपनी नागरिकता सिद्ध करने का भार था। तथापि, लाल बाबू हुसैन और अन्य (1995) के मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्णय के अनुसरण में, निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी के लिए यह आवश्यक था कि वह किसी व्यक्ति का नाम विद्यमान निर्वाचक नामावली में दर्ज होने के तथ्य को पर्याप्त साक्ष्यात्मक महत्त्व प्रदान करे।
- स्थानांतरित निर्वाचकों को नामांतरण के रूप में मानना: स्थानांतरित हो चुके निर्वाचकों की प्रविष्टियों को मिटाने के बजाय उन पर रेखा खींचकर “S” अंकित किया जाता था तथा गणनाकार उनके नए पते का अभिलेखन करते थे। यदि किसी परिवार के सभी सदस्यों के स्थानांतरित होने की सूचना होती थी, तो पर्यवेक्षक व्यक्तिगत रूप से उसका सत्यापन करते थे। चूँकि सभी क्षेत्रों की गणना एक साथ की जाती थी, इसलिये स्थानांतरित निर्वाचकों के नाम उसी पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान उनके नए पते पर दर्ज किये जाते थे और मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी यह सुनिश्चित करता था कि पुराने पते पर दर्ज प्रविष्टि विलोपित कर दी जाए। केवल वे निर्वाचक, जिनके नाम नए पते पर दर्ज होने से छूट गए थे, दावों एवं आपत्तियों की अवधि के दौरान आवेदन करने के लिए बाध्य थे।
- सामूहिक दावों की अस्वीकृति: किसी व्यक्ति, संगठन या राजनीतिक दल द्वारा सामूहिक रूप से प्रस्तुत दावों एवं आपत्तियों को संक्षिप्त आदेश द्वारा निरस्त किया जाना था। अंतिम निर्वाचक नामावली सभी दावों एवं आपत्तियों का निस्तारण किये जाने के पश्चात् ही तैयार की जाती थी।
वर्तमान विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से संबंधित प्रमुख मुद्दे क्या हैं?
- अज्ञात निर्वाचकों का अपवर्जन: जिन निर्वाचकों का पता नहीं लगाया जा सका अथवा जिन्होंने प्रपत्र वापस नहीं किया, उनके नाम प्रारूप निर्वाचक नामावली से अपवर्जित कर दिये गए, भले ही उन्होंने पूर्ववर्ती निर्वाचनों में मतदान किया हो।
- स्थानांतरित निर्वाचकों के साथ व्यवहार: वर्ष 2002 के विपरीत, वर्तमान पुनरीक्षण में स्थानांतरित निर्वाचकों के नाम उसी प्रक्रिया के दौरान उनके नए पते पर दर्ज नहीं किये गए। ऐसे निर्वाचकों को प्ररूप 8 (Form 8) प्रस्तुत करना होगा अथवा, यदि उनका नाम दर्ज होने से छूट गया हो, तो नए निर्वाचकों के लिए निर्धारित प्ररूप 6 (Form 6) के माध्यम से नए सिरे से आवेदन करना होगा। यह भारत निर्वाचन आयोग की अपनी निर्वाचक नामावलियों संबंधी नियमावली, 2023 के विपरीत है। उक्त नियमावली के अनुसार, स्थानांतरित निर्वाचकों का पता लगाया जा सकने की स्थिति में उन्हें नोटिस दिया जाना चाहिये तथा जिनका पता नहीं लगाया जा सकता, उनके अंतिम ज्ञात पते पर वयस्क साक्षियों की उपस्थिति में नोटिस चस्पा किया जाना चाहिये। नाम विलोपित करने से पूर्व इन प्रक्रियाओं का पालन किया जाना आवश्यक है।
- कमजोर पर्यवेक्षण: बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण संबंधी अधिसूचना में पर्यवेक्षकों द्वारा केवल 10% मामलों का यादृच्छिक सत्यापन अनिवार्य किया गया है। इसके अतिरिक्त, निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी द्वारा सहायक निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों, पर्यवेक्षकों तथा बूथ-स्तरीय अधिकारियों (BLOs) के साथ नियमित निगरानी बैठकें आयोजित करने का प्रावधान है।
- सबूत का भार स्थानांतरित करना: निर्वाचकों से अपेक्षा की जाती है कि वे लगभग दो दशक पूर्व किये गए अंतिम गहन पुनरीक्षण की निर्वाचक नामावलियों में स्वयं अथवा अपने माता-पिता का नाम खोजें या नागरिकता स्थापित करने वाले दस्तावेज प्रस्तुत करें। इसे सामान्य निर्वाचकों पर अपनी पात्रता साबित करने का भार डालने के रूप में देखा जा रहा है।
- सॉफ्टवेयर द्वारा उत्पन्न "तार्किक विसंगतियाँ": वर्तनी में अंतर, किसी एक पूर्वज से छह से अधिक निर्वाचकों का संबद्ध होना तथा माता-पिता और संतान की आयु में 15 से 45 वर्ष की निर्धारित सीमा से बाहर का अंतर जैसी विसंगतियों को चिह्नित किये जाने के कारण लाखों पात्र निर्वाचकों को मनमाने ढंग से अपवर्जित किये जाने की स्थिति उत्पन्न हुई है।
- सामूहिक आपत्तियाँ: नाम विलोपित कराने के लिए प्ररूप 7 (Form 7), अर्थात् आपत्ति प्रपत्र, सामूहिक रूप से प्रस्तुत किये जाने की खबरें सामने आई हैं। भारत निर्वाचन आयोग ने प्रति व्यक्ति प्रस्तुत किये जा सकने वाले आपत्ति प्रपत्रों की संख्या पर सीमा केवल 9 अक्टूबर को निर्धारित की।
- विधिक चिंताएँ: प्ररूप 6 के साथ संलग्न घोषणा की वैधता, निर्वाचक नामावली से विलोपित निर्वाचकों के नाम पुनः दर्ज करने के लिये प्ररूप 6 के उपयोग तथा बड़ी संख्या में अपीलों का निस्तारण करने की जटिल प्रक्रिया को लेकर भी प्रश्न उठाए गए हैं।
विलोपन का पैमाना क्या है?
- तीनों चरणों में लगभग 13.3 करोड़ निर्वाचकों के नाम हटा दिये गए हैं।
- लगभग 2.7 करोड़ (20%) प्रविष्टियाँ मृत्यु के कारण हटा दी गईं, और 1.01 करोड़ (7.6%) प्रविष्टियों को डुप्लिकेट प्रविष्टियों के रूप में चिह्नित किया गया।
- लगभग 9.5 करोड़ निर्वाचक (71%) "अनुपस्थित, स्थानांतरित और अन्य" श्रेणी में आते हैं, जिनमें से कई पुन: नामांकन के लिये पात्र हो सकते हैं।
आगे की राह क्या है?
- अब तक अंतिम रूप दिये गए नामों की सूचियों का विस्तृत ऑडिट किया जाना चाहिये।
- पुनः नामांकन के लिये पात्र दावों को घर-घर जाकर और निर्वाचक नामावलियों को अद्यतन करके शीघ्रता से निपटाया जाना चाहिये।
- जिन राज्यों में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की प्रक्रिया जारी है, वहाँ घर-घर जाकर गणना करना निर्धारित प्रक्रिया होनी चाहिये।
- निर्वाचक नामावलियों को सभी दावों एवं आपत्तियों का निस्तारण किए जाने के पश्चात् ही अंतिम रूप दिया जाना चाहिये।
- लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21(3) के परंतुक के अधीन, विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया सम्यक् प्रक्रिया का पालन करते हुए पूर्ण होने तक, पूर्ववर्ती निर्वाचक नामावलियाँ प्रवृत्त रह सकती हैं तथा आगामी राज्य विधानसभा निर्वाचनों में उनका उपयोग किया जा सकता है।
निष्कर्ष
मतदान का अधिकार भारतीय लोकतंत्र की नींव है, और निर्वाचक नामावलियों में किसी भी संशोधन का उद्देश्य इसे कमजोर करने के बजाय इसकी रक्षा करना होना चाहिये। वर्ष 2002–04 के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के साथ तुलना से स्पष्ट होता है कि पूर्ववर्ती प्रक्रिया में सत्यापन का भार मुख्यतः राज्य पर था, जिसके अंतर्गत घर-घर जाकर गणना, निकट पर्यवेक्षण तथा स्थानांतरित निर्वाचकों को नामांतरण के रूप में मानने जैसी व्यवस्थाएँ सम्मिलित थीं। इसके विपरीत, वर्तमान विशेष गहन पुनरीक्षण में यह भार निर्वाचक पर डाल दिया गया है। इन सुरक्षा उपायों को पुनः स्थापित करना तथा पात्र मतदाताओं के पुनः नामांकन की प्रक्रिया में तेजी लाना यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है कि कोई भी पात्र नागरिक निर्वाचक नामावली में नाम दर्ज होने से वंचित न रह जाए।